दैनिक भास्कर की एक ख़बर उल्लेखनीय है। इस ख़बर से पता चलता है कि जहां कहीं भी न्यूज़रूम में सही अनुपात में महिलाएं नहीं होती हैं वहां आधी आबादी से जुड़ी ख़बरों को किस घटिये नज़रिए से प्रस्तुत किया जा सकता है। इस ख़बर से अंदाजा लगाया जा सकता है कि दैनिक भास्कर के न्यूज़रूम में भी महिलाएं नाम मात्र की होंगी और शायद ऊंचे पदों पर तो नहीं के बराबर। आगे बढ़ने से पहले आप उस ख़बर पर एक नज़र डालें जिसकी चर्चा हो रही है। -
मिनीस्कर्ट में चीन के “नए हथियार”
वेंकटेशन वेंबू, हांगकांग
एक अक्टूबर को अपने राष्ट्रीय दिवस परेड में चीन ने अपनी मारक क्षमता और युद्धक हथियारों का जमकर प्रदर्शन किया था। इसमें परमाणु क्षमता से लैस अंतरमहाद्वीपीय बैलेस्टिक मिसाइलें भी शामिल थीं। ये मिसाइलें यूरोप और अमेरिका तक मार कर सकती हैं। हालांकि इस पर अधिक चर्चा नहीं हो रही है। वहां चर्चा “व्यापक नरसंहार वाले” दूसरे हथियारों की अधिक है, जो परेड में दिखे बात बीजिंग महिला पुलिस की हो रही है। परेड में बेहद फैशनेबल गुलाबी पोशाक में शिरकत की, जिसमें उनकी खूबसूरती निखर कर आ रही थी। इसके अलावा टखनों तक आने वाले गो-गो बूट्स तो थे ही। उन्होंने अपने लिए तालियां और प्रशंसा तो बटोरी ही, आमतौर पर बेहद गंभीर रहने वाले चीनी राष्ट्रपति हू जिंताओ के चेहरे पर भी मुस्कान बिखर गई थी।
महिला मिलिशिया दरअसल नागरिक पुलिस है। इस वर्ष की परेड में कॉलेज की लड़कियों, कॉरपोरेट कामगारों, ग्रामीण अधिकारियों और यहां तक कि युवा माताओं ने भी हिस्सा लिया। परेड का नेतृत्व करने वाली झांग जियोफेई और झाओ ना नाम की दो युवतियां बीजिंग के चीनी महिला विश्वविद्यालय में अंतिम वर्ष की छात्राएं थीं। उन्होंने परेड में शिरकत करने के लिए पढ़ाई बीच में ही रोक दी। दोनों ही पेशेवर मॉडल भी हैं। परेड के एक दिन बाद ही चीन के लोगों ने इंटरनेट पर उनकी सैकड़ों तस्वीरें खोजी और डाउनलोड की। इनमें कुछ में वे बिकिनी पहने हुई हैं। झांग ने लॉरियल कॉस्मेटिक्स के साथ ही कई चीनी वस्त्र कंपनियों के लिए भी काम लिया है। झाओ मर्सिडीज बेंज और ऑडी के प्रिंट विज्ञापन में आई हैं। दोनों चीन के शांदोंग इलाके से हैं और पिछले वर्ष बीजिंग ओलंपिक में प्रस्तोता भी रह चुकी हैं। दोनों फैशन मॉडलों के लिए सैन्य प्रशिक्षण काफी मुश्किल रहा। उन्होंने इसे चुनौती के तौर पर लेकर पूरा किया। महिला मिलिशिया इकाई 1958 में बनाई गई थी। चीन की महिलाओं के लिए इसने प्रेरणा का काम किया। वैसे भी वे केवल अपनी खूबसूरती से ही क़त्ल कर सकती हैं।
आप इस रिपोर्ट की भाषा पर गौर कीजिए। इसमें महिलाओं को बैलेस्टिक मिसाइल से भी अधिक घातक बताया गया है। रिपोर्टर और संपादक के मुताबिक मिनी स्कर्ट में चीन की ये महिलाएं “व्यापक नरसंहार” की क्षमता रखती हैं। रिपोर्ट पढ़ने से लगता है कि अगर चीन “व्यापक नरसंहार” के “इन हथियारों” को भारतीय सीमा पर तैनात कर दे तो हमारे जांबाज सैनिक खुद ब खुद हथियार डाल देंगे और अपनी भारत मां को चीन के हवाले कर देंगे।
दैनिक भास्कर के रिपोर्टर और संपादक दोनों से पूछना चाहिए कि ये कॉलेज के लौंडों वाली भाषा का इस्तेमाल करना था तो पत्रकारिता के पेशे में क्यों चले आए? महिलाओं की तुलना बम और माल से ही करनी थी तो भर्ती हो गए होते किसी गैंग में और पूरी ज़िंदगी कहीं लौंडागीरी करते रहते।
उनसे यह भी पूछना चाहिए कि बीएसएफ में भर्ती हुई महिलाओं के बारे में उनका क्या खयाल है? दिल्ली पुलिस में तैनात महिलाओं के बारे में उनकी क्या राय है? कहीं उन्हें यह तो नहीं लगता कि भारत ने बीएसएफ और पुलिस में महिलाओं को इस नज़रिए से भर्ती किया है कि उनमें “व्यापक नरसंहार” की क्षमता है। वो सीमा पर और सीमा के भीतर हर वक़्त नरसंहार करके दुश्मनों के साथ भारत की बढ़ती आबादी पर भी लगाम लगाए रखें।
यह रिपोर्ट सकारात्मक नज़रिए से लिखी जा सकती थी। बताया जा सकता था कि किस तरह मॉडलिंग की दुनिया में नाम कमा चुकी महिलाएं भी बीजिंग की नागरिक महिला पुलिस में भर्ती हो रही हैं। आखिर बीजिंग की नागरिक पुलिस की खासियत क्या है? ये महिलाएं ज़िंदगी में क्या कुछ करना चाहती हैं? इनके सपने, इनकी उड़ान के बारे में बताया जा सकता था। रिपोर्ट में लिखा है कि ये चीन की महिलाओं के लिए प्रेरणा की स्रोत हैं। बताया जा सकता था कि किन मायनों में ये प्रेरणा की स्रोत हैं। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। उन्हें एक उत्पाद की तरह बेचने की कोशिश की गई। दैनिक भास्कर ने ऐसा करके बेहद घटिया और निंदनीय सोच का परिचय दिया है। उसे इसके लिए माफी मांगनी चाहिए।
सुधीर शर्मा
October 5, 2009 at 1:50 pm
यकीनन यह ख़बर विकृत मानसिकता की द्योतक है. इसके लिए दैनिक भास्कर को माफी मांगनी चाहिए.
mukesh pandey
October 5, 2009 at 1:52 pm
सही कहा आपने , मैं भी कई सालो से दैनिक भास्कर पढ़ रहा हूँ. लोकल न्यूज़ में भी जो फोटो प्रकाशित होती है, उसमे भी लड़कियों की फोटो ही ज्यादा होती है . मसलन शहर में अगर ज्यादा वरिश हुई तो उसमे भीगती हुई लड़कियां ही नजर आएँगी , गर्मी ज्यादा पड़ी तो स्कार्फ बंधे लड़कियां ही छपेंगी, कोई छात्रो का या स्कूली\कॉलेज का कार्यक्रम हो तो उनमे छात्रों को ही फोटो में वरीयता मिलेगी . इससे दैनिक भास्कर की मानसिकता पता चलती है .
Ramkant
October 5, 2009 at 5:42 pm
pata nahi patrkarita ki bhasa kaisi honi chahie par isme bura kaya laga aur pratisthit ramkripal ji ke akhbar khas kar internet edtion ke bare me aapne apnituglaki ray nahi di shayad apko pata nai ho ek link de raha hu ummid hai aage ispar bhi charcha ka khula manchdenge.jantantra ek bara plateform hai kripya iski garima ko bana kar rakhe yashwantji ki chap na padne de.kripya ise vaiktigat ya pakchpatpurn nazrie se na dekhiega.
http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/3950170.cms
http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/5036596.cms
http://photogallery.navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/5049791.cms
http://photogallery.navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/2869462.cms
yakin janie inme se koi link aisa nai hai jo apko koi jankari de pae ya patrkarita ka poot nazar aae,ha apki sanso ko zarur tez karne me sahayak hoga aur unka fayda karne me.
in links ko dekhne ke baad aapko yah mahsus hoga ki galti se kahi aapne porn site to nai click kar di…kam se kam apne pita mata aur bahan ke saamne to inhe click nai hi kar paenge
Shukriya.
Ramkant
समरेंद्र
October 7, 2009 at 5:36 pm
रमाकांत जी,
आपकी चिंता वाजिब है। लेकिन ऐसा नहीं है कि जनतंत्र पर नवभारत टाइम्स की पोर्न पत्रकारिता के बारे में नहीं लिखा गया है। उस पर खूब लिखा गया है और बहस भी चलाई गई है। हो सकता है कि उन लेखों पर आपकी नज़र नहीं पड़ी हो। आपकी सहूलियत के लिए हम उनके लिंक्स नीचे पोस्ट कर रहे हैं। हो सके तो एक बार उन पर नज़र डालिएगा। अगर आप उस बहस को आगे बढ़ाना चाहते हैं तो जनतंत्र पर आपका स्वागत है।
http://janatantra.com/2009/07/20/dengerous-web-media/
http://janatantra.com/2009/07/21/why-not-ban-these-site/
http://janatantra.com/2009/07/24/why-ban-on-websites/
http://janatantra.com/2009/07/25/nbt-savita-bhabhi-discourse/
रामकांत
October 8, 2009 at 1:54 pm
प्रिय संमरेंद्र जी,
आपका शुक्रिया निष्पक्ष बने रहने के लिए।एक स्वस्थ लेख काफी प्रभाव छोड़ता है जनमानस पर और जाहिर है उसकी भाषा भी ठोक बजा कर लिखी गई हो तो फिर कहना ही क्या?पिछली बार मैं भी कह नहीं पाया था पर विचारों पर टिप्पणी देने से लेख या साईट में निखार देखने के लिए मिलता ही है…भविष्य के लिए आपको शुभकामनाएं।
रामकांत
सुशांत झा
October 5, 2009 at 7:15 pm
मुझे ये खबर पाकिस्तानी अखबार डेली मेल की हूबहू कापी लगती है जिसमें उसने लिखा था कि भारत ने जो बीएसएफ में महिलाओं की नियुक्तियां की है वो दरअसल पेशेवर वेश्याएं हैं जिन्हे सरहद पर तैनात किया गया है। अब लगता है कि पाकिस्तान के अखबार भी सर्कुलेशन कैंसर से ही ग्रसित होंगे-मंशा उनकी भी शायद इतनी कुत्सित न हो। याद कीजिए हमारे यहां उस खबर पर कैसी प्रतिक्रिया आई थी! लेकिन कामुक भाषा का प्रयोग से सर्कुलेशन बढ़ाने की मंशा भी दरअसल कुत्सित मानसिकता ही है जो दोनों देशों के लोगों की सेक्स पीड़ित मानसिकता को दर्शाती है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण नवभारत टाईम्स और खासकर इसका नेट एडीशन है जो इस तरह के कंटेन्ट बेचकर लाजवाब हिट्स बटोर रहा है। क्या हुआ अगर सविता भाभी गायब हो गई, हमारे पत्रकार तो शब्द को ही सविता भाभी बनाने पर तुले हुए हैं। ये सब पैसे की माया है। लेकिन यहां सवाल संपादक की नैतिकता का जरुर है। ये वही लोग है जिन्होने स्कूलों में यौन शिक्षा देने के नाम पर नाक भौ सिकोंड़ी है और कभी भी इस बारे में बहस नहीं चला पाए। लेकिन मनेजमेंट के दबाव में धड़ल्ले से यौन कंटेंन्ट बेच रहे हैं। ये हमारे देश की अजीब हिप्पोक्रेसी है।
इसका इलाज तबतक नहीं होगा जबतक हमारे देश में लड़के और लड़कियों को एक खास सांचे में रखकर सोचा जाएगा। जबतक दोनों के बीच दूरी रहेगी, ऐसे कंटेन्ट अपना रुप बदल कर जगह-2 अपना करतब दिखाएंगे। कभी-2 तो मुझे लगता है कि देश में अगर लड़के-लड़कियों के बीच इतनी कृतृम दूरी न होती तो तमाम विज्ञापन, समाचार और कंन्टेन्ट को काफी मशक्कत करनी पड़ती। अभी तो वे बल्तकार, छेड़खानी, करबाचौथ, बारिस में भींगना और यहां तक सेना के परेड को भी सेक्स कंटेन्ट बना देते हैं!
अरविंद शेष
October 5, 2009 at 8:45 pm
जिस अखबार के लिए “सुख की खोज” एकमात्र सूत्रवाक्य हो, उसके “सुख” को खोजते हुए चीन की सेना की इन महिलाओं की वेशभूषा तक पहुंच जाना स्वाभाविक लगता है। लेकिन इसे केवल इस रूप में देखना शायद भास्कर की इस दुर्दशा का सरलीकरण होगा। हाल में जिस तरह मीडिया के एक वर्ग की ओर से चीन से युद्ध की आशंका को उन्माद में बदलने की कोशिश हुई, यह उस कोशिश का सबसे अश्लील नतीजा है।
लेकिन जो अखबार महज पूंजी हितों के लिए कुछ भी करने को आमादा हो, उससे आप उम्मीद भी क्या कर सकते हैं। किसी भी एक दिन का अखबार देख कर बताइए कि जनता के पक्ष के लिहाज से इस अखबार के क्या मायने हैं। सिर्फ सेलिब्रेटियों से पृष्ठों को सजाना इस अखबार और इसकी संपादकीय नीति की नियति बन चुकी है। बड़े नाम इसके लिए शोभा की वस्तु है और ज्यादा प्रसार इसका गुण…।
ऐसे में अगर मोर्चा संभालती महिलाओं की हिम्मत के बजाय अगर इसे उसकी “मारक क्षमता” के रूप में उघड़ी टांगें या मिनी स्कर्ट दिखाई देता है, तो इस पर गुस्साइए नहीं, दया कीजिए…।
रंगनाथ सिंह
October 6, 2009 at 12:45 am
ज्नतंत्र ने जो कहा है वही काफी है। भाष्कर के कर्णधार जरा कान दें….
sanjay
October 6, 2009 at 3:56 pm
dainik bhaskar me women bhaskar publish hota hain par eshpar kam karnw wale jayadatar male editor hain.
आयशा
October 6, 2009 at 4:19 pm
यह कितना अजीब है कि एक अख़बार के पत्रकार इस खोज में लगे हैं कि किसी दूसरे देश की नागरिक पुलिस में भर्ती महिलाएं निजी ज़िंदगी में क्या कुछ करती हैं। किस महिला ने बिकिनी में फोटो खिंचवाए और किसने नहीं। दैनिक भास्कर ने इस रिपोर्ट के जरिए खोजी पत्रकारिता को एक नया आयाम दिया है। उसके लिए इसके संपादकों को सार्वजनिक तौर पर जूतों की माला पहना कर “सम्मानित” किया जाना चाहिए।
दरअसल, यह पूरा मामला एक घृणित सोच से जुड़ा है। ऐसे लोग महिलाओं को उपभोग की वस्तु से ऊपर कुछ भी समझने को तैयार नहीं हैं। हम सबको इसका विरोध करना चाहिए। हम महिलाओं का अपमान करने के लिए दैनिक भास्कर को माफी मांगनी चाहिए। साथ ही यह वादा करना चाहिए कि ऐसी बेहूदा हरक़त आगे नहीं होगी।
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चन्दर
October 9, 2009 at 1:54 pm
शर्मनाक! मगर आज अखबारों में और उनके दैनिक परिशिष्टों में भी क्या छप रहा है और कैसी भाषा उपयोग में लायी जा रही है…प्रस्तुत सामग्री में साहित्य, समाज, घर-परिवार या ऐसे ही अन्य विषयों की बजाय अधिकांश जगह ग्लैमर को ही मिलती है। अब तो रविवारी अंक में कुछ खास पढ़ पाने की प्रतीक्षा भी बेवकूफ़ी की बात है। कागज बरबाद करना ही इन लोगों का उद्देश्य बन गया है। ईश्वर इन्हें (चाहे तो) सद्बुद्धि दे!
arun pandey
October 19, 2009 at 1:58 am
दैनिक भास्कार की इस रिपोर्ट में क्या अश्लील है और क्या खराबी है ये समझ के परे है। दरअसल हम सभी यहां हम में मैं शामिल नहीं हूं, एक अजीब से गोल चक्कर में फंस गए हैं। मैं दैनिक भास्कर के बड़े प्रशंसकों में नहीं हूं, पर जिस आर्टिकल का हवाला दिया जा रहा है उसमें कुछ भी गलत नहीं है। कातिल हसीनाएं शब्द में क्या खराबी है। अरे ये तो लिखने की एक विधा है। अगर उसी लेख को सीधे सीधे लिख दिया गया होता तो उसमें नया क्या होता। एक पत्रकार चाहे वो टेलीविजन का हो या प्रिट का, उसके सामने विकट चुनौती आ चुकी है कि वो कितने क्रिएटिव होकर पाठकों के सामने जाता है। दैनिक भास्कार सफल अखबार है। इसके लिए अगर वो खूबसूरती को सहारा बना रहा है तो इसमें बुरा क्या है। दूरदर्शन से ज्यादा सभ्य सुसंस्कृत भाषा और दृश्य भला कहां मिल सकते हैं, फिर भी लोग दूरदर्शन क्यों नहीं देखते उसके न्यूज क्यों नहीं देखते, उसकी डाक्यूमेंट्री क्यों नहीं सुनते। जिन लोगों ने यहां बढ़चकर भास्कर की बुराई की है वो भी दूरदर्शन दस मिनट नहीं देख पाते होंगे। इसलिए अब और न कहलवाइए