चलिए प्रभाष जोशी ने जवाब तो दिया वरना हमें तो लगने लगा था कि उम्र की इस दहलीज पर आ कर उन्हें सुनाई और दिखाई कम देने लगा है। तभी तो उनके इंटरव्यू पर घमासान छिड़ा है और वो हैं कि कान में रुई ठूंस कर मस्त घूम रहे हैं। पश्चिम बंगाल की सरकार के ख़िलाफ़ “खास मकसद” से लिखी गई एक पुस्तक का विमोचन करते फिर रहे हैं। बात अटपटी लगती है। नक्सलियों की आड़ में संघियों और कांग्रेसियों का यह गठजोड़ अजीब लगता है। लेकिन इस पर बात फिर कभी। जैसा कि प्रभाष जोशी कहते हैं कि यह बताऊंगा तो बहस पटरी से उतर जाएगी। इसलिए हम इस अजीब से दिखने वाले गठजोड़ पर चर्चा करेंगे और सिर्फ इसी पर क्यों? चर्चा “मनुवादी” प्रभाष जोशी के दंभ पर होगी। उनकी साज़िशों पर होगी। उनकी तथ्यात्मक ग़लतियों पर होगी। और बहुसंख्य आबादी के प्रति उनकी घृणित सोच पर होगी। लेकिन उससे पहले आप प्रभाष जोशी का लेख पढ़िए और हर शब्द में छिपे अर्थ को समझने की कोशिश कीजिए।- मॉडरेटर
चलो, कोई तो मैदान में उतरा। न सही लोकसभा चुनाव जैसे नाजुक और निर्णायक मौके पर काला धन लेकर चुनावी विज्ञापन को खबर बना कर बेचने वाला अखबार मालिक, उसका संपादक या जनरल मैनेजर। कोई प्रमोद रंजन ही सही, जिनका मानना है कि विज्ञापन को खबर बना कर बेचने से ज्यादा बुरा और खतरनाक तो पत्रकारिता में जाति धर्म और मित्र धर्म का निर्वाह है। क्योंकि इससे मूल्यों में ऐसे भयावह क्षरण से नुकसान दलित-पिछड़ों की राजनीतिक ताकतों, वाम आंदोलनों और प्रतिरोध की उन शक्तियों का भी हुआ है जो इसके प्रगतिशील तबके से नैतिक और वैचारिक समर्थन की उम्मीद करते हैं। मीडिया के ब्राह्मणवादी पूंजीवाद ने इन्हें उपेक्षित, अपमानित और दिग्भ्रमित भी किया है।
प्रमोद रंजन के इसी लेख पर बिफरे हैं प्रभाष जोशी
“कानपुर में स्वर्गीय नरेंद्र मोहन(दैनिक जागरण के मालिक) के नाम पर पुल का नामांकरण उस समय हुआ जब मैं उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री था. उनके मल्टीप्लैक्स को जमीन हमारे समय में दी गयी. जागरण का जो स्कूल चलता है और उनका जहां दफ्तर है. उनकी जमीनें हमारे समय में उन्हें मिलीं. लेकिन यह सब मैंने किसी अपेक्षा में नहीं अपना मित्र धर्म निभाते हुए किया. फिर भी मेरे साथ ऐसा व्यवहार (खबर के लिए पैसे की मांग) हुआ. इतनी निर्लज्जता से चलेंगे तो कैसे चलेंगे रिश्ते।”
-लालजी टंडन, लखनऊ से भाजपा के विजयी लोकसभा प्रत्याशी (1)“दैनिक जागरण के मालिक को हमने वोट देकर सांसद बनाया था. वे बताएं वोट के बदले उनने हमें कितना धन दिया था. तब खबर के लिए हम धन क्यों दें।” -मोहन सिंह, देवरिया से सपा के पराजित लोकसभा प्रत्याशी (2)
“मैंने उषा मार्टिन (प्रभात खबर को चलाने वाली कंपनी) को भी कठोतिया कोल ब्लॉक दिया. प्रभात खबर को यह बताना चाहिए कि उसकी ‘शर्तें क्या थीं. मैंने उनसे कितने पैसे लिए.”
-मधु कोड़ा, झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री, चाईबासा से निर्दलीय सांसद (3)मीडिया पर चुनावों के दौरान पक्षपात के आरोप लगते रहे हैं. इस तरह के आरोप प्राय: चुनाव हार गये दल और प्रत्याशी लगाते हैं. या फिर दलित-पिछड़े नेताओं की ब्राह्मण-बनिया प्रेस से शिकायतें रही हैं. इस तरह की आपित्तयों को खिसियानी बिल्ली का प्रलाप मान कर नजरअंदाज कर दिया जाता है. लेकिन इस बार किस्सा कुछ …
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प्रमोद रंजन का यह भी निष्कर्ष है कि काले धन से खबरों के पैकेज बेचने-खरीदने से कुछ नहीं होता क्योंकि वोट देने वाली जनता समझ गयी है कि इन अखबारों की कोई विश्वसनीयता नहीं है। काले धन से इन अखबारों में खबरें छपवाने वाले अक्सर हार जाते हैं। लेकिन जो लोग जाति धर्म और मित्र धर्म निबाहते हुए विश्वास का धंधा कर रहे हैं वे ज्यादा बड़ा नुकसान कर रहे हैं क्योंकि वे दलित-पिछड़ों, वाम आंदोलनों और प्रतिरोध की शक्तियों को अपमानित, उपेक्षित और दिग्भ्रमित करते हैं।
अब पैकेज के काले धंधे को इनने बुरा मान लिया है, इसलिए इसे अपना समर्थन मान कर मुझे संतोष कर लेना चाहिए। लेकिन इससे भी बुरा इनने पत्रकारिता में जाति धर्म और मित्र धर्म को बताया है। और उदाहरण के नाम पर प्रभात खबर के प्रधान संपादक हरिवंश और पत्रकार-लेखक सुरेंद्र किशोर की टिप्पणी को उद्धृत किया है। हरिवंश कोई पैंतीस साल से मेरे मित्र हैं और सुरेंद्र किशोर ने जनसत्ता की शुरुआत से रिटायर होने तक एक विश्वसनीय और प्रामाणिक पत्रकार की तरह काम किया है। इसलिए आइए पहले पत्रकारिता में जाति और मित्र धर्म और ब्राह्मणवादी पूंजीवाद को लें।
हरिवंश जेपी आंदोलन से कुछ पहले से मेरे मित्र हैं। बांका उनका मेरे साथ जाना भी कोई बड़ी बात नहीं है। बीसियों सभाओं-सम्मेलनों, आंदोलनों और संघर्षों में वे मेरे साथ गये हैं। उनकी सोहबत मुझे प्रिय और महत्त्वपूर्ण लगती है। जो वरिष्ठ पत्रकार दिग्विजय सिंह का मीडिया प्रबंधन कर रहे थे, वे हम दोनों के मित्र हैं। उनने डायरी भी लिखी है, यह मुझे दिल्ली में पता चला जब मैं अपने अभियान के लिए सामग्री और सबूत जुटा रहा था। बांका अकेली जगह नहीं थी, जहां मैं इस चुनाव के दौरान गया। हिंदी इलाके के हर राज्य में पत्रकारों से बात करके मैंने सामग्री ली। हरिवंश अपना लेख खबरों का धंधा पहले छब्बीस मार्च को ही लिख चुके थे, जिसकी आखिरी लाइन थी – विज्ञापन और खबरें दो चीजें हैं। जिन चीजों के साथ स्पांसर्ड, प्रायोजित, पीके मार्केटिंग मीडिया इनिशियेटिव लिखा होगा वे विज्ञापन होंगे। हम खबर की शकल में विज्ञापन नहीं छापेंगे। हरिवंश ने यह एक लेख ही नहीं, दो और लेख, एक पाठक का पत्र भी पहले पेज पर छापा। उनने चुनाव कवरेज की अपनी आचार संहिता भी खूब बड़ी छापी। इसमें नाम-पता देकर पाठकों से कहा कि इसका उल्लंघन हो रहा हो तो तत्काल शिकायत कीजिए। चुनाव के बाद 11 मई को उनने फिर खबरों का धंधा-2 फिर पाठकों के द्वार शीर्षक से लेख लिखा, जिसमें एक पाठक की शिकायत को अपने पूरे कवरेज और आचरण से जांचा। किसी भी हिंदी अखबार ने न ऐसा अभियान चलाया न पाठकों के सामने ऐसी जवाबदेही दिखायी।
लेकिन नयनसुख प्रमोद रंजन को न यह दिखा और न इस पर उनने विश्वास किया। क्यों? (यह बताऊंगा तो बहस पटरी से उतर जाएगी) अभी यही कि प्रथम प्रवक्ता के सोलह जुलाई के अंक में उस पत्रिका के झारखंड ब्यूरो की रिपोर्ट बताती है प्रभात खबर में भी खबरें उसी की ज्यादा छपीं जिसने विज्ञापन ज्यादा दिया। वहां अघोषित नियम बनाया गया कि जो पैसा देगा उसको कवरेज मिलेगा। प्रमोद रंजन को ये दो लाइनें प्रभात खबर के तीन महीने के कवरेज अभियान और पाठकों से खुली जवाबदेही को सिरे से खारिज करती क्यों लगती हैं। इसका भी जवाब दूंगा तो दलित-पिछड़ों और वाम आंदोलनों की बड़ी क्षति होगी। इसलिए फिलहाल सिर्फ मित्र धर्म पर।
प्रथम प्रवक्ता का वह अंक जिसे प्रमोद रंजन ने मेरे निर्देशन में निकला कहा है उसकी पैकेज वाली सारी सामग्री राम बहादुर राय ने मेरे पास भेजी। उसी के आधार पर इस पत्रिका में मैंने लेख लिखा और उस पूरी सामग्री को मैंने संपादित किया। झारखंड ब्यूरो की रपट की वे दो लाइनें मेरी जानकारी और लिखे के विरुद्ध थीं। उनको न तो सबूत और पदार्थ के साथ पुष्ट किया गया था, न उनका विश्लेषण। मैं जो प्रमोद रंजन के कहे मित्र धर्म निबाहता हूं – मैंने ही वे लाइनें संपादित करके बाहर क्यों नहीं कीं? क्योंकि मैं स्वभाव से संवाददाता पर भरोसा और अपने से भिन्न राय की कदर करता हूं। और मेरा मित्र धर्म तो ठीक है, प्रथम प्रवक्ता के संपादक राम बहादुर राय तो हरिवंश के और भी गहरे और पुराने मित्र हैं। अपनी पत्रिका में उनने ये दो लाइनें क्यों जाने दीं? मित्र धर्म क्यों नहीं निभाया?
यह तो खुली प्रमोद रंजन के मित्र धर्म के आरोप से तात्कालिक संदर्भ की पोल। यह भी झूठ है कि सभी अखबार मीडिया इनिशिएटिव लिख रहे थे। मैंने इन अखबारों की जो प्रतियां प्रेस परिषद को जांच के लिए दी हैं उनमें कुछ भी नहीं लिखा है। और ऐसे इनिशिएटिव के बारे में क्या सोचता हूं, वह भी एक लेख में लिख चुका हूं। मैंने एक नहीं चार लेख लिखे हैं। पर छोड़िए तात्कालिक संदर्भ। मैं लगभग पचास साल से पत्रकारिता कर रहा हूं। कम से कम पांच प्रधानमंत्री मेरे बड़े मित्र थे। चंद्रशेखर सबसे बड़े और पुराने, फिर अटल बिहारी वाजपेयी, फिर नरसिंह राव और विश्वनाथ प्रताप सिंह। इनके खिलाफ मैंने क्या-क्या और क्या नहीं लिखा है। दर्जन भर मुख्यमंत्रियों से मेरी बड़ी मित्रता रही। उन पर जो लिखा, वह भी सब छपा है। अपनी रतौंध दूर करना चाहें तो पच्चीस साल की जनसत्ता की फाइलें दफ्तर में मौजूद हैं। और यह भी ख्याल रखें कि अखबार मित्र की प्रशंसा और आलोचना के लिए ही नहीं होते। उनका एक व्यापक सामाजिक धर्म भी होता है। वह दलित-पिछड़ों की राजनीतिक ताकतों, वाम आंदोलनों और प्रतिरोध की शक्तियों का भी आकलन मांगता है और जिसकी जैसी करनी उसको वैसी ही देने से पूरा होता है। लेकिन वह भी बाद में।
अभी अपन ब्राह्मणवाद देख लें। जनसत्ता की पहली टीम में एक अच्छेलाल प्रजापति हुआ करते थे। कुछ ही महीने काम करके वे कोलकाता गये। वहां से खबर आयी कि उनने कहा कि जनसत्ता में तो बड़ा ब्राह्मणवाद चल रहा है। मैं तब डेस्क पर साथियों से मिल कर पहला संस्करण निकाल रहा था। निकल गया तो सबको इकट्ठा करके हमने इस मनोरंजक खबर का मजा लिया। फिर मेरे सुझाव पर पूरी टीम की जातिवादी मर्दुमशुमारी की गयी। ब्राह्मण ज्यादा थे। मैं कहा – देख लो अपने ही एक टीम साथी ने आरोप लगाया है। अब हमें ठीक से काम करना है। हम सब हंसे क्योंकि अच्छेलाल प्रजापति भी उसी प्रक्रिया से जनसत्ता में आये थे, जिससे बाकी थे।
जनसत्ता हिंदी का पहला अखबार है, जिसका पूरा स्टाफ संघ लोक सेवा आयोग से भी ज्यादा सख्त परीक्षा के बाद लिया गया। सिवाय बनवारी के मैं किसी को भी पहले से जानता नहीं था। बहुत सी अर्जियां आयी थीं। उनमें सैकड़ों छांटी गयीं। कई दिनों तक लिखित परीक्षाएं चलीं – घंटों लंबी। वे बाहर के जानकारों से जंचवायी गयीं। उसके अनुसार बनी मेरिट लिस्ट के प्रत्याशियों को इंटरव्यू के लिए बुलाया गया। इंटरव्यू के लिए भारतीय संचार संस्थान के संस्थापक निदेशक महेंद्र देसाई, प्रेस इंस्टीट्यूट के भूतपूर्व निदेशक चंचल सरकार, गांधीवादी अर्थशास्त्री एलसी जैन, इंडियन एक्सप्रेस के संपादक जॉर्ज वर्गीज, मैं और एक विशेषज्ञ। कई दिन तक इंटरव्यू चले। लिखित और इंटरव्यू की मेरिट लिस्ट के मुताबिक लोगों को काम करने बुलाया। वेतन, पद उसी से तय हुए। कोई भी किसी की सिफारिश या किसी के रखे नहीं रखा गया। इससे ज्यादा वस्तुपरक और तटस्थ कोई प्रक्रिया हो नहीं सकती थी।
हम चुनाव नहीं लड़ रहे थे, जो जाति के वोटों का ख्याल रखते। मंत्रिमंडल नहीं बना रहे थे जो सबको प्रतिनिधित्व देते। हम नया अखबार निकालने की ऐसी टीम बना रहे थे – जो हलकी हो, फुर्ती से लग और बदल सकती हो और अपने भविष्य के साथ अखबार बना सकती हो। कुछ बरस बाद एक अन्नू आनंद ने लिखा कि प्रभाष जोशी देखते नहीं कि इंडियन एक्सप्रेस में कितनी महिलाएं हैं और जनसत्ता में कितनी कम। जब वे मुझे प्रेस इंस्टीट्यूट में मिलीं तो मैंने पूछा – आप जानती हैं कि एक्सप्रेस की महिलाएं भी मेरी रखी हुई हैं? और चंडीगढ़ एक्सप्रेस में तो आधी महिलाएं थीं।
जिस भाषा में से जैसे लोग पत्रकारिता में निकल कर आएंगे वैसे ही तो रखे जाएंगे। महिला है इसलिए रख लो तो अखबार की टीम कैसे बनेगी? एक्सप्रेस की सब महिलाओं में राधिका राय खास थीं। उन्हें रात की शिफ्ट और अखबार निकालना पसंद था। मैंने संपादक और रामनाथ गोयनका से तय किया था कि राधिका राय को देश की पहली महिला समाचार संपादक बनाएंगे। आजकल वे एनडीटीवी की मालकिन हैं। उनके यहां भी हिंदी में कम और अंग्रेजी में ज्यादा महिलाएं हैं।
मीडिया से दलित-पिछड़ों, वाम आंदोलनों आदि के सरोकार बाहर हुए तो सिर्फ इसलिए नहीं कि वहां घनघोर बाजारवाद और ब्राह्मणवादी पूंजीवाद आ गया है। चौधरी चरण सिंह से लेकर मायावती तक ने दलित-पिछड़ों के हितों को अपनी सत्ता और धन-लालसा में कैसे बरबाद किया है, पूरा देश जानता है। वंशवाद और धन के लोभ ने लालू, मुलायम, चौटाला, नीतीश कुमार, अजित सिंह और मायावती को मजबूत विपक्ष बनने के बजाय बिन बुलाये कांग्रेस समर्थक क्यों बनाया है? क्योंकि सबके कंकाल सीबीआई के पास हैं। और नंदीग्राम और सिंगूर के बाद वामपंथी किस नैतिक और वैचारिक समर्थन के हकदार हैं?
दलित-पिछड़ों और वाम आंदोलनों के सरोकारों की दुहाई देकर खबरों के बेचने के काले धंधे को माफ करना चाहते हो? देखते नहीं कि यह बनिये की ब्राह्मण पर जातिवादी विजय भर नहीं है जिस पर प्रमोद रंजन जैसे बच्चे ताली बजाएं। यह भ्रष्ट राजनेताओं और पत्रकारिता को काली कमाई का धंधा बनाने वाले मीडिया मालिकों की मिलीभगत है। सबसे ज्यादा यह भ्रष्ट राजनेताओं के हित में है कि मीडिया अपनी तटस्थता, निष्पक्षता और स्वतंत्रता के बजाय दो नंबर की कमाई की रक्षा करे। पैसा फेंक खबर छपवा। ऐसा मीडिया लोकतंत्र को बचा नहीं सकेगा। दलित-पिछड़ों और वाम आंदोलनों की जरखरीद लोकतंत्र में कोई पूछ होगी?
यह समझ न आता हो तो अब आओ! कहो कि यह ब्राह्मणवादी प्रभाष जोशी – सती समर्थक, दलित, पिछड़ा, महिला और मुसलमान विरोधी है। अपन इसका भी जवाब देंगे। लेकिन खबरों को बेचने के काले धंधे को रोकने के पुण्य कार्य में फच्चर मत फंसाओ। टिकोगे नहीं!!
sanjay tiwari
September 6, 2009 at 2:47 pm
निजी तौर पर किसी व्यक्ति पर हमलावर होने की यह पराकाष्ठा है. ऐसी हेडिंग से बचते तो अच्छा रहता.
समरेंद्र
September 6, 2009 at 4:18 pm
बचना क्यों और किससे संजय जी? जो शख्स प्रमोद रंजन के अस्तित्व को खारिज करने के लिए “कोई प्रमोद रंजन” लिखता हो। “नयनसुख” जैसी उपमा देता हो। उस शख़्स की सोच को जाहिर करने के लिए मनुवादी लिख दिया गया तो आप सब विफरने लगे। निजी हमले तो उन्होंने किए हैं। एक व्यक्ति ने सवाल उठाया तो बिना सोचे समझे उसकी नीयत पर सवालिया निशान लगा देना कहां तक सही है? लेख को पढ़िए जब जनसत्ता छोड़ कर गए ए एल प्रजापति ने जातिवाद का सवाल उठाया तो बकौल प्रभाष जोशी “उनने कहा कि जनसत्ता में तो बड़ा ब्राह्मणवाद चल रहा है। मैं तब डेस्क पर साथियों से मिल कर पहला संस्करण निकाल रहा था। निकल गया तो सबको इकट्ठा करके हमने इस मनोरंजक खबर का मजा लिया।” क्या जातिगत भेदभाव मजा लेने की बात है?
आप लोग भी कमाल करते हैं। कोई एक से बढ़ कर एक तल्ख और आपत्तिजनक शब्द इस्तेमाल कर दे तो कुछ नहीं और यहां हल्का सा लिख दिया तो नैतिकता खतरे में पड़ जाती है!
Adwitya
September 7, 2009 at 3:11 pm
Dear Samarendra
Quite frankly there was no need for you to react so aggresively to what Sanjay wrote. Your reply quite clearly show that you are no better than the man you are currently targeting (please read it as Joshiji). You are also using the same language as Joshiji used for Pramod Ranjan.
I have been following your portal of late and had found out the real reason behind attacking Joshiji – to get maximum hits on your portal. Not a wrong technique employed by your new portal. Most of the interactive sites do this.
By the way, Neither I know Prabhash Joshi nor I am his fan.
रंगनाथ सिंह
September 6, 2009 at 5:00 pm
प्रभाष जोशी के इस अश्लील लेख पर कुछ भी कहने से पहले प्रभाष जोशी और उसके चेला मण्डल ये जान ले कि जो बूढ़ा नौजवानों को वाजिब इज्जत नहीं देता वो ये भूल जाए कि नौजवान उस बूढ़े गिद्ध को दिखावटी इज्जतअदायगी करेंगे। चेला लोग जाकर अपने गुरू को समझाओ की इस उम्र में पहलवानों वाली भाषा लिखना बंद करे। ऐसा करके वो अपना बुढ़ापा खराब कर रहा है। किसी टुटपूंजिए गुण्डे की तरह धमकी भरी भाषा लिखने वाले किसी बूढ़े पर सिर्फ तरस भर खाया जा सकता है।
ये प्रभाष जोशी हमें अपने प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री मित्रों की धौंस देता है। पत्रकार गैलरी का दुरूपयोग करके सत्ताधारियों से कैसी मित्रता बनती है इसे कौन नहीं जानता। नेताओं से भीतरखाने सांठगांठ करके उनके खिलाफ विरोध के मंच को चालाकी से कब्जा कर लेने को ये वीरगाथा की तरह सुनाते हैं। इनके समकालीन पत्रकारों में रत्तीभर नैतिकता बची है तो वो हमें इसकी असलियत से वाकिफ कराए।
आज सुबह जनसत्ता पढ़ा तो सन्न रह गया था। पहला सवाल यही नाच रहा था कि ये प्रमोद रंजन है कौन जिसकी छाती पर यह खिसिआया बूढ़ा चढ़ बैठा है। एक नौजवान को धमकाने और अपमानित करने के लिए इसने खबर के बेचने के धंधे को ओट बनाया है। हम भी काले धंधे की खिलाफ मुहीम में इसके साथ हैं। जरा हम भी तो देखें कि ये इस नूरा-कुश्ती के आखिर में कौन सा जाली दाँव चलता है। हमें इसके इस सरकारी मुहीम के हश्र का इंतजार रहेगा।
प्रमोद रंजन जो भी हैं उनसे अपील है कि वो इसे जवाब जरूर दें। यदि प्रभाष जोशी उन्हंे या उनके परिवार के किसी भी सदस्य को किसी भी प्रत्यक्ष या परोक्ष तरीके से क्षति पहुँचाने की कोशिश करे तो वो इस तरह के कुत्सित प्रयासों को सार्वजनिक करके उसके असल चेहरे को सरेबाजार बेनकाब करें।
वैसे इसने डर के मारे इंटरनेट वालों का अपने लेख में कोई जिक्र नहीं किया है। जानता था कि यहाँ अगिया-बैताल लेखक हैं। जो इनकी गीदड़ भभकी से डरने वाले नहीं हैं। धुलाई कर देंगे। मैं ज्यादा नहीं लिख रहा हूँ। गुरू-चेला मण्डल से गाल-बात तो अब होती ही रहेगी। सो, शेष फिर कभी….
जगदीश्वर चतुर्वेदी
September 6, 2009 at 8:08 pm
प्रभाष जोशी, ‘ईमानदार’ हैं। कारपोरेट घरानों के कलमघिस्सु हैं। उन्होंने ‘सच’ कहा है,उसे गंभीरता से लेना चाहिए। पहला सच ,प्रेस (संपादकों,पत्रकारों और प्रेस मालिकों) और राजनेताओं गहरा याराना होता है, उनका भी कितने ही प्रधानमंत्रियों और मुख्यमंत्रियों के साथ याराना था। धन्य है दोस्ती और पेशे की ईमानदारी। कम से कम अखबार वालों के साथ राजनेता कभी ज्ञान,सलाह और समझ पाने के लिए दोस्ती नहीं करते, प्रचार पाने के लिए दोस्ती करते हैं। स्वयं प्रभाष जोशी यह काम करते रहे हैं,यह तथ्य भी वे लिख चुके हैं। दिक्कत यह है कि जोशीजी पेशेवर मीडिया वाले नहीं हैं,सामंती मीडिया वाले हैं। जोशीजी अपने मालिकों को ‘जनसंपर्क’ एजेंसी खोलने का सुझाव दे ही सकते थे,ऐसी ही एजेंसियां वे सब काम करती हैं, जिनको वे करते रहे हैं अथवा उनके करीबी दोस्त पत्रकार करते रहे हैं। हिंदी प्रेस में यदि इस बार खबरों के लिए लेन-देन हुआ है तो यह कोई नयी बात नहीं है,यह तो बारह महिने चलता रहता है,जोशी जी भी जानते हैं कि किस तरह चलता है यह धंधा। समस्या लेन देन में नहीं है। हम निंदा करेंगे,वे तब भी लेंगे। यह निंदा की समस्या नहीं है। यह चुनाव की समस्या भी नहीं है। यह कारपोरेट प्रेस की दैनन्दिन समस्या है। हमारे सामने प्रभाष जोशी चाहे जितना सौगंध खाएं, कितना ही अपने को सत्यवादी बताएं, कौन नहीं जानता कि प्रत्येक संपादक अपने मालिक के लिए ‘जनसंपर्क’ का काम करता है,पूंजीपतियों के लिए ‘जनसंपर्क’ नहीं करेगा,तो उसे कोई नौकरी पर भी रखने वाला नहीं है, रिटायर्ड होने के बाद भी जब पगार मिलती है तो उसका लक्ष्य लेखन नहीं कुछ और है। प्रभाष जोशी की मुश्किल यह है कि करना चाहते हैं कारपोरेट प्रेस का धंधा, लेकिन सामंती खोल और मूल्यों के आवरण को बनाए रखकर। वे जानते हैं क्या कर रहे हैं लेकिन दावा ‘सत्य’ की रक्षा का कर रहे हैं,’खबर’ की रक्षा का कर रहे हैं। उन्हें इस आवरण को फेंक देना चाहिए। इससे अन्य संपादक भी प्रेरणा लेंगे,कारपोरेट प्रेस के पेशेवर नियमों के तहत प्रभाष जोशी को परखना चाहिए, जातिवाद इसका एक बडा हिस्सा है। अब जोशी जी यह न समझाएं कि जाति हिस्सा नहीं है। सिर्फ पेशेवर तरीकों के आधार पर चयन किया था,हम प्रभाष जोशी और उनके भक्तों से यही कहना चाहते हैं कि प्रभाष जोशी कारपोरेट घराने का पत्रकार है ,जनता के हितों को लेकर लडने वाला पत्रकार नहीं है। जनता के हितों को लेकर लडने वाले पत्रकार को प्रधानमंत्री,मुख्यमंत्री से दोस्ती गांठने की जरूरत नहीं पडती। प्रभाष जोशी कम से कम एक भी ऐसा रहस्योदघाटन बताएं जो कभी उन्होंने अपने दोस्त प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री , अथवा अपने कारपोरेट आकाओं (जो उनके दोस्त थे या हैं ) के बारे में किया हो, कौन नहीं जानता चन्द्रशेखर जब प्रधानमंत्री बने थे तो प्रधानमंत्री कार्यालय में बैठकर सीधे सौदे पटते थे,प्रधानमंत्री कार्यालय में ही रकम सरेआम ली जाती थी। जोशी जी उन व्यक्तियों को भी जानते हैं जरा सुविधा के लिए स्वयं ही सत्य बोल दें तो पता चल जाएगा कि खबर पर्दा कौन डालता रहा है, ,भारत के इतिहास में प्रधानमंत्री के रूप में चन्द्रशेखर सबसे भ्रष्ट थे। किसी भी कांग्रेसी नेता से इस तथ्य की आसानी से पुष्टि हो सकती है। लेकिन ‘ईमानदारी’ और ‘सत्य’ के लिए आग उगलने वाले प्रभाष जोशी को चन्द्रशेखर के कार्यालय का भ्रष्टाचार नजर ही नहीं आया। बलिहारी गुरू आपने गोविन्द दियो मिलाय। कारपोरेट घरानों की राजनेताओं के साथ कैसे ढील होती है और वे इसके बारे में कितने तथ्य जानते हैं ,यदि उसकी थोडी सी भी झलक वे देते तो देश का बडा भला होता।
शंबूक
September 6, 2009 at 11:27 pm
बेस्ट चैनलों और अखबारों को चलाने वाले ब्रह्म से संवाद नहीं करते!
ये गिनती करने का दिल तो नहीं करता लेकिन प्रभाष जोशी जैसा कोई जड़मति पूर्व संपादक जब जातीय श्रेष्ठताबोध का जहरबुझा लेखन करता है तो चुप रहना अपराध होगा।
प्रभाष जोशी की मूल स्थापना है कि ब्राह्मण लिखने पढ़ने के काम में श्रेष्ठ हैं। अमूर्त चिंतन में हजारों साल की महारत उन्हें हासिल है। आगे चलकर वो लिखते हैं कि जनसत्ता के लिए उन्हें योग्य पत्रकारों की टीम चुननी थी उसमें ज्यादातर ब्राह्मण आए। वो इसलिए आए क्योंकि वो योग्य थे। तो प्रभाष जोशी, हिंदी मीडिया की एक लिस्ट यहां आपके लिए पेश है। इस लिस्ट में दो को छोड़कर सभी ब्रांड के मालिक बनिया हैं।
इस लिस्ट से किसी का महिमामंडन करने, मजाक उड़ाने या कुछ और साबित करने की मंशा नहीं है, सिवा इसके कि प्रतिभा किसी जाति की बपौती नहीं है। और हिंदी पत्रकारिता में ऊपर चढ़ने के हुनर पर जाति विशेष का एकाधिकार अब टूट गया है। प्रिंट मीडिया में बदलाव की रफ्तार धीमी है पर बदल वो भी रहा है। अभी बदलाव पूरा नहीं हुआ है, बदलाव की रफ्तार तेज होनी चाहिए, सारी चिंता इसी बात को लेकर है। और प्रभाष जोशी, आप इस बदलाव को रोक नहीं पाएंगे। आपके समय नहीं होता होगा (ये आप कह रहे हैं), पर कुछ साल में ऐसा हुआ कि टेलेंट जगह जगह से आने लगा। बहरहाल अभी तो आप लिस्ट देखिए।
सबसे लोकप्रिय न्यूज चैनल
1. आज तक-चैनल हेड मुस्लिम
2. स्टार न्यूज- चैनल हेड मुस्लिम
3. इंडिया टीवी- मालिक/चैनल हेड ब्राह्मण
4. जी न्यूज – चैनल हेड भूमिहार
5. आईबीएन7- चैनल हेड बनिया
6. एनडीटीवी इंडिया- चैनल हेड की जगह साझा नेतृत्व
सबसे लोकप्रिय बिजनेस न्यूज चैनल
1. सीएनबीसी आवाज- चैनल हेड बनिया
2. ज़ी बिजनेस- चैनल हेड गैर ब्राह्मण पंजाबी
सबसे लोकप्रिय अखबार
1. दैनिक जागरण- मालिक संपादक बनिया
2. दैनिक भास्कर- मैनेजिंग एडिटर राजपूत
3. दैनिक हिंदुस्तान- प्रधान संपादक ब्राह्मण
4. अमर उजाला- मालिक संपादक बनिया
सिद्धार्थ
September 7, 2009 at 10:08 am
समरेंद्र भाई… आपने हल्का सा लिख दिया और संजय भाई की एक छोटी सी टिप्पणी आ गई तो आपकी इतनी सारी मिर्ची लग गई. क्या बात है प्रभाष जोशीजी के कथन सुनकर हाज़मा खराब हो गया है क्या ?…
akhilesh sharma
September 7, 2009 at 11:29 am
कुछ तो शर्म करो!
इसे कहते हैं तिल का ताड बना देना. असली मुद्दे से ध्यान भटकाना. व्यक्ति के इरादों पर सवाल खड़े कर उसकी मुहिम को रोक देना. व्यक्तिगत आरोप लगा कर उसकी साख पर सवाल उठाना ताकि उसके उठाए मुद्दों के बजाए बात कहीं ओर निकल जाए.
मुद्दा था हाल के लोक सभा चुनाव में कुछ अख़बारों ने अपनी इज़्ज़त बेच कर पैकेज डील की. उम्मीदवारों से घूस ली और उनके पक्ष में प्रायोजित समाचार छापे.
इनकी मुहिम थी पत्रकारिता का सम्मान बनाए रखने के लिए. ऐसे लालची अख़बारों को कठघरे में खड़ा करने के लिए. जनता तक उनका सच पहुंचाने की. लेकिन मुद्दा भटका दिया गया है.
मुद्दा बना दिया गया है पत्रकारिता में जातिवाद घुसाकर बनिए बनाम ब्राह्मण का.
जिन लोगों ने मुद्दे से ध्यान भटकाया वो किनके हाथों में खेल रहे हैं. ये किसके कंधे पर रख कर बंदूक चलाई जा रही है.
कौन है ये लोग. क्यों पत्रकारिता में जातिवाद का मुद्दा घुसा देते हैं. फर्जी सर्वेक्षणों से ये साबित करने की कोशिश करते हैं कि मीडिया में ब्राह्मणवाद का बोलबाला है.
तो निकाल लें अपना अखबार. शुरू कर ले अपना टीवी चैनल. योग्यता की कसौटी को नज़रअंदाज़ कर सरकारी कंपनियों की तरह दे दो जाति के आधार पर पत्रकारों को भर्ती में आरक्षण.
नहीं तो कम से कम अपने ब्लॉग पर ही कमजोर तबके की आवाज़ बुलंद करें. इसमें तो पैसे भी ख़र्च नहीं होंगे. क्यों ऐसा नहीं करते.
क्यों ‘मनुवादी संपादकों’ के पीछे पड़े हो भाई. वो अपना काम कर रहे हैं तुम अपना काम करो.
शंबूक
September 7, 2009 at 2:55 pm
पैकेज पत्रकारिता में बदला क्या। यही ना कि पहले जो काम आप जैसे पत्रकार निजी फायदे के लिए करते थे वो अब मालिक अपने फायदे के लिए करने लगे। यानी बनियों ने बाह्मणों के मुंह से घी चुपड़ी रोटी खींच ली। इसी का दर्द है ना आपको। मालिकों ने एक फुटकर चापलूसी और लूट के धंधे को संस्थागत रूप दे दिया। लूट में हिस्सा न मिलने से विचलित हैं आप।
जोशी जी, किसी को भ्रम नहीं होगा कि आप सरकारी कमेटियों में और सरकारी पदों पर क्यों बैठाए जाते थे। वो सब भी पैकेज का ही सौदा था। पुरानी बाते न खुलवाइए।