नीतीश कुमार का गठबंधन क्या बिहार का पिछला उपचुनाव इसलिए हार गया कि बिहार के भूस्वामी उनसे नाराज हैं? मीडिया में चुनाव को लेकर जातीय गोलबंदियों के संदर्भ में जिस भाषा का इस्तेमाल होता है उसके मुताबिक क्या बिहार के सवर्ण नीतीश कुमार से नाराज हैं? क्या बिहार में कांग्रेस की वापसी नीतीश कुमार को अगले विधानसभा चुनाव में ले डूबेगी?
बिहार की संसदीय राजनीति के इस समय ये कुछ सबसे बड़े सवाल हैं। इन सवालों को लेकर बिहार का मीडिया क्या सोच रहा है, ये जानने के लिए हमने 19 सितंबर को पटना से छपे वाले हिंदी के कुछ अखबारों को खंगालने की कोशिश की। यही वो तारीख है जब विधानसभा उपचुनाव के बाद पटना में अखबार छपे। 17 सितंबर को विश्वकर्मा पूजा की वजह से पटना में सभी प्रेस बंद होते हैं और 18 सितंबर का अखबार नहीं आता।
इस दौरान नजर गई पत्रकार सुरेंद्र किशोर के एक विश्लेषण पर। ये विश्लेषण प्रभात खबर के पहले पन्ने पर छपा है और शीर्षक है – “कैसे बदला तीन ही महीने में मतदाताओं का मूड।”
इस लेख का लगभग आधा हिस्सा तो ये बताता है कि नीतीश कुमार ने वंशवाद को खत्म करने और इसके लिए नेताओं के रिश्तेदारों को टिकट न देने की नीति बनाई उसका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ा है हालांकि सुरेंद्र किशोर कहते हैं कि :
“यह बहुत अच्छी बात है कि ताजा उप चुनाव में झटके खाने के बावजूद शरद यादव व नीतीश कुमार ने कह दिया है कि वे परिवारवाद का विरोध जारी रखेंगे। जाहिर है कि शरद-नीतीश के इस ऐतिहासिक कदम से डा। राम मनोहर लोहिया की आत्मा को शांति मिल रही होगी। शायद यह कदम आगे कभी इस देश के लिए निदेशक भी साबित हो!”
सुरेंद्र किशोर के विश्लेषण का दूसरा हिस्सा काफी महत्वपूर्ण हैं। इसमें वो कहते हैं कि नीतीश ने अगर बिहार में सामंती भूमि संबंधों से टकराने की कोशिश की तो वो कहीं के नहीं रहेंगे। सुरेंद्र किशोर की मान्यता है कि बटाईदार कानून और भूमिसुधार आयोग की रिपोर्ट को लागू करने की चर्चा ने भूस्वामियों को नाराज कर दिया क्योंकि उन्हें लगा कि इस तरह उनकी जमीन छिन सकती है। नीतीश कुमार की ये भारी भूल थी और अब इसे सुधारने की जरूरत है। बिहार की राजनीति और वहां से सामाजिक आर्थिक संबंधों में जिनकी दिलचस्पी है उन्हें ये विश्लेषण जरूर देखना चाहिए।
“कारण और भी हो सकते हैं, पर विधान सभा उप चुनावों में राजग की हार का एक दूसरा तात्कालिक कारण यह समझ में आता है कि राज्य सरकार के राजस्व व भूमि सुधार विभाग के सूत्रों के हवाले से अखबारों में इस जुलाई में ही यह खबर छप गई थी कि राज्य सरकार बटाईदारी कानून में सुधार सहित भूमि सुधार आयोग की कुछ सिफारिशों को जल्दी ही लागू करेगी। इस खबर के मीडिया में आते ही राज्य भर में छोटे -बड़े किसानों में खलबली मच गई। उन किसानों में से अनेक लोग राजग के ठोस मतदाता रहे हैं। आशंकित बटाईदारी कानून से नाराज होने वालों में हर जाति के किसान हैं जिनके पास बंटाई पर देने के लिए जमीन है। राज्य सरकार को अपनी ‘गलती’ का एहसास हुआ। इसके बाद राज्य सरकार ने 5 अगस्त 2009 को यह घोषणा कर दी कि अभी पुराने ही सीलिंग व बटाईदारी कानून लागू रहेंगे। उनमें कोई बदलाव नहीं होगा। राज्य सरकार ने यह भी कहा कि बंदोपाध्याय आयोग की रपट समग्रता में नहीं है। इसलिए उसे लागू नहीं किया जाएगा। पर राज्य सरकार की इस सफाई पर अनेक किसानों ने भरोसा नहीं किया।
जहां उप चुनाव हुए,उनमें एक चुनाव क्षेत्र फुलवारी शरीफ के एक सवर्ण बहुल गांव के एक किसान ने मतदान के दिन ही यानी 15 सितंबर, 2009 को ही इन पंक्तियों के लेखक को बताया कि रामाश्रय प्रसाद सिंह (बिहार सरकार के मंत्री) की इज्जत रखने के लिए कुछ मतदाताओं ने जरूर जदयू को वोट दे दिया अन्यथा हमारा पूरा गांव बटाईदारी कानून लागू होने की आशंका से पीड़ित होकर राजग से नाराज हो गया है। इस गांव के अधिकतर वोट इस बार कांग्रेसी उमीदवार को पड़े। ऐसी ही खबर सारण जिले के एक राजपूत बहुल गांव से भी मिली थी जिस गांव के किसान बटाईदारी कानून नहीं चाहते। हालांकि यह आशंका सिर्फ इन दो गांवों व जातियों में ही नहीं है।”….
पूरा लेख सुरेंद्र किशोर के ब्लॉग पर मौजूद है। वहां जाने के लिए यहां क्लिक करें।
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