बोफोर्स घोटाले के बारे में इस देश का हर जागरुक शख़्स जानता है। वो यह भी जानता है कि उस घोटाले का आरोपी कौन है और कहां का रहने वाला है? ऐसे में यह ख़बर आए कि मनमोहन सरकार ने बोफोर्स घोटाले में इटली के ओट्टावियो क्वात्रोकी के ख़िलाफ़ मुक़दमे को बंद कराने का अंतिम फ़ैसला ले लिया है तो उस पर आपकी पहली प्रतिक्रिया क्या होगी? आप सोच में पड़ जाइएगा। यह जानते हुए भी कि क्वात्रोकी को सज़ा दिलाने की औकात भारतीय जांच एजेंसियों में नहीं है – केंद्र सरकार का यह फ़ैसला सोचने पर मजबूर करता है। ख़ासतौर पर… जब देश की कमान कांग्रेस के हाथ में है और कांग्रेस की कमान सोनिया गांधी के हाथों में।
बीस साल से मीडिया में बोफोर्स के बारे में जितना कुछ लिखा गया है उतना बहुत कम मुद्दों के बारे में छपा होगा। भारत में कोई ऐसा आम चुनाव नहीं गुजरा जिसमें बोफोर्स घोटाले की गूंज सुनाई नहीं दी हो। बीते आम चुनाव में भी यह मुद्दा उछला था। यही वजह है कि जब क्वात्रोकी के ख़िलाफ़ सभी मामलों को बंद कराने से जुड़ी ख़बर आई तो अगले दिन यानी बुधवार को सभी अख़बारों ने इसे पहले पन्ने पर जगह दी। इंडियन एक्सप्रेस की यह पहली स्टोरी है। टाइम्स ऑफ इंडिया की दूसरी स्टोरी। द हिंदू की तीसरी स्टोरी। दैनिक भास्कर की पहली स्टोरी। दैनिक जागरण की तीसरी ख़बर। नई दुनिया ने भी इस ख़बर को पहले पन्ने पर नीचे का एक कोना दे दिया। लेकिन हिंदी का एक बड़ा और राष्ट्रीय अख़बार है जिसने ये अहम ख़बर पहले पन्ने से गोल कर दी।
वो अख़बार है हिंदुस्तान। हिंदुस्तान में क्वात्रोकी से जुड़ी ख़बर पढ़ने के लिए आपको 11वें पेज पर जाना होगा। ऐसा अनजाने में हुआ या फिर सोच समझ कर किया गया – यह तो उसके संपादक ही बता सकते हैं। वैसे आपको यह भी बता दें कि इसी ग्रुप के अंग्रेजी अख़बार हिंदुस्तान टाइम्स में यह ख़बर पहले पन्ने पर है।
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