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बिग अड्डा पर बिग बॉस के बारे में बिग बी की बातें

अपने ब्लॉग पर अमिताभ बच्चन ने बिग बॉस के बारे में विस्तार से बताया है। इस शो को लेकर उनकी क्या सोच है और कलर्स के प्रस्ताव को मंजूर करने से पहले वो किस किस्म के संशोधन चाहते थे उन सबके बारे में जानकारी दी है। पेश है उसी ब्योरे के कुछ अंश

एक दूसरे से अनजान 13 व्यक्ति। जिन पर 35 कैमरों की मदद से पैनी नज़र रखी जा रही हो। बाहरी दुनिया से एकदम अलग, एक मकान में 84 दिन के लिए रखे जाते हैं…. आखिर इस जहान में कोई ऐसा सोच भी कैसे सकता है? क्या एक सुबह अचानक वो (प्रोग्राम बनाने वाले) उठे और इस काम में जुट गए? क्या यह एक ऐसे इंसान का बेतुका ख़्याल है जिसका दिमाग क्षतिग्रस्त हो चुका है? आखिर ये है क्या?

मुझे लगता है कि जिन लोगों ने भी इस शो का खाका तैयार किया है उन्होंने बिग बॉस कार्यक्रम में मिलने वाली कठिन चुनौतियों के बीच इंसानी दिमाग की प्रतिक्रिया पर काफी गहरा शोध किया है।…

… आपको कैसा लगेगा जब सुबह अपने अख़बार से ज़ुदा कर दिया जाए। राष्ट्रीय अवकाश वाले दिन जब प्रेस बंद रहते हैं, हमारी सुबह बेतरतीब सी लगती है। सोचिए 84 दिन तक कोई अख़बार नहीं। बाहरी दुनिया से जोड़ने वाला मोबाइल फोन या फिर कोई और माध्यम नहीं। किसी भी तरह के मनोरंजन का कोई साधन नहीं। टेलीविजन और रेडियो नहीं। समय बताने के लिए कोई टाइम मशीन नहीं।

और तब … एक हफ़्ते बाद आप, उस मकान के वाशिंदों ने जो कुछ भी किया, उसका मूल्यांकन करने के लिए पहुंचते हैं। यह किसी चुनौती से कम नहीं। मुझे लगा कि हफ़्ते भर बाद वोटिंग के आधार पर किसी प्रतियोगी को सिर्फ़ बाहर करने की जगह, उनसे बात करके, उनकी सोच के स्तर पर जाकर, बीते हफ़्ते उनके बर्तावों का तार्किक आधार पता लगाने की कोशिश होनी चाहिए। लगा कि शो के दौरान यह तत्व उभर कर सामने आ सके तो इससे न केवल बिग बॉस के प्रतियोगियों को अगले सप्ताह अपने आचरण का मूल्याकंन करने का अवसर मिलेगा बल्कि दर्शकों को भी काफी कुछ खुराक मिलेगी।

हमारी सोच, उन पलों को बौद्धिक बनाने की या फिर मसीहा बनने की नहीं है। और न ही आधिकारिक जज या जूरी बनने की। बल्कि कोशिश एक फ्रेंड फिलॉस्फर (दार्शनिक दोस्त), एक पॉप फिलॉस्फर, बनने की है। पॉप फिलॉस्फर चैनल के द्वारा दिया गया नाम है।…

… इस शो में अपनी भूमिका मंजूर करने से पहले मैनेजमेंट को मुझे इसी तत्व के बारे में भरोसे में लेना था। उन्होंने इस विचार की प्रशंसा की। कॉन्सेप्ट को एक नई ऊंचाई तक ले जाने का भरोसा दिया। वो इस अभियान में जुट गए कि नई क्षमता से साथ इस विचार को अमल में लाया जा सके।

कार्यक्रम की बनावट से लेकर, फर्नीचर की साज सज्जा और प्रतियोगियों को लाने का तरीका – सभी कुछ में काफी बदलाव बुआ। और मैं यह देख कर खुश हूं कि उन लोगों में शुरुआत से ही यह इच्छा रही कि जो भी बातचीत हुई उस पर अमल सुनिश्चित हो सके।…

((पूरा ब्योरा पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें))

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