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क़ैदियों की ज़िंदगी में “निर्मल धारा सेतु”

अक्सर यह होता है कि जेल के लिए कोई भी कार्यक्रम करते समय वक्ता, अभिनेता, कलाकार, कविगण इस बात के लिए आशंकित रहते हैं कि जेल के लोग यानी कि क़ैदी उनकी बातें समझेंगे या नहीं. पिछले 6 सालों से जेल में काम कर रही छम्मक्छल्लो के लिए अनुभव एकदम अलग है. उसकी नज़र में सबसे पहले तो जेल में बन्द सभी इंसान हैं. छम्मक्छल्लो को नहीं मालूम कि वे अपराधी हैं भी या नहीं. कोर्ट सबूतों के आधार पर फैसला सुनाती है. छम्मक्छल्लो को यह भी नहीं मालूम कि इन फैसलों के कारण सजा काट रहे लोग वास्तव में अपराधी हैं या नहीं. उन्होंने अपराध खुद से किया या किसी के उकसाने पर किया, या वे उस खेल के नामालूम से मोहरे रहे, जिनके कन्धे पर बन्दूक चला कर सभी अपनी-अपनी गोलियां दागते रहे. दुर्भाग्य से छम्मक्छल्लो को यह कुछ भी नहीं पता. उसे पता है तो सिर्फ़ यह कि जेल में बन्द लोग भी इंसान है, उनके भीतर भी दिल धड़कता है, वे भी अपने किये के लिए पछताते हैं, वे भी वहां से निकल कर सम्मान की ज़िन्दगी बसर करना चाहते हैं. मतभेद हो सकते हैं, मगर ग्लास आधा खाली देखने के बजाय ग्लास आधा भरा हुआ देखे जाने की ज़रूरत है.

छम्मक्छल्लो यही करने का प्रयास करती है. इसी क्रम में ‘अवितोको’ द्वारा गान्धी और शास्त्री जयंती यानी 2 अक्तूबर के ठीक एक दिन बाद यानी, 3 अक्तूबर, 2009 को ठाणे सेंट्रल जेल में भारतीय पीनल कोड की भिन्न भिन्न धाराओं के तहत बन्द 35 बन्दियों के लिए ‘निर्मल आनन्द सेतु’ पर एक दिवसीय कार्यशाला रखी गई. इसका मूल उद्देश्य व्यक्ति के अपने ‘स्व’ का विकास करना था. जेल जैसी विषम जगह में रहकर भी अगर कोई अपने विकास की बात सोचता और समझता है तो यह उसके जीवन की कभी ना भूलनेवाली घटना हो जाती है. रविदत्त गौड़ ने इस कार्यशाला का संचालन किया. रवि भारतीय मिथकों के सहारे आज के जीवन की परतों को तह दर तह खोलने में माहिर हैं. जीवन की जटिलता उनकी प्रवाहमयी भाषा और विचारों के प्रभाव में आ कर अपने आप अपने गिरह खोलने लगती है.

कार्यशाला के सहभागी व्याख्यान के विन्दुओं को अपने जीवन से जोड़ कर देखने का प्रयास कर रहे थे और वे उसमें सफल भी हुए. सहभागियों को एक अभ्यास कराया गया. कागज से उन्हें एक सेतु बनाने को कहा गया, जिसके नीचे से एक जहाज को गुजरना था और जिसके ऊपर सामान को भी टिकाए रखना था. तीन ग्रुपों में यह अभ्यास कराया गया. सभी ग्रुपों को अपने ग्रुप का नाम रखने और अपनी टीम का नेता यानी लीडर चुनने के लिए कहा गया. ग्रुप ने अपने अपने ग्रुप का नाम रखा- ए-1, क्रिएटिव और ईगल. ईगल ग्रुप ने बडा सा सेतु बनाया, मगर उसके नीचे से ना तो जहाज गया और ऊपर ना ही सामान टिक सका. क्रिएटिव ग्रुप के सेतु के साथ भी यही बात हुई. ए-1 ग्रुप के सेतु के नीचे से जहाज तो नहीं गया, मगर उसके ऊपर सामान आ गया. जीवन वही एक सेतु है, जिसके नीचे से हमारे अपने अन्दर के लोगों की भी समाई हो और जिसे अपने ऊपर से बड़े से बड़ा असला भी रख सकने की कूव्वत हो. सहभागियों ने जीवन के इस तत्व को इतनी आसानी से समझा कि वे इस कथन के मर्म तक तुरंत पहुंच गए.

सहभागियों ने इस कार्यशाला के लिए नमित होने से लेकर कार्यशाला स्थल तक आने और यहां आकर उन्हें कैसा लगा और उन्होंने इससे क्या हासिल किया, पर अपने विचार दिए. ये विचार फिर कभी आपको अलग से दिए जाएंगे. ‘अवितोको’ सहभागियों को अपनी भाषा में बात करने देने के लिए स्वतंत्र रखता है. यहां भी सहभागियों ने हिन्दी, मराठी, गुजराती, अंग्रेजी में अपनी बातें रखीं. सहभागियों का बारम्बार यही अनुरोध रहा कि आप यहां जल्दी जल्दी आएं, ताकि इस कार्यशाला की बातों को और गहराई से सीखा जा सके. और आगे सकारात्मक तरीके से सोचा, समझा और किया जा सके.

आप भी ‘अवितोको’ के इस अभियान से कला, थिएटर, साहित्य य अन्य किसी भी क्रिएटिव और सकारात्मक तरीके से जुडना चाहते हैं तो आपका स्वागत है. आप हमें avitoko@rediffmail.com या gonujha.jha@gmail.com पर सम्पर्क कर सकते हैं

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