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आखिर कहां है दलितों, पिछड़ों और मुसलमानों का प्रभुवर्ग?

एडवांस स्टडी, शिमला में हिंदी की आधुनिकता के मुद्दे पर 23 से 29 सितंबर तक एक कार्यक्रम चला। उसमें मीडिया में दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों की हिस्सेदारी पर भी बहस हुई। उसी बहस में प्रमोद रंजन ने अपना शोधपत्र पढ़ा। एक दिन पहले हमने जनतंत्र के पाठकों से वो शोधपत्र साझा किया। उस कार्यक्रम में प्रमोद रंजन के उठाए सवालों को अभय कुमार दुबे ने आगे बढ़ाया। अभय जी मौजूदा दौर के चंद सुलझे हुए और वैचारिक धरातल पर मजबूत लोगों में शामिल हैं। उन्होंने पूछा कि आखिर दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों का अभिजात्य वर्ग क्या कर रहा है? मीडिया की मुख्यधारा पर दबाव बढ़ाने के लिए अपने मीडिया का सृजन क्यों नहीं कर रहा? उनके उठाए सवाल पर उस कार्यक्रम में अच्छी बहस चली। खुले दिमाग और साफ़ मन से की चर्चा हुई। हम चाहते हैं कि कुछ वैसी ही चर्चा जनतंत्र पर भी हो, इसलिए अभय कुमार दुबे के उठाए सवालों को यहां छाप रहे हैं। आप पढ़िए और खुल कर अपनी प्रतिक्रिया दीजिए।

मैं अपनी बात एक सवाल से शुरू करुंगा। दलित, पिछड़ी और दूसरी पूंजी इस वक़्त कहां है? इस वक़्त पूंजी पर ऊंची जातियों का, ऊंचे तबके का, हिंदुस्तान के अभिजात्य वर्ग का कब्जा है। लेकिन ऐसी बात नहीं है कि पिछड़ों के पास पूंजी न हो। भारत में पिछड़े तबके का एक बहुत बड़ा प्रभुवर्ग उभर चुका है। भारत में धीरे-धीरे दलितों का भी एक प्रभुवर्ग उभर रहा है जिसके पास बहुत बड़े पैमाने पर पूंजी है। मुसलमानों के पास भी अपना एक प्रभुवर्ग है। इन सभी लोगों को यह समझ में आ गया है या धीरे-धीरे आ रहा है कि मीडिया हमारी बातें नहीं आ रही हैं। वो खुद को हाशियाग्रस्त श्रेणी में रखते हैं और हिस्सेदारी का प्रश्न बड़े रेडिकल अंदाज में उठाते हैं – तो यह एक पेंचीदा सवाल है कि आखिर उनकी प्राथमिकताओं में अपना मीडिया चालू करने का प्रश्न कहां पर मौजूद है? 

जब तक हिंदुस्तान का दलित और पिछड़ा वर्ग और मुसलमान अपने प्रभाव का मीडिया किसी तरह से नहीं बनाएगा, तब तक जिस तरह का यह देश है, जिस तरह का समाज है जिस तरह की यहां पर राजनीति होती है उसमें यह बिल्कुल असंभव है कि उनकी बात सामने आ सके।

मैं आपको अपना एक व्यक्तिगत उदाहरण बताता हूं। 1994 में जब मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने, पिछड़ों और दलितों के गठजोड़ से, तो जागरण अख़बार से उनका बहुत बड़ा टकराव हुआ। जागरण अख़बार का संघ परिवार से रिश्ता रहा है और हिंदुत्व के नाम पर ही वो राज्यसभा भेजे जाते रहे हैं। जागरण ने समाजवादी पार्टी की सरकार के ख़िलाफ़ जोरदार तरीके से लिखना शुरू किया। उसके बाद मुलायम सिंह ने जागरण पर हल्ला बोल का नारा दिया। समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने जागरण के दफ़्तर पर हमला बोल दिया और लगभग जागरण का प्रकाशन नामुमकिन सा हो गया। नरेंद्र मोहन जो जागरण के मालिक संपादक थे रातों रात मुलायम सिंह के पास गए और उनसे बात की। टकराव समाप्त हो गया। हल्ला बोल आंदोलन वापस ले लिया गया और जागरण ने विचारधारा को स्थगित करते हुए व्यवहारिकता और मुनाफे को ध्यान में रखते हुए सपा सरकार के ख़िलाफ़ की मुहिम बंद कर दी।

उसके बाद मुलायम सिंह के दिमाग में ये बात आई कि हमें अपना अख़बार निकालना चाहिए। उनके पास संसाधनों की कमी नहीं थी। उन्होंने अपने जान-पहचान के पत्रकारों से विचार-विमर्श करना शुरू किया कि अख़बार कैसे निकाला जाए। ऐसा अख़बार निकाला जाए जो 16 पेज का हो उसमें 8 पेज रंगीन हों। जान पहचान के पत्रकारों ने बताया कि दैनिक अख़बार निकालना चुनाव लड़ने और पार्टी चलाने से बिल्कुल अलग तरह की चीज है। इसमें आपको क्या-क्या दिक्कतें आएंगी और ये आपको तुरंत फायदा नहीं पहुंचा सकता। अगर दैनिक पत्र ने आपका और आपकी पार्टी का समर्थन करना शुरू कर दिया तो अख़बार बेचना मुश्किल होगा। इसके लिए आपको लॉन्ग जेस्टेशन पीरिएड को ध्यान में रखना होगा। इसमें मुनाफा मिलना 20-25 साल बाद शुरू होता है। और बहुत ही बारीक प्रक्रियाओं के जरिए आप एक खास तरह की राजनीति का दूरगामी नजरिए से समर्थन करते हैं। तब धीरे धीरे वह ऐसा माहौल बनता है जिसमें मीडिया हाउस खास तरह के राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक निहित स्वार्थ को मजबूत कर सके। अगर मीडिया का कोई हिस्सा तुरंत किसी को समर्थन करना शुरू करता है तो पाठक वर्ग उसे नहीं मिलता। वो परास्त हो जाता है। तब मुलायम सिंह को लगा कि इससे तो कोई फायदा नहीं होगा। इससे तो हमारे करोड़ों अरबो रुपये खर्च हो जाएंगे अख़बार निकलता रहेगा और तुरंत वोट बढ़ेंगे नहीं। तो उन्होंने उसका विचार त्याग दिया। वही पुराना हथकंडा अपनाया कि पांच पत्रकारों को अपना लेंगे। वो पत्रकार हमारी ख़बरें छाप देंगे उसमें बहुत कम खर्चा है। वही पुरानी पद्धति जो राजनेता अपनाते हैं।

जब आप मीडिया में हस्तक्षेप करेंगे तो आपको एक दूरगामी नजरिया अपनाना पड़ेगा। मेरा मानना ये है कि दलित में उभर रहे अभिजात्य वर्ग… पिछड़ों में लगभग उभर चुके अभिजात्य वर्ग और मुसलमानों में पहले से मौजूद अभिजात्य वर्ग में दूरदृष्टि का अभाव है। ये जब तक अपने फौरी फायदों को थोड़ा सा स्थगित करके मीडिया में हस्तक्षेप नहीं करेंगे तब तक यह समस्या ऐसी की ऐसी बनी रहेगी।

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6 Responses to आखिर कहां है दलितों, पिछड़ों और मुसलमानों का प्रभुवर्ग?

  1. दिलीप मंडल Reply

    October 2, 2009 at 5:47 pm

    प्रमोद रंजन ने न्यूजरूम में डायवर्सिटी का जो सवाल उठाया है, उसके प्रत्युत्तर में अभय कुमार दुबे जो समाधान सुझा रहे हैं, वो महत्वपूर्ण है। दरअसल मझौली जातियों के प्रभावशाली लोगों ने खासकर दक्षिण भारत में अपना मीडिया बना भी लिया है। मीडिया में दलित एंटरप्रिन्योरशिप की कमी जरूर है, लेकिन उम्मीद की जा सकती है कि ये भी कुछ ही समय की बात है। उत्तर भारत में ये प्रक्रिया सुस्त है और इसके कारण भी हैं। दक्षिण भारतीय मीडिया को देखें तो:

    - तमिलनाडु में ओबीसी मारन परिवार का सन नेटवर्क इस समय दक्षिण भारत ही नहीं, बल्कि पूरे देश के सबसे बड़े मीडिया हाउस में से एक है।
    - इनाडु/ईटीवी ग्रुप के मालिक रामोजी राव मझौली जाति कम्मा के हैं।
    - कर्नाटक के अखबार समूह डेक्कन हेराल्ड-प्रजावाणी के मालिक पिछड़ी इडिगा (ताड़ी निकालने वाली जाति) के हैं।
    –क्रिश्चियन स्वामित्व वाला मलयालम मनोरमा हो या मुसलमान स्वामित्व वाला माध्यमम, इनकी हैसियत अच्छीखासी है। मलयालम मनोरमा केरल का सबसे बड़ा मीडिया समूह है।
    (यानी दक्षिण भारत के चार सबसे बड़े मीडिया ग्रुप गैर द्विज जातियों के स्वामित्व वाले हैं।
    -आंध्र प्रदेश में वाइएसआर परिवार का भी मीडिया में खासा अच्छा हस्तक्षेप है। कई और दक्षिण भारतीय मीडिया समूह भी पिछड़ी जातियों के कारोबारी चलाते हैं।

    पूरे दक्षिण भारत में मीडिया ओनरशिप के मामले में सवर्ण वर्चस्व खत्म हो चुका है। इस मायने में ये उत्तर भारतीय समस्या है। उत्तर भारत में भी लगभग सभी बड़े मीडिया हाउस गैर द्विज(वैश्य) स्वामित्व वाले हैं। लेकिन न्यूजरूम में सवर्ण वर्चस्व इसके बावजूद है।

    इसलिए अभय जी के सुझाव से गुत्थी सुलझती कम और उलझती ज्यादा है। ऐसा लगता है कि मीडिया ओनरशिप और न्यूजरूम के स्ट्रक्चर में वैसा सरल संबंध है नहीं, जैसा कि अभय कुमार दुबे बता रहे हैं। इसकी जड़े उत्तर भारतीय समाज में ही होंगी। इस बारे में रॉबिन जैफ्री एक और शोध कर सकते हैं। कोई भारतीय शोधकर्ता तो इस विषय को हाथ लगा नहीं सकता!

  2. Saroj Sagar Reply

    October 2, 2009 at 9:49 pm

    आपने अभय कुमार दुबे का परिचय देते हुए कहा है कि -अभय जी मौजूदा दौर के चंद सुलझे हुए और वैचारिक धरातल पर मजबूत लोगों में शामिल हैं’। मैंने भी उनके द्वारा संपादित कुछ किताबें पढी हैं। इसलिए यह कह सकता हूं कि उनके द्वारा किया गया काम महत्‍वपूर्ण है। इस तरह वह हिंदी की दुनिया के कथित ‘मजबूत लोगों’ में से एक भी साबित होते हैं। लेकिन भाई उनके द्वारा प्रमोद रंजन जी के शोध आलेख पर कही गयी बातों से उनका एक दूसरा पहलु भी उजागर होता है। इसे पढने के बाद भी आप कह रहे हैं कि ‘मौजूदा दौर के चंद सुलझे हुए’ और ‘मजबूत वैचारिक धरातल’ वाले व्‍यक्ति हैं !

    भाई मेरे, अभय की बातों को जरा ध्‍यान से पढिए और लोगों को भी जरा से ध्‍यान से पढने से पढने के लिए कहिए। अभय कुमार दुबे ‘ ‘सुलझे हुए’ नहीं बेहद ‘उलझे हुए’ आदमी के रूप में यहां हैं। और जितना वह खुद उलझे हुए हैं, उससे कहीं अधिक दलित-पिछडों को भयानक रूप से उलझा देने के फेर में हैं।

    आपने और दिलीप मंडल जी ने जरा सोचा है कि वास्‍तव में क्‍या कह रहे हैं अभय कुमार दुबे ? वह कह रहे हैं कि दलितों को अल्‍पसंख्‍यकों को अपना मीडिया बना लेना चाहिए। अगर उनके तर्कों को मानें तो हमें में हमें राजपूत मीडिया, ब्राहमण मीडिया, यादव मीडिया, जाट मीडिया, चमार मीडिया और भंगी मीडिया भी बनाना होगा। उसके बाद महिलाओं के लिए एक अलग मीडिया की जरूरत होगी। सब रहेंगे अपने-अपने खेमे में।
    वास्‍तव में अभय कुमार यह सब कहते हुए यह बताना चाहते हैं कि दलितों और पिछडों के पास काफी पैसा आ गया है। जो कि वास्‍तविकता नहीं है। उत्‍तर भारत में इन तबकों शायद एक भी ऐसा आदमी नहीं मिलेगा, जिसके पास इतना पैसा हो कि वह एक बडा मीडिया संस्‍थान खोल सके। मुलायम सिंह के पास भी अगर इतना सरप्‍लस पैसा होता तो वे जरूर अखबार निकाल लेते। आखिर इतना पैसा नहीं था कि वह लंबे समय तक रिटर्न का इंतजार कर सकें तभी न उनको अपने हाथ वापस खींच लेने पडे।

    और, आज जब समाज में, राजनीति में सब जगह निजी क्षेत्र, विशेषकर मीडिया में आरक्षण की जरूरत पर बात हो रही है तो अभय दुबे का ध्‍यान इस ओर क्‍यो नहीं जाता। यह संयोग नहीं वल्कि ध्‍यान भटकाने, उलझाने षडयंत्र है। दुबे जी आरक्षण पर बात नहीं कर यह कहना चाह रहे हैं कि सवर्णों के पास पैसा है, उन्‍होंने पूंजी लगायी, लगवाई है तो वे दलितों- पिछडो को क्‍यों रखेंगे। दलित- पिछडे अपनी ढपली और अपना राग अलग जाकर बजाएं। ‘

  3. अभय जी ने चर्चा भटकाने के लिए कोई नया शगूफा छोड़ा है…मैं नहीं मानता। हां, हो सकता है कि सरोज जी की चिंता जायज हो कि ऐसे तो खेमेबंदी बनी रहेगी। वैसे, मीडिया संस्थानों की स्थापना ना सही पर समानांतर चिंतन की ज़रूरत से तो सरोज भी संभवतः इनकार नहीं करेंगे। वैसे, यहां एक बात बोलूं…तमाम लोग अपने गांव-गिंवार से बाहर आते हैं, तो प्रदेश की राजधानियों का नाम लेकर बताते हैं कि मैं तो वहां का हूं जी…। कहीं ऐसा ही तो नहीं कि दलितों, पिछड़ों और मुसलमानों का प्रभुवर्ग ऊंचाई पर पहुंचते ही नीचे की तरफ देखने में अपनी हेठी समझने लगता है?

  4. सुशांत झा Reply

    October 3, 2009 at 11:18 am

    मुझे नहीं लगता कि आज के दौर में कोई नेता या कोई आम आदमी भी जब किसी धंधे में पूंजी लगाता है तो उसके सामने राष्ट्र, समुदाय या उसके जाति का हित सर्वोपरि होता है। ये बाते गांधीजी के वक्त सही हो सकती थी जब उन्होने ‘हरिजन’ या ‘इंडियन ओपिनियन’ निकाला था जो अंग्रेजो से लड़ने और अपने विचारों को आमजनों तक पहुंचाने का माध्यम बना। यहां सवाल ये नहीं है कि मीडिया हाउस पर मालिकाना हक किसका है, सवाल ये है कि न्यूजरुम में डायवर्सिटी कितनी है और वहां व्यापर समाज के मुद्दे क्यों नजरों से ओझल हो जाते हैं। दिलीपजी ने सही कहा कि उत्तरभारत में भी तो लगभग सारे मीडिया हाऊस बनियों के माल्कियत में चल रहे हैं लेकिन न्यूजरुम ब्राह्मण और कायस्थों से भरा है। दूसरी अहम बात ये डायवर्सिटी आने का ये मतलब नहीं कि न्यूज रुम में व्यापक समाज के मुद्दों को जगह मिल ही जाएगी,यहां बाजार का अपना दवाब रहेगा जो प्रोडक्ट बन चुके मीडिया कंटेन्ट को बेचने के लिए पत्रकारों पर तरह-तरह के दबाव डालेगा।

    दूसरी बात जो अहम है वो ये दक्षिण भारत और उत्तर भारत के समाज में जो पिछले 50 साल मे अंतर आ गया है उसके सही विश्लेषण के बिना हम इस खेल को नहीं समझ सकते कि क्यों एक दक्षिण का नेता मीडिया हाउस और इंजिनियरिंग कालेज का चेन खोल लेता है जबकि बिहारी नेता सिर्फ पेट्रोल पंप और बस-ट्रक निकालकर ही संतुष्ट हो जातें है। दक्षिण के नेताओं ने अपने क्षेत्र को नाउजेल इकनामी बना दिया है जबकि उत्तर भारत अभी तक श्रम आधारित मनीआर्डर इकानामी ही है।

    जाहिर सी बात है कि ये एक दिन में नहीं हुआ है। दक्षिण भारत में तकरीन पिछले दो पीढ़ी से पिछड़े-दलितों के सशक्तिकरण के फलस्वरुप अब वे मीडिया हाउस, कंस्ट्रक्शन, आईटी और तमाम उद्योग धंधों के मालिकान बन गए हैं जबकि उत्तरभारत के सवर्ण तक ऐसा नहीं कर पाए हैं-पिछड़े दलित तो वैसे भी पीछे हैं। दक्षिण का सर्वांगीण विकास नजर आता है , जबकि उत्तर अभी तक नाकामयाबी का बोझ ढ़ो रहा है। ऐसे में लालू-मुलायम-माया से ये उम्मीद करना कि वे मीडिया हाउस खोल ले और तमाम दलित या पिछड़ों को उसमें भर लें या कमसे पिछड़ा-दलित हित की बात करने वाले को ही जगह दे दें-बिल्कुल सही नहीं लगता। इसके लिए उत्तरभारत के पिछड़ों-दलितों के जीवन में आर्थिक-शैक्षणिक क्रान्ति लानी होगी, उसके बाद ही वे जातिवाद के महीन षडयंत्र को पार कर पाएंगे।

  5. विवेक Reply

    October 3, 2009 at 1:41 pm

    अभय कुमार दुबे कहना क्या चाहते हैं यह बात समझ नहीं आई। एक तरफ़ वो मुलायम सिंह यादव का उदाहरण देकर यह भी समझाते हैं कि मीडिया कितना महीन खेल हैं। बताते हैं कि 20-25 साल में ऐसा माहौल बनता है कि निहित स्वार्थों को पूरा किया जा सके और दूसरी तरफ़ कहते हैं कि दलित और पिछड़ों की पूंजी कहां हैं? मतलब आज दलित पूंजी लगने लगे तो बीस साल बाद महीन खेल शुरू होगा और उसके बीस साल बाद कुछ सार्थक नतीजे निकलेंगे। कमाल का क्रांतिकारी विचार है यह।

    सिर्फ़ यही एक बात नहीं, उनका पूरा तर्क गले नहीं उतरता। उन्होंने पुरानी और जातिवादी थ्योरी को ही नए अंदाज में प्रस्तुत किया है। पुराने जमाने में भी तो यही होता था। हर ऊंची जातियों की बस्तियों में नीची जातियों के लोगों के मकान में नहीं होते थे। चमरटोली, दुस्साध टोली, यादव बस्ती यह सब गांव के किसी एक कोने में बने होते हैं। ऊंची जातियों की बस्ती अलग और अवर्णों की बस्ती अलग। नीची जाति के लोगों को अपने दुआर और गृह में प्रवेश वर्जित होता था। मठों में और मंदिरों में उनका प्रवेश मना होता था। वो मठ अपने पसीने से तैयार करते थे। उसकी ईंटे जोड़ते थे लेकिन वही मठ तैयार होने के बाद इतना पवित्र घोषित कर दिया जाता कि जो लोग उन्हें खून पसीने से तैयार करते वही अशुद्ध करार दे दिए जाते।

    अभय कुमार दुबे भी यही कह रहे हैं कि इस घोर ब्राह्मणवादी मीडिया में सभी वर्गों और जातियों की हिस्सेदारी की बात तब तक मानी नहीं जाएगी जब तक अवर्ण अपना मीडिया तैयार नहीं करते। उनसे पूछना चाहिए कि अगर अपना-अपना ही मीडिया बनाने की बात है तो फिर मुख्यधारा में हिस्सेदारी की बात कैसे होगी? एक ऐसा मीडिया कैसे तैयार होगा जो देश के सभी वर्गों, जातियों और धर्मों को समान रूप से देखे। उनके हितों की बात उठाते वक़्त भेदभाव नहीं करे?

    एक बात और कहना चाहता हूं। मॉडरेटर ने बेतुके ढंग से अभय कुमार दुबे को सुलझे हुए विचारक के तौर पर पेश किया है। दरअसल अभय कुमार दुबे सुलझे हुए नहीं बल्कि उलझे हुए विचारक हैं। या तो उन्हें वर्ग चरित्र का अंदाजा नहीं है या फिर वो भी एक महीन खेल खेल रहे हैं। वरना वह क्यों कहते कि दलितों और पिछड़ों का प्रभुवर्ग कहां है? वह नहीं जानते कि प्रभुवर्ग में जो शामिल हुआ उसे प्रभुवर्ग किस तरह से स्वीकार करके अपना बना लेता है? क्या देश में सामाजिक बदलाव प्रभुवर्गों के भरोसे हुए हैं? क्या टाटा, बिड़ला, अंबानी, सुनील मित्तल, लक्ष्मी मित्तल, के पी सिंह वगैरह… की फौज देश में सामाजिक परिवर्तन का बिगुल बजा रही है?

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