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“नारे उन्होंने ही लगाए, जिन्होंने मैनेजरों से फायदे उठाए”

वरिष्ठ पत्रकार शशि शेखर के इंटरव्यू का यह दूसरा हिस्सा है। जनतंत्र को उन्होंने यह इंटरव्यू हिंदुस्तान में समूह संपादक की जिम्मेदारी संभालने से ठीक एक दिन पहले यानी तीन सितंबर को दिया। तब वो अमर उजाला के समूह संपादक थे। इस इंटरव्यू का पहला हिस्सा जनतंत्र के पाठक पढ़ चुके हैं। उसमें हिंदुस्तान को लेकर उनकी योजनाओं के बारे में बात की गई थी। आज के हिस्से में अमर उजाला में उनके अनुभवों का जिक्र है। अमर उजाला के मालिकों से उनके संबंधों का जिक्र है। उनके अलावा शशि शेखर ने कुछ सामाजिक मुद्दों पर भी अपना नज़रिया साझा किया है। संपत्ति की घोषणा पर बात की। साथ ही पत्रकारिता और सत्ता के बीच गठजोड़ पर भी अपनी राय जाहिर की। आप उनका यह इंटरव्यू पढ़िये और अपनी प्रतिक्रिया दीजिए। - मॉडरेटर

समरेंद्र - अमर उजाला का अनुभव कैसा रहा? आप वहां मेरठ के संपादक बन कर गए। फिर ग्रुप एडिटर बने।

शशि शेखर – (बीच में टोकते हुए) यह ग़लत बात है। यह उड़ाई हुई बात है कि मैं स्थानीय संपादक बन कर गया था। यह बिल्कुल ग़लत है। मैं “आज तक” में काम करता था। यहां आने से पहले श्री अतुल माहेश्वरी और श्री अशोक अग्रवाल से मेरी कई महीने बात होती रही। दोनों के समान स्नेह का मैं भागीदार हूं। अजब सी बातें होती रहती हैं। कुछ ऐसे लोग हैं जो फैला देते है। उस समय सोच रहा था कि मैं किसी अख़बार को ज्वाइन करूं या टेलिविजन में रह जाऊं। मैंने इनसे बात की। बात होती रही… होती रही। फिर मैंने इनको डीसेंट्रलाइजेशन की थ्योरी बताई। मेरा मानना है कि अक्सर संपादक आते हैं और वो अपने को लाद देते हैं। मेरा तो कोई एजेंडा नहीं है तो क्यों नहीं चंदौली के जिला संवाददाता को प्रेरित करूं कि वो हमको विचार दे और कठुवा या जम्मू या श्रीनगर में भी उसका उपयोग हो सके। हम विचारशील लोगों का समूह हैं। इस लेटेस्ट सिस्टम में जब संचार के साधन जोरदार हो गए हैं तो हमें उनका प्रयोग करना चाहिए। जब मैंने कहा तो उन्होंने कहा कि ये तो संभव ही नहीं है। अतुल जी हंस कर बोले कि देखो शशि तुम्हारे बारे में और तुम्हारी क्षमता के बारे में किसी से कुछ पूछना नहीं है। तुमने जो काम किया है, उससे सबसे ज़्यादा प्रभावित मैं हूं। लेकिन यार संपादक लोग बातें बहुत करते हैं काम नहीं करते। तो मैंने कहा कि एक बार हो जाए। तय ये हुआ कि पूरा ग्रुप चलाने से पहले एक बार मेरठ और देहरादून चला कर देखो।

आपको जान कर आश्चर्य होगा कि बीस किलोमीटर से कम के दायरे वाले मेरठ में हमने कंप्यूटर लगाए। संवाददाताओं को सिखाया कि वो आठ बजे घर चले जाएं। मैंने कहा कि शिक्षा विभाग के संवाददाता को रात के एक बजे तक काम करने की क्या जरूरत है। मैंने कहा कि आप घर जाइए और क्वालिटी टाइम एन्ज्वॉय कीजिए। मैंने उन्हें एक भाई की तरह समझाने की कोशिश की। सोच के स्तर पर बदलाव की कोशिश हुई। मैं आपको बताऊं कि मुझे अख़बार के मालिकों ने जो दिया वो दिया। मेरे सहयोगियों ने जो दिया वो मेरे लिए अतुलनीय है। मैं अपने सहयोगियों का बहुत आभारी हूं। उन्होंने जो दिया उसे भूला नहीं जा सकता। मैं गदगद, भावुक और कृतज्ञ तीनों हूं।

समरेंद्र – अतुल माहेश्वरी का आपने बार-बार जिक्र किया है। उनके बारे में कुछ बताएं।

शशि शेखर – अतुल माहेश्वरी जी का वैल्यू सिस्टम बहुत जोरदार है। इसका श्रेय आप मुझे दे सकते हैं कि अमर उजाला में हमने समाचार की शक्ल में विज्ञापन नहीं छापे। लेकिन अतुल जी के बगैर यह संभव था क्या? और पूरे निदेशक मंडल के बिना यह संभव था क्या? अतुल जी का मानना है कि अमर उजाला की विश्वसनीयता से हम कोई समझौता नहीं करेंगे। आज जान लीजिए कि हिंदुस्तान के मालिक भी इस मामले में दृढ़ हैं। दिक्कत वहां होती है जब हम दृढ़ता से अपनी बात नहीं रखते। मुझे नहीं लगता कि कोई भी अख़बार मालिक अपनी विश्वनीयता से समझौता करना चाहता है। और हिंदुस्तान टाइम्स वो ग्रुप है जिसने कभी पेज थ्री को मौका नहीं दिया। उस अंधड़ में भी जब एक ग्रुप करोड़ों-अरबों रुपये कमा रहा था, उन्होंने पेज थ्री को जगह नहीं दी। दिक्कत यही हो गई है कि मीडिया में हम लोग कभी-कभी एकांगी बात करते हैं। मेरा मानना है कि एक अच्छे मालिक का दिल नहीं तोड़ना चाहिए। चाहे वो प्रणव रॉय हों, चाहे वो अतुल माहेश्वरी हों, चाहे वो शोभना भरतीया हों या कोई भी हो। हमें उनका सहयोग करना चाहिए। हम अक्सर मान लेते हैं कि वो हमारे शत्रु हैं।

मैं चाहूंगा कि आप एक वाकये का जिक्र करें। जब मैं आज अख़बार में सब-एडिटर था। तो एक दिन यूनियन के लोग मेरे पास चंदा मांगने आए। उन्होंने कहा कि बीस रुपये चंदा दीजिए। मैंने कहा कि क्या करेंगे बीस रुपये लेकर। उन्होंने कहा कि हम मुकदमा लड़ेंगे। मैंने कहा कि मुकदमा लड़ कर क्या करेंगे। उन्होंने कहा कि हम इस अख़बार को बंद करा देंगे। तो मैंने कहा कि भगवन आप अख़बार बंद करा देंगे? उसके लिए आप बीस रुपये मुझसे चाहते हैं। अरे आप किसी का भला करें तो बीस की जगह दो सौ रुपये ले जाइए। इस पर वो आग बबूला हो गए। एक सज्जन बहुत बड़े थे… गालियां देने लगे। मैंने कहा कि गालियां दीजिएगा तो उठा कर पटक दूंगा। गाली वाली नहीं सुनूंगा।

उस दिन मैंने सोचा कि झंडा और डंडा लेकर मालिक से लड़ना जरूरी हो गया तो लड़ेंगे, लेकिन उससे पहले एक बार उसे ठंडे दिमाग से समझाना चाहिए। कहना चाहिए कि हम आपको व्यापार चलाने में मदद करेंगे। उसके बदले में आप मुनाफे का कुछ हिस्सा हमें दीजिए।

अतुल माहेश्वरी ने इसी अख़बार में जूनियर सब-एडिटर का पद समाप्त किया। मुझे नहीं मालूम कि इसकी चर्चा क्यों नहीं होती है। एक अवैधानिक पद था जूनियर सब-एडिटर का। अमर उजाला में हमने ख़त्म किया। हमने सब-एडिटर की सैलरी अवार्ड से कहीं अधिक तय की। 12 हज़ार रुपये। हमने तीन साल पहले कैल्कुलेट किया कि बुलंदशहर जैसे शहर में क्लास टू ऑफिसर की सैलरी जितनी होती है उतना हम अपने जिला संवाददाता को दें तो अच्छा है। लेकिन आप गौर करिए कि क्लास टू ऑफिसर लोक सेवा आयोग के जरिए आता है। अभी पत्रकारों में प्रशिक्षण की प्रक्रिया शुरू नहीं हुई है। फिर भी हमने एक परंपरा की शुरुआत की। अगर हम झंडा और डंडा लेकर लड़ते तो जो आज अख़बार का हाल हुआ है शायद वही हाल यहां होता। इसलिए मैं यह मानता हूं कि अगर हम अच्छी बात करें। साथियों को अच्छी तरह प्रेरित करें। तो ज़्यादातर मौकों पर बिना लड़ाई के अच्छे नतीजे निकल सकते हैं।

समरेंद्र – अमर उजाला छोड़ने की कोई और वजह है या फिर सिर्फ यही कि एक नई जिम्मेदारी मिली है।

शशि शेखर – (मुस्कुराते हुए, मजाक के लहजे में) ज्योतिषी लोग एक वजह बताते हैं। मुझे बहुत ज़्यादा यकीन नहीं है। पहले शनि की महादशा थी जब आज अख़बार में मैं काम करता था। कहते हैं कि शनि मेरे लिए एक स्थिर ग्रह है। शनि की महादशा में मैंने बीस साल आज अख़बार में काम किया। अत्यंत प्रलोभन मिले। 93 में नवभारत टाइम्स पटना का रेजिडेंट एडिटर बन रहा था। आलोक मेहता जी के बाद। तब मैं कुल 32-33 का था, लेकिन नहीं गया। फिर जब बुध की दशा आई तो एक ज्योतिषी ने कहा (मैं फिर कह रहा हूं कि मेरा ज्योतिषी में विश्वास नहीं है। लेकिन अपने यहां ज्योतिष छापता हूं और ज्योतिषियों से साबका पड़ता है।) कि अब चंचल ग्रह आ रहा है तुम्हारा, तुम एक जगह टिक कर नहीं बैठोगे। फिर मैं “आज तक” गया। एक साल पांच महीने में मन उखड़ गया। यहां सात साल रहा हूं। (यकीन मानिए कई रातों से सोया नहीं हूं। अतुल जी के साथ आगे काम नहीं कर पाने की कसक है।) कहीं वो ज्योतिषी सही तो नहीं कह रहा था कि मैं चंचल हो गया हूं। (हंसते हुए)

समरेंद्र – अब कुछ सामाजिक मुद्दों पर बात। अब जजों की भी संपत्ति सार्वजनिक होगी। यहां यह बात भी उठ रही है कि पत्रकारों को और मीडिया संस्थानों को भी अपनी आय के स्रोत सार्वजनिक करने चाहिए।

शशि शेखर – बहुत अच्छी बात है। सिर्फ पत्रकारों को ही क्यों? सबको करना चाहिए। यदि इस बारे में कोई फैसला लिया जाए तो सबसे पहले मैं घोषणा करने को तैयार हूं। एक-एक पाई की घोषणा। इसमें क्या बुरी बात है। वैसे भी जो लोग इनकम टैक्स देते हैं… एक तरह से उनका ब्योरा तो जमा होता ही है।

लेकिन मुझे लगता है कि संपत्ति की घोषणा भी हाथी के दांत की तरह है। मसलन नोएडा में किसी की कोठी है तो स्टांप रेट के हिसाब से उसकी कीमत होगी 28 लाख रुपये। बेचने चलिए तो हो सकता है कि तीन करोड़ रुपये मिलें। पर हाथी के दांत ही सही। कुछ रंग-रूप तो सामने आती ही है। मुझे लगता है कि इसका स्वागत किया जाना चाहिए

समरेंद्र – सत्ता और पत्रकारिता के बीच एक गठजोड़ है। उदाहरण के तौर पर राज्य सभा के लिए पत्रकारों के मनोनयन को देखिए। मनोनीत होने की पहली शर्त बुनियादी योग्यता नहीं यही गठजोड़ है।

शशि शेखर – बात ठीक कह रहे हैं। जब कोई किसी को देता है तो उसके बदले में कुछ चाहता भी है। गठजोड़ है और लाइकिंग-डिसलाइकिंग है तभी तो देना और लेना चल रहा है। लेकिन मुझ जैसे पत्रकार भी हैं जो किसी नेता के सत्ता में आने पर दुश्मन हो जाते हैं और वैसे घर के सदस्य रहते हैं। एक बड़े कद्दावर नेता हैं। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री कई बार रह चुके हैं। प्रधानमंत्री पद के दावेदार हैं। मेरे गांव के पास के हैं। जब वो मुख्यमंत्री होते हैं तो नाराज़ हो जाते हैं और जब वो मुख्यमंत्री पद से हटते हैं तो मैं उनका भतीजा हो जाता हूं। मेरा अलग तरह का भाई भतीजावाद है, जो चलता रहता है। आमतौर पर तभी चलता है, जब लोग सत्ता में नहीं रहते हैं।

समरेंद्र – तो क्या सत्ता और पत्रकारिता के गठजोड़ को आप सही मानते हैं?

शशि शेखर – मैं सही क्यों मानूंगा। जहां लेना-देना है। वो एक व्यापार है। व्यापार को मैं सही कहूं या नहीं कहूं वो चल रहा है। मैं किसी की निंदा या आलोचना नहीं करना चाहता। पर मैं निजी तौर पर राज्यसभा में नहीं जाना चाहता। मैं निजी तौर पर कभी किसी भी सरकारी संस्था का सदस्य नहीं बना। मैंने कभी किसी राजनीतिक पार्टी से चुनाव लड़ने के बारे में नहीं सोचा।

समरेंद्र – आजकल कहा जा रहा है कि संपादक मैनेजर हो गया है। उसका काम ख़बरों से ज्यादा कंपनी के कारोबार को बढ़ाना है।

शशि शेखर – परसों तक अमर उजाला में छपने वाली हर प्रमुख ख़बर, संख्या में 100-125, मुझको मालूम थी। परसों तक आज़मगढ़ में हादसे की ख़बर मुझे पता थी। मुझे मालूम था कि लीड ख़बर का शीर्षक क्या होगा। मुझे मालूम था कि पहले पन्ने का डिजाइन कैसा होगा। मुझे मालूम था कि पांच प्रदेशों के अलग-अलग संस्करणों में पहली हेडलाइन क्या होगी। अब अगर इसके बाद भी कोई मुझे मैनेजर कहे … तो मुझे उससे फर्क नहीं पड़ता।

मैं अपनी बात जानता हूं। पता नहीं कौन खुद को मैनेजर कहता है? कौन मैनेजर पत्रकार कहता है? लेकिन परसों तक तो मैं अपना काम कर रहा था। कल अलबत्ता ख़बर आई कि राजशेखर रेड्डी (आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री) लापता हो गए हैं तो मैं थोड़ा भावुक हो गया था। मैंने कहा कि आज मैं ख़बर नहीं जानना चाहता। तीस साल के करियर में यह पहली बार था जब मैंने अख़बार को फोन नहीं किया। सोचा जो अख़बार निकाल रहे हैं उन्हें निकालने दिया जाए। अगर मैं दफ़्तर में होता तो यह हेडिंग नहीं जाती कि हवा में लापता सीएम। क्योंकि मैं मैनपुरी के गांव में रहने वालों के लिए भी अख़बार निकालता हूं। उत्तरकाशी के गांव के लिए भी अख़बार निकालता हूं। कठुवा के लिए भी निकालता हूं। इसलिए परसों तक मैं पत्रकारिता कर रहा था और कल से फिर पत्रकारिता ही करूंगा। कोई मुझे मैनेजर कहे तो यह उसकी श्रद्धा है।

समरेंद्र – मैनेजमेंट से आपका कोई टकराव हुआ है। कभी कोई झगड़ा। कोई तीखी बहस।

शशि शेखर – यह भी बहुत स्वार्थी और चालाक लोगों की उड़ाई हुई चीज है। आखिर ऐसा क्यों होता है कि जब तक संपादक जी की कुर्सी सुरक्षित रहती है तो कोई टकराव की बात सामने नहीं आती। जैसे ही कुर्सी हिलने लगती है तो वो और उनके साथी हल्ला मचाना शुरू कर देते हैं। मैं किसी बड़े का नाम नहीं लेना चाहता। एक हादसा तो अभी ही हुआ है। उससे पहले एक आदरणीय पुरुष थे। उनके बारे में बोल दिया तो बड़ी दिक्कत होगी। अब वो रह ही नहीं गए हैं। मेरे बहनोई उनके मित्र थे। हम लोग बैठा करते थे उनके साथ। हमसे वो बात कुछ करते थे और मंच पर जाते ही कुछ और कहने लगते थे। एक पूरा का पूरा कबिला उनके साथ चलता था। तो जय-जय भी होती रहती थी। हम जैसे लोगों की दिक्कत यह है कि हमारे पास कोई कबिला नहीं है। तो बुराई करने वाले तो खुल कर बुराई कर देते हैं। तारीफ़ करने वाले सोचते हैं कि यार पता नहीं ये आदमी कुछ देगा या नहीं देगा तो बोल कर दूसरों का दुश्मन न बन जाऊं। नारे आज तक उन्होंने ही लगाए हैं जिन्होंने मैनेजरों से फायदे उठाए हैं।

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3 Responses to “नारे उन्होंने ही लगाए, जिन्होंने मैनेजरों से फायदे उठाए”

  1. banarasi Reply

    September 17, 2009 at 12:59 am

    HINDUSTAN KI KAMAN SHASHI JI KE SHAMBHLANE KE BAD HINDI JOURNALISM MEAN 24/7 KAM KARANAEWALE YOUTH KO BARI UMEED HEA. HINDUSTAN BHALE BAHUT PAHALE BADALANE KA NARA DIYA LEKIN ABB WAKIA MEAN BADLEGA

    • yogi Reply

      September 19, 2009 at 12:34 pm

      We all miss you sir. May u be always happy. Dukh rahega ki aapke saath kaam ka bahut mauka nahi mil paya.

  2. dream zone Reply

    September 19, 2009 at 12:28 pm

    Shashi shekhar apni baaton se ek imandaar insaan lagte hain. Wah apni imandaari banaye rahen aur youth ko aage lane ka kaam karte rahen. Youn bhi wah kai logo ke role model hain. people love him.

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