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अपने-अपने गांधी, अपने-अपने राम

गांधी टाइटल लगाकर कितने लोग घूमते हैं लेकिन गांधी सुनकर तो जेहन में एक ही नाम घूमता है- मोहनदास करमचंद गांधी। इन्हें हिंदुस्तान अपना राष्ट्रपिता और दुनिया महात्मा मानती है। इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, संजय गांधी, सोनिया गांधी, मेनका गांधी, राहुल गांधी, वरुण गांधी वगैरह तक गांधियों की लंबी कतार है लेकिन गांधी अगर संज्ञा के बजाय किसी नाम से जुड़कर विशेषण बन गया तो वह नाम है मोहनदास। वह गांधी पर्याय बन गया सत्य और अहिंसा के पुजारी का। 23 सितंबर की सुबह हर अखबार में एक गांधी और छाया था। ना तो वह मोहनदास गांधी के खानदान का है, ना ही नेहरु गांधी परिवार का कोई वारिस। उसका नाम है खोबाद गांधी। एक बार तो कोई गांधी शब्द सुनकर यही सोचेगा कि खोबाद गांधी भी कोई गांधीवादी, अहिंसावादी, सविनय अवज्ञावादी होंगे। लेकिन इस गांधी का परिचय अलग निकला।

खोबाद गांधी सीपीआई (माओवादी) के पोलित ब्यूरो के सदस्य हैं। सीपीआई (माओवादी) वह संगठन है जो चीनी अधिनायकवादी माओत्सो तुंग के इस बयान से चलायमान होता है कि सत्ता तो बंदूक की नली से निकलती है। खोबाद गांधी भी ऐसा ही मानते हैं। दून स्कूल में पढ़े और लंदन से चार्टर्ड एकाउंटेसी में डिग्री हासिल करने वाले खोबाद ने सर्वहारा की तानाशाही के लिए अपनी परंपरागत दुनिया छोड़ दी। वह अपनी पत्नी अनुराधा के साथ हिसाब-किताब की गली छोड़ बंदूक की नली से समाज बदलने निकल पड़े। 22 सितंबर को दिल्ली में वह गिरफ्तार हो गये।

पता नहीं, महात्मा गांधी के बारे में खोबाद गांधी की क्या राय है? वह गांधी को कितना जानते, मानते, अपनाते और नकारते हैं? सीपीआई (माओवादी) का मानना है कि वह समाज के आखिरी आदमी के हक की लड़ाई लड़ता है। खोबाद गांधी भी वही लड़ाई लड़ने के लिए जमाने से छुपते हुए जमाने के सामने आए। गांधी भी वही लड़ाई लड़ते रहे लेकिन उनमें सत्य का सत्व और त्याग का ताप था, लिहाजा उन्हें ना तो किसी से डरने की जरूरत पड़ी, ना ही किसी से मुंह छुपाने की। अपनी विचारधारा में वह स्पष्ट थे और अपनी मान्यताओं के लिए सब कुछ न्यौछावर कर देने को सतत तैयार। गांधी का जीवन इस बात का सबूत है कि इच्छा शक्ति की लाठी खून बहाने वाली बंदूक से मजबूत होती है। लेकिन एक गांधी मानवीय मूल्यों पर न्यौछार हो गया, दूसरा गांधी बम और बंदूक का रोडमैप तैयार करता रहा।

विचित्र मणि

विचित्र मणि

फिर वही सवाल उठता है कि नाम में क्या रखा है। शेक्सपीयर ने भी तो यही पूछा था। इत्तफाक देखिए कि भारतीय समाज में उत्तर-आधुनिक और दलित क्रांति के नए-नए विचारकों को जिस राम नाम से ही बदबू आने लगती है, वही राम शब्द तमाम दलित जातियों के लिए सरनेम के तौर पर इस्तेमाल होता है। जगजीवन राम से लेकर कांशीराम तक। (अति महत्वपूर्ण नोट- राम के नाम को संघ परिवारवालों ने इतना छला और भुनाया है कि अब राम में कई लोगों को संघ परिवार का ही फरेब और घृणा नजर आने लगता है। लेकिन ऐसा है नहीं। संघ परिवार तो राम का नाम बदनाम करता है। निर्गुण में देखें तो कबीर थे राम भक्त, जिन्होंने कहा- राम मोरे पिया, मैं राम की बहुरिया। और सगुण में तुलसी दास। उन्होंने लिखा- तुलसी सरनाम गुलाम है राम को, जाको रचे सो कहे कुछ कोई, मांग के खइबो, मसिद में सोइबो, लेबो को एक ना देबो को दोई।) तथाकथित बड़ी जातियां राम के नाम पर जयकारा तो खूब लगाती हैं, लेकिन समाज के आखिरी पायदान पर खड़ी कर दी गयी जातियों को उनका हक तो छोड़िये, सम्मान भी देना नहीं चाहतीं। राम का धनुष तो दिखता है, शबरी का जूठा बेर नहीं दिखता। कुल मिलाकर बात यही है कि चाहे गांधी हों या राम, सबके अपने गांधी हैं, सबके अपने राम।

((विचित्र मणि टेलीविजन में वरिष्ठ पत्रकार हैं))

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5 Responses to अपने-अपने गांधी, अपने-अपने राम

  1. Sanjay Grover Reply

    September 24, 2009 at 10:51 am

    तथाकथित बड़ी जातियां

    lekh to achchha hai hi. तथाकथित shabd ka prayog bhi achchhi shuruaat hai.

  2. नाम में क्या रखा है ?? Reply

    September 24, 2009 at 11:20 am

    विचित्र मणि ने कुछ हिन्दी अखबारों की लापरवाही को जनतंत्र तक पहुंचा दिया। मणि जी हमें बताए कि Sonia Gandhi और Kobad Ghandy दोनों के सरनेम में कोई फर्क है या नहीं ? Gandhi और Ghandy एक ही है क्या ?

    दूसरी तरफ राम नाम को ले उड़ने से पहले मणि जी को ध्यान रखना था कि कांशीराम बौद्ध थे। उनके ज्यादातर अनुयायी भी बौद्ध ही हैं। उनका मणि के राम से कोई संबंध नहीं है। नाम जाप करने की उन्हें पूरी छूट है लेकिन इस तरह का अतिसतही सरलीकरण ठीक नहीं है।

    मणि जी और उनके प्रशंसको की भावनाएं बहुत जल्द आहत होती हैं इसलिए उन्होंने शेष जो कुछ लिखा है उस पर जितना कम कहा जाए उतना अच्छा है।

  3. अनिकेत Reply

    September 24, 2009 at 3:26 pm

    बढ़िया है..जनतंत्र की बहसों में दक्षिणपंथी पाठ से विविधता आती है। छिछले तर्कों या वितंडा पर आधारित सतही विश्लेषण, ऐसे विश्लेषणों की पोल खोलने में मदद देते हैं। विचित्र मणि के भीतर का सवर्ण बार-बार सिर उठाता है, हालांकि चोला मानवता, परंपरा और अब गांधी का भी होता है। वैसे स्वर्गीय चंद्रशेखर के भक्त से और उम्मीद भी क्या की जा सकती है। लेकिन विचित्र मणि के स्तर से भी ये लेख बेहद सतही है।

  4. विद्रोही Reply

    September 24, 2009 at 3:35 pm

    सिर्फ लिखने के लिए लिख दिया क्या भाई? क्या कहना चाहते हो, कुछ पता नहीं चल रहा…दिमाग में कोई आइडिया आए, तो थोड़ा सोचकर, ठहरकर लिखा करो..बात कुछ बनी नहीं..नक्सलवाद, गांधी, हिंसा, अहिंसा, दलित, सवर्ण, राम, तुलसी, कबीर, कांशीराम …सौ शब्दों में सबकुछ क्यों समेटना चाहते हो?

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