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“फिर मिलेंगे क्योंकि शो अभी जारी है”

जहां किसी ने चंद लम्हे बिताए हों उस जगह से खुद-ब-खुद एक रिश्ता कायम हो जाता है। फिर शशि शेखर ने तो अमर उजाला में सात साल बिताए हैं। उस संस्थान से उनका रिश्ता कितना मजबूत होगा इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। हिंदुस्तान में नई पारी शुरू करने से पहले अमर उजाला के समूह संपादक ने साथियों को विदाई संदेश भेजा। दिल को छू लेने वाला विदाई संदेश। आप सब वो संदेश पढ़िए। इस संदेश का सार यही है कि ज़िंदगी सूदखोर महाजन की तरह है। वो बिना कीमत वसूले किसी को कुछ नहीं देती।

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शशि शेखर ने दुष्यंत की जिस चर्चित ग़ज़ल का जिक्र किया है वो ग़ज़ल


ये सच है कि पांवों ने बहुत कष्ट उठाए
पर पांवों किसी तरह से राहों पे तो आए

हाथों में अंगारों को लिए सोच रहा था
कोई मुझे अंगारों की तासीर बताए

जैसे किसी बच्चे को खिलौने न मिले हों
फिरता हूं कई यादों को सीने से लगाए

चट्टानों से पांवों को बचा कर नहीं चलते
सहमे हुए पांवों से लिपट जाते हैं साए

यों पहले भी अपना—सा यहां कुछ तो नहीं था
अब और नज़ारे हमें लगते हैं पराए.

अब तुमसे रुखसत होता हूं

एक वरिष्ठ साथी ने एसएमएस भेजा है- “किसी चिराग का कोई मकां नहीं होता, जहां भी रहेगा रोशनी लुटाएगा। सर, आपको नई पारी की अग्रिम शुभकामनाएं। आपको हर पल मिस करेंगे। सादर…”

यह अकेला एसएमएस नहीं है। जिस दिन से मेरे जाने की खबर उजागर हुई है, उस दिन से सैकड़ों साथियों के फोन, ई-मेल और एसएमएस और फोन मुझे रुलाते रहे हैं। कभी सोचा भी नहीं था कि चौबीस घंटे काम में मशगूल रहने के बावजूद स्नेह के तंतु इतने मजबूत हो जाएंगे कि सब कुछ तरल और धुंधला नजर आएगा। इसीलिए जाते समय कृतज्ञता के कहीं गहरे धंसे लंगर से खुद को बंधा हुआ महसूस कर रहा हूं। जहां भी रहूंगा, जैसा भी रहूंगा, स्नेह की यह डोर मेरे चारों ओर लिपटी रहेगी और एहसास दिलाएगी कि ईमानदारी का जवाब ईमानदारी है। भावना का जवाब भावना है। यह डोर इसकी गवाह है। आंधी और पानी के ये सात साल जाने कैसे गुजर गए। मैंने अपने बच्चों को बड़ा होता हुआ नहीं देखा। पर अमर उजाला को बढ़ा देखता रहा। साथियों को पनपता देखता रहा। दिन, तारीख और साल ऐसे में कैसे दिखते?

कृतज्ञ हूं कि मुझे आप जैसे सहयोगी मिले, जिन्होंने सुर से सुर मिलाया और हम एक महागान की सर्जना कर सके। मैं भाग्यशाली हूं कि इस दौरान मालिकों का भी भरपूर सहारा मिला। आपका सहयोग, उनका सहारा और मेरे सपने मिल-जुलकर एक मीठी कहानी-सी बन गए। उम्मीद है कि यह मिठास रह जाएगी। इस संदेश के बाद sshekhar@amarujala.com को डिलीट कर दिया जाएगा। अब न उस पर कोई संदेश आएगा, न जाएगा। पर यह अफसाना अधूरा रह जाएगा, अगर मैं अतुल माहेश्वरी जी की चर्चा न करूं। दुष्यंत ने कभी कमलेश्वर के लिए कहा था। आज मैं उसी शेर को उन्हें समर्पित कर रहा हूं- “मैं तो हाथ में अंगारे लिए सोच रहा था, कोई मुझे उनकी तासीर बता दे।” उम्मीद है, फिर मिलेंगे, क्योंकि शो अभी जारी है।

आपका
शशि शेखर

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