बिहार में फिर जातीय नरसंहार हुआ है। खगड़िया में अमोसी गांव के करीब 16 लोगों की गोली मार कर हत्या कर दी है। मारे गए लोगों में पांच किशोर हैं। इस हत्याकांड से सभी सकते में हैं। कई साल बाद बिहार में जातीय नरसंहार की वारदात हुई है। तो हड़कंप मचेगा ही। इस घटना को लेकर मीडिया में भी तीखी प्रतिक्रिया है। अमूमन सभी अख़बारों ने इस ख़बर को प्राथमिकता से छापा है। सिवाय हिंदी के हिंदुस्तान के।
हिंदुस्तान के दिल्ली संस्करण में यह ख़बर पहले पन्ने पर नहीं है। यह जानते हुए भी कि दिल्ली की आबादी में बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोगों की अच्छी खासी आबादी है। हिंदुस्तान के इस रवैये से थोड़ी हैरानी होती है, लेकिन उससे भी ज़्यादा हैरानी इसलिए कि बिहार की एक ख़बर को पहले पन्ने पर जगह मिली है। वो ख़बर है कि “मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सुरक्षा दोगुनी की गई” उस ख़बर के मुताबिक –
“इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े पटना के एक पत्रकार के मोबाइल पर एक कथिक नक्सली द्वारा जेल में बंद दो कट्टर माओवादी नेताओं को छोड़ने अथवा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर हमले की धमकी भरा मैसेज मिलने के बाद मुख्यमंत्री की सुरक्षा बढ़ा दी गई है।
शुक्रवार की सुबह खगड़िया में नक्सलियों द्वारा 16 निर्दोष ग्रामीणों के मारे जाने की ख़बर जब राजधानी में फैली तो उसके कुछ ही देर बाद इस तरह का धमकी भरा संदेश मिलने के बाद आला अधिकारियों के होश फाख्ता हो गए।”
बिहार में जातीय नरसंहार की ख़बर पहले पन्ने पर छाप कर इस ख़बर को एक छोटे से बॉक्स में छापा जा सकता था। नई दुनिया और दैनिक भास्कर ने ऐसा ही किया है। लेकिन यह न्यूज़ सेंस का मसला है। लंबे अंतराल के बाद जातीय नरसंहार की ख़बर से कहीं अधिक तरजीह एक एसएमएस को दी गई है, तो इसके पीछे उनका अपना न्यूज़ सेंस होगा। वैसे भी न्यूज़ सेंस ऑब्जेक्टिव होने के साथ एक सब्जेक्टिव तत्व है। यह मुमकिन है कि जो ख़बर हमें और दूसरे तमाम अख़बारों को पहले पन्ने लायक लगी हो हिंदुस्तान के संपादकों को वह उतनी अहम नहीं लगी हो।
इस ख़बर से जुड़ी एक और बात पर गौर करना चाहिए। नई दुनिया को छोड़ कर अमूमन हिंदी के सभी अख़बारों ने घोषित तौर पर लिखा है कि यह नरसंहार नक्सलियों ने किया है। जबकि यह दावा तो वहां के पुलिस अधिकारियों ने भी नहीं किया है। उन्होंने कहा है कि नक्सलियों का हाथ हो सकता है। हो सकता है और होने में बहुत अंतर है। साथ ही पुलिस अधिकारी ज़मीन विवाद को लेकर जातीय नरसंहार और सियासी साज़िश की बात से भी इनकार नहीं कर रहे हैं।
लेकिन अख़बारों ने नक्सलियों की संदिग्ध दलील को हाथों हाथ ले लिया। दैनिक जागरण ने तो यहां तक लिख दिया है कि “अमौसी गांव की धरती को नक्सलियों ने गुरुवार देर रात निरीह ग्रामीणों के ख़ून से “लाल” कर दिया।” इस भीड़ में बस नई दुनिया की रिपोर्ट संतुलित नज़र आ रही है। उसमें नक्सलियों को सीधे-सीधे जिम्मेदार ठहराने की जगह वही लिखा गया है जो वहां के अधिकारी कह रहे हैं।
इस मामले में द हिंदू की रिपोर्ट गौर करने लायक है। रिपोर्ट के मुताबिक बिहार के एडीजी नीलमणि ने द हिंदू को बताया है कि हिंसा ज़मीन विवाद के कारण हुई। साथ ही नीलमणि ने यह भी बताया है कि शुरुआती जांच से यह कहा जा सकता है कि यह बड़े पैमाने पर माओवादी हमला नहीं था। हमले में इस्तेमाल हथियार भी आधुनिक नहीं थे।
((ऊपर की तस्वीर द हिंदू में छपी है))
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