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एक साल बाद ख़बरों की जगह बेडशीट के भरोसे नई दुनिया

नई दुनिया के दिल्ली संस्करण ने एक साल पूरा कर लिया है। पिछले साल दो अक्टूबर को ही यह अख़बार पूरे ताम-झाम के साथ लॉन्च हुआ था। राजधानी के एक पांच सितारा होटल में बड़े-बड़े नेताओं को अख़बार की पहली प्रति बांटी गई और जश्न मनाया गया। बड़े-बड़े वादे और दावे किए गए हैं। लेकिन एक साल बाद सारे वादे धरे रह गए हैं और दावे झूठे साबित हुए हैं।  सूत्रों के मुताबिक बाहर के लोगों की बात क्या करें? अख़बार में काम करने वालों के बीच ही अख़बार की विश्वसनीयता घटती चली गई है। तभी एक साल पूरा होने पर संपादक आलोक मेहता को अपनी टीम से यह कहना पड़ा कि आप सभी चिंता मत करें… यह एक लड़ाई है… इसमें कभी हम आगे निकल जाते हैं और कभी पीछे। 

नई दुनिया पर विश्वसनीयता के संकट का असर दूरगामी हुआ है। यह अख़बार दिल्ली में हिंदुस्तान टाइम्स प्रिंटिंग प्रेस में छपता है। वहां के सूत्रों के मुताबिक नई दुनिया का सर्कुलेशन पिछले कुछ महीनों में आधा हो गया है। एक समय एनसीआर में इस अख़बार की 70 हज़ार प्रतियां छपती थीं। लेकिन अब केवल 35 हज़ार के करीब प्रतियां छपती हैं। जाहिर है नई दुनिया पाठकों के भरोसे पर खरी नहीं उतरी है और अब पाठक इसे खारिज कर रहे हैं। लगता है कि वो भी हर रोज़ प्रतिभा पाटिल की तस्वीरें देख कर और कांग्रेस के गुणगान पढ़ कर तंग आ गए हैं। उन्हें भी यह अख़बार कांग्रेस का भोंपू नज़र आने लगा है।

गिरते सर्कुलेशन की चिंता अख़बार के मैनेजमेंट को सताने लगी है। यही वजह है कि अख़बार ने नई स्कीम लॉन्च की है। स्कीम के तहत 399 रुपये में साल भर का सब्स्क्रिप्शन लेने पर एक बेडशीट मुफ़्त मिलेगी। बेडशीट अख़बार के दफ़्तर में रखी हुई हैं। वहां काम करने वाले कई लोगों ने भी बेडशीट के लालच में अख़बार का सब्स्क्रिप्शन ले लिया है। मीडिया बाज़ार में चर्चा तो यहां तक है कि नई दुनिया के मैनेजमेंट ने कर्मचारियों को सब्स्क्रिप्शन लेने और मित्रों-रिश्तेदारों को भी इसके लिए प्रेरित करने का फरमान दिया है। लेकिन नई दुनिया के कई पत्रकारों के मुताबिक ऐसा कोई औपचारिक फरमान नहीं दिया गया है। हां, कुछ लोग खुद ही उत्साहित होकर सब्स्क्रिप्शन ले रहे हैं और इसके लिए दूसरों को भी प्रेरित कर रहे हैं।

तो बेडशीट के भरोसे नई दुनिया का निर्माण होगा। कहा तो यही जा रहा है कि नई दुनिया लो तो मुफ़्त में एक बेडसीट भी। लेकिन इस स्लोगन को थोड़ा उलट कर देखिए तो तस्वीर ज़्यादा साफ़ नज़र आएगी। अब नई दुनिया में ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे बेचा जा सके इसलिए बेडशीट बेचो और नई दुनिया मुफ़्त में दो।

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4 Responses to एक साल बाद ख़बरों की जगह बेडशीट के भरोसे नई दुनिया

  1. विनीत कुमार Reply

    October 3, 2009 at 5:37 pm

    हैंडीबैग,आयरन,हॉट पॉट,फ्लासक तो कई अखबार पहले से ही देते आए हैं। एक-दो बार कटोरे भी हाथ लगे हैं लेकिन नयी दुनिया की बेडसीट। लगता है नयी दुनिया को बिछाने शब्द से खास लगाव है।

    • रीतेश Reply

      October 4, 2009 at 2:47 am

      विनीत जी, आप “बिछने” लिखने के मूड में तो नहीं थे. देख लीजिए, ख के साथ मात्रा मुफ्त में लग गई हो.

  2. रीतेश Reply

    October 4, 2009 at 2:45 am

    बेहतरीन.

  3. brij khandelwal Reply

    October 4, 2009 at 3:43 pm

    yeh sab agra mein dainik hindustan ne bhi kiya tha pichli saal, lekin kuch fayda nahin hua
    khabron se khilwad karke vishwasniyata kho jati hai. kab seekhenge hamare akhbar.
    kayde ki khabrein nap tol kar dee jani chahiye

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