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जय हो अम्मा-बाप की!

इंदिरा गांधी के प्रिय पात्रों में रहे पीसी एलेकजेंडर ने लिखा है कि इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी को प्रधानमंत्री बनाने का फैसला बाथरूम में लिया गया था। ज्ञानी जैल सिंह तब राष्ट्रपति थे और राष्ट्रपति पद की महिमा और महानता को हटाकर देखेंगे तो इंदिरा गांधी के परम भक्त। इंदिरा गांधी ने उन्हें देश का प्रथम पुरुष बनाया था, उन्होंने अपने मैडम के बेटे के साथ में देश की बागडोर दे दी। कांग्रेस की मर्जी तो नेहरू-गांधी परिवार का बस इशारा ही तो खोजती है। पहली नवंबर 1984 को 40 साल के राजीव गांधी देश के सबसे युवा प्रधानमंत्री बन गये। उनका प्रधानमंत्री बनना लोकसभा की मर्जी से ज्यादा इंदिरा गांधी की शोकसभा में फैले कांग्रेसी आंसुओं का पराक्रम ज्यादा था। लोकतंत्र में राजशाही ऐसे ही नैना मटकाती है। पता नहीं चल पाता कि उसमें प्यार है या धोखा।

25 साल बाद कांग्रेस में फिर वही स्थिति पैदा हो गयी है। हालांकि फलक छोटा है और व्यक्तित्व का फर्क भी है लेकिन हालात में अंतर नहीं है। तब देश के प्रधानमंत्री और कांग्रेस के सर्वेसर्वा की हत्या हुई थी। अभी आंध्र प्रदेश में सबसे दिग्गज कांग्रेसी नेता और मुख्यमंत्री वाईएस राजशेखर रेड्डी की हेलीकॉप्टर दुर्घटना में हुई मौत के बाद नेतृत्व के सवाल ने वही हालात खड़े कर दिये हैं। राजशेखर रेड्डी के बाद किसके हाथों में होगी आंध्र प्रदेश की तकदीर, यह सवाल कांग्रेस में सबसे ज्यादा मथा जा रहा है।

यहां नेतृत्व के सवाल पर बात घुम-फिरकर चली जा रही है राजशेखर रेड्डी के सांसद पुत्र जगन मोहन रेड्डी पर। 37 साल के जगन मोहन को मुख्यमंत्री बनवाने के लिए वाईएसआर की शोकसभा में भी कई विधायक, सांसद और पार्टी नेता हुंआ-हुंआ करने लगते हैं। अब जगन मोहन मुख्यमंत्री बनेंगे या नहीं, यह तो कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ही तय करेंगी लेकिन सवाल यह है कि हर पद को विरासत की जंजीरों में बांधने की प्रवृति देश को कहां ले जाएगी? वाईएसआर आंध्र प्रदेश के एक प्रभावशाली नेता थे। छह साल पहले पूरे सूबे को उन्होंने अपने पैरों से नाप डाला था। राज्य के हर इलाके के लोगों से उनका सीधा वास्ता था।

एन चंद्रबाबू नायडू के ई-गवर्नेंस के पलट उन्होंने मास-गर्वनेंस की राजनीति की और कामयाब रहे। अगर यूपीए सरकार में कांग्रेस का पाया मजबूत दिख रहा है, तो उसमें आंध्र से गये 33 सांसदों का बड़ा योगदान है। वे सांसद कडप्पा के शेर कहे जाने वाले वाईएसआर की बदौलत दिल्ली तक पहुंचे। वैसे नेता का असामयिक निधन किसे दुखी नहीं करेगा। दुखी तो सभी हैं लेकिन क्या दुख को दूर करने का रास्ता यही है कि पिता की जगह बेटे की ताजपोशी कर दी जाए? क्या व्यक्ति का दुख दूर करने के लिए लोकतंत्र को दुख में डालना जरूरी है? अगर लोकतंत्र ही नहीं रहेगा तो कोई वाइएसआर कैसे होगा? सिर्फ सौ दिन की जिसकी सियासी यात्रा है, वह अपने पिता की मौत के बाद अनुकंपा पर मुख्यमंत्री बन जाए तो धीरे धीरे हमें इस बात के लिए तैयार रहना चाहिए कि हम जम्हुरियत की मर्सिया पढ़ने की तैयारी कर रहे हैं।

जगन मोहन का मामला अभी ताजा है, लिहाजा इस पर बात हो रही है। नहीं तो राजनीति और भारतीय संसदीय व्यवस्था को हमारे राजपुरुषों और राजमाताओं ने बहुत पहले से वंशवाद की रखैल बना रखा है। कांग्रेस में इस घातक परंपरा की शुरुआत हुई। तब लोहिया जी की अगुवाई में समाजवादियों ने इस पर खूब हाय-तौबा मचाया। लेकिन आज आलम यह है कि खुद को समाजवादी कहने वाले भी उसी नर्क में डूबे हैं। अब मुलायम सिंह यादव को ही ले लीजिए। खुद समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष हैं तो पुत्र अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश में पार्टी के प्रमुख। (अब यूपी से बाहर पार्टी की हैसियत क्या है?)। दोनो ही लोकसभा के सदस्य भी हैं। मुलायम सिंह के छोटे भाई राम गोपाल यादव और भतीजे धर्मेंद्र यादव भी संसद की शोभा बढ़ा रहे हैं तो एक और छोटे भाई उत्तर प्रदेश विधानसभा में विपक्ष के नेता हैं। नगर पंचायत और ग्राम पंचायत में इनके परिवार वालों की मौजूदगी की बात करना ही बेमानी है। बगल के राज्य बिहार में लालू प्रसाद से लेकर राम विलास पासवान तक उनका परिवार ही उनकी पार्टी की शक्ति है। लालू-मुलायम-पासवान से लेकर सोनिया गांधी तक से 36 का आंकड़ा रखने बाल ठाकरे भी परिवार को राजनीतिक मलाई खिलाने के मामले में अलग नहीं हैं।

दूसरों की छोड़िये, खुद कांग्रेस में क्या स्थिति है। किसी भी कांग्रेसी से पूछिए तो सोनिया गांधी की तुलना महात्मा गांधी से करने में उसे एक सेकंड नहीं लगेगा। तर्क भी है कि सोनिया भी चाहतीं तो प्रधानमंत्री बन जातीं लेकिन प्रधानमंत्री की कुर्सी ठुकराकर उन्हें गांधी वाले त्याग का मिसाल दिया है। पद ठुकराने से ही कोई महान नहीं बन जाता। गांधी ने अपने किसी बेटे को अपना वारिस नहीं बनाया।

विचित्र मणि

विचित्र मणि

गांधी की बात छोड़िये, इसके लिए एक बेहतरीन उदाहरण हैं बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी नेता कर्पूरी ठाकुर। कहा जाता है कि 1985 के विधानसभा चुनावों में उनकी पार्टी के कुछ नेताओं ने कहा कि रामनाथ ठाकुर (कर्पूरी ठाकुर के पुत्र) को चुनाव लड़वाया जाए। तब कर्पूरी जी ने कहा कि ठीक है, मैं चुनाव नहीं लड़ूंगा। इसी तरह बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह ने भी अपने बेटे को उनकी इच्छा के बावजूद संसद या विधानसभा तक नहीं पहुंचने दिया। लेकिन अच्छे उदाहरण इतने कम हैं कि वो वंशवाद की जागीर बन चुके लोकतंत्र को उबारने में नाकाफी दिखते हैं।

((विचित्र मणि टेलीविजन के वरिष्ठ पत्रकार हैं))

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2 Responses to जय हो अम्मा-बाप की!

  1. रीतेश Reply

    September 8, 2009 at 4:03 pm

    “कहा जाता है कि 1985 के विधानसभा चुनावों में उनकी पार्टी के कुछ नेताओं ने कहा कि रामनाथ ठाकुर (कर्पूरी ठाकुर के पुत्र) को चुनाव लड़वाया जाए। तब कर्पूरी जी ने कहा कि ठीक है, मैं चुनाव नहीं लड़ूंगा।”

    विचित्र जी,
    क्या कर्पूरी जी चुनाव लड़े या नहीं क्योंकि उनके बेटे रामनाथ ठाकुर तो लड़े और बिहार सरकार में आजकल मंत्री पद पर हैं.

  2. रीतेश Reply

    September 8, 2009 at 4:04 pm

    विचित्र जी,
    रामनाथ के लड़ने का तात्पर्य चुनाव लड़ने से है न कि 1985 के ही चुनाव से.

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