हम यह बता चुके हैं कि एडवांस स्टडी, शिमला में मीडिया में दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों की हिस्सेदारी पर बहस हुई। उसी बहस में प्रमोद रंजन ने अपना शोधपत्र पढ़ा। हमने जनतंत्र के पाठकों से वो शोधपत्र साझा किया था। प्रमोद रंजन के उठाए सवालों को अभय कुमार दुबे ने आगे बढ़ाया। हमने अभय कुमार दुबे का भाषण भी छापा था। अभय कुमार दुबे ने मीडिया में दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों की हिस्सेदारी पर जो नज़रिया पेश किया है उस पर कई विचारोत्तेजक टिप्पणियां आई हैं। ज़्यादातर लोग उनकी राय से इत्तेफाक नहीं रखते हैं। कुछ के मुताबिक उन्होंने वही पुरानी सोच जाहिर की है जिसके जरिए बदलाव की लहर रोकी जाती है। हम चाहते हैं कि आप सभी उन टिप्पणियों को पढ़ें और इस बहस को आगे बढ़ाएं।
सरोज सागर
आपने अभय कुमार दुबे का परिचय देते हुए कहा है कि – “अभय जी मौजूदा दौर के चंद सुलझे हुए और वैचारिक धरातल पर मजबूत लोगों में शामिल हैं।” मैंने भी उनके द्वारा संपादित कुछ किताबें पढी हैं। इसलिए यह कह सकता हूं कि उनके द्वारा किया गया काम महत्वपूर्ण है। इस तरह वह हिंदी की दुनिया के कथित “मजबूत लोगों” में से एक भी साबित होते हैं। लेकिन भाई उनके द्वारा प्रमोद रंजन जी के शोध आलेख पर कही गयी बातों से उनका एक दूसरा पहलु भी उजागर होता है। इसे पढने के बाद भी आप कह रहे हैं कि “मौजूदा दौर के चंद सुलझे हुए” और “मजबूत वैचारिक धरातल” वाले व्यक्ति हैं!
भाई मेरे, अभय की बातों को जरा ध्यान से पढिए और लोगों को भी जरा से ध्यान से पढने के लिए कहिए। अभय कुमार दुबे “सुलझे हुए” नहीं बेहद “उलझे हुए” आदमी के रूप में यहां हैं। और जितना वह खुद उलझे हुए हैं, उससे कहीं अधिक दलित-पिछडों को भयानक रूप से उलझा देने के फेर में हैं।
आपने और दिलीप मंडल जी ने जरा सोचा है कि वास्तव में क्या कह रहे हैं अभय कुमार दुबे? वह कह रहे हैं कि दलितों को अल्पसंख्यकों को अपना मीडिया बना लेना चाहिए। अगर उनके तर्कों को मानें तो हमें में हमें राजपूत मीडिया, ब्राहमण मीडिया, यादव मीडिया, जाट मीडिया, चमार मीडिया और भंगी मीडिया भी बनाना होगा। उसके बाद महिलाओं के लिए एक अलग मीडिया की जरूरत होगी। सब रहेंगे अपने-अपने खेमे में।
वास्तव में अभय कुमार यह सब कहते हुए यह बताना चाहते हैं कि दलितों और पिछडों के पास काफी पैसा आ गया है। जो कि वास्तविकता नहीं है। उत्तर भारत में इन तबकों शायद एक भी ऐसा आदमी नहीं मिलेगा, जिसके पास इतना पैसा हो कि वह एक बडा मीडिया संस्थान खोल सके। मुलायम सिंह के पास भी अगर इतना सरप्लस पैसा होता तो वे जरूर अखबार निकाल लेते। आखिर इतना पैसा नहीं था कि वह लंबे समय तक रिटर्न का इंतजार कर सकें तभी न उनको अपने हाथ वापस खींच लेने पडे।
और, आज जब समाज में, राजनीति में सब जगह निजी क्षेत्र, विशेषकर मीडिया में आरक्षण की जरूरत पर बात हो रही है तो अभय दुबे का ध्यान इस ओर क्यो नहीं जाता। यह संयोग नहीं वल्कि ध्यान भटकाने, उलझाने षडयंत्र है। दुबे जी आरक्षण पर बात नहीं कर यह कहना चाह रहे हैं कि सवर्णों के पास पैसा है, उन्होंने पूंजी लगायी, लगवाई है तो वे दलितों- पिछडो को क्यों रखेंगे। दलित- पिछडे अपनी ढपली और अपना राग अलग जाकर बजाएं।
विवेक
अभय कुमार दुबे कहना क्या चाहते हैं यह बात समझ नहीं आई। एक तरफ़ वो मुलायम सिंह यादव का उदाहरण देकर यह भी समझाते हैं कि मीडिया कितना महीन खेल हैं। बताते हैं कि 20-25 साल में ऐसा माहौल बनता है कि निहित स्वार्थों को पूरा किया जा सके और दूसरी तरफ़ कहते हैं कि दलित और पिछड़ों की पूंजी कहां हैं? मतलब आज दलित पूंजी लगाने लगें तो बीस साल बाद महीन खेल शुरू होगा। और उसके बीस साल बाद कुछ सार्थक नतीजे निकलेंगे। कमाल का क्रांतिकारी विचार है यह।
सिर्फ़ यही एक बात नहीं, उनका पूरा तर्क गले नहीं उतरता। उन्होंने पुरानी और जातिवादी थ्योरी को ही नए अंदाज में प्रस्तुत किया है। पुराने जमाने में भी तो यही होता था। हर ऊंची जातियों की बस्तियों में नीची जातियों के लोगों के मकान नहीं होते थे। चमरटोली, दुस्साध टोली, यादव बस्ती, कोइरियों की कोड़ारी – यह सब गांव के किसी एक कोने में बने होते हैं। ऊंची जातियों की बस्ती अलग और अवर्णों की बस्ती अलग। ऊंची जाति के लोग नीची जाति के लोगों को अपने दुआर और घर में दाखिल नहीं होने देते थे। सवर्णों के मठों में और मंदिरों में उनका प्रवेश मना होता था। पिछड़ी जातियों के लोगों और दलितों से मठ तैयार तो कराया जाता लेकिन वही मठ तैयार होने के बाद पवित्र घोषित कर दिया जाता। वो भी इतना कि जो लोग उन्हें खून पसीने से तैयार करते थे वो वहां दाखिल नहीं हो सकते थे।
अभय कुमार दुबे भी यही कह रहे हैं कि इस घोर ब्राह्मणवादी मीडिया में सभी वर्गों और जातियों की हिस्सेदारी की बात तब तक मानी नहीं जाएगी जब तक अवर्ण अपना मीडिया तैयार नहीं करते। उनसे पूछना चाहिए कि अगर अपना-अपना ही मीडिया बनाने की बात है तो फिर मुख्यधारा में हिस्सेदारी की बात कैसे होगी? एक ऐसा मीडिया कैसे तैयार होगा जो देश के सभी वर्गों, जातियों और धर्मों को समान रूप से देखे। उनके हितों की बात उठाते वक़्त भेदभाव नहीं करे?
एक बात और कहना चाहता हूं। मॉडरेटर ने बेतुके ढंग से अभय कुमार दुबे को सुलझे हुए विचारक के तौर पर पेश किया है। दरअसल अभय कुमार दुबे सुलझे हुए नहीं बल्कि उलझे हुए विचारक हैं। या तो उन्हें वर्ग चरित्र का अंदाजा नहीं है या फिर वो भी एक महीन खेल खेल रहे हैं। वरना वह क्यों कहते कि दलितों और पिछड़ों का प्रभुवर्ग कहां है? वह नहीं जानते कि प्रभुवर्ग में जो शामिल हुआ उसे प्रभुवर्ग किस तरह से स्वीकार करके अपना बना लेता है? क्या देश में सामाजिक बदलाव प्रभुवर्गों के भरोसे हुए हैं? क्या टाटा, बिड़ला, अंबानी, सुनील मित्तल, लक्ष्मी मित्तल, के पी सिंह वगैरह… की फौज देश में सामाजिक परिवर्तन का बिगुल बजा रही है
दिलीप मंडल
प्रमोद रंजन ने न्यूजरूम में डायवर्सिटी का जो सवाल उठाया है, उसके प्रत्युत्तर में अभय कुमार दुबे जो समाधान सुझा रहे हैं, वो महत्वपूर्ण है। दरअसल मझौली जातियों के प्रभावशाली लोगों ने खासकर दक्षिण भारत में अपना मीडिया बना भी लिया है। मीडिया में दलित एंटरप्रिन्योरशिप की कमी जरूर है, लेकिन उम्मीद की जा सकती है कि ये भी कुछ ही समय की बात है। उत्तर भारत में ये प्रक्रिया सुस्त है और इसके कारण भी हैं। दक्षिण भारतीय मीडिया को देखें तो:
- तमिलनाडु में ओबीसी मारन परिवार का सन नेटवर्क इस समय दक्षिण भारत ही नहीं, बल्कि पूरे देश के सबसे बड़े मीडिया हाउस में से एक है।
- इनाडु/ईटीवी ग्रुप के मालिक रामोजी राव मझौली जाति कम्मा के हैं।
- कर्नाटक के अखबार समूह डेक्कन हेराल्ड-प्रजावाणी के मालिक पिछड़ी इडिगा (ताड़ी निकालने वाली जाति) के हैं।
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–क्रिश्चियन स्वामित्व वाला मलयालम मनोरमा हो या मुसलमान स्वामित्व वाला माध्यमम, इनकी हैसियत अच्छीखासी है। मलयालम मनोरमा केरल का सबसे बड़ा मीडिया समूह है। (यानी दक्षिण भारत के चार सबसे बड़े मीडिया ग्रुप गैर द्विज जातियों के स्वामित्व वाले हैं।)
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-आंध्र प्रदेश में वाइएसआर परिवार का भी मीडिया में खासा अच्छा हस्तक्षेप है। कई और दक्षिण भारतीय मीडिया समूह भी पिछड़ी जातियों के कारोबारी चलाते हैं।
पूरे दक्षिण भारत में मीडिया ओनरशिप के मामले में सवर्ण वर्चस्व खत्म हो चुका है। इस मायने में ये उत्तर भारतीय समस्या है। उत्तर भारत में भी लगभग सभी बड़े मीडिया हाउस गैर द्विज(वैश्य) स्वामित्व वाले हैं। लेकिन न्यूजरूम में सवर्ण वर्चस्व इसके बावजूद है।
इसलिए अभय जी के सुझाव से गुत्थी सुलझती कम और उलझती ज्यादा है। ऐसा लगता है कि मीडिया ओनरशिप और न्यूजरूम के स्ट्रक्चर में वैसा सरल संबंध है नहीं, जैसा कि अभय कुमार दुबे बता रहे हैं। इसकी जड़े उत्तर भारतीय समाज में ही होंगी। इस बारे में रॉबिन जैफ्री एक और शोध कर सकते हैं। कोई भारतीय शोधकर्ता तो इस विषय को हाथ लगा नहीं सकता!
चंडीदत्त शुक्ल
अभय जी ने चर्चा भटकाने के लिए कोई नया शगूफा छोड़ा है…मैं नहीं मानता। हां, हो सकता है कि सरोज जी की चिंता जायज हो कि ऐसे तो खेमेबंदी बनी रहेगी। वैसे, मीडिया संस्थानों की स्थापना ना सही पर समानांतर चिंतन की ज़रूरत से तो सरोज भी संभवतः इनकार नहीं करेंगे। वैसे, यहां एक बात बोलूं…तमाम लोग अपने गांव-गिंवार से बाहर आते हैं, तो प्रदेश की राजधानियों का नाम लेकर बताते हैं कि मैं तो वहां का हूं जी…। कहीं ऐसा ही तो नहीं कि दलितों, पिछड़ों और मुसलमानों का प्रभुवर्ग ऊंचाई पर पहुंचते ही नीचे की तरफ देखने में अपनी हेठी समझने लगता है?
सुशांत झा
मुझे नहीं लगता कि आज के दौर में कोई नेता या कोई आम आदमी भी जब किसी धंधे में पूंजी लगाता है तो उसके सामने राष्ट्र, समुदाय या उसके जाति का हित सर्वोपरि होता है। ये बाते गांधीजी के वक्त सही हो सकती थी जब उन्होने ‘हरिजन’ या ‘इंडियन ओपिनियन’ निकाला था जो अंग्रेजो से लड़ने और अपने विचारों को आमजनों तक पहुंचाने का माध्यम बना। यहां सवाल ये नहीं है कि मीडिया हाउस पर मालिकाना हक किसका है, सवाल ये है कि न्यूजरुम में डायवर्सिटी कितनी है और वहां व्यापर समाज के मुद्दे क्यों नजरों से ओझल हो जाते हैं। दिलीपजी ने सही कहा कि उत्तरभारत में भी तो लगभग सारे मीडिया हाऊस बनियों के माल्कियत में चल रहे हैं लेकिन न्यूजरुम ब्राह्मण और कायस्थों से भरा है। दूसरी अहम बात ये डायवर्सिटी आने का ये मतलब नहीं कि न्यूज रुम में व्यापक समाज के मुद्दों को जगह मिल ही जाएगी,यहां बाजार का अपना दवाब रहेगा जो प्रोडक्ट बन चुके मीडिया कंटेन्ट को बेचने के लिए पत्रकारों पर तरह-तरह के दबाव डालेगा।
दूसरी बात जो अहम है वो ये दक्षिण भारत और उत्तर भारत के समाज में जो पिछले 50 साल मे अंतर आ गया है उसके सही विश्लेषण के बिना हम इस खेल को नहीं समझ सकते कि क्यों एक दक्षिण का नेता मीडिया हाउस और इंजिनियरिंग कालेज का चेन खोल लेता है जबकि बिहारी नेता सिर्फ पेट्रोल पंप और बस-ट्रक निकालकर ही संतुष्ट हो जातें है। दक्षिण के नेताओं ने अपने क्षेत्र को नाउजेल इकनामी बना दिया है जबकि उत्तर भारत अभी तक श्रम आधारित मनीआर्डर इकानामी ही है।
जाहिर सी बात है कि ये एक दिन में नहीं हुआ है। दक्षिण भारत में तकरीन पिछले दो पीढ़ी से पिछड़े-दलितों के सशक्तिकरण के फलस्वरुप अब वे मीडिया हाउस, कंस्ट्रक्शन, आईटी और तमाम उद्योग धंधों के मालिकान बन गए हैं जबकि उत्तरभारत के सवर्ण तक ऐसा नहीं कर पाए हैं-पिछड़े दलित तो वैसे भी पीछे हैं। दक्षिण का सर्वांगीण विकास नजर आता है , जबकि उत्तर अभी तक नाकामयाबी का बोझ ढ़ो रहा है। ऐसे में लालू-मुलायम-माया से ये उम्मीद करना कि वे मीडिया हाउस खोल ले और तमाम दलित या पिछड़ों को उसमें भर लें या कमसे पिछड़ा-दलित हित की बात करने वाले को ही जगह दे दें-बिल्कुल सही नहीं लगता। इसके लिए उत्तरभारत के पिछड़ों-दलितों के जीवन में आर्थिक-शैक्षणिक क्रान्ति लानी होगी, उसके बाद ही वे जातिवाद के महीन षडयंत्र को पार कर पाएंगे।
Saroj Sagar
October 4, 2009 at 8:13 am
मॉडरेटर जी, आप जो कोई भी हों, आपकी सदाशयता और निष्पक्षता को सलाम करने का जी चाहता है। पिछली पोस्ट में आपने अभय कुमार दुबे का पक्ष लिया था। लेकिन उनके विरोध में आयी बातों को प्रमुखता से छाप कर आपने साबित कर दिया है आप इस मुददे पर सचमुच खुले दिल से बहस चाहते हैं।
मैं इस बहस में आगे भाग लेने वाले लोगों को एक बार फिर यह याद दिलाना चाहता हूं कि अभय जी जैसे लोग मीडिया में आरक्षण की बात से इस तरह कन्नी क्यों काटते हैं ? इस पर सोचने की जरूरत है। मैंने सुना है कि विदेशों में मीडिया संस्थानों ने विभिन्न समाजों के लिए आरक्षण की व्यवस्था कर रखी है। तो भारत में ऐसा क्यों नहीं होना चाहिए ? आप जगह नहीं देंगे तो दलित-ओबीसी अपना मीडिया बनाएंगे ही। जैसा की दक्षिण भारत में है भी। लेकिन प्रमोद रंजन जी के शोधपत्र का सिरा पकड कर अभय जी से पूछें कि क्या इससे ‘मीडिया में आधुनिकता’ आ जाएगी ? शिमला पहुंच कर प्रमोद रंजन जी से बहस करने वाले दुबे जी से पूछा जाना चाहिए वह वास्तव में ‘आधुनिकता’ से क्या समझते हैं?
अभय जी की टिप्पणी को प्रमोद रंजन जी के लेख के साथ पढने पर अभय जी की हिडेन एजेंडा उजागर हो जाता है। शोध पत्र में प्रमोद रंजन बताते हैं कि 1890 में हिंदी के निर्माताओं में से एक प्रतापनाराण मिश्र ब्राह्मण वर्चस्व की वकालत कर रहे थे तो 2009 में `आधुनिक हिंदी पत्रकारिता´ के नायकों में से एक (यह वास्तव में प्रभाष जोशी हैं, देखें शोध पत्र की टिप्पणी) उदघोष करते हैं कि ब्राह्मण जाति विभिन्न कौशलों में श्रेष्ठ है।
अभय जी शोधपत्र में उठाये गये इस सवाल का उत्तर क्यों नहीं देते कि- ‘ हिंदी पत्रकारिता के पिछले 150 सालों में क्या बदला है?’ जबकि प्रमोद रंजन ने लिखा भी है कि – ‘वास्तव में यही वह सवाल है, जिसे हमें ऐसी किसी भी चर्चा के आरंभ में पूछना चाहिए।’ इस आरंभिक सवाल को ही दरकिनार कर दलित-पिछडों को अपनी ढपली अपना राग अलग बजाने की सलाह देना संयोग नहीं है।
मैंने प्रमोद रंजन के शोधपत्र को ध्यान से पढा है और इसका 100 प्रिंट आउट यहां स्थानीय मित्रों को वितरित करने के लिए निकाले हैं। उसमें कई ऐसी बातें हैं जो दिमाग को झन्ना देने वाली हैं। मीडिया पर कॉलम लिखकर अखबारों को पन्ना दर पन्ना रंग देने वाले लोगों को इस पर सोचना चाहिए वे मीडिया को कितना समझते हैं। शोध पत्र से एक उदाहरण देता हूं- ‘मीडिया के बाजारवाद के खतरे और दुष्परिणाम बहुआयामी हैं। नयी तकनीक ने कई मायनों में ब्राह्मणवाद के अस्त्र के प्रभाव को व्यापक बनाया है। लेकिन क्या कारण है कि इसके दुष्परिणामों में से सिर्फ एक – स्त्री शरीर के प्रदर्शन को ही चिन्हित किया जाता है? वस्तुत: यही वह दुष्परिणाम है, जिससे सबसे ज्यादा भारत का सामंती समाज प्रभावित हुआ है’। क्या प्रमोद रंजन का यह वाक्य अश्लीलता के कथित हंगामें पर रेडिकल रूप से नये सिरे से सोचने के लिए मजबूर नहीं करता?
मॉडरेटर भाई, बहस प्रमोद रंजन के इस वाक्य पर भी कि करवाइए कि -’ इस बाजारवाद ने अनेक प्रकार की मनोरंजन-विधियों, जो सिर्फ़ धनिकों तक सीमित थीं, की पहुंच बहुसंख्यक लोगों तक संभव कर दी है’। प्रमोद रंजन के यह वाक्य मीडिया के बारे में मौजूदा समझ को अलट कर रख देता है।
अभय जी जैसे आधुनिकता के नाम पर सिर्फ लिबास बदलने की हिमायत करने वालों से पूछिए कि वे एक ऐसे शोध लेख को, जिसमें शायद भारत के मीडिया को पहली बार आधुनिकता की रोशनी में देखा गया है की प्रशंसा करने के बजाए क्यों उलझा देना चाह रहे हैं। मुझे विश्वास है कि साइबर जगत मीडिया की आधुनिकता को प्रमोद रंजन के नजरिए से देखेगा न कि अभय कुमार दुबे के नजरिए से।