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मीडिया के सहारे हिंसक भीड़ तैयार कर रही है सरकार?

रविवार को देश के सभी बड़े अंग्रेजी अख़बारों में एक विज्ञापन छपा। यह विज्ञापन केंद्रीय गृह मंत्रालय की तरफ़ से जारी हुआ था। उसमें नक्सली हिंसा में मारे गए सात लोगों की तस्वीरें छापी गई हैं। पहली तस्वीर है छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले की जत्ति पुरुषोत्तम की। तस्वीर के नीचे नाम और पता के साथ क़त्ल की तारीख़ छपी है। तीसरी तस्वीर चार साल के एक मासूम की है। दो तस्वीरें नवयुवक और युवती हैं। बाकी तीन तस्वीरें 35 से 45 साल की उम्र के लोगों की हैं। इन तस्वीरों के साथ संदेश लिखा है कि नक्सली हिंसा में बेकसूर मारे जा रहे हैं और नक्सली उन क्रूर क़ातिलों के समान हैं जो सोची समझी साज़िश के तहत क़त्ल करते हैं।

नक्सली हिंसा को किसी भी लिहाज से जायज नहीं ठहराया जा सकता। उसका विरोध होना चाहिए। लेकिन केंद्रीय गृह मंत्रालय की तरफ़ से जारी इस विज्ञापन से कई सवाल उठते हैं। पहला सवाल कि अपने देश की जनता को नक्सली बनाने के लिए जिम्मेदार कौन है? दूसरा सवाल, छत्तीसगढ़ में सलवा जुडुम और सुरक्षाबलों के जुल्मों को किस श्रेणी में रखा जाए? क्या उसे भी सरकार सोची समझी साज़िश के तहत किए गए क़त्ल मानेगी या नहीं? तीसरा सवाल, क्या इस तरह अख़बारों में विज्ञापन से नक्सली हिंसा पर रोकथाम लग सकती है? चौथा और आखिरी सवाल, कहीं ऐसा तो नहीं कि मारे गए लोगों के क्षत-विक्षत शवों को छाप कर सरकार, छत्तीसगढ़ और नक्सल प्रभावित दूसरे इलाकों में नरसंहार के लिए जनमत तैयार करना चाहती है? सरकार की तरफ़ से प्रायोजित हिंसा में मीडिया को भागीदार बनाना चाहती है?

इन सभी सवालों के जवाब में अंगुली सरकार की तरफ़ भी उठेगी। नक्सली हिंसा घृणित है और उसके ख़िलाफ़ सरकारी मुहिम भी कम घृणित नहीं। बीते दो दशक में अलग-अलग सरकारों ने आतंकवादियों से लेकर अलगाववादियों तक से बिना शर्त बातचीत की। सीज फायर किए। लेकिन नक्सलियों से बातचीत की कभी कोई संजीदा कोशिश नहीं हुई। आंध्र प्रदेश में राजशेखर रेड्डी के पहले दौर के शासनकाल में छह महीने के लिए सीजफायर हुआ था। लेकिन उसमें भी सरकार की मंशा साफ-सुथरी नहीं थी। जिसकी वजह से बातचीत बेनतीजा ख़त्म हो गई। उसके विपरीत अगर आप आतंकवादी संगठनों की बात करें तो कश्मीर से लेकर नगालैंड तक सभी जगह सरकार ने बातचीत के जरिए रास्ता निकालने की कई कोशिशें कीं। इसलिए अगर देश में नक्सली हिंसा जारी है तो उसके लिए सरकार भी नक्सलियों के बराबर ही जिम्मेदार है।

नक्सल प्रभावित इलाकों में बेकसूर लोगों पर सुरक्षाबलों के जुल्म भी कम नहीं। यही वजह है कि आज भी नक्सलियों की ताक़त बढ़ रही है। सत्ता की तरफ से किए गए जुल्मों के ख़िलाफ़ ही लोग हथियार उठाते हैं। अगर दलितों और आदिवासियों के प्रति और उनकी ज़मीन के प्रति सरकार का रवैया संवेदनशील और मानवीय होता तो नक्सली कब के ख़त्म हो गए होते। मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट में भी छत्तीसगढ़ में बेकसूरों पर सुरक्षाबलों के जुल्मों की कई दास्तान दर्ज हैं। इसलिए विरोध करना है तो दोनों तरफ़ की हिंसा का विरोध करना होगा।

अब बात विज्ञापन से जागरुकता फैलाने की तो यहां विज्ञापन की भाषा और उससे पहले की पृष्ठभूमि पर गौर करने के बाद यही कहा जा सकता है कि सरकार नक्सल प्रभावित इलाकों में बड़े पैमाने पर सशस्त्र कार्रवाई की तैयारी में जुटी है। उन्हीं तैयारियों के तहत एक माहौल बनाया जा रहा है। ताकि जब बड़े पैमाने पर हिंसा होगी तो उसे जायज ठहराया जा सके। उसी कड़ी में सबसे पहले नक्सलियों को आतंकवादी घोषित किया गया। फिर सभी राज्यों की पुलिस और अर्धसैनिक बलों के साझे प्रयास से उन्हें ख़त्म करने की भूमिका तैयार की जा रही है। उसी के तहत अख़बारों में ये विज्ञापन छपवाए गए हैं।

वरना जागरुकता फैलाने का मकसद होता तो विज्ञापन की भाषा संवेदनशील होती। ऐसी भाषा जो दिल को छू जाए, न कि आपको गुस्से से भर दे। इस लिहाज से देखें तो देश भर के सभी बड़े अंग्रेजी अख़बारों में छापे गए इस विज्ञापन का सिर्फ़ और सिर्फ़ एक ही मकसद है – सत्ता से जुड़े तमाम तबकों को, देश की प्रशिक्षित जनता को और नीति निर्धारण में जुटे लोगों को… भविष्य में सरकार की तरफ से प्रायोजित हिंसा के लिए मानसिक तौर पर तैयार किया जा सके। एक ऐसी हिंसक भीड़ खड़ी की जा सके जो नक्सलियों के क़त्लेआम पर तालियां बजाएं। यह सोचे बगैर कि वो गुमराह लोग भी इसी देश के नागरिक हैं और उन्हें भी हमारी और आपकी तरह सम्मान से जीने का हक़ है।

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3 Responses to मीडिया के सहारे हिंसक भीड़ तैयार कर रही है सरकार?

  1. संदीप Reply

    September 24, 2009 at 4:18 pm

    समरेंद्र भाई,

    वाकई नक्‍सली हिंसा को जायज नहीं ठहराया जा सकता, यह मार्क्‍सवाद या माओवाद नहीं बल्कि वामपंथी आतंकवादी है। लेकिन सरकार को बरी नहीं किया जा सकता, और आपने इस विज्ञापन अभियान की बघिया उघेड़ते हुए सही प्रश्‍न उठाये हैं।

  2. रंगनाथ सिंह Reply

    September 24, 2009 at 7:11 pm

    bahut hi jaruri lekh hai. itne sandar aur samichin lekh ke liye aapko badhayi. naxaliyo ne jyada hatya ki hai sarkari tantra ne iski gadana honi chahiye. naxaliyo ko khuli debate me aana chahiye. sarkari daxinpanth aur khas taur par avsarvadi vampanth se unhe khuli bahas karni chahiye.

  3. ira jha Reply

    September 24, 2009 at 8:02 pm

    uska doosra pahloo kaun dikhayega.sarkari hinsa me jo log mare gaye hain vo kiske khate me jayenge.unkee tasveer yakahan chhapegi/kisi ne lee hogi tab bhee nahin chhap saktee.patrakaron ko ek-ek karne dharne kee taiyari hai unkee har gatividhi par nazar hai aur likhne par teeka tippani.chhattisgarh se bhagayen naxaliyon ko par garantee to den ki unse jyada tadad me adivasee nahi marenge.sarkar ke pass koi formula nahin hai naxaliyon aur adivasiyon kee pahchan ka.ghane jungalon me kya hota hai koi kya jane.1966 ke golikand kee dahshat se adivasiyon kee nai peedhi ubarne lagi thee to salwajudud sawal bankar khada ho gaye donon bade rajneetik dalon kee dukan chal padi aur jangal me jeene ka aadi adiwasee camp me simat gaya.poori taiyari hai chhattisgadh me naxal vrodhi bade abhiyan kee par iskee asliyat jub tak duniya tak pahunche badi der ho jayegee.vaise hee jaise 1966 ke golikand ke bad hua tha-ira jha

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