
हिंदुस्तान के पहले पन्ने पर छपी तस्वीर
इस देश में क्रिकेट जुनून है। यही वजह है कि हर अख़बार में खेल के दो-तीन पन्ने होते हैं और उनमें ज़्यादातर क्रिकेट से ही जुड़ी जानकारियां होती हैं। लेकिन कुछ अख़बारों का रवैया क्रिकेट को लेकर बहुत लापरवाह है। इनमें हिंदी में सबसे आगे है हिंदुस्तान। हमने जनतंत्र के पाठकों को बताया था कि कैसे 20-20 विश्व कप के दौरान जिस बेहद अहम मैच में हार से भारत टूर्नामेंट से बाहर हो गया था, उसमें भी अख़बार को पढ़ने से लगता था कि भारत मैच जीत गया है। ठीक उसी तरह आज भी यही लग रहा है कि भारत मैच जीत गया है। पहले पन्ने पर नेहरा और रैना की तस्वीर है और उसका हेडर है दिल्ली के छोरे ने रखी लाज। इस हेडर को देख कर पहली नज़र में यही लगता है कि भारत मैच जीत गया है और दिल्ली के नेहरा की वजह से मैच जीता है। लेकिन दैनिक जागरण पर नज़र डालते ही पता चलता है कि अरे लाज तो लुट गई है। फिर हिंदुस्तान कौन सी लाज को बचाने की बात कर रहा है।
अख़बार में टाइम का बहुत महत्व होता है। लेकिन दिल्ली के गोल मार्केट पहुंचने वाले अख़बार में, जो कि हिंदुस्तान टाइम्स के दफ़्तर से महज तीन किलोमीटर की दूरी पर है, अगर भारत–पाकिस्तान मुक़ाबले का नतीजा नहीं है, तो फिर अख़बार निकालने का क्या मतलब?
यही हाल दैनिक भास्कर का है। लेकिन उसके पहले पन्ने को देख कर लगता है कि कुछ मेहनत की गई है। उसमें भारत का स्कोर दिया हुआ है। बताया गया है कि अख़बार के छपने तक भारत ने चार विकेट खोकर 203 रन बना लिए हैं। खेल पन्ने पर भी बताया गया है कि गंभीर और द्रविड़ ने अर्धशतक जमा लिये हैं। लेकिन आधी-अधूरी जानकारी को पहले पन्ने पर देने का कोई मतलब नहीं। उस सूरत में तो कतई नहीं, जब मैच का नतीजा कुछ भी निकल सकता हो। इससे तो बेहतर वही होता, जो जनसत्ता ने किया है। चुपचाप खेल पन्ने पर पहली पारी का स्कोर दे दिया है। पहले पन्ने पर पाठकों को गुमराह करने की कोशिश नहीं की है।
इस मामले में टेलीविजन का रुख ठीक रहता है। आमतौर पर टेलीविजन में भी आखिरी बुलेटिन बारह बजे रोल होता है। लेकिन वहां इसकी तैयारी रहती है कि मैच का नतीजा जब भी आए दर्शकों को उसकी जानकारी दे दी जाए। प्रिंट में भी ऐसी ही कोशिश होनी चाहिए। मैच का नतीजा आने तक इंतज़ार करना चाहिए। दूरदराज के संस्करणों में कई बार यह मुमकिन नहीं होता। उन संस्करणों में पहले पेज पर मैच के बारे में शोर नहीं मचाना चाहिए। और उन संस्करणों में तो मैच का नतीजा बताने की पूरी कोशिश करनी चाहिए जो अख़बार के दफ़्तर के 30-40 किलोमीटर के दायरे में पड़ते हों।
brij khandelwal
September 27, 2009 at 4:05 pm
shashi shekhar ke aane ke baad bhi agar hindustan sust chaal se hi chal raha hai to chinta ka vishay hai
राजेश पांडे
September 27, 2009 at 4:39 pm
बात सही है। मैं गाज़ियाबाद में रहता हूं। मैं कल जल्दी हो गया था। हेडिंग देख कर मैं खुश हो गया। लेकिन थोड़ी देर बाद टीवी चालू किया तो दुखी हो गया। ऐसी हेडिंग लगाने का कोई मतलब नहीं। दिल्ली के छोरे ने रखी लाज से यही लगता है कि हम मैच जीत गए हैं। हिंदुस्तान वाले कभी नहीं सुधरेंगे।