मीडिया सामाजिक बदलावों का नहीं बल्कि यथास्थिति बनाए रखने का हथियार है। ऐसा हथियार जिसके ज़रिए अगड़ी जातियों के लोग अवर्णों का हक़ मार रहे हैं। यह एक बहुत ही महीन खेल है। इसे समझना आसान नहीं। सवर्णों की इसी साज़िश पर से पर्दा उठा रहे हैं पत्रकार प्रमोद रंजन। जनतंत्र के पाठक प्रमोद रंजन से परिचित होंगे। उनके ही लेख पर वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जोशी बौखला उठे थे और होश खो बैठे थे। आज आप प्रमोद रंजन के इस शोधपत्र को पढ़िए और एक बार मीडिया पर काबिज सवर्णों की चालों को उनके नज़रिए से देखने की कोशिश कीजिए। यह शोधपत्र आपको थोड़ा लंबा लग सकता है। लेकिन अभिव्यक्ति की आज़ादी और स्वतंत्र प्रेस जैसे जुलमों की आड़ में चल रही घिनौनी साज़िश को समझने के लिए थोड़ा धैर्य तो दिखाना ही चाहिए। - मॉडरेटर
हमारे सामने सवाल है कि हिंदी पत्रकारिता अपने 150 साल के इतिहास में कितनी आधुनिक हुई है। मुझे यह आरंभ में ही स्पष्ट कर देना चाहिए कि मेरा आशय समाचार माध्यमों की तकनीक या इसके आर्थिक पक्ष से नही, समाजिक सरोकारों से है। इस एक सदी में में हम कहां पहुंचे हैं? आधुनिकता के नाम पर हमने सिर्फ लिबास तो नहीं बदल लिया? इन सवालों का उत्तर तलाशते हुए हम मीडिया की आधुनिकता को संकटग्रस्त पाते हैं और हिंदी मीडिया की आंतरित संरचना और उसके द्वारा संप्रेशित विचारों में हिंदी समाज के विभिन्न तबकों की हिस्सेदारी तलाशने के लिए मजबूर होते हैं।
1890 में प्रताप नारायण मिश्र कहते हैं कि सामाजिक `सुधारों को आगे बढ़ाने की पहली ‘शर्त समाज में ब्राह्मणों का नेतृत्व कायम करना है। यह देश जब सुधरेगा, तब इसी से सुधरेगा।´ (1) मिश्र `आधुनिक हिंदी´ के निर्माताओं में से एक थे। यह वह समय था जब आर्य समाज ने वेदों और शिक्षा पर ब्राह्मणों के एकाधिकार को खारिज कर उन्हें गंभीर सांस्कृतिक-राजनीतिक चुनौती दी थी। इस समय ऐसी ही चुनौती उन्हें रानाडे और उनके सहयोगियों के नेतृत्व वाले सोशल कांफ्रेस की ओर से भी मिल रही थी। (2) इसके 100 साल बाद 1990 के आसपास भी भारतीय प्रभुवर्ग को दलित-पिछड़ों की ओर से तीखी राजनीतिक चुनौती मिलती है। इस समय हिंदी पत्रकारिता पूरी चेतनता से कारसेवकों की प्रशंसा और आरक्षण विरोधियों के गुणगान में पट जाती है। हम इसे लगातार `एक राष्ट्र में एक संविधान, एक भाषा, एक राष्ट्रीय ध्वज तो `एक राष्ट्रधर्म´ क्यों नहीं´ (3) – की मांग को प्रमुखता देते देखते हैं।
इतना ही नहीं, इस चुनौती के लगातार बढ़ते जाने पर `आधुनिक हिंदी पत्रकारिता´ के नायकों में से एक उदघोष करते हैं कि ब्राह्मण जाति विभिन्न कौशलों में श्रेष्ठ है। (4) वह मीडिया संस्थानों में विभिन्न सामाजिक समूहों की हिस्सेदारी की जरूरत को सिरे से खारिज कर देते हैं। (5) जाहिर है, इस तरह की बातें अपवाद नहीं हैं, बल्कि 1890 से 2009 तक की हिंदी और उसकी पत्रकारिता की मूल प्रवृतियों का प्रतिनिधित्व करती हैं। तो इस पृष्ठभूमि में मैं सामाजिक रूप से वंचित तबकों की मीडिया में हिस्सेदारी की जरूरत पर बात करना चाहता हूं।
श्रमण चेतना केंद्र, पटना के साथियों के साथ मैंने बिहार के मीडिया संस्थानों में कार्यरत लोगों की सामाजिक पृष्ठभूमि का सर्वेक्षण किया है। सर्वेक्षण में हमने पाया कि बिहार के हिंदी अखबारों में प्रमुख पदों पर वंचित तबकों की उपस्थिति शून्य है। निचले पदों पर भी दलित और पिछड़ी जातियों की मौजूदगी महज 12 फीसदी है। (6) ऐसा ही एक सर्वे दिल्ली के मीडिया स्टडीज ग्रुप ने राष्ट्रीय मीडिया के संदर्भ में किया था। उसमें पाया गया था कि राष्ट्रीय हिंदी मीडिया में फैसला लेने वाले पदों पर दलितों और आदिवासियों की उपस्थित शून्य है लेकिन अन्य पिछड़ी जाति के लोग 8 फीसदी, मुसलमान 2 फीसदी और महिलाएं 14 फीसदी हैं। बिहार के मीडिया में `फैसला लेने वाले पदों´ पर इन सभी तबकों की मौजूदगी शून्य है। क्या यह संभव है कि मीडिया की ऐसी आंतरिक सामाजिक संरचना उसके विचारों, पक्षधरताओं को प्रभावित न करे? इसकी समाजिक संरचना में विविधता की जरूरत पर बल दिये बिना आधुनिकता की जो भी बात की जाएगी वह मेरे नजरिये से सिर्फ लिबास परिवर्तन तक सिमट कर रह जाएगी।
हिंदी पत्रकारिता के पिछले 150 सालों में क्या बदला है? वास्तव में यही वह सवाल है, जिसे हमें ऐसी किसी भी चर्चा के आरंभ में पूछना चाहिए। क्या पत्रकारिता आजादी के बाद पतित हुई है? क्या पत्रकारिता ज्ञान की सत्ता का ही एक हिस्सा नहीं, जिसके चारों ओर द्विजों ने चारदिवारियां खींच रखी थीं और जिसका दुरुपयोग वे 1947 के बहुत पहले से और उसके बाद भी अपनी सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक सत्ता को बचाए रखने, पुनर्स्थापित करने के लिए करते रहे हैं?
बदलाव भारतीय प्रेस की मानसिकता में नहीं, तकनीक में हुआ है। यह दुनिया के पहले अखबार के प्रकाशन का 400 वां साल है। जर्मनी में सामान्य अभिरुचि का पहला अखबार `अविका रिलेशंस ओडर जोइतुंग´ 1609 में शुरू हुआ था। इसके लगभग 200 साल बाद भारत में अखबारों का छपना शुरू हुआ। संचार व्यवस्था की अद्यतन प्रौद्योगिकी के लिए भारत हमेशा यूरोप का मुखाक्षेपी रहा है। जबकि वहां `दूसरे विश्वयुद्ध से लेकर आज तक प्रौद्योगिकी – खासकर संचार की प्रौद्योगिकी – की परिकल्पना और उसका विकास पूंजीवाद के हितों और उसकी विशेष जरूरतों से जुड़ा रहा है।´ (7) ब्रिटिश चिंतक रेमंड विलियम्स ने तर्कपूर्ण ढंग से प्रमाणित किया है कि `रेडियो और दूरदर्शन के प्रसारण का आरंभ और विकास बाजार द्वारा ‘शासित विकास का अनिवार्य परिणाम है।´ (8)
मीडिया के बाजारवाद के खतरे और दुष्परिणाम बहुआयामी हैं। नयी तकनीक ने कई मायनों में ब्राह्मणवाद के अस्त्र के प्रभाव को व्यापक बनाया है। लेकिन क्या कारण है कि इसके दुष्परिणामों में से सिर्फ एक – स्त्री शरीर के प्रदर्शन को ही चिन्हित किया जाता है? वस्तुत: यही वह दुष्परिणाम है, जिससे सबसे ज्यादा भारत का सामंती समाज प्रभावित हुआ है। अन्यथा इस बाजारवाद ने अनेक प्रकार की मनोरंजन-विधियों, जो सिर्फ़ धनिकों तक सीमित थीं, की पहुंच बहुसंख्यक लोगों तक संभव कर दी है। निश्चित तौर पर यह छलावा पिछड़ी और दलित जातियों का ध्यान मूल मुद्दों से भटकाता है, उन्हें यथास्थिति के लिए अनुकूलित करता है और उनकी संघर्ष चेतना को कुंद कर उन्हें अराजनैतिक बनाए रखने की साजिश में शामिल रहता है। वह इन तबकों में परिवर्तनकामी बौद्धिक विकास को बाधित करता है तथा इनके नायकों की पहचान को धुंधला कर डालता है। किंतु, ये बातें इस देश में बाजारवाद के ख़तरे और दुष्परिणामों पर विमर्श का हिस्सा क्यों नहीं बनतीं? असली सवाल यह है।
गत लोकसभा चुनाव में हमने देखा कि हिंदी के प्राय: सभी प्रमुख अखबारों ने बिकी हुई खबरें किस कदर छापीं। पत्रकारिता के मूल्यों में ऐसे भयावह क्षरण से नुकसान दलित, पिछड़ों की राजनैतिक ताकतों, वाम आंदोलनों तथा प्रतिरोध की उन शक्तियों को भी हुआ है, जो इसके प्रगतिशील तबके से नैतिक और वैचारिक समर्थन की उम्मीद करते हैं। मीडिया के ब्राह्मणवादी पूंजीवाद ने इन्हें उपेक्षित, अपमानित और बुरी तरह दिग्भ्रमित किया है। लेकिन इस दौरान मीडिया की गिरती विश्वसनीयता पर जाहिर की जा रही चिंता का कारण यह नहीं है। इसके खिलाफ बोलने, लिखने वालों को चिंता है कि -`यदि मीडिया की ताकत ही नहीं रहेगी तो कोई अखबार मालिक किसी सरकार को किसी तरह प्रभावित नहीं कर सकेगा। फिर उसे अखबार निकालने का क्या फायदा मिलेगा? यदि साख नष्ट हो गयी तो कौन सा सत्ताधारी नेता, अफसर या फिर व्यापारी मीडिया की परवाह करेगा? (9) यह तर्क पूंजीवाद से मनुहार करता है कि वह ब्राह्मणवाद से गठजोड़ बनाए रखे। सलाह स्पष्ट है अगर हम गलबहियां डाल चलते रहें तो ज्यादा फायदे में रहेंगे। मीडिया की `विश्वसनीयता´ बनाए रखना भी इनके लिए `समय का तकाजा´ है।
वास्तव में लोकतंत्र और पत्रकारिता अपने आप में ही एक आधुनिक अवधारणा है. स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के मूल्य इसमें समाहित हैं। भारत का सामाजिक प्रभुवर्ग इनकी आधुनिकता को जबरन दबाये रखने के लिए निरंतर सक्रिय रहा है। पत्रकारिता को लोकतंत्र में आजादी मिली है। हमें देखना चाहिए कि उसकी इस आजादी का उपयोग कौन अपने हित की सूचनाओं के प्रसारण के लिए कर रहा है? – अगर भारत के आर्थिक-सामाजिक प्रभुवर्ग के क्रूर लचीलेपन और संकट के समय आपसी गठजोड़ की आश्चर्यजनक क्षमता का इतिहास नहीं जानते तो – प्रसन्न हो सकते हैं कि अब अभिव्यक्ति की आजादी है।
इस तरह के निष्कर्ष पर पहुंचना अव्वल तो फ्री प्रेस, स्वतंत्र पत्रकारिता और अभिव्यक्ति की आजादी को पर्यायवाची समझने की भूल करना है। दूसरे, इस तथ्य को नजरअंदाज करना है कि `प्रेस´ पर उन्हीं प्रभुवर्गों का आर्थिक और बौद्धिक प्रभुत्व है, जिनके हितों को अभिव्यक्ति की आजादी से निर्णायक नुकसान पहुंचेगा। हमें यह सवाल खुद से और सार्वजनिक रूप से भी पूछना ही चाहिए कि प्रेस किससे, कैसे और किन शर्तों पर आज़ाद है? मेरी समझ में मौजूदा परिदृश्य में इस सवाल का एक ही उत्तर होगा कि पत्रकारिता की आजादी – फ्री प्रेस – का मतलब ऊंचे वर्ग और ऊंची जाति के हितों का पोषण करने वाली सूचनाएं, विचारों को प्रसारित करने की आजादी है।
क्या हमें इस पर विचार नहीं करना चाहिए कि कभी सूचनाओं के लिए जीभ काटी जाती थी। आज गोली मारी जाती है। कभी कानों में पिघला सीसा डाला जाता था। आज जेलों में ठूंसा जाता है। और मीडिया संस्थानों में कथित `खबर´ होती है -`मारे गये नक्सलियों से मिला नक्सली साहित्य का जखीरा।´ `माओवादी साहित्य समेत चार पुरुष और दो महिलाएं गिरतार।´
राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक – सभी किस्म की आजादियों की शुरुआत गुलामी की समझ और उसकी अभिव्यक्ति से ही संभव है। भारतीयों ने अंग्रेजों से राजनीतिक आजादी छीनी थी। अब स्थानीय प्रभुवर्गों से आर्थिक आजादी की लड़ाई चल रही है। सामाजिक व सांस्कृतिक आजादी के बारे में तो अभी हमने ढंग से सोचना भी शुरू नहीं किया है।
बहरहाल, `प्रेस की आजादी´ और `अभिव्यक्ति की आजादी´ अलग-अलग चीजें हैं। लगभग विरोधाभासी। प्रेस चाहे आर्थिक उदारवाद, गुड गवर्नेंस, विकास की वकालत कर रहा हो या राममंदिर की, या फिर देश में द्विदलीय लोकतंत्र की अनिवार्यता पर बहस करवा रहा हो, वह वास्तव में द्विज-हितों को संवारने की कोशिश में लगा होता है। वह प्रभुवर्ग की शत्रु शक्तियों – बहुसंख्यक पिछड़े, दलित हिंदुओं तथा मुसलमानों को बांटने, तोड़ने, भ्रमित करने, उनके विचारों को ऊंची जाति के हिंदुओं के हितों के अनुरूप अनुकूलित करने वाली सूचनाएं प्रसारित करने में रुचि रखता है। इस प्रकार प्रसारण के लिए चयनित `खबर´ उपभोक्ता वस्तु नहीं, बल्कि प्रभु वर्गों का एक अमूर्त अस्त्र होती है। इसके अलावा फ्री प्रेस उन्हें इन तबकों के आक्रोश से बचाने के लिए सेटी-वैल्व का काम भी लगातार करता रहता है। जब `पत्रकारिता की विश्वसनीयता´ में गिरावट की बात होती है तो वास्तव में उसका आशय इसी सेटी-वैल्व की कार्य दक्षता में कमी आने से होता है। ये सेटी-वैल्व ही मीडिया संस्थानों की शक्ति का स्रोत हैं।
भारतीय लोकतंत्र यदि कमजोर है तो हमें कारणों की तलाश करनी चाहिए। लोकतंत्र के चार खंभों में से विधायिका तो एक हद तक सामाजिक रूप से समावेशी बनती जा रही है। और आरक्षण के बूते कार्यपालिका भी अब नितांत एकपक्षीय नहीं है। लेकिन न्यायपालिका और मीडिया के बारे में क्या कहा जाएगा? और इसी प्रसंग में मेरा मानना है कि जब तक लोकतंत्र का चौथा खंभा सामाजिक रूप से सर्वसमावेशी नहीं होगा, तब तक विरोधी मत रखने वाले विचारों, समानता और बंधुत्व के लिए उसमें जगह नहीं होगी. और इसके बिना इसके आधुनिक हो चुकने की सभी बातें बेमानी बनी रहेंगी।
संदर्भ सूची
(1) प्रतापनारायण मिश्र ग्रंथावली, नागरी प्रचारिणी सभा, काशी. प्रताप नारायण मिश्र आधुनिक हिंदी के निर्माताओं की वृहत्त्रयी (भारतेंदु, बालकृष्ण भट्ट, प्रताप नारायण मिश्र) में से एक थे। उन्होंने ब्राह्मण पत्र का प्रकाशन 15 मार्च, 1883 ई. में प्रारंभ किया था। सन् 1894 ई. तक यह प्रकाशित हुआ। बीच में कुछ दिनों के लिए मिश्र कालाकांकर से प्रकाशित होनेवाले `हिंदुस्तान´ में संपादक होकर चले गये थे। ब्राह्मण और हिंदी प्रदीप (सं. बालकृश्ण भट्ट) उस युग की के प्रमुख पत्र थे जो उग्र राजनीतिक धारा के लिए जाने जाते थे, हिंदी साहित्य कोश, ज्ञानमंडल(2) धर्म और समाज सुधार शीर्षक लेख, वीर भारत तलवार, रस्साकशी, सारांश प्रकाशन
(3) दैनिक जागरण, पटना संस्करण में प्रकाशित समाचार `एक राष्ट्रधर्म घोषित करे सरकार´, 29 जुलाई, 2009.
(4) देखें, जनसत्ता के संस्थापक संपादक श्री प्रभाष जोशी का रविवार डॉट काम पर आलोकप्रकाश पुतुल द्वारा लिया गया साक्षात्कार
(5) देखें, जनसत्ता के 6 सितंबर, 2009 के अंक में श्री प्रभाष जोशी का लेख `काले धंधे के रक्षक´
(6) प्रमोद रंजन की पुस्तिका `मीडिया में हिस्सेदारी´ में बिहारी मीडिया का सामाजिक सर्वेक्षण, प्रज्ञा सामाजिक संस्थान, पटना
(7) हरबर्ट आई. शिलर, संचार माध्यम और सांस्कृतिक वर्चस्व, ग्रंथ शिल्पी, पृष्ठ 65
(8) वही, रेमंड विलियम्स का उद्धरण. ग्रंथ शिल्पी, पृष्ठ 61
(9) पत्रकार सुरेंद्र किशोर की टिप्पणी, प्रथम प्रवक्ता, (संपादक-रामबहादुर राय) का प्रभाष जोशी के निर्देशन में पैकेज पर केंद्रित अंक, 16 जुलाई, 2009.
संजय ग्रोवर
October 1, 2009 at 1:59 pm
प्रमोद रंजन के इस लेख में विचार भी हैं और तथ्य भी। आंखें खुली रखी जाएं तो कई बातें तो ऐसी हैं जिनमें बहुत ज़्यादा छान-बीन की भी ज़रुरत नहीं है। जैसे हिंदी या अंग्रेजी ब्लागिंग में कितने दलित व अन्य हैं ? फेसबुक या आरकुट पर कितने दलित व अन्य हैं ? जिस बैंक में आपका अकाउंट है वहां नज़र दौड़ा लीजिए। और किसी सरकारी या गैर-सरकारी दतर में जहां रोज़ाना आपका काम पड़ता हो, वहां देख लीजिए। यह मैं उन लोगों के लिए कह रहा हूं जो कहते फिर रहे हैं कि अब तो सब कुछ ठीक-ठाक हो चुका है और अब आपको फिर से हमारे बारे में सोचना चाहिए। साहित्य में आ जाईए। आप अगर अच्छे नहीं तो बुरे लेखक भी नहीं माने जाएंगे जब तक आप वर्णवाद के विरोध या आरक्षण के समर्थन में कुछ नहीं लिखते। जैसे ही आपने यह किया, पूरी संभावना है कि आपके व्यंग्य में से व्यंग्य उड़ जाए, आपकी कविता में कविता न रह,े, आपको देशी-विदेशी साहित्य का चोर ठहरा दिया जाए।
गांवों में दलित स्त्रियों के साथ सामूहिक बलात्कार होते रहें, हरियाणा में पंचायतें प्रेमी जोड़ों को फांसी पर लटकाती रहें, अडवाणीजी और मोदीजी के बनाए माहौल के चलते हिंदू-मुस्लिम आपस में दुआ-सलाम करते भी घबराने-शरमाने लगें, देश पर कोई संकट नहीं आएगा। मगर जैसे ही ब्राहमणवाद के विरोध में या वंचितों के समर्थन में एक छोटी-सी बहस भी शुरु हुई नहीं कि देश खतरे में पड़ जाएगा। हाय, समाज बंट जाएगा ! हाय, देश टूट जाएगा! हाय, गृहयुद्ध छिड़ जाएगा !
मुसीबत यह है कि धर्म के प्रचलित स्वरुप के चलते नारी-आंदोलनों पर भी पकड़ उन्हीं की मजबूत रहेगी जो नयी बोतल में पुरानी शराब के साथ कथित सवर्णता की अफीम परोसते रहेंगे। जब तक धर्म का प्रचलित स्वरुप मौजूद है, किसी आमूल-चूल बदलाव की आशा ही व्यर्थ है। क्यों कि हिंदू धर्म का तो सीधा-सीधा मतलब ही है वर्णवाद यानि कि ब्राहमणवाद। किसी स्त्री को अगर ‘‘चाहे पत्नी कितनी प्यारी हो, उसे भेद बताना ना चहीए’’ जैसे किसी भजन के रचयिता से इसलिए प्यार हो जाता है कि वह उसी के जाति-वर्ण का है और उसके पसंदीदा धर्मग्रंथ में निहित विचार को ही आसान शब्दों में व्यक्त कर रहा है तो आप कबाब में हड्डी कब तक, क्यों और किस तर्क से बनेंगे !? शरद यादव जैसे कुछ नेताओं की ‘आरक्षण में आरक्षण’ की बेचैनी और कवायद खामख्वाह नहीं लगती।
सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि एक आदमी जो किसी को पहले कमजोर बनाता है, फिर उससे बचा-खुचा भी छीन लेता है और गाली भी देता है फिर उसी पर गाली देने का आरोप लगाकर उसकी पिटाई भी कर देता है। अब अगर इस आदमी में संवेदना है और मानवता है तो संभावना है कि यह बाद में कभी या ज़िन्दगी भर अपने किए पर पछताएगा और तब यह भी संभावना है कि वह माफी मांगे और खुदको सुधार ले। मगर एक दूसरा आदमी जो अपने द्वारा किए गए षड्यंत्र और शोषण को या तो मानने को ही तैयार नहीं है या फिर इसपर गर्व करता है, उसका आप क्या कर लेंगे !?
चण्डीदत्त शुक्ल
October 1, 2009 at 10:56 pm
सिर्फ गरियाने की जगह अब समाधान पर भी बहस करनी होगी…एक बात और, ये मत समझिएगा कि मैं बह्मन होने की वज़ह से दुर्वचन बोल रहा हूं…लगातार चर्चाएं होती हैं…पंडितवादी दलितों को पिछाड़ने में हमेशा लगे रहते हैं पर दलित विमर्श के नाम पर भी क्या हो रहा है ब्राह्मणों-सवर्णों को गाली देने के सिवा…यार, घृणा के बीज पर मोहब्बत की फसल कैसे उगेगी? अब ज़रूरी है कि ब्राह्मणवाद से जो बुराइयां पनपी हैं, उन्हें ख़त्म करने के तरीक़े तलाशे जाएं। ये माना कि अफ़सोस, नाराज़गी और क्षोभ किसी आंदोलन की नींव रखने के लिए ज़रूरी हैं, लेकिन अब ज़रूरत है आंदोलन आगे बढ़ाने और नतीज़े तक पहुंचने की। नतीज़ा मतलब निष्कर्ष से नहीं, मंज़िल से है। वैसे, एक व्यक्तिगत बात बता दूं, मेरे अधिकांश मित्र ब्राह्मण नहीं हैं…क्योंकि उच्चता की ठेकेदारी जन्म से नहीं, कर्म से होती है और वो मैंने जब भी तलाशी, तो ब्राह्मणों के अलावा, बाकी सबमें भी दिखी है। ख़ैर…फ़िलहाल राम-राम।
कबीर
October 1, 2009 at 11:59 pm
चण्डीदत्त जी,
घृणा और हिंसा इसी समाज का हिस्सा है। हज़ारों साल से जिनके हिस्से घृणा और नफ़रत आई है आप उन्हें एक झटके में उदार बनने की सलाह कैसे और किस हक़ से दे सकते हैं? यह अक्सर देखा गया है कि ब्राह्मणवाद की चर्चा जैसे शुरू होती है व्यक्ति उदार बनने की सलाह देने लगते हैं। यह सही नहीं है। उदारता पहले उन्हें दिखाने चाहिए जिनके हाथ में सत्ता है।
वैसे यह मसला संकीर्णता और उदारता का नहीं है। यह मसला हक़ और हिस्सेदारी का है। यह बात आज भी हमारे समाज में लोग समझ नहीं सकें कि किसी को उसका हक़ स्वभाविक तौर पर मिलना चाहिए। इसमें दान का बोध नहीं आना चाहिए। लेकिन हमारे यहां सवर्ण दलितों, पिछड़ों, अल्पसंख्यकों और महिलाओं को उनका हक़ देना ही नहीं चाहते। जो देना चाहते हैं वो भी दान देने के अहसास के साथ देना चाहते हैं। यह ग़लत है। इसका विरोध होना चाहिए।
रही बात उपाय की। तो उपाय सीधा और सरल है। आपको टीम बनाते वक़्त हमेशा यह ध्यान रखना चाहिए कि आपने समाज के कितने तबकों को प्रतिनिधित्व दिया है। यहां तो जिसके हाथ सत्ता आती है.. वो अपनी जाति, धर्म और क्षेत्र के आधार पर लोगों को भरने लगता है। उसके बाद अगर सवाल उठाइये तो कहने लगता है कि टीम तैयार करना है सामाजिक सुधार नहीं। इस तरीके से व्यवस्था में बदलाव कैसे आएगा?
आप यह भी सोचिएगा कि व्यवस्था में बदलाव ताक़तवर तबके की सद्इच्छा से नहीं आते। इसके लिए व्यवस्था बनानी पड़ती है। आधिकारिक तौर पर तय करना पड़ता है कि आबादी और ज़रूरत के हिसाब से सीटों की कुल संख्या में से एक तय संख्या दलितों, पिछड़ों, अल्पसंख्यकों और महिलाओं के लिए आरक्षित की जाएगी। सरकार ने जिन क्षेत्रों में यह व्यवस्था की वहां पर बदलाव हुए भी हैं। लेकिन मीडिया समेत तमाम निजी क्षेत्र इससे दूर हैं। इसलिए यहां भेदभाव है और ब्राह्मणवादी विचारधारा का बोलबाला है। ब्राह्मणवादी विचारधारा को सिर्फ़ और सिर्फ़ ब्राह्मणों से जोड़ कर मत देखिएगा। बात व्यवस्था की है।
चण्डीदत्त शुक्ल
October 2, 2009 at 10:07 pm
कबीर भाई
मुझे नहीं पता कि मेरी प्रतिक्रिया आवेशपूर्ण है, आक्रोश से भरी है या सहज खिन्नता का बोध है पर ये ज़रूर महसूस कर रहा हूं कि झुंझलाया हूं बेतरह। देखिए, जन्म से ब्राह्मण होने का दोष या गुण चाहे जो मेरे व्यक्तित्व पर लदा-लगा हो, उसमें मैं कुछ कर नहीं सकता, लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं कि हमारे पुरखों के दोषों (वो नहीं मानेंगे कि उन्होंने दोष किए हैं, पर अब ये सिद्ध हो चुका है) की सज़ा हम भी झेलते रहें या फिर सच और ज़रूरी बात कहने का हक़ ही खो बैठें…कृपया सुधारें…सलाह कैसे और किस हक़ से दे सकते हैं जैसी पंक्ति। क्या हिरण्यकश्यप का पुत्र होने के कारण प्रह्लाद प्रभुभक्ति का अधिकार खो बैठे। जहां तक दलितों पर अत्याचार की बात है, तो पुरखों की वकालत किए बिना एक सामान्य सी बात कहूंगा…कब तक लकीर पीटते रहेंगे। उदारता की सलाह नहीं दे रहा हूं…ये वक्त की ज़रूरत है…आप कब तक घृणा की लकीर पीटते रहेंगे…आगे आने का सवाल ज़रूर है। हक और हिस्सेदारी चिल्लाने, चीखने या गरियाने से कहां मिलने वाली…और जो आपका हक़ है, कब तक कोई दबाएगा…कितना दबा पाएगा…। वैसे भी, सवर्णों की संख्या दलितों से कम है…जहां तक मेरा ज्ञान है उसके मुताबिक़। हां, षड्यंत्र के मामले में ज़रूर ताक़त थोड़ी ज्यादा हो सकती है। वैसे भी, मुझे कोई चुनाव नहीं लड़ना, जो अपने पुरखों को गलत साबित करने में जान लगा दूं, उन्होंने जो किया है, उसके पीछे उनके पास कुछ खोखले या मज़बूत तर्क रहे होंगे, लेकिन मैं भी जानता हूं कि तार्किकता से कहीं आगे दलितों का जिस कदर शोषण हुआ है, वह घृणित है…निस्संदेह।
मैं पहले ही निवेदित कर चुका था कि मेरे कथ्य को बम्हन का बेटा होने की नज़र से ना तौला जाए, पर क्या करूं…मेरी या हम जैसों की यही नियति है…कबीर बाबू।
दान का बोध, सहानुभूति की चिंता…क्या इतनी बुरी बातें हैं…। वैसे भी, एहसान करने वाले हम कौन हैं…। अपनी ही एक कविता उद्धृत कर रहा हूं, शायद आप मनोभाव समझ पाएं…
हृदय-तार झनझनाते हैं
वधिक के भी
जब छू लेता है वो
कोई मासूम आंसू.। और मैं कोई वधिक नहीं हूं कम से कम।
उपाय के संदर्भों में मैं इतना ज़रूर कहूंगा कि टीम बनाते समय काबिलियत का खयाल ही रखा जाना चाहिए। इस बात का कृपया इस तरह पोस्टमार्टम ना कीजिएगा कि दलितों के पास योग्यता नहीं होती क्या और क्या सारे ज्ञान का ठेका बह्मनों और बाकी सवर्णों ने ले रखा है? नहीं…यक़ीनन नहीं। जैसा कि आपने एकदम सच्ची बात कही है कि लोग अपनी सत्ता के मुताबिक़ ही फैसले करते हैं…तो उसकी निंदा हर हालत में होनी ही चाहिए। अब कम से कम आप ये बैरियर तो हटा ही लीजिए कि वो निंदा कोई ब्राह्मण / सवर्ण महज इसलिए नहीं कर सकता, क्योंकि उसके पुरखों ने निंदनीय कर्म किए हैं।
आरक्षण किस कदर ताकतवर हल है…ये आप भी जानते होंगे…। ख़ैर, मुकम्मल बहस का कोई मतलब निकले, तब तो बात आगे बढ़े। मैं बस इतना कहना चाहता हूं कि खुद को हर कोई अपडेट करता रहे, चाहे वो सवर्ण हो या हरिजन। घृणा में डूबे रहकर कुछ खाइयां बनाते रहने से क्या होगा…बताऊं…सिर्फ पॉलिटिकल पार्टियों का फायदा कराते रहेंगे हम…दलित भाई लोग तथाकथित शुभचिंतकों का और सवर्ण स्वनामधन्य लोग मोदियों का…बाकी राम-राम।
कबीर
October 3, 2009 at 4:58 am
सज़ा आप और हम नहीं झेलते हैं चण्डीदत्त जी। हमें तो सजा का अहसास तक नहीं है। हम तो एक नौकरी नहीं मिलती है तो बौखला जाते हैं। चंद दिन सड़क पर बिताने पड़ते हैं तो अपनी किस्मत और आरक्षण की व्यवस्था को कोसने लगते हैं। काबिलियत की दुहाई और सलाह देने लगते हैं। जैसे काबिलियत और सलाह देने का ठेका हम जैसे लोगों को ही मिला हो।
वैसे अपने दाएं-बाएं कभी गौर से देखिएगा ऊंची जातियों के कितने काबिल लोग मौजूद हैं? ये वही काबिल लोग हैं जिन्होंने व्यवस्था के सभी अंगों को दीमक की तरह चाट लिया है। आप मीडिया में काम करते हैं। आपको आज मीडिया की हालत का अंदाजा होगा। लोग पत्रकारों और पुलिलिया गुंडों को एक तराजू में रखने लगे हैं। पत्रकारों से डरने लगे हैं। अख़बारों और चैनलों की हालत देखिए – किस तरह का कंटेंट जा रहा है। फिर किस बात की काबिलियत और किस बात का पाखंड। इसलिए आपसे गुजारिश है कि काबिलियत की दुहाई मत दीजिए।
अब देखिए न। एक पंक्ति कही गई कि “हज़ारों साल से जिनके हिस्से घृणा और नफ़रत आई है आप उन्हें एक झटके में उदार बनने की सलाह कैसे और किस हक़ से दे सकते हैं?” और आप तिलमिला उठे। यही सामंतवाद है। एक सीधी और सरल पंक्ति से आपके अहम को ठेस पहुंच गई। और आप दलितों को “तथाकथित शुभचिंतकों” से सावधान रहने की सलाह दे बैठे। ये तो सब जानते हैं कि दलितों के “तथाकथित शुभचिंतक” कौन हैं? या फिर वो भी बताने की जरूरत है।
रही बात हक़ की तो आपको बता दें कि आपने दलितों और पिछड़ों को उनका हक़ दिया नहीं है उन्होंने छीना है। अभी कई क्षेत्र ऐसे हैं जहां उन्हें हक़ नहीं मिला है और वो छीनने की तैयारी में हैं। और सच में उनके विरुद्ध जो भी खड़ा होगा उसे झुकना पड़ेगा। और जो नहीं झुकेगा वो टूट जाएगा।
संजय ग्रोवर
October 3, 2009 at 12:12 pm
वैसे तो कबीर भाई ने काफी कुछ साफ कर दिया है। पर कुछ बातें और साफ कर देना ज़रुरी हैं। अगर ‘‘ गावस्कर और तेंदुलकर इसलिए अच्छा खेलते हैं कि वे सारस्वत ब्राहमण हैं ’’ जैसी बातें किसी अन्य जाति-वर्ण के विद्वान (?) ने किसी अन्य जाति-वर्ण के खिलाड़ियों के बारे में कही होतीं तो आप जानते नहीं हैं कि क्या होता !? यही तर्क दिए जाते कि:-
“”घृणा के बीज पर मोहब्बत की फसल कैसे उगेगी?””
“”घृणा में डूबे रहकर कुछ खाइयां बनाते रहने से क्या होगा…बताऊं…सिर्फ पॉलिटिकल पार्टियों का फायदा कराते रहेंगे हम…दलित भाई लोग तथाकथित शुभचिंतकों का और सवर्ण स्वनामधन्य लोग मोदियों का…””
इससे आगे बढ़कर यह भी कहा जा सकता था कि ‘‘क्यों घृणा फैला रहे हो यार, दंगा करवाने का इरादा है क्या ?’’
दरअसल यह रणनीतियां हैं।
एक आदमी किसी की छाती पर चढ़ा बैठा है, उसका गला दबाए है, उसके नाक, कान, दबाए है, उसे नीच कह रहा है, पीट रहा है, उस तक जूठन तक नहीं पहुंचने दे रहा है। मगर कोई बात नहीं ! यह शांति है, अमन है, हारमनी, है, सद्भावना है, विभिन्नता में एकता है, सहिष्णुता है। मगर जैसे ही नीचे दबा आदमी कराहता है या उसके पक्ष में कोई बोलता है तो कहा जाता है कि यह घृणा है, समाज को बांटा जा रहा है…..
और जो रणनीतियां साहित्य से इतर समाज में खेली जाती हैं !? कैसे पक्ष में बोलने वालों को धमकाया जाता है, उनके रोज़मर्रा के काम बिगाड़े जाते हैं, उनकी रोज़ी-रोटी के स्रोत बंद किए जाते हैं, कभी तो यह भी सामने आएगा ही।
और योग्यता !? अहा, ‘ग्राम्य जीवन भी क्या है’ की तर्ज़ पर योग्यता के गुणगान। ओय-होय। आरक्षण से पहले की सरकारी दतरों की योग्यता किसने नहीं देखी ! कैसा राम-राज्य था ! इस दरवाज़े से घुसिए और उस दरवाज़े से काम करवा कर बाहर निकल जाईए। ऐसा ही होता था न ! असलियत सबको पता है। अपना लिखा भी ठीक से न समझ सकने वाले कर्मचारी भी किस तरह महीनों चक्कर लगवाया करते थे।
जन्म पर किसी का वश नहीं हो सकता पर किसी बहस में आप किस वक्त दाखिल होते हैं और किसके पक्ष में कब कैसे तर्क देते हैं, उस पर तो वश हो सकता है। समझने वाले इसी से समझ जाते हैं कि असल मंशा क्या है ?
चण्डीदत्त शुक्ल
October 3, 2009 at 4:27 pm
कबीर और संजय भाई—बहस खासी गर्मागर्म हो चुकी है. काबिलियत की बात करते वक्त मेरे कहने का मतलब कहां था कि सवर्णों ने ही काबिलियत का ठेका ले रखा है. शायद आप गुस्से में इतने ज्यादा हैं कि ब्योरों के बीच में जाकर उन अर्थों को तलाशने की कोशिश कर रहे हैं, जो दरअसल हैं ही नहीं…जहां तक मेरी मंशा का सवाल है, तो अब क्या कहूं। अगर कोई निष्कर्ष निकाल ही लिया है, तो धुनते रहिए! अहम को धक्का लगने, तिलमिलाने और कचोट में फ़र्क है…शायद आप भी समझते हों। हां, ये एकदम सही बात है कि सदियों से जो आतंक फैला है, चोट लगी है, उसकी प्रतिक्रिया ऐसी ही होगी, लेकिन आप किसी और की सज़ा किसी और को और साथ ही खुद को कैसे दे सकते हैं. हक़ वैसे भी छीने ही जाते हैं…मांगने से कहां मिलते हैं…क्या सवर्णों को और क्या दलितों को! मुझे ब्राह्मण होने के एवज में कितनी तरक्की मिली है…मैं नहीं जानता, हां–अप्रत्यक्ष लाभ मिला हो, तो उससे इनकार भी नहीं कर सकता…और एक बात और, इस बात की शर्मिंदगी किसी को भी नहीं होगी कि वो ब्राह्मण है या दलित है…। मुझे भी नहीं है, लेकिन केवल जन्म से ब्राह्मण होने के नाते इस बात का कोई गर्व भी मुझे नहीं है।
मैं कहना कुछ और चाहता था पर उसका राजनीतिकरण करके देखेंगे…तो मंशा ब्राह्मणवादी ही लगेगी…। मेरी शुभकामनाएं आपके साथ हैं…और कृपया इसे किसी ब्राह्मण की शुभकामनाएं समझकर घृणा से नाक-भौं सिकोड़ने की जगह और ये कहने की–अपनी दुआ अपने पास रखो…जगह दोस्ती की गर्माहट के साथ मुस्कराइएगा…बहस में शामिल होते समय भी मेरी मंशा एक दोस्त से बात करने की थी…पर अफ़सोस…आप इतने नाराज़ हैं कि मुस्कराने की जगह झगड़ने लगे!
संजय ग्रोवर
October 3, 2009 at 7:24 pm
आदरणीय चण्डीदत्त जी,
यह सही है कि आप दूसरों के मुकाबले उदारता दिखा रहे हैं और आगे बढ़कर पूर्वजों के अत्याचारों को स्वीकार भी रहे हैं। मगर आपको यह भी पता होगा कि दूध का जला छाछ भी फूक-फूंक कर पीता है। ख़ासकर जब आप दूसरे के तर्कों और उदाहरणों को खामख्वाह घृणा इत्यादि घोषित किए जा रहे हों। अपन तो ऊंच-नीच या छोटे-बड़े जैसी बातों में यकीन ही नहीं रखते तो काहे घृणा करेंगे !? हां, सावधानी सबको रखनी चाहिए। अब आप ही बताईए बहस क्या कोई पकौड़ा है जो गरमागरम होगा और हम अपनी सुविधानुसार इसे खा जाएंगे। (अच्छा मज़ाक है, तनिक मुस्करा दीजिए न !) अब इसे भी घृणा मत समझ लीजिएगा। इस घृणा रुपी धारा का गोमुख न तो हमसे शुरु हुआ है न हमसे खत्म होगा। और विश्वास कीजिए हम जब भी बनेंगे आपके दोस्त ही बनेंगे, ‘तथाकथित दोस्त’ नहीं बनेंगे। इसी तथाकथित में तो सारा लफड़ा घुसा हुआ है, नही ंतो अपने देश में समस्या ही क्या होनी थी।
चण्डीदत्त शुक्ल
October 3, 2009 at 7:50 pm
उनका जो फर्ज है अहल-ए-सियासत वो जानें…मेरा पैगाम है मोहब्बत, जहां तक पहुंचे। आप तक पहुंचा, दोस्ती बनाए रखें।
Pingback: “अभय कुमार दुबे “सुलझे हुए” नहीं “उलझे हुए” विच
amit tyagi
October 4, 2009 at 9:43 pm
koi sawarn aur koi awarn nahin yah media sabki hai, jo jaisi kabiliyat dikhata hai, use waisi jagah milti hai. faltu mein aap log bahas ko naya mod de rahe hain. kisi ek aadmi ke kahne se saare bramhan hoshiyar nahin ho jate.
neeche likhi panktiyon par gaur karein aur aage badhne ka hausla nikalein.
कल की तरह बुलंद हैं सब हौसले मेरे, कश्ती भंवर में है किरदार तो नहीं
कुमार राजेश
October 4, 2009 at 11:52 pm
भई अमित त्यागी मैदान में उतर गए हैं और अब सब लोग चुप हो जाओ. फालतू की बहस बंद करो और काबिलियत को सलाम करो. और कुछ नहीं तो हौसला मिल ही गया होगा. उसी हौसले को ओढ़ना, बिछाना, खाना और सो जाना.
ऐसे लोग या तो मूर्ख होते हैं या फिर बहुत ख़तरनाक. या तो ये भारतीय व्यवस्था के बारे में जरा भी नहीं जानते या फिर सबकुछ जानते-बूझते एक खास मकसद से अनजान बने रहते हैं. ये एक अच्छी और सकारात्मक बहस को ख़त्म करना चाहते हैं. इनसे सावधान रहने की जरूरत है. इनसे पूछना चाहिए कि ये फालतू की सलाह इनसे किसने मांगी है? इस सलाह के पीछे इनकी क्या मंशा है?
अरविंद शेष
October 5, 2009 at 9:06 pm
इस लेख के साथ संजय ग्रोवर और कबीर की टिप्पणी भी काफी कुछ कह जाती है…।
amit tyagi
October 6, 2009 at 7:33 pm
ऐसे लोग या तो मूर्ख होते हैं या फिर बहुत ख़तरनाक.
rajeshjee, main wakai murkh hun, warna patrakarita ke “dhandhe” mein nahin aata. waise apne bahut kam samay ke patrakariya anubhaw se hamne yahi dekha hai ki talent ho to na cast kam aata hai, naa hee jati. main delhi, noida, panipat aur sriganganagar mein aapko saikdon eise patrakar bata sakta hun jo jati ya pahunch ke bina achhe padon par pahunche.
iska matlab yah katai nahin ki media mein jatiwad nahin hota. lekin hamein bahas mein maryadon ka dhyan rakhna chahiye. main murkh hun yah main janta hun, lekin aapse sunkar bura laga. mera matlab yah kahana nahin ki aap jatiwad ka samarthan kariye, lekin is kshetra mein talent ki bhee kadra hai, isliye hausla banaye rakhiye.
kuchh galat kaha ho to dobara mafi mangta hun.
waise mujhe lagta hai ki is site par kuchh behad budhiman log tippani karne lage hain, jo samrendra ke liye bahut utsahjanak baaat hai.
hauslon ko bichhaya to nahin ja sakta rajesh bhai, lekin uske sahare zindgi mein bahut kuchh hasil kiya jaa sakta hai. yakin ho to apne aas paas ke logon se poochh lijiyega.