“एक मजदूर काफी बूढ़ा हो गया था। बदन में इतनी शक्ति नहीं थी कि वह मजदूरी कर सके। लेकिन संतान नालायक थीं, इसलिए वृद्धावस्था में भी उसे काम करना पड़ता था। जब भी वह बोझ उठाता तो भगवान का नाम लेकर कहता- हे भगवान, कितना सताओगे, अब तो मुझे उठा लो। एक दिन भगवान पसीज ही गये। प्रकट हुए और बोले कि वत्स, चलो मेरे धाम। तुम्हारा दुख-दर्द अब मुझसे सहा नहीं जाता। भगवान को सामने और खुद को अपने साथ ले जाने का उनका आग्रह देख उस बूढ़े की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गयी। उसने भगवान से गिड़गिड़ाकर कहा- प्रभो, अभी मुझे मत उठाओ, बस मेरा बोझ उठा दो। मैं तो यूं ही मजाक में तुम्हें याद कर लेता था।” यह एक लघु कथा है राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की। शब्दों में हेर-फेर हो सकता है लेकिन भावार्थ यही है कि दुनियादारी की किचकिच में सड़ना मंजूर है, मरना मंजूर नहीं। चाहे उम्र ही क्यों ना हो गयी हो।
संसार को मृत्युलोक कहा जाता है। यहां जो आता है, उसे मरना ही होता है। मृत्यु सबसे बड़ा यक्ष-प्रश्न है और शाश्वत सत्य। लेकिन उस मृत्यु पर विजय पाने की मानवीय आकांक्षा जब तब जोर मारती है। मनुष्य ऐसी तरकीब तैयार करना चाहता है कि जिंदगी में सिर्फ जन्म हो, मृत्यु नहीं। वह अमर होने की राम-वाण दवा चाहता है। तभी तो अमेरिका के एक वैज्ञानिक रे कुर्जवील ने एक ऐसा फार्मूला खोज निकालने का दावा किया है, जिसके जरिये इंसान अगले बीस साल में अमर हो जाएगा। कुर्जवील का कहना है कि बीस साल में शरीर की दोबारा प्रोग्रामिंग कर स्टोन-ऐज सॉफ्टवेयर तैयार किया जा सकता है, जो उम्र को एक ही बिंदू पर रोक लेगा। यानी मनुष्य उम्र की एक सीमा से आगे नहीं बढ़ेगा, वही पर स्थिर रहेगा। कुर्जवील और उनके साथी वैज्ञानिक अपनी इस थ्योरी पर जी-जान से लग गये हैं।

विचित्र मणि
((विचित्र मणि टेलीविजन में वरिष्ठ पत्रकार हैं))
सुधीर शर्मा
September 25, 2009 at 3:29 am
अरे भई विचित्र जी, कुर्जवील जैसे “कलाकार” हर दौर में आते हैं और चले जाते हैं। अब तक तो कोई मृत्यु को हरा नहीं सका है। देर-सबेर मौत तो आनी ही है।
यहां एक फ़ीसदी के लिए अगर यह मान लें कि कुर्जवील या फिर उनके जैसा कोई सनकी, उम्र को एक पड़ाव पर रोकने में कामयाब हो जाता है तो धरती की स्थिति भी जन्नत जैसी हो जाएगी। जहां लाखों बरस के लोग होंगे। ऐसे मौके के लिए तो दाग़ देहलवी के एक ग़ज़ल की आखिरी दो पंक्तियां ध्यान आती हैं -
जिस में लाखों बरस की हूरें हों,
ऐसी जन्नत का क्या करे कोई
वैसे बढ़िया लिखा है आपने। आप मजेदार विषय चुनते हैं।
Sanjay Grover
September 25, 2009 at 1:13 pm
इसमे सबसे ज़्यादा परेशानी उन लोगों के लिए होगी जो अपने धंधे की ख़ातिर ईश्वर का इस्तेमाल इस तर्क के साथ करते आए हैं कि अगर ‘ईश्वर नहीं है तो आदमी की मृत्यु क्यों हो जाती है’। ‘इंसान अपने विज्ञान के सहारे मृत्यु पर विजय क्यों नहीं पा सका’ आदि। कभी न कभी तो यह होगा और तब यह बौखलाहट भी स्वाभाविक और अनिवार्य ही समझिए।
Amitabh Tripathi
September 25, 2009 at 2:46 pm
अमरत्व के प्रति आग्रह ही मृत्यु के प्रति भय की भावना को व्यक्त करता है। किसी भी वैज्ञानिक जिज्ञासा या शोध का स्वागत होना चाहिये क्योंकि सभी वैज्ञानिक खोज एक ही सत्य को प्रमाणित करती है कि इस जगत में बहुत्व में एकत्व है और वह एकत्व ही ब्रह्म, ईश्वर, परम पुरुष, परमात्मा है। जगत में ईश्वर का अस्तित्व इसलिये ही नहीं है कि व्यक्ति मरता है वरन इस समस्त जगत का संचालन आखिर कैसे होता है और इतनी विविधता और विभिन्न्ता होते हुए भी जगत में सब कुछ एक नियम से कैसे चलता है। यदि भौतिक विज्ञान यह खोज कर ले कि वह कौन सा तत्व है जिससे अन्य सभी तत्व बने हैं तो उसके बाद उसे खोजने के लिये क्या रहेगा? इसी प्रकार रसायन शास्त्र, मनोविज्ञान सभी विज्ञान एक ही तत्व की खोज में तो लगे हैं जिसके बारे में उपनिषदों में हमारे ऋषिय़ॉं ने घोषणा कर दी कि अणोरणीयान महतोमहीयान, अर्थात अणु से भी छोटा और महान से भी महान। केवल यही आध्यात्मिक विज्ञान ही अन्य सभी विज्ञानों द्वारा धीरे धीरे पुष्ट होता जा रहा है कि इस जगत का संचालन एक शक्ति द्वारा ही हो रहा है और उसे ही अपने भीतर अनुभव करो और बहुत्व का सम्मान करते हुए सभी में एक ही चेतना अनुभव करो।
ईश्वर भी तो हमारे आदर्श का प्रकटीकरण है जिसकी जैसी प्रवृत्ति, भावना और चेतना का स्तर है उसका ईश्वर भी उसी परिमाण में है। हमने सहस्रों वर्षों की पराधीनता के बाद अपनी स्वाभाविक आध्यात्मिक परम्परा को भुला दिया है इसी कारण सामान्य आचार व्यवहार, रहन सहन, खान पान और एकरूपता को धर्म मान बैठे है इसी कारण किसी भी नये विकास या बदलाव को लेकर हम सशंकित हो जाते हैं। विकास, जिज्ञासा, वैज्ञानिक शोध मानव स्वभाव है क्योंकि वह निरंतर विकासमान और स्वतंत्र होने की चेष्टा में लगा है क्योंकि वह अपनी स्वतंत्र चेतना को प्राप्त करना चाहता है।
कार्ल मार्क्स ने भी यदि भारत में जन्म लिया होता और उपनिषदों का अध्ययन किया होता और धर्म की सेमेटिक व्याख्या के बजाय आध्यात्मिक विकल्प देखा होता तो वे ईश्वर के अस्तित्व को नहीं नकारते। लेकिन मार्क्स ने भारत का इतिहास राजनीतिक सन्दर्भ में पढा और उसकी मानवता को मूल देन आध्यात्मिकता को नहीं जान सके और मार्क्स ने धर्म के नाम पर पहले इस्लाम और फिर चर्च का जो स्वरूप देखा था उसके आधार पर कोई भी संवेदनशील व्यक्ति वही निष्कर्ष निकालता जो कार्ल मार्क्स ने निकाला था।
आज भारत में कम्युनिष्ट विचारधारा के लोगों को सोचना चाहिये कि वे कार्ल मार्क्स को पैगम्बर न बनायें और कार्ल मार्क्स के मूल तत्व अर्थात अभाव विभीन समाज की परिकल्पना को लेकर चलें न कि ईश्वर पर अविश्वास, क्रांति के आधार पर बदलाव। कार्ल मार्क्स ने जिस ईश्वर या ब्रह्म की चेतना के आधार पर युगानुकूल दर्शन दिया उन्होंने स्वयं अंतर्मुखी होकर यह जानने का प्रयास नहीं किया कि उनमें इस विचार का स्रोत क्या है?
आज समाज विचारधारागत पूर्वाग्रहों, राजनीतिक खेमेबन्दी में इस प्रकार उलझ गया है कि कोई भी अंतर्मुखी होकर अपनी आत्मा को शुद्ध अंतः करण से सुनना ही नहीं चाहता कि उसके लिये उचित क्या है और अनुचित क्या है?
Sanjay Grover
September 25, 2009 at 5:29 pm
अभी मेरे घर के बाहर कोई एक दस का नोट या एक पैन या कुछ भी फेंक जाए और मै यह पता लगाने में असमर्थ रहूं कि यह कौन फेंक गया है तो क्या मैं यह मानने लगूं कि यह परमात्मा फेंक गया है !? क्या कैनेडी की हत्या परमात्मा ने की थी (क्यों कि आज तक पता नहीं लग पाया कि किसने की थी)। दुनिया भर में जितने बम फट रहे हैं जिन्हें फेंकने वालों का पता नहीं लग पा रहा है, क्या परमात्मा फेंक रहा है!? जिस भी सवाल का हमें उत्तर नहीं मिल पा रहा उसका हम एक काल्पनिक उत्तरदाता क्यों खोज ले रहे हैं !? अगर सौ में से नब्बे सवालों के जवाब विज्ञान ने खोज लिए हैं तो बाकी दस के लिए हम थोड़ा इंतज़ार नहीं कर सकते !? 90 प्रतिशत पाने वाले बच्चे की 10 प्रतिशत और न ला पाने के लिए उपेक्षा, निंदा या उपहास या पिटाई किए जाएं, क्या यह अच्छी बात है !? क्या पृथ्वी पर इंसान न होता सिर्फ नदी, पर्वत नाले, रात-दिन, समय आदि-आदि होते, तब भी परमात्मा होता ?
Amitabh Tripathi
September 25, 2009 at 7:02 pm
मैं ईश्वर से प्रार्थना करूँगा कि आप अपने संकल्प पर जीवन भर टिके रहें और इस विश्वास को कभी न बदलें। नास्तिक होना भी एक साहस का काम है और वह भी अलग पहचान है जिसका निश्चित रूप से सम्मान होना चाहिये। मैं आपके साथ तर्क करूँ तो उसका कोई लाभ नहीं है क्योंकि मेरा उद्देश्य किसी के संकल्प को बदलना नहीं है। मैने तो अपना विचार व्यक्त किया और इतनी स्वतंत्रता तो आप मुझे देंगे ही इतना तो विश्वास है।
Sanjay Grover
September 26, 2009 at 11:32 am
मैं आपको स्वतंत्रता क्यों दूंगा, दोस्त ! मैं कौन हूं किसी को स्वतंत्रता देने और लेने वाला ? मैं इस तरह की तानाशाह सामाजिक व्यवस्था में विश्वास ही नहीं रखता। चीन या रुस का तो मुझे पता नहीं लेकिन यहां के बारे में ज़रुर इतना जानता हूं कि अब तक आस्तिक ही नास्तिकों को परेशान करते और उनकी स्वतंत्रता छीनते आए हैं। लगता है उन्हें खुद ही ईश्वर पर विश्वास नही है। नही ंतो वे नास्तिकों का फैसला भी ईश्वर के ऊपर छोड़ देते। फिलहाल इतना ही कहना मुझे काफी लगता हैं।
अरविंद शेष
September 26, 2009 at 2:47 pm
संजय ग्रोवर जी की बातों से सहमति है…