पिछले महीने हमने सहारा में छंटनी की ख़बर प्रकाशित की। उसके बाद एक कानूनी नोटिस मिल गया। उसके बाद इलाहाबाद से मोहम्मद मोईन ने जनतंत्र ब्लॉग के लिए अपना लेख भेजा। उस लेख के बाद अब कोई जनतंत्र के शुभेच्छु हैं जो बार-बार ये बताने की कोशिश कर रहे हैं कि निकाले जा रहे कर्मचारियों के हितों से जुड़ी ख़बरें और लेख प्रकाशित करके हम ग़लत कर रहे हैं। उनके मुताबिक छंटनी की ख़बर सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के लिए प्रकाशित की गई थी। शुभेच्छु जी ने अपना नाम और पता नहीं दिया है। परिचय के नाम पर उन्होंने इतना ही कहा है कि वो सहारा के कर्मचारी हैं। उनका यह दावा कितना पुख़्ता है यह कहना मुश्किल है। लेकिन यह सोच कर हैरानी होती है कि हमारे बीच कुछ ऐसे लोग भी हैं जिन्हें निकाले जा रहे साथियों के प्रति हल्की सी सहानुभूति भी नहीं। आगे बढ़ने से पहले आप उनकी पहली टिप्पणी पढ़िए।
श्री समरेन्द्र जी/ श्री मोईन जी
यह लेख पढने के बाद मुझे काफी गुस्सा आया और आप दोनों पर दया भी. ऐसा लगता है आप दोनों की सहारा से कोई पुरानी चिढ है. जो बातें लिखी गयी हैं, वह काफी बचकानी हैं और लगता है सस्ती लोकप्रियता पाने के लिए किसी नामचीन हस्ती की आलोचना करने का शार्टकट नुस्खा आप लोगों ने सीख लिया है. आप पत्रकारों के हमदर्द हैं, यह अच्छी बात है, लेकिन पिछले एक साल में कोई ऐसा न्यूज़ चैनल नहीं, जहां स्टाफ की छंटनी न की गयी हो. ऐसा कोई संस्थान नहीं जहां पत्रकारों पर गाज न गिरी हो, लेकिन वह आप लोगों को नज़र क्यों नहीं आई. तब आपकी कलम खामोश क्यों रही. आप दोनों खुद जिस संस्थान में थे या हैं, क्या वहां पत्रकारों के साथ बड़ा अच्छा सलूक किया जाता है? लेकिन वह आपको नहीं दिखेगा. सहारा ने अपने संस्थान के पत्रकारों को जितनी सुख-सुविधाएं व मान-सम्मान दिया, क्या उतना किसी और जगह के लोगों को मिला है? एक पत्ता क्या हिला, आप लोगों ने तूफ़ान मचा दिया और जहां वाकई तूफ़ान आया वहां आंख बंद कर ली. मैं खुद सहारा में हूं, लेकिन अपना नाम देकर बेवजह के विवाद में नहीं पढ़ना चाहता. अंत में ईश्वर से प्रार्थना करता हूं कि वह आप दोनों को सदबुद्धि दे. आपके पोर्टल की एक अलग पहचान थी, लेकिन लगता है ज़्यादा भीड़ बटोरने के चक्कर में आप इसे चूरन बना देना चाहते हैं और खुद दूसरों को चूरन वाला बताते हैं. हो सकता है आप मेरी टिप्पणी प्रकाशित भी न करें, लेकिन अगर सच का सामना करने की हिम्मत है तो मेरी इस सच्चाई पर पोर्टल के माध्यम से अपनी प्रतिक्रिया भी दे.
जनतंत्र का एक शुभेच्छु
117.199.147.246
indiasbest001@gmail.com
जैसा कि आपने पढ़ा, अपनी टिप्पणी के आखिर में शुभेच्छु जी ने हमसे प्रतिक्रिया मांगी थी। हमने उनको अपनी प्रतिक्रिया दी। बताया कि दूसरे संस्थानों में छंटनी की ख़बरें भी प्रकाशित की गईं हैं और इसमें कोई भेदभाव नहीं किया गया।
जनतंत्र के शुभेच्छु जी,
आप पहले पढ़ा कीजिए। उसके बाद अपनी टिप्पणी दीजिए। आपसे किसने कहा है कि दूसरी जगहों पर हो रही छंटनी की ख़बरें जनतंत्र पर नहीं छपती हैं। एनडीटीवी, न्यूज़ एक्स, वॉयस ऑफ इंडिया और डीएनए समेत सभी जगहों पर हुई छंटनी की ख़बरें यहां छपी हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया, दैनिक जागरण, हिंदुस्तान, दैनिक भास्कर, जनसत्ता समेत सभी अख़बारों की ख़बरों के बारे में लिखा गया है। प्रभाष जोशी, शेखर गुप्ता, आलोक मेहता, मृणाल पांडे, हरिवंश, शैलेंद्र दीक्षित समेत कई बड़े और सम्मानित संपादकों की नीतियों और विचारों के बारे में नाम लेकर लिखा गया है। बहुत कड़े शब्दों में आलोचना की गई है। सबने उन खबरों को पढ़ा है और बहुतों ने उन पर अपनी प्रतिक्रिया दी है। लेकिन आप जैसी बौखलाहट कहीं नज़र नहीं आई। शायद इसलिए कि आप एक एजेंडे के तहत जनतंत्र पर पहुंचे और अपने गुस्से को जाहिर कर दिया। इसलिए आपसे एक ही गुजारिश है कि आलोचना करने से पहले पढ़ा कीजिए।
रही बात जनतंत्र पर टिप्पणी को प्रकाशित करने या नहीं करने की तो यहां पर हमारी नीति साफ है। अगर आपने गाली का सीधे तौर पर या फिर घुमा कर प्रयोग नहीं किया है… अगर आपने किसी का भी चरित्र हनन नहीं किया तो आपकी बात चाहे कितनी भी तल्ख क्यों न हो हम उसे सेंसर नहीं करेंगे। हमारी कोशिश जनतंत्र को एक सार्थक बहस के मंच के तौर पर विकसित करने की है।
आखिर में बस इतना ही कि आप हम लोगों के लिए कोई प्रार्थना मत कीजिए। ईश्वर से तो कतई नहीं।
- मॉडरेटर
इस प्रतिक्रिया के बाद शुभेच्छु जी ने दूसरी टिप्पणी चस्पा की।
श्री समरेन्द्र जी/ श्री मोईन जी,
आशा के विपरीत आपने मेरी टिप्पणी तो प्रकाशित कर दी, पर अपनी वाह-वाही लूटने से खुद को रोक नहीं सके. टिप्पणी के साथ ही अपना एक पुछल्ला भी लगा दिया, लेकिन उसमे मेरे द्बारा उठाये गए सवाल नदारद रहे, आप खुद अपने मुंह मियां मिट्ठू बनते रहे. आप लोग तो कई संस्थानों में रहे हैं, तमाम अनुभव होंगे. क्या सहारा जितना पैसा, मान-सम्मान और सुविधाएं दूसरे किसी मीडिया हाउस ने अपने कर्मचारियों को दी हैं. बेशक नहीं. आप भी इस सच से इनकार नहीं कर सकते, लेकिन इसे स्वीकारेंगे नहीं, क्योंकि आप तो हमारे संस्थान के खिलाफ एक ख़ास उद्देश्य से दुष्प्रचार में लगे हैं. ऐसे में आपसे किसी जवाब की उम्मीद करना बेमतलब है. आप भले ही कुछ कहें, लेकिन सहारा श्री इस देश में पूजे जाते हैं. तमाम घरों के चूल्हे उन्ही की वजह से जलते हैं. हमारे और हमारे जैसे हजारों लोगों के लिए तो वह साक्षात भगवान हैं. लेकिन यह सब आपको इस वजह से नज़र नहीं आएंगा, क्योंकि आपने लेख में तो धृतराष्ट्र और गांधारी का जिक्र किया, लेकिन खुद अपनी आँखों पर पट्टी बांधे हुए हैं. आप लोग सिर्फ वही देखते हैं, जो आप देखना चाहते हैं. सच तो कतई नहीं. छोडिये!
मैं आप लोगों की व्याकुलता और विवशता समझ सकता हूं. एक ने कई मीडिया हाउस में काम किया, लेकिन हर बार बाहर का रास्ता देखना पडा, और दूसरे महाशय 12-14 साल खपाने के बाद भी अभी किसी चैनल के नियमित स्टाफ नहीं बन सके. सो, सहारा में नौकरी पाने या कुछ और पाने की लालसा में यह दांव खेलने को विवश हैं. मैं भी मीडिया में हूं, और एक पेशे में होने के नाते आप दोनों साथियों को सलाह दे रहा हूं कि खुद को कुंठित होने से बचाइये. सहारा परिवार ने बहुतों की मदद की है. उन्हें रोज़गार दिया है. अपने नाम की तरह ही सहारा दिया है. फिर आप दोनों की अनदेखी कैसे की जा सकती है. इस तरह बेवजह कीचड़ मत उछालिये. मन के मैल मिटाकर खुले दिल से आइये, यकीन मानिए आपको नौकरी के लिए निराश नहीं होना पड़ेगा. वैसे भी आप दोनों अच्छा लिख ही लेते हैं, कम से कम पोर्टल देखकर तो ऐसा ही लगता है. मेरी बातों का बुरा मत मानियेगा, तिलमिलाइएगा भी नहीं. मैं कोई पराया नहीं. आपका ही भाई हूं. इसलिए अंत में एक और सलाह देना चाहता हूं. पत्रकारिता के नाम को गंदा मत करिए. अपनी योग्यता और कलम का सही इस्तेमाल करिए, वरना लोकतंत्र सचमुच खतरे में पड़ जाएगा. जिसके जिम्मेदार भी तो आप जैसे लोग ही होंगे.
जनतंत्र का एक शुभेच्छु
117.199.144.209
indiasbest001@gmail.com
शुभेच्छु जी का कहना है कि ऐसी ख़बरें प्रकाशित करने से “लोकतंत्र” ख़तरे में पड़ जाएगा और उसके लिए हम लोग ही जिम्मेदार होंगे। हम आपसे बस यही पूछना चाहते हैं कि मीडिया संस्थानों में हो रही छंटनी की ख़बर प्रकाशित करने से क्या सच में “लोकतंत्र” ख़तरे में पड़ जाएगा?
one Journalist
September 5, 2009 at 5:06 am
I think this man is not a journalist, this is behave like Sahara Agent. it is very bad, Usme Sach Sunane ki takat nahi hai….
शशि सिंह
September 5, 2009 at 8:22 am
हंसी आ रही है… और क्या कहूं? नहीं… नहीं… श्रीमान शुभेच्छु जी पर दया भी आ रही है।
संदीप
September 5, 2009 at 3:49 pm
भई यह तो वाकई में शुभेच्छु हैं, लेकिन आपके यानि जनतंत्र, या सहारा कर्मियों के नहीं; बल्कि मालिकों की जमात के शुभेच्छु है। चाटुकारिता की चाशनी में सने इनके शब्दों को पढ़कर, कहीं पढ़ी हुई तारीफ याद आ रही है, किसी महोदय ने किसी पत्र में अंग्रेजों की तारीफ करते हुए लिखा था कि अंग्रेज नहीं होते तो भारत के लोग शिक्षित-सुसंस्कृत नहीं होते, यहां ट्रेन नहीं आतीं, डाक व्यवस्था तो दूर की बात है…आदि आदि। ये उसी तरह भाट-चारण परंपरा का पालन करते हुए इनके माई-बाप सहारा को भगवान बनाने पर तुले हुए हैं….
ramesh
September 7, 2009 at 6:46 pm
subhkshu ji mujhko lagata hai aap ko sahara se sabse pahale bahar kiya jana chaiye, kyoki ye company aap jaise tel lagane walo ki vajah se hi barbad hui hai, & for your information – i am the employee of sahara samay 2, & posted some were in UP.
Joy
September 5, 2009 at 1:03 pm
एक सिरे से सबसे इस्तीफा न मांग कर…चैनल के अंदर उन बड़े हाथियों की खोज की जानी चहिए…जो हर महिने मोटे रकम एटते तो हैं ही साथ में किसी प्रकार की कोई काम नही करते…पहले इन्हें हटाए… पुराने लोगो में ही ये लोग शामिल हैं…जो अब अपने आप को सहारा के खास मानते तो है ही और दुसरो पर भी ये रोप दिखाने की कोशिश कर काम से बचते हैं…क्योकि इन्हें काम नहीं आता…
दुसरा कम और नये और तजुर्वेकार पुराने लोगो की खोज कर उन्हें चैनल की जिम्मेदारी दी जाएं…ना की दुसरे चैनल से बड़े रकम में चैनल हेड या लोग ढूड़ लाए…तभी सहारा में सब ठिक होगा…आज देश के सभी शीर्ष चैनल भले वो अंग्रेजी हो या फिर हिंदी सभी में 70 प्रतिशत सहारा के लोग हैं… इसलिए लकनऊ को गौर करना चहिए कि हिरे अपने अंदर ही हैं…उन्हें ढूड़ कर मौका दिया जाना चहिए… नहीं तो क्या हैं बाहर से अच्छे ऑफर मिलते ही ये भी उड़न छू हो जायेंगे…और नुकसान सहारा को ही होगा…जो हो रहा हैं…
yatin sharma
September 5, 2009 at 11:03 pm
main 14 years se sahara me thaa bade utaae chadhav dekhe maine apane jawani k din sahara k saath sahih gujare accha anubhav hua delhi se lucknow sahara sahar tak main apani sari zindgi sahara k naam kar diya is ummied k saath ki aaj ya fir kal kuch accha hoga lekin sab bekar aakhir me mujhe hi faisla karna pada aur sahara chordna pada wo sahara shri ki vajah se nahi wo to waqai bhagwan hai aur hamesha rahenge lekin ‘shubhekshu ji jaise saapon’ ko paal kar sahara samay media ko bhi barbaad kar diya. acche khase channel ko loot liya gaya aur to aur ab sahara samay bikane ki kagar par ja pahuncha kaun hai zimmedaar sahara shri? jawab nahi
employee?jawab nahi sahara samay ko iss halat me pahunchane wale koi aur nahi sahara k bade dalal hai aur dekhna shubhekshu ji aap bhi kuch din baad yahi vichar denge jantantra k dwara kyonki aap bhi tab tak sahara me nahi rahenge aage bus yahee kahenge ”tel dekha? ab tel ki dhaar dekho
dhanyaad
RAKESH SING
September 6, 2009 at 9:00 am
शुभेच्छु की जी बाते पढ़कर आश्चर्य हो रहा है। ये तो ऐसे लिख रहे हैं जैसे कि कोई सहारा को जानता ही नहीं है। हम भी सहारा को बेहतर तरीके से जानते हैं। लगता है शुभेच्छु उन लोगों में से हैं जो केबिन में बैठने वालों के आगे पीछे घूमते हैं और चाय पिलाते रहते हैं। भगवान उनको सदबुद्धि दे।
suman
September 6, 2009 at 11:12 am
shubechu ji se puchiye jab ye sahara se bahar honge to kaisa lagega..puchiye un logo se jo pichle 3 mahine me sahara se nikale yage..kya unke bachche school ja re hai, kya unke ghar me dono waqt chulha jal raha hai..ha un logo ki tarah subhechu ji agar sirf patrakarita karte honge to shayad dadr shmajhenge nahi to kuch khaas logo ki tarah “note banaye honge patrakarita bechkar to fir inhe kya pata un garibo ka dard..
aise subhechuo ko to……
we r all with “sach”ke sath..
jantantra aapko badhae..
deepak
September 6, 2009 at 1:59 pm
yatin ji ki baat se main sahmat hoom shubechu ji jaise kitne log sahara me hai jo isi baat ka paisa pate hai bhagwan shubechu ji jaise logo ko sahara me se joote maar maar kar bahar nikal dena chahiye jisse ki sahara ki wishvanitiya bani rahe
SHIVA G
September 7, 2009 at 6:41 pm
u r right sir
sanjay sharma
September 8, 2009 at 1:16 am
Likhne k liye bahut kuch hai lekin bus itna hi kahunga ki ek samay thaa jab sahara samay ka bhi naam thaa ab lagta hai shubhekshu ji jaise deemak ki vajah se poora sahara hi khokhla ho gaya hai. Kya kahoon ab to shabd bhi khtam ho gaye hai. Bus yahi kahunga pata nahi kitno ki roji roti abhi aur jayegi jinhone ne apani sari zindgi sahara ko de di unko ratorat sahara se bahar kar diya gaya. Are shubekshu ji agar aap itne hi sacche the to kam se kam apana poora naam hi likh dete. Dar gaye the kya? ‘jantantra’ aap jaise logo k liye hi to bana hai. Jis sahara samay ki tarif karte fir rahe hai na aap, aap ko kya pata hai us sahara me kya kya hota hai. Zara acchi tarah andar jhaank kar dekhiye khud apane aap se dar jayenge. Samne wale par ungli uthane se pahle dekh liya keejiye ki baki 3 ungli aap ki taraf hai shayad samajh gaye honge aap ‘jai ho jantantra ki’