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आलोक मेहता की अगुवाई में नई दुनिया का "गौरवशाली क्षण"

हिंदी के अख़बार बदल रहे हैं और उनमें में सबसे तेज़ी से बदल रहा है नई दुनिया। बीते हफ़्ते नई दुनिया को पढ़ने पर एक सुखद अनुभूति हुई। मन काफी खुश हुआ। लगा कि पहली बार किसी हिंदी अख़बार ने लीक से हट कर कुछ सकारात्मक करने की कोशिश की है और बाज़ार को ठेंगा दिखाया है।

बीते एक हफ़्ते में नई दुनिया, न केवल हिंदी बल्कि अंग्रेजी का, इकलौता अख़बार रहा जिसने राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल की रूस और ताजिकिस्तान यात्रा का विस्तृत कवरेज दिया। राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के व्यक्तित्व को नया उभार दिया। भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में यह शायद पहला मौका है जब किसी राष्ट्रपति की विदेश यात्रा को उचित स्पेस दिया गया है।

राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल सात दिन की रूस और ताजिकिस्तान यात्रा पर गईं थीं। नई दुनिया ने सातों दिन राष्ट्रपति की यात्रा डायरी प्रकाशित की। पहले दिन से प्रतिभा पाटिल के भारत लौटने तक ये डायरी हर रोज और हर संस्करण में छपी। आमतौर पर पहले पन्ने में बतौर बॉटम एंकर, लेकिन एक दिन पेज बारह पर। पांच सितंबर को तो राष्ट्रपति की यात्रा पर कुल पांच ख़बरें छापी गईं। कवरेज की शुरुआत चार सितंबर से हुई। उस दिन आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री वाईएसआर रेड्डी की मृत्यु की ख़बर छपी थी। उस दुखद ख़बर के ठीक नीचे बेतुके ढंग से गणेश उत्सव की सुखद तस्वीर छापी गई। और उसके नीचे राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल की रूसी यात्रा की ख़बर।

आगे बढ़ने से पहले राष्ट्रपति की यात्रा को लेकर नई दुनिया के कवरेज पर आप एक सरसरी नज़र डालें।

चार सितंबर, डायरी का पहला पन्ना
पेज वन - रूसी कहावत का जिक्र कर, छा गईं राष्ट्रपति
पेज सोलह – मेरा जूता है जापानी की धुन बजी

पांच सितंबर, डायरी का दूसरा पन्ना
पेज वन - दोस्ती को आर्थिक रिश्तों में बदलना ज़रूरी: पुतिन
पेज वन - राष्ट्रपति ने दी शिक्षकों को दी शुभकामनाएं

पेज बारह पर तीन ख़बरें
पहली – रूसियों की नई पसंद शाह रुख और ऐश्वर्य
दूसरी – भारत के विराट सांस्कृतिक वैभव की शानदार प्रस्तुति
तीसरी – हमारी दोस्ती ज़िंदाबाद (मॉस्को डायरी)

छह सितंबर, डायरी का तीसरा पन्ना
पेज वन – मास्को में पुस्तक मेला
गीता और गांधी भी पढ़े जा रहे हैं रूस में (फ्रंट पर कुल पांच ख़बरें – मास्को में पुस्तक मेला समेत तीन ख़बरें जिन्हें ठीक-ठाक स्पेस दिया गया। उनके अलावा दो ख़बरें संक्षेप में।))

सात सितंबर, डायरी का चौथा पन्ना
पेज वन – एतिहासिक धरोहर में इस्तेमाल हो रहा है संगमरमर
रूप में जयपुर के पत्थरों की धूम (राष्ट्रपति की यात्रा डायरी)

आठ सितंबर, डायरी का पांचवां पन्ना
पेज वन – ताजिकिस्तान में महिलाओं की स्थिति बदतर

नौ सितंबर, डायरी का छठा पन्ना
पहले पन्ने पर तीन कॉलम में लंबी सी तस्वीर। उसमें प्रतिभा पाटिल के साथ खड़े हैं ताजिकिस्तान के राष्ट्रपति इमामोली राखमोन। ऊपर लिखा है गौरवशाली क्षण। इसी तस्वीर से ताजिकिस्तान के राष्ट्रपति भी भारत में मशहूर हो गए। कुछ लोग उनका नाम भी जानने लगे।

पहले पन्ने का बॉटम एंकर – विदेशी जमीं पर हिंदी में भाषण दिया पाटिल ने
बॉक्स में – दरगाह पर चढ़ाई भारत की चादर
जितना कवरेज ताजिकिस्तान के स्वतंत्रता दिवस में प्रतिभा पाटिल को मिला उतना तो अपने यहां के गणतंत्र दिवस पर शायद ही मिला हो।

दस सितंबर, डायरी का सातवां पन्ना
पेज वन - “मैं रिश्तों को मानवीय स्पर्श देने गई थी”

अब आपको अंदाजा लग गया होगा कि राष्ट्रपति के दौरे को लेकर नई दुनिया के कवरेज ने कितनी बड़ी मिसाल पेश की है। यह पहली बार है जब किसी अख़बार ने स्पेस के मामले में राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को एक बराबर ला खड़ा किया हो। वरना अब तक की तो यही परंपरा रही है कि प्रधानमंत्री के विदेश दौरे की खूब विस्तार से छापो और राष्ट्रपति के दौरे को नज़रअंदाज कर दो।

आखिर में आप सबसे अपील। यह सही है कि मनोनीत सांसद चंदन मित्रा की राज्यसभा से विदाई के बाद खाली हुई जगह के लिए कई पत्रकारों का नाम चर्चा में है। यह भी सही है कि नई दुनिया के प्रधान संपादक आलोक मेहता का नाम एक ताक़तवार दावेदार के तौर पर उछाला जा रहा है। लेकिन हमारी आपसे गुजारिश है कि राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल की विदेश यात्रा को मिले कवरेज को उससे जोड़ कर मत देखिएगा। इस कवरेज में कोई फच्चर मत फंसाइयेगा

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11 Responses to आलोक मेहता की अगुवाई में नई दुनिया का "गौरवशाली क्षण"

  1. विनीत कुमार Reply

    September 11, 2009 at 10:02 am

    पूरी पोस्ट पढ़कर फच्चर फंसाने का मन तो पूरी तरह बना चुका था लेकिन अंत में आपका अनुरोध पढ़कर रुक गया।..आपके अनुरोध की कद्र करता हूं लेकिन सच कहूं,पोस्ट पढ़ने के दौरान लगा कि आज जनतंत्र को हो क्या है जो आलोक मेहता के नाम के कसीदे पढ़ने लग गया है। बाद में समझ आया तीर आगे तक जाए इसके लिए जरुरी है कि प्रत्यंचा जितनी पीछे तक खींची दाए उतना ही अच्छा।..

  2. brij khandelwal Reply

    September 11, 2009 at 4:43 pm

    chandan mitra rajya sabha mein jakar barbad hi hue. baise bhi ek party vishesh ki bhonpu ban gaye the. alok mehta bhi agar rajya sabha pahunche to patrikarita ko nuksan hi hoga. president kee coverage karne se patrakarita mein koi aayam nahin juda hai. hamari vyavastha mein president ka kuch khas role bhi nahin hai. sirf yatra karne se khabar nahin banti.

  3. सुधीर शर्मा Reply

    September 11, 2009 at 6:53 pm

    चलिए ठीक है। हम लोग कोई फच्चर नहीं फसाएंगे। न प्रतिभा पाटिल की कवरेज में, न नई दुनिया की पहल में और न ही आलोक मेहता की राज्यसभा की मुहिम में।

  4. Sanjay Pathak Reply

    September 12, 2009 at 4:06 pm

    Dear Samrendra Ji,

    I have become a regualr reader of your website since last 1 month or so & I would like to give you a little advise : please tell your desk to be little more informative while compiling special stories like MUDDA etc.

    How can your desk say that only Nai Duniya gave approriate space & detailing to the President’s Russia/Tazakistan tour ?? Haven’t you read RASHTRIYA SAHARA lately ???? Rashtriya Sahara gave each & every details related to President’s Tour & apart from that, they also published daily tour dairy written/reported by senior journlist Rajeev Saxena.

    Don’t be partial while making such stories & be as fair as you can be, if you want to be in run for a longer time.

  5. Rajesh Kumar Reply

    September 12, 2009 at 6:38 pm

    Are miyan kabhi kabhar JANSATTA bhi Padha karen.

  6. रंगनाथ सिंह Reply

    September 13, 2009 at 12:25 am

    आपकी इस रिर्पोट से आश्चर्य हुआ !! अन्य टिप्पणियों से आप जनमत का रूझान जान गए होंगे। हमारी भी राय उसमें शामिल समझें।

  7. sahil Reply

    September 14, 2009 at 3:48 pm

    राष्ट्रपति का अतिरंजित कवरेज खुद ज़ाहिर करता है कि यह आलोक मेहता की कारीगरी है. क्या आप उन्हें जानते नहीं हैं? पद्मश्री किस जुगाड़ से लिया था? पत्रकार के नाते नहीं, साहित्यकार बन कर हथियाया था (पत्रकार का पद्मश्री अपने मालिक छजलानी को जो दिलवा दिया था). तब अशोक वाजपेयी ने लिखा था कि इस मिडिओकर पत्रकार को हिंदी साहित्य के दो हज़ार नामो में भी जगह नहीं मिलेगी और पद्मश्री पा गया है . परन्तु वाजपेयीजी कि भड़ास से क्या फरक पड़ता है, कुंवर नारायण, कृष्णा सोबती, केदारनाथ सिंह, विनोद कुमार शुक्ल सेकडों साहित्यकारों को पीछे छोड़ आलोक पद्मश्री हो गए तो अब राज्य सभा को भी सुशोभित कर ही डालेंगे. छापने दो, खूब छापने दो राष्ट्रपति की तस्वीरें…जलो मत यारों.

  8. shailendra Reply

    September 15, 2009 at 2:04 pm

    kya aap bhi alok mehta ko rajyasabha sansad main dekhna chahte hain.padm puruskar to vo or unke malik le hi chke hain….

  9. sahil Reply

    September 23, 2009 at 4:23 pm

    जाने दो यार. जैसी संपादकी कर रहा है (आज फिर पहले पन्ने पर नई दुनिया में माननीय राष्ट्रपति और उनके पति की तस्वीर देख लो) उससे तो राज्यसभा में जा दुबकना अच्छा है. दीनानाथ मिश्र की तरह कुछ सांसद फंड का पैसा ही …

  10. jhagadu Reply

    September 25, 2009 at 1:28 pm

    sahi kaha ab to mahamahim ji ko rajya sabha mein alok ji ko bhej hi denaa chaahiye

  11. krantiveer Reply

    August 29, 2011 at 11:09 pm

    ye alok mehta to govt ke pithhu hein. taluye Chat-Chat ke aage jane ki hod mein usne apna jameer girvi rakh diya hai. tabhi tamam channels par anna ke against bolte nazar aaye. shame on him!

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