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	<title>Comments on: &#8220;हम&#8221; टिके हैं और टिके रहेंगे प्रभाष जोशी</title>
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	<description>बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे</description>
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		<title>By: विद्रोही</title>
		<link>http://jantantra.com/2009/09/07/reply-to-prabhash-joshi-2/comment-page-1/#comment-1781</link>
		<dc:creator>विद्रोही</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 09 Sep 2009 07:49:33 +0000</pubDate>
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		<description>आपकी बात कुछ समझ नहीं आयी। क्या कहना चाहते हैं आप?
&quot;ऐसा लग रहा है कि आप भी संसदीय व्‍यवस्‍था के भीतर रहकर कबड्डी खेलने के पक्षधर हैं तब फिर किस मुंह से प्रभाष जोशी की खिंचाई करेंगे। दलितों-पिछडों, अल्‍पसंख्‍यकों और दूसरी राष्‍ट्रीयताओं का शोषण-दमन यह पूंजीवादी व्‍यवस्‍था कर रही है और प्रभाष जोशी जैसे व्‍यवस्‍था को लंबी उम्र देने के पक्षधर लोग चाहते हैं कि चुनाव साफ-सुधरे ढंग से आयोजित किये जाएं ताकि थैलीशाहों के इस जनतंत्र में जनता का यकीन बना रहे। वे अपने विश्‍वासों के अनुसार अविचल-अकंप रहकर काम कर रहें हैं और आप जैसे बच्‍चे उन्‍हें आड़े हाथ लेने के नाम पर पिपिहरी बजा रहे हैं। किसी भी व्‍यक्ति के कहे की बातों की तस्‍दीक उसकी निजी जिंदगी से की जाती है। थोड़ी आत्‍मावलोचना कीजिए और देखिये कि आपने खुद को कितना बदला है। हम आज की तारीख में इतिहास को आगे की ओर गति देने वाले मजदूर वर्ग के बीच होकर और वैज्ञानिक विचारधारा यानि मार्क्‍सवाद को अपनाकर ही बदल सकते हैं।वरना !!! आप भी माल-मुद्रा पर आधारित सामाजिक हैसियत के कायल हैं और उसे बढ़ाने-चमकाने में यकीन रखते हैं और अगर ऐसा है तो व्‍यक्तिगत जीवन में प्रभाष जोशी का कद आपके मुकाबले बहुत ऊंचा रहा है। किस जमीन पर खड़े होकर सवाल उठा रहे हैं यह तो देखा ही जाएगा भाई। यह भी देखा जाता है कि किन्‍ही खास तथ्‍यों का ही चयन क्‍यों किया गया है अपनी बात की पुष्टि करने के लिए।&quot;

&quot;..अगर ऐसा है तो...ऐसा लग रहा है...आप जैसे बच्चे...प्रभाष जोशी का कद आपसे बड़ा है...किस मुंह से प्रभाष जोशी की खिंचाई करेंगे...&quot; क्या कहना चाहते हैं आप? अगर मार्क्सवादी हैं, तो आपको इस बहस से, प्रभाष जोशी के प्रभामंडल में छेद होने से खुश होना चाहिए, इस कोशिश में हाथ बंटाना चाहिए..अगर आपके हिसाब से बहस भटक रही है, तो उसे सही दिशा देने की कोशिश करनी चाहिए..लेकिन लगता है आप विचार और पहचान से मार्क्सवादी हैं, लेकिन निजी तौर पर प्रभाष जी के एहसानों से दबे हैं। इसीलिए विचार से जिस पर हमला कर रहे हैं, व्यावहारिक बनकर उसी की तारीफ कर रहे हैं? क्या आप वही हिंदी लेखक कामता प्रसाद हैं, जिनके ग्रंथ का लोकार्पण प्रभाष जी की मौजूदगी में उनके &quot;बड़े भाई&quot; नामवर जी ने किया था और आपकी तारीफों के पुल बांधे थे? मार्क्सवादी नामवर जी आपके हिसाब से पूंजीवादी जोशी जी के सरपरस्त क्यों हैं? और दोनों मिलकर आपको क्यों प्रेमचंद के बरअक्स रखने की कोशिश कर रहे थे? निजी संबंधों के जाल में फंसकर लगता है आपके विचार दम तोड़ रहे हैं। आत्मावलोकन की ज़रूरत आपको भी है..</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आपकी बात कुछ समझ नहीं आयी। क्या कहना चाहते हैं आप?<br />
&#8220;ऐसा लग रहा है कि आप भी संसदीय व्‍यवस्‍था के भीतर रहकर कबड्डी खेलने के पक्षधर हैं तब फिर किस मुंह से प्रभाष जोशी की खिंचाई करेंगे। दलितों-पिछडों, अल्‍पसंख्‍यकों और दूसरी राष्‍ट्रीयताओं का शोषण-दमन यह पूंजीवादी व्‍यवस्‍था कर रही है और प्रभाष जोशी जैसे व्‍यवस्‍था को लंबी उम्र देने के पक्षधर लोग चाहते हैं कि चुनाव साफ-सुधरे ढंग से आयोजित किये जाएं ताकि थैलीशाहों के इस जनतंत्र में जनता का यकीन बना रहे। वे अपने विश्‍वासों के अनुसार अविचल-अकंप रहकर काम कर रहें हैं और आप जैसे बच्‍चे उन्‍हें आड़े हाथ लेने के नाम पर पिपिहरी बजा रहे हैं। किसी भी व्‍यक्ति के कहे की बातों की तस्‍दीक उसकी निजी जिंदगी से की जाती है। थोड़ी आत्‍मावलोचना कीजिए और देखिये कि आपने खुद को कितना बदला है। हम आज की तारीख में इतिहास को आगे की ओर गति देने वाले मजदूर वर्ग के बीच होकर और वैज्ञानिक विचारधारा यानि मार्क्‍सवाद को अपनाकर ही बदल सकते हैं।वरना !!! आप भी माल-मुद्रा पर आधारित सामाजिक हैसियत के कायल हैं और उसे बढ़ाने-चमकाने में यकीन रखते हैं और अगर ऐसा है तो व्‍यक्तिगत जीवन में प्रभाष जोशी का कद आपके मुकाबले बहुत ऊंचा रहा है। किस जमीन पर खड़े होकर सवाल उठा रहे हैं यह तो देखा ही जाएगा भाई। यह भी देखा जाता है कि किन्‍ही खास तथ्‍यों का ही चयन क्‍यों किया गया है अपनी बात की पुष्टि करने के लिए।&#8221;</p>
<p>&#8220;..अगर ऐसा है तो&#8230;ऐसा लग रहा है&#8230;आप जैसे बच्चे&#8230;प्रभाष जोशी का कद आपसे बड़ा है&#8230;किस मुंह से प्रभाष जोशी की खिंचाई करेंगे&#8230;&#8221; क्या कहना चाहते हैं आप? अगर मार्क्सवादी हैं, तो आपको इस बहस से, प्रभाष जोशी के प्रभामंडल में छेद होने से खुश होना चाहिए, इस कोशिश में हाथ बंटाना चाहिए..अगर आपके हिसाब से बहस भटक रही है, तो उसे सही दिशा देने की कोशिश करनी चाहिए..लेकिन लगता है आप विचार और पहचान से मार्क्सवादी हैं, लेकिन निजी तौर पर प्रभाष जी के एहसानों से दबे हैं। इसीलिए विचार से जिस पर हमला कर रहे हैं, व्यावहारिक बनकर उसी की तारीफ कर रहे हैं? क्या आप वही हिंदी लेखक कामता प्रसाद हैं, जिनके ग्रंथ का लोकार्पण प्रभाष जी की मौजूदगी में उनके &#8220;बड़े भाई&#8221; नामवर जी ने किया था और आपकी तारीफों के पुल बांधे थे? मार्क्सवादी नामवर जी आपके हिसाब से पूंजीवादी जोशी जी के सरपरस्त क्यों हैं? और दोनों मिलकर आपको क्यों प्रेमचंद के बरअक्स रखने की कोशिश कर रहे थे? निजी संबंधों के जाल में फंसकर लगता है आपके विचार दम तोड़ रहे हैं। आत्मावलोकन की ज़रूरत आपको भी है..</p>
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		<title>By: kamta Prasad</title>
		<link>http://jantantra.com/2009/09/07/reply-to-prabhash-joshi-2/comment-page-1/#comment-1780</link>
		<dc:creator>kamta Prasad</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 09 Sep 2009 04:10:10 +0000</pubDate>
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		<description>भाई समरेंद्र जी, भारत में जाति-व्‍यवस्‍था और उससे निर्मित लोकमानस के ऐतिहासिक कारण रहे हैं और यह एक प्रक्रिया में ही खत्‍म होगी, झटके से नहीं। ऐसा लग रहा है कि आप भी संसदीय व्‍यवस्‍था के भीतर रहकर कबड्डी खेलने के पक्षधर हैं तब फिर किस मुंह से प्रभाष जोशी की खिंचाई करेंगे। दलितों-पिछडों, अल्‍पसंख्‍यकों और दूसरी राष्‍ट्रीयताओं का शोषण-दमन यह पूंजीवादी व्‍यवस्‍था कर रही है और प्रभाष जोशी जैसे व्‍यवस्‍था को लंबी उम्र देने के पक्षधर लोग चाहते हैं कि चुनाव साफ-सुधरे ढंग से आयोजित किये जाएं ताकि थैलीशाहों के इस जनतंत्र में जनता का यकीन बना रहे। वे अपने विश्‍वासों के अनुसार अविचल-अकंप रहकर काम कर रहें हैं और आप जैसे बच्‍चे उन्‍हें आड़े हाथ लेने के नाम पर पिपिहरी बजा रहे हैं। किसी भी व्‍यक्ति के कहे की बातों की तस्‍दीक उसकी निजी जिंदगी से की जाती है। थोड़ी आत्‍मावलोचना कीजिए और देखिये कि आपने खुद को कितना बदला है। हम आज की तारीख में इतिहास को आगे की ओर गति देने वाले मजदूर वर्ग के बीच होकर और वैज्ञानिक विचारधारा यानि मार्क्‍सवाद को अपनाकर ही बदल सकते हैं।वरना !!! आप भी माल-मुद्रा पर आधारित सामाजिक हैसियत के कायल हैं और उसे बढ़ाने-चमकाने में यकीन रखते हैं और अगर ऐसा है तो व्‍यक्तिगत जीवन में प्रभाष जोशी का कद आपके मुकाबले बहुत ऊंचा रहा है। किस जमीन पर खड़े होकर सवाल उठा रहे हैं यह तो देखा ही जाएगा भाई। यह भी देखा जाता है कि किन्‍ही खास तथ्‍यों का ही चयन क्‍यों किया गया है अपनी बात की पुष्टि करने के लिए।
मेरी बातें नागवार लगी हों तो मॉडरेटर के विशेषाधिकार का प्रयोग करते हुए पब्लिश नहीं करना और आर्यवीरों की तरह खुश हो जाना।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>भाई समरेंद्र जी, भारत में जाति-व्‍यवस्‍था और उससे निर्मित लोकमानस के ऐतिहासिक कारण रहे हैं और यह एक प्रक्रिया में ही खत्‍म होगी, झटके से नहीं। ऐसा लग रहा है कि आप भी संसदीय व्‍यवस्‍था के भीतर रहकर कबड्डी खेलने के पक्षधर हैं तब फिर किस मुंह से प्रभाष जोशी की खिंचाई करेंगे। दलितों-पिछडों, अल्‍पसंख्‍यकों और दूसरी राष्‍ट्रीयताओं का शोषण-दमन यह पूंजीवादी व्‍यवस्‍था कर रही है और प्रभाष जोशी जैसे व्‍यवस्‍था को लंबी उम्र देने के पक्षधर लोग चाहते हैं कि चुनाव साफ-सुधरे ढंग से आयोजित किये जाएं ताकि थैलीशाहों के इस जनतंत्र में जनता का यकीन बना रहे। वे अपने विश्‍वासों के अनुसार अविचल-अकंप रहकर काम कर रहें हैं और आप जैसे बच्‍चे उन्‍हें आड़े हाथ लेने के नाम पर पिपिहरी बजा रहे हैं। किसी भी व्‍यक्ति के कहे की बातों की तस्‍दीक उसकी निजी जिंदगी से की जाती है। थोड़ी आत्‍मावलोचना कीजिए और देखिये कि आपने खुद को कितना बदला है। हम आज की तारीख में इतिहास को आगे की ओर गति देने वाले मजदूर वर्ग के बीच होकर और वैज्ञानिक विचारधारा यानि मार्क्‍सवाद को अपनाकर ही बदल सकते हैं।वरना !!! आप भी माल-मुद्रा पर आधारित सामाजिक हैसियत के कायल हैं और उसे बढ़ाने-चमकाने में यकीन रखते हैं और अगर ऐसा है तो व्‍यक्तिगत जीवन में प्रभाष जोशी का कद आपके मुकाबले बहुत ऊंचा रहा है। किस जमीन पर खड़े होकर सवाल उठा रहे हैं यह तो देखा ही जाएगा भाई। यह भी देखा जाता है कि किन्‍ही खास तथ्‍यों का ही चयन क्‍यों किया गया है अपनी बात की पुष्टि करने के लिए।<br />
मेरी बातें नागवार लगी हों तो मॉडरेटर के विशेषाधिकार का प्रयोग करते हुए पब्लिश नहीं करना और आर्यवीरों की तरह खुश हो जाना।</p>
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		<title>By: pankaj srivastava</title>
		<link>http://jantantra.com/2009/09/07/reply-to-prabhash-joshi-2/comment-page-1/#comment-1779</link>
		<dc:creator>pankaj srivastava</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 08 Sep 2009 07:41:22 +0000</pubDate>
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		<description>जात-जात में जात है, जस केलन के पात,
रैदास न मानुख बन सकै, जब तक जात न जात।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>जात-जात में जात है, जस केलन के पात,<br />
रैदास न मानुख बन सकै, जब तक जात न जात।</p>
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		<title>By: संजय शाह</title>
		<link>http://jantantra.com/2009/09/07/reply-to-prabhash-joshi-2/comment-page-1/#comment-1778</link>
		<dc:creator>संजय शाह</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 07 Sep 2009 12:07:17 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://janatantra.com/?p=2440#comment-1778</guid>
		<description>प्रमोद रंजन के लेख पर प्रभाष जोशी ने जितनी हिंसक और आक्रामक भाषा में लिखा है वो बताता है कि चोट मर्मस्थल को भेद गई है। बुजुर्ग प्रभाष जोशी की बौद्धिक चमक को इस तरह से उतरते देखना पुरानी पीढ़ी के पत्रकारों के लिए तकलीफदेह हो सकता है। हम पुराने लोगों की तकलीफ को समझ सकते हैं।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>प्रमोद रंजन के लेख पर प्रभाष जोशी ने जितनी हिंसक और आक्रामक भाषा में लिखा है वो बताता है कि चोट मर्मस्थल को भेद गई है। बुजुर्ग प्रभाष जोशी की बौद्धिक चमक को इस तरह से उतरते देखना पुरानी पीढ़ी के पत्रकारों के लिए तकलीफदेह हो सकता है। हम पुराने लोगों की तकलीफ को समझ सकते हैं।</p>
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