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प्रभाष जोशी, क्या आपने अपना टॉयलेट साफ किया है?

लेखक-पत्रकार दिलीप मंडल का ये लेख हमें प्रभाष जोशी विवाद के बीच ही मिला। 21वीं सदी में बदलते भारतीय समाज पर वो एक पुस्तक की योजना में लगे हैं और ये लेख मूल रूप से उसके लिए ही लिखा गया है। इस विषय पर उनके कई दर्जन लेख अखबारों में आ चुके हैं। प्रभाष जोशी और ब्राह्मणवाद पर चल रही बहस में ये लेख हमें प्रासंगिक लगा। इसलिए आपके सामने पेश है।- मॉडरेटर

हर रविवार की सुबह हमारी कॉलोनी में एक स्वीपर हांक लगाता हुआ जाता है- “फ्लैश साफ करा लो फ्लैश।“ लगभग 2,000 परिवार इस कॉलोनी में रहते हैं जिनमें बड़ी संख्या में आईएएस, आईपीएस, आईआरएस और डॉक्टर से लेकर अलग अलग विभागों के डायरेक्टर और तमाम और पदों पर कार्यरत लोग रहते हैं। इतनी बड़ी कॉलोनी में ये अकेला आदमी है जो सिर्फ रविवार को टॉयलेट साफ करने आता है। वो अपने काम के एक घर से 10 रुपए लेता है और उसे पूरे दिन में 10 से ज्यादा घरों में काम नहीं मिलता। क्या ये भारतीय समाज में बनती किसी बड़ी कहानी का एक छोटा हिस्सा है?

शायद हां। इस छोटे सी बात को आप थोड़ा विस्तार दें। टेलिवजन पर आने वाले टॉयलेट क्लिनर्स के विज्ञापनों को गौर से देखें। ऐसे विज्ञापन आजकल काफी आते हैं। क्या आपको इन विज्ञापनों में कभी कोई स्वीपर दिखता है। आपने सही देखा। किसी भी टॉयलेट क्लीनर के विज्ञापन में स्वीपर नहीं होता। यानी परिवारिक जीवन का ये काम अब खासकर महानगरो में घर के लोग ही करने लगे हैं। ये बात और है कि इन विज्ञापनों में सफाई का काम महिलाओं के जिम्मे डाला जाता है।

इसके साथ आप तेजी से उभरते इस ट्रेंड को देखें कि नए बनने वाले घरों में अब भारतीय की जगह पश्चिमी स्टाइल के टॉयलेट लगने लगे हैं। ये चलन इतना आम होता जा रहा है कि बिल्डर अब बिना पूछे भी आपके घर में पश्चिमी स्टाइल का कमोड लगा देता है। कमोड की सफाई के लिए स्वीपर का घरों में आना अब लगभग खत्म हो गया है। कमोड की वजह से टॉयलेट अब साफ सुथरे हो गए हैं और अब “बाथरूम (जिसमें अक्सर टॉयलेट भी होता है) भी एक रूम है” का नारा चल पड़ है।

आप सबकी नजर इस बात पर भी गई होगी कि मॉल्स और हाई प्रोफाइल रेस्टोरेंट में खाना परोसने से लेकर प्लेट उठाने तक का काम अब तमाम जातियों के युवा करने लगे हैं। मैक्डॉनल्ड और पिज्जा हट जैसे रेस्टोरेंट में तो कोई भी स्टाफ जरूरत पड़ने पर फर्श भी साफ कर लेता है, टेबल भी साफ कर देता है। फ्लाइट में खाना परोसने से लेकर जूठे प्लेट उठाने वाले स्टीवार्ड और एयर होस्टेस तो हमेशा से तमाम जातियों की रही हैं।

ऊपर की इन चारों बातों के कोलाज से एक पूरी तस्वीर बनती है। इसके साथ आप ये जोड़ लीजिए कि खासकर महानगरों के हाई प्रोफाइल हेयर ड्रेसर अब नाई जाति के हों ये जरूरी नहीं है। शेफ हलवाई जाति के हों ये भी जरूरी नहीं है। फ्लोरिस्ट माली हो ये जरूरी नहीं है। शराब कलवार ही बेचें, दुकान सिर्फ बनिए चलाएं, ये भी जरूरी नहीं है। कुल मिलाकर तस्वीर ये बताती है कि वर्ण क्रम के हिसाब से जिस काम को समाज के सबसे नीचे तबके का माना जाता है, वो अब लोग खुद करने लगे हैं या फिर तमाम जातियों के लोग तमाम तरह के काम करने लगे हैं।

ये कोई छोटी बात नहीं है। महात्मा गांधी तक के समय में ये सहज बात नहीं थी। गांधी अगर वर्णव्यवस्था का समर्थन करते थे तो उनके मन में शायद यही भय था कि समाज के उच्च वर्ण के लोग इसे स्वीकार नहीं करेंगे। लेकिन आज ये सब कितना सहज हो गया है। 21वं सदी में इस देश में अगर कोई गांधी पैदा हो तो उसके लिए वर्ण व्यवस्था का समर्थन करना असंभव होगा। बल्कि आज अगर कोई कहे कि किसी जाति में किसी काम को करने की खास महारत है तो लोग उसे पागलखाने भेजना चाहेंगे।

दरअसल ऊपर बताई गई तस्वीरों के ये टुकड़े नए जमाने में बनते नए भारत की कुल इमेज का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। ये तस्वीर आपको ये बता रही है कि जन्म और कर्म के बंधन तेजी से ढीले पड़ रहे हैं। भारतीय वर्ण व्यवस्था का ये मूलाधार है कि हर जाति का एक खास कर्म होता है। ये आधार पिछले दो हजार साल से कायम था, लेकिन पिछले तीस से चालीस चाल में वर्ण व्यवस्था के इस आधार में निर्णायक किस्म की दरारें पड़ने लगी है। परिवर्तन की गति इतनी तेज है कि अगले 10-20 साल के बाद जाति और कर्म का कोई रिश्ता होता है, इस बात की स्मृति भी शायद न बचे।

खासकर शहरीकरण की तेज होती रफ्तार ने जाति व्यवस्था पर तेज हमले किए हैं। शहरीकरण और औद्योगीकरण ने छुआछूत को असंभव बना दिया। सार्वजनिक परिवहन की वजह से ये भेदभाव और कमजोर पड़ा। होटल और रेस्टोरेंट ने हर जाति के लोगों को साथ बैठकर खाने को मजबूर कर दिया। कोई खास जाति ही कोई खास काम करेगी का नियम कम से कम शहरों में लागू नहीं होता। सुलभ शौचालयों में आपको हर जगह ब्राह्मण कर्मचारी मिल जाएंगे और इस बात को लेकर उनमें कोई संकोच नहीं है। वो जनेऊ पहनकर टॉयलेट साफ करते हैं और आउटलुक पत्रिका के कवर पर ऐसी तस्वीरें आने को लोग बेहद सहज मानते हैं।

रोजगार के हर साधन के लिए मची मारामारी और जीविका के संघर्ष ने लोगों के साथ साथ समाज को बदलने के लिए मजबूर कर दिया है। सेवा का काम परंपरागत रूप से शूद्रों का होता है। लेकिन सेवा के काम में आज हर जाति के लोग हैं। सेना में हर जाति के लोग भर्ती होते हैं और उनमें ब्राह्मण से लेकर दलित शामिल हैं। हर जाति का डॉक्टर हर जाति के मरीज को छूता है और ये बात कितनी सहज लगती है। एक ऐसे डॉक्टर की कल्पना करें जो खास जाति के मरीजों के अलावा बाकियों को छूने से मना कर दे? पढ़ने पढ़ाने का काम भी हर जाति समूह के लोग कर रहे हैं और अगर आप जाति को लेकर आदिम सोच से संचालित नहीं होते तो ये बात आपके जेहन में भी नहीं आती कि इसमें कुछ अस्वाभाविक है।

एक बात और है जिसकी वजह से जाति पर भारी दबाव पड़ रहा है। वो है खासकर प्राइवेट सेक्टर में परफॉर्म करने का प्रेसर। बाजार हर स्तर पर टार्गेट के पीछे दौड़ने को मजबूर करता है। ऐसे में नियुक्तियों में जातिवादी होने की सुविधा काफी कम हो जाती है। जब बाजार किसी सीईओ को लक्ष्य के पीछे दौड़ने को मजबूर करता है तो नियुक्तियों में पक्षपात करने की लक्जरी वो आसानी से नहीं उठा सकता। इस वजह से प्राइवेट सेक्टर में किसी तरह का आरक्षण न होने के बावजूद डायवर्सिटी की उम्मीद ज्यादा होती है। इसके बावजूद प्राइवेट सेक्टर में खासकर ऊंचे पदों पर अगर सवर्ण जातियों की संख्या ज्यादा दिखती है तो इसकी वजह ये है कि शिक्षा और ट्रेनिंग के स्तर पर कमजोर तबकों को अवसर कम मिल रहे हैं। आईआईटी और आईआईएम और दूसरे उच्च शिक्षा संस्थानों में अगर ईमानदारी से आरक्षण लागू किया गया तो आपको प्राइवेट सेक्टर के उच्च पदों पर भी भारत की विविधता दिखेगी। हालांकि फिलहाल इस बात पर शक करने के पर्याप्त कारण है कि उच्च शिक्षा में आरक्षण ईमानदारी से लागू होगा। न्यायपालिका और मीडिया के साथ ही खासकर सरकारी उच्च शिक्षा संस्थानों के कैंपस जातिवाद के आखिर किले हैं। लेकिन यहां भी हालात बदलने की शुरुआत हो गई है।

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15 Responses to प्रभाष जोशी, क्या आपने अपना टॉयलेट साफ किया है?

  1. सुमन Reply

    September 8, 2009 at 1:14 am

    ये तो गांधी जी ने कहा था कस्तूरबा को। गांधी को भारतीय समाज की बेहतरीन समझ थी। इस वजह से ही वो एक साथ सनातनी सवर्ण हिंदुओं को साध रहे थे, मुसलमानों के एक हिस्से को साथ ले रहे थे और दलितों को भी भारतीय समाज का हिस्सा होने का एहसास दिला पा रहे थे। ऐसे विजनरी की कमी खलती है!

  2. विद्रोही Reply

    September 8, 2009 at 1:54 pm

    लेखक ने गांधीजी के बारे में ग़लत जानकारी दी है। वो वर्ण व्यवस्था के समर्थक नहीं थे, बल्कि इस तरह की भेदभावपूर्ण व्यवस्था को पूरी तरह खत्म करने के हक में थे। यही वजह है कि उन्होंने शर्त रखी थी कि वो सिर्फ उन्हीं विवाहों में अपना आशीर्वाद देंगे, जिनमें लड़के-लड़की में एक दलित होगा। ये शर्त पूरी न होने पर उन्होंने अपने पांचवे पुत्र महादेव देसाई के बेटे नारायण देसाई की शादी में भी आशीर्वाद देने से इनकार कर दिया था, जबकि गांधी जी उस वक्त नारायण देसाई के अभिभावक थे। यहां कोई भ्रम न हो इसलिए साफ कर दूं कि नारायण देसाई अपनी मर्जी से प्रेम विवाह कर रहे थे और दूसरे प्रांत की लड़की से कर रहे थे, फिर भी गांधी जी ने अपने नियम में ढील देने से इनकार कर दिया था। इतना ही नहीं, गांधी जी के आश्रमों में सभी लोगों के लिए पाखाना सफाई करना अनिवार्य था। वो भी आज जैसा मॉडर्न टायलेट नहीं, पुराने ढंग का मैला हाथ से उठाकर साफ करने वाला। खुद गांधी जी ऐसा करते थे और आश्रम के बाकी लोगों के लिए भी ये ज़रूरी था। गांधीजी की विधवा बहन इसके लिए तैयार नहीं हुईं, तो उन्हें आश्रम से बाहर कर दिया था। अगर वो वर्णाश्रम समर्थक होते तो ब्राह्मणों समेत तमाम सवर्णों से टायलेट साफ नहीं कराते।

  3. rakesh Reply

    September 8, 2009 at 2:55 pm

    बदलाव को ठीक पकड़ा आपने दिलीपजी पर मुझे थोड़ा डाउट लग रहा है कि अगले 30-40 में जाति व्‍यवस्‍था जर्जर हो जाएगी. आधुनिक तौर-‍तरीक़ा भले अख्तियार कर ले लेकिन ये मानसिकता समाप्‍त होगी, इतनी जल्‍दी : लगता नहीं है.

  4. दिलीप मंडल Reply

    September 8, 2009 at 3:22 pm

    विवाह संस्था के एक खंभे के तौर पर जाति ने अपना अस्तित्व मजबूती से बचा रखा है। राकेश भाई, मेरा अनुमान सिर्फ ये है कि कर्म और वर्ण का रिश्ता खासकर शहरों में बेहद तेजी से कमजोर हो रहा है और इस रिश्ते का लंबे समय तक टिक पाना आसान नहीं है। वैसे जाति के बारे में आपकी आशंका बेबुनियाद नहीं है। आखिर ये संस्था इतने लंबे समय से, समाज में इतने बदलावों के बावजूद, जिंदा है। जाति में अद्भुत जीवनी शक्ति है। इससे इनकार नहीं है। लेकिन इस बार जाति पर हमला किसी सुधार आंदोलन की ओर से नहीं आया है। उत्पादन संबंधो में हो रहे बदवाल से जाति खुद को कैसे बचाती है या तबाह हो जाती है, ये देखना रोचक होगा।

    हम सब भाग्यशाली है कि ऐसे रोमांचक समय में हम जी रहे हैं।

  5. राजेश पांडे Reply

    September 8, 2009 at 6:06 pm

    ये क्या मजाक है? ऐसा कैसे लिख सकते हैं आप लोग? क्या टॉयलेट साफ किया है – का मतलब क्या है? अगर प्रभाष जी ने ऐसा किया होगा तो क्या बहस बंद कर देंगे? मुझे नहीं लगता है कि आप लोग बहस बंद करेंगे. इसलिए बेहतर हो कि भाषा की मर्यादा बनाए रखी जाए. आज टॉयलेट में घुस रहे हैं कल को कहीं और घुसिएगा. ये ठीक नहीं है।

  6. brij khandelwal Reply

    September 8, 2009 at 6:35 pm

    dilip has tried to analyse the situation objectively. like others i too have my doubts how long it would take de-caste indian society. in recent years there have been instances of caste rigidities getting accentuated. the younger generation particularly is becoming caste-focused and one can even notice a degree of heart-burning and animosity due to caste based reservations in sections of high castes.
    i remember having written in point of view weekly edited by dev duttji, some 30 years ago that the only way out was to rapidly urbanise india. the rural areas should also be urbanised in terms of facilities, urbanisation creates new pressures and new situations where practise of casteism becomes practically difficult. new castes based on professional work like fitters, mechanics, repair-men, service providers, the courier wallash, the waiters and helpers, are created. nobody bothers to ask an electrician what his caste is and now in bigger cities domestic helps are coming from all castes and no one can afford to mind that.
    the solution therefore is urbanise india. in the west rural areas were urbanised long back. we should also specifically focus on this aspect

    brij khandelwal

  7. tushar banerjee Reply

    September 8, 2009 at 7:30 pm

    दिलीप भाई….समाज मे आ रहे बदलाव का तो आपने बहुत अच्छा और सटीक निष्कर्श निकाला पर एक बात समझ नही आ रही । एक तरफ आप बात कर रहे हैं जातिवाद के खात्मे की और दूसरी तरफ अपनी ही बात से पलटकर आरक्षण का पुरज़ोर समर्थन करते दिखते है । बात क्या है ?

  8. दिलीप मंडल Reply

    September 8, 2009 at 7:31 pm

    राजेश, मेरी समझ में ये नहीं आया कि टॉयलेट साफ किया है से भाषा की मर्यादा कैसे खंडित हो गई। कोई तो ये काम करता ही है, तो क्या उसकी मर्यादा भंग हो जाती है। फिर तो मेरी और शायद आपकी भी मर्यादा अक्सर भंग होती रहती है। अपने घर की सफाई से मर्यादा टूटती है तो दूसरे के घर में ये काम करने से तो मर्यादा का पूरा सत्यानाश हो जाता होगा? ऐसे लोगों की मर्यादा का ख्याल है आपको?

    भारत में पहले कुछ खास समुदाय के लोग ये काम करते थे और उन्हें नीचा माना जाता था। अब शहरी घरों में लगभग सभी लोग ये करने लगे हैं। यूरोपीय और अमेरिकी घरों में इसे करने के लिए कोई दलित नहीं जाता है। ये एक घरेलू काम है। इसे करने से किसी की इज्जत कैसे खराब होती है? बाटा और लिबर्टी की शू फैक्ट्री में किस जाति के लोग कौन सा काम नहीं करते हैं। होटल में आपकी प्लेट कौन उठाता है? समय बदल रहा है तो मैं क्या करूं? आप ही क्या कर लेंगे?

    मेरे ख्याल से इस प्रसंग में प्रभाष जोशी का जिक्र सिर्फ इसलिए आया है क्योंकि पिछले दिनों उन्होंने जाति श्रेष्ठता की बात की थी, जो आधुनिक अवधारणा है ही नहीं। प्रभाष जोशी खुद भी इस पर पुनर्विचार कर रहे होंगे। राजेंद्र यादव ने तो बाकायदा इंटरव्यू देकर कहा है कि वो अपने स्टैंड को रिव्यू करेंगे। इसलिए निश्चिंत रहें, किसी की मर्यादा का अतिक्रमण नहीं हो रहा है। कुछ लोग आपस में संवाद कर रहे हैं और संवाद का मीठा और कड़वा दोनों झेलने में सक्षम हैं। आप आतंकित न हों।

  9. दिलीप मंडल Reply

    September 9, 2009 at 3:15 pm

    तुषार जी, भारत में लोकजीवन से लेकर अर्थव्यवस्था तक हर क्षेत्र में पूरा भारत दिखे, इसके लिए जाति का कमजोर होना भी जरूरी है और आरक्षण भी। इन दोनों में कोई अंतर्विरोध नहीं है। दुनिया के ज्यादातर देशों में विविधता लाने के लिए अलग अलग मॉडल अपनाए जा रहे हैं। भारत ने भी एक मॉडल अपनाया है। हो सकता है कल को कोई बेहतर मॉडल इसे रिप्लेस कर देगा।

  10. abhishek singh Reply

    September 9, 2009 at 4:20 pm

    MANYAVAR AAP JO BHEE HO MUJHSE YE MATLAB NAHI LEKIN TOILET VALI BAAT SE TO VO TABKA JISE HUM **** AOUR **** KAHTE HAIN VO CHHOTE SHAHRON MEIN AAJ BHEE SAFAI KARTA HAI JAISI SAFAI VO KARTA HAI SHAYAD HEE KOI KARE. AMAN VERMA BHEE SHAYAD **** HE HONGE. MAIN EK THAKUR PARIVAR SE HUN AOUR AASHA KARTA HOON JIS JAATI KA JO KARYA HAI USE KARNE MEIN KOI HARZ NAHI HAI VAISE BHEE AGAR SAB LOG APNE TOILET SAAF KAR LENGE TO VO **** TO BEROZGAR HO JAYEGA

  11. Shesh Narain Singh Reply

    September 9, 2009 at 5:56 pm

    भाई ,जाति का विनाश तो करना ही पड़ेगा. इस बात पर किसी बहस का अब कोई मतलब नहीं होना चाहिए.अब तो यह मान कर चलना होगा कि जाति के आधार पर कोई बड़ा या छोटा नहीं रह सकता…नेता लोग जाति को बनाए रखने के चक्कर में हैं लेकिन अगर पढ़े लिखे लोग भी जाति संस्था के आधार पर तर्क देंगें तो ठीक नहीं है. गाँधी जी भी अगर जिंदा होते और जाति के समाज को विभाजित कर सकने की ताक़त देखते तो वे भी आंबेडकर और लोहिया की तरह जाति के विनाश की बात करते. आप लोग भी अपने बच्चों की शादी अपनी जाति के बाहर करिए समाज बहुत ही खूबसूरत हो जाएगा.

    • सुमन Reply

      September 10, 2009 at 12:29 am

      “अगर पढ़े लिखे लोग भी जाति संस्था के आधार पर तर्क देंगें तो ठीक नहीं है.” …लेकिन आपके महान प्रभाष जोशी ब्राह्मणवाद को वैचारिक आधार देने के लिए तर्क गढ़ें तो ठीक है? शेषनारायण जी आप दरअसल कहना क्या चाहते हैं ये सोच लीजिए।

  12. Shesh Narain Singh Reply

    September 9, 2009 at 6:50 pm

    एक बात रह गयी. शहरीकरण से जाति का विनाश करने की सोच ही पलायनवाद है. ..इसका मतलब यह है कि एक बीमारी के इलाज के लिए दूसरी और ज्यादा खतरनाक बीमारी को पाला जाए. ऐसा करना ठीक नहीं होगा. सूचना क्रान्ति के दौर से गुज़र रहे भारत में, गाँव की ज़मीन पर ही जाति के विनाश का काम करना होगा..अपना उदाहरण देना ठीक नहीं है लेकिन अगर आप तय कर लें कि अपने बच्चों की शादी, जाति के बाहर करेंगें तो गाँव में भी अब कोई विरोध नहीं कर सकता..बस मजबूती से अपने बच्चों के साथ खड़े रहिये..और तथाकथित सामाजिक दबाव की परवाह मत करिए..दिलीप की बात बहुत ही गंभीर है उसको उसी गंभीरता से बहस के केंद्र में बने रहने दीजिये.

  13. Yusuf Kirmani Reply

    September 10, 2009 at 12:24 am

    एक गंभीर बहस छेड़ी है आपने लेकिन गांधी जी वाली बात पर तथ्यों को साफ करने की जरूरत है। बहरहाल, इस बात में दम है कि महानगरों में अब जाति या वर्ण व्यवस्था जैसी कोई बात नहीं रह गई है।

  14. शेष नारायण सिंह Reply

    September 10, 2009 at 5:29 am

    मैं जो कहना चाहता हूँ, वह तो मुझे मालूम है और पिछले चालीस साल से मालूम है.. आप समझना क्या चाहते हैं , वह आप तय कीजिये.और श्रीमान जी ,” यह आपके प्रभाष जोशी “जैसा जुमला इस्तेमाल करके इतनी गंभीर बहस को क्यों हल्का करना चाहते हैं. प्रभाष जोशी मेरे रिश्तेदार नहीं हैं.. जहां तक जाति के विनाश की बात है , उस पर मेरी एक निश्चित राय है..मैं नहीं जानता कि प्रभाष जोशी या आप क्या सोचते हैं इस बारे में. अगर आप लोग जाति को जिंदा रखना चाहते हैं तो मेरी राय सुन लें. जाति को एक संस्था के रूप में जिंदा रखने वालों को मैं वोट याचक मानता हूँ.यह आप को और प्रभाष जोशी को तय करना है कि आप लोग जाति के विनाश वालों की जमात में हैं या मायावती, मुलायम सिंह यादव,लालू प्रसाद, सोनिया गाँधी, राजनाथ सिंह, जयललिता, शरद पवार जैसे लोगों की जमात में हैं जो जाति की कृपा से रोटी खाते हैं. और ध्यान रखियेगा , जाति की कृपा से रोटी खाने वाले साहित्य में भी हैं और पत्रकारिता में भी. आप शायद मुझे जानते नहीं वर्ना मेरे लिए “आपके प्रभाष जोशी” जैसी बात न करते. मैं सब की इज्ज़त करता हूँ और यह इज्ज़त उसकी अच्छाइयों के लिए करता हूँ अच्छाइयां प्रभाष जी में निश्चित रूप से हैं और आप में भी होंगीं . जहां तक आपके और उनके हल्केपन का सवाल है , उसे आप लोग खुद संभालिये. मैं किसी के भी छिछोरपन से व्यथित होता हूँ . वह चाहे आप में हो या प्रभाष जी में.

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