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पैंट पहने के "जुर्म" में कोड़ों से राहत, पर जाना होगा जेल

पत्रकार लुबना अहमद अल हुसैन की हिम्मत और हौसलों से अदालत भी डर गई। तभी तो सूडान की अदालत ने दोषी ठहराने के बाद भी उन्हें कोड़ों की सज़ा से मुक्त कर दिया। अदालत ने लुबना से 200 डॉलर का जुर्माना भर कर घर जाने को कहा। लेकिन महिलाओं के हक़ की लड़ाई लड़ रही लुबना ने अदालत से कह दिया कि वो एक दमड़ी भी नहीं देंगी। जिसके बाद उन्हें एक महीने कैद की सज़ा सुनाई गई।

34 साल की पत्रकार लुबना को जुलाई में एक रेस्त्रां से 12 दूसरी महिलाओं के साथ गिरफ़्तार किया गया था। उस दिन वो सभी एक संगीत कार्यक्रम का लुत्फ उठा रही थीं और उन्होंने पैंट पहन रखी थी। सूडान में महिलाओं को पैंट पहनने की इजाजत नहीं है। वहां पैंट पहनना अभद्र बर्ताब के दायरे में आता है। गिरफ़्तार की गई 13 महिलाओं और लड़कियों में 10 ने गुनाह कबूल कर लिया। जिसके बाद थाने में उन सभी पर 10-10 कोड़े बरसाए गए और 250 सूडानी पाउंड का जुर्माना लगाया गया और फिर रिहा कर दिया गया। लेकिन लुबना और दो दूसरी महिलाओं ने गुनाह नहीं कबूल किया।

लुबना हुसैन संयुक्त राष्ट्र के लिए काम करती थीं। सूडान के कानून के मुताबिक संयुक्त राष्ट्र के कर्मचारियों को इम्यूनिटी हासिल है। मतलब उन पर संयुक्त राष्ट्र की इजाजत के बगैर कानूनी कार्रवाई नहीं की जा सकती। अदालत में जज ने लुबना से कहा कि वो चाहें तो जा सकती हैं। लेकिन लुबना ने इससे इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि वो अदालत में अपना पक्ष रखना चाहती हैं और उसके लिए उन्होंने संयुक्त राष्ट्र की नौकरी से त्यागपत्र दे दिया।

लुबना का कहना है कि वो इन्हीं परिधानों में इबादत करती हैं और ऐसा नहीं मानती कि पैंट पहन कर उन्होंने कोई गुनाह किया है। लुबना ने यह भी एलान किया कि “मैं इस मामले को ऊपरी अदालत तक ले जाऊंगी। अगर जरूरत पड़ी तो संविधान पीठ तक। अगर वहां भी मुझे गुनहगार ठहराया गया तो मैं चालीस कोड़े खाने को तैयार हूं। सिर्फ चालीस क्यों, मैं चालीस हज़ार कोड़े खाने को तैयार हूं। अगर सभी महिलाएं सिर्फ पहनावे को लेकर कोड़े खाने की हक़दार हैं तो मुझ पर भी चालीस हज़ार कोड़े बरसाए जाएं।”

जारी रहेगा आंदोलन

लुबना के हौसले ने सूडान में महिला अधिकारों के आंदोलन को जन्म दे दिया है। लुबना के समर्थकों ने एलान किया है कि वो महिलाओं की आज़ादी के लिए संघर्ष जारी रखेंगी। एक महीने से चल रही सुनवाई के दौरान वहां कई प्रदर्शन हुए हैं। हर सुनवाई के वक़्त अदालत के बाहर महिलाएं बड़ी संख्या में सरकार की तानाशाही को चुनौती देने के लिए जुट जाती थीं। उनका कहना है कि लुबना दोषी नहीं हैं, बल्कि दोषी है सूडान की सरकार, पुलिस और अदालत।

सोमवार को भी अदालत के बाहर एक तरफ कट्टरपंथी इस्लामिक परिधान में मौजूद थे तो दूसरी तरफ 150 से ज़्यादा लुबना समर्थक डटे हुए थे। ख़बरों के मुताबिक लुबना समर्थक जहां सरकार की तानाशाही के ख़िलाफ़ नारेबाजी कर रहे थे, तो वहीं कट्टरपंथी पैंट पहनने वाली महिलाओं को वेश्या बताते हुए लुबना के लिए कठोर दंड की मांग कर रहे थे। एक बार तो दोनों गुटों में झड़प की नौबत आ गई। जिसके बाद पुलिस को बीच में दखल देना पड़ा।

बीस साल से जारी है दमन

सूडान में महिलाओं पर पैंट पहनने की पाबंदी करीब बीस साल से लागू है। वहां कट्टरपंथी उमर अल बशीर ने 1989 में तख्ता पलट किया था। उसके बाद वहां इस्लामिक कानून लागू किए गए। उन्हें के तहत दो साल बाद 1991 में महिलाओं के पैंट पहनने को अभद्र ठहराया गया। तब से लेकर अब तक हज़ारों महिलाओं पर सरेआम कोड़े बरसाए जा चुके हैं। लुबना के मुताबिक “आए दिन महिलाओं की गिरफ्तारी होती है और उन पर कोड़े बरसाए जाते हैं।” इसके नतीजे बहुत भयावह होते हैं। “कई बार तो अपमान से ग्रस्त लड़कियां अपने घर नहीं लौटती। कई लड़कियां पढ़ाई छोड़ चुकी हैं। कुछ लड़कियों की तो शादी तक टूट चुकी है।” ये एक ऐसी मानसिक यंत्रणा है जिसका अंत जरूरी है।

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