गुजरात से सारे गांवों का नामोनिशान मिटा दिया गया है। अब वहां एक भी गांव नहीं है। ये हम नहीं कह रहे और न ही गुजरात की बीजेपी सरकार के किसी विरोधी ने ऐसा आरोप लगाया है। ये जानकारी तो खुद गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने दी है। वो भी देश के तमाम राज्यों के मुख्यमंत्रियों और उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों की साझा बैठक में। देश भर के गांवों में ग्रामीण न्यायालय बनाने के प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान मोदी ने दावा किया कि उनके गुजरात में तो एक भी गांव नहीं है, लिहाजा ग्रामीण न्यायालयों की कोई ज़रूरत ही नहीं है। अगर आपको यकीन नहीं आ रहा, तो आप सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर बैठक की कार्यवाही देखने के लिए यहां क्लिक कर सकते हैं।
हालांकि मोदी की गुजरात सरकार में कृषि, सिंचाई, ग्रामीण विकास, पंचायती राज और ग्रामीण आवास जैसे विभाग अब भी काम कर रहे हैं। जब गांव ही नहीं हैं, तो सवाल ये है कि गांवों से जुड़े ये तमाम विभाग क्या कर रहे हैं? क्या गांवों को ठिकाने लगाने का काम ही इनके जिम्मे रहा है, जो अब पूरा कर लिया गया है? अगर ऐसा है, तो अब काम पूरा हो गया, इन्हें बंद कर देना चाहिए। लेकिन सवाल और भी हैं।
गुजरात सरकार के ही कृषि मंत्रालय की वेबसाइट बताती है कि राज्य में 124 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि है, जिस पर गेहूं, बाजरा, चावल, मूंगफली, सरसों, तिल, चना, कपास और गन्ने जैसी फसलें पैदा होती हैं। इसी साइट पर बड़े फख्र से बताया गया है कि गुजरात कैस्टर (अरंडी), तंबाकू और इसबगोल का देश का सबसे बड़ा उत्पादक राज्य है, जबकि तिल, कपास और मूंगफली के उत्पादन में ये देश में दूसरे नंबर पर है। सरसों, अरंडी और कपास में गुजरात की प्रति हेक्टेयर उत्पादकता देश में सबसे ज्यादा है।
हैरानी की बात ये है कि जब गुजरात में गांव ही नहीं हैं, तो ये सारी फसलें आखिर कहां पैदा हो रही हैं? क्या सारी खेती शहरों में होने लगी है? या सारे खेत उद्योगपतियों के हवाले कर दिए गए हैं? या फिर नरेंद्र भाई मोदी ने मुहावरे को सच में बदलते हुए सचमुच हथेली पर सरसों उगानी शुरू कर दी है?
चण्डीदत्त शुक्ल
October 1, 2009 at 10:49 pm
ग़ज़ब हैं मोदी और उनके सलाहकार…कहो–चमत्कार को नमस्कार!