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	<title>Comments on: दैनिक भास्कर की &quot;लौंडागीरी&quot;</title>
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	<description>बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे</description>
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		<title>By: arun pandey</title>
		<link>http://jantantra.com/2009/10/05/dainik-bhaskar-objectionable-repor/comment-page-1/#comment-438</link>
		<dc:creator>arun pandey</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 18 Oct 2009 20:28:59 +0000</pubDate>
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		<description>दैनिक भास्कार की इस रिपोर्ट में क्या अश्लील है और क्या खराबी है ये समझ के परे है। दरअसल हम सभी यहां हम में मैं शामिल नहीं हूं, एक अजीब से गोल चक्कर में फंस गए हैं। मैं दैनिक भास्कर के बड़े प्रशंसकों में नहीं हूं, पर जिस आर्टिकल का हवाला दिया जा रहा है उसमें कुछ भी गलत नहीं है। कातिल हसीनाएं शब्द में क्या खराबी है। अरे ये तो लिखने की एक विधा है। अगर उसी लेख को सीधे सीधे लिख दिया गया होता तो उसमें नया क्या होता। एक पत्रकार चाहे वो टेलीविजन का हो या प्रिट का, उसके सामने विकट चुनौती आ चुकी है कि वो कितने क्रिएटिव होकर पाठकों के सामने जाता है। दैनिक भास्कार सफल अखबार है। इसके लिए अगर वो खूबसूरती को सहारा बना रहा है तो इसमें बुरा क्या है। दूरदर्शन से ज्यादा सभ्य सुसंस्कृत भाषा और दृश्य भला कहां मिल सकते हैं, फिर भी लोग दूरदर्शन क्यों नहीं देखते उसके न्यूज क्यों नहीं देखते, उसकी डाक्यूमेंट्री क्यों नहीं सुनते। जिन लोगों ने यहां बढ़चकर भास्कर की बुराई की है वो भी दूरदर्शन दस मिनट नहीं देख पाते होंगे। इसलिए अब और न कहलवाइए</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>दैनिक भास्कार की इस रिपोर्ट में क्या अश्लील है और क्या खराबी है ये समझ के परे है। दरअसल हम सभी यहां हम में मैं शामिल नहीं हूं, एक अजीब से गोल चक्कर में फंस गए हैं। मैं दैनिक भास्कर के बड़े प्रशंसकों में नहीं हूं, पर जिस आर्टिकल का हवाला दिया जा रहा है उसमें कुछ भी गलत नहीं है। कातिल हसीनाएं शब्द में क्या खराबी है। अरे ये तो लिखने की एक विधा है। अगर उसी लेख को सीधे सीधे लिख दिया गया होता तो उसमें नया क्या होता। एक पत्रकार चाहे वो टेलीविजन का हो या प्रिट का, उसके सामने विकट चुनौती आ चुकी है कि वो कितने क्रिएटिव होकर पाठकों के सामने जाता है। दैनिक भास्कार सफल अखबार है। इसके लिए अगर वो खूबसूरती को सहारा बना रहा है तो इसमें बुरा क्या है। दूरदर्शन से ज्यादा सभ्य सुसंस्कृत भाषा और दृश्य भला कहां मिल सकते हैं, फिर भी लोग दूरदर्शन क्यों नहीं देखते उसके न्यूज क्यों नहीं देखते, उसकी डाक्यूमेंट्री क्यों नहीं सुनते। जिन लोगों ने यहां बढ़चकर भास्कर की बुराई की है वो भी दूरदर्शन दस मिनट नहीं देख पाते होंगे। इसलिए अब और न कहलवाइए</p>
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		<title>By: चन्दर</title>
		<link>http://jantantra.com/2009/10/05/dainik-bhaskar-objectionable-repor/comment-page-1/#comment-437</link>
		<dc:creator>चन्दर</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 09 Oct 2009 08:24:07 +0000</pubDate>
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		<description>शर्मनाक! मगर आज अखबारों में और उनके दैनिक परिशिष्टों में भी क्या छप रहा है और कैसी भाषा उपयोग में लायी जा रही है...प्रस्तुत सामग्री में साहित्य, समाज, घर-परिवार या ऐसे ही अन्य विषयों की बजाय अधिकांश जगह ग्लैमर को ही मिलती है। अब तो रविवारी अंक में कुछ खास पढ़ पाने की प्रतीक्षा भी बेवकूफ़ी की बात है। कागज बरबाद करना ही इन लोगों का उद्देश्य बन गया है। ईश्वर इन्हें (चाहे तो) सद्बुद्धि दे!</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>शर्मनाक! मगर आज अखबारों में और उनके दैनिक परिशिष्टों में भी क्या छप रहा है और कैसी भाषा उपयोग में लायी जा रही है&#8230;प्रस्तुत सामग्री में साहित्य, समाज, घर-परिवार या ऐसे ही अन्य विषयों की बजाय अधिकांश जगह ग्लैमर को ही मिलती है। अब तो रविवारी अंक में कुछ खास पढ़ पाने की प्रतीक्षा भी बेवकूफ़ी की बात है। कागज बरबाद करना ही इन लोगों का उद्देश्य बन गया है। ईश्वर इन्हें (चाहे तो) सद्बुद्धि दे!</p>
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		<title>By: रामकांत</title>
		<link>http://jantantra.com/2009/10/05/dainik-bhaskar-objectionable-repor/comment-page-1/#comment-436</link>
		<dc:creator>रामकांत</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 08 Oct 2009 08:24:49 +0000</pubDate>
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		<description>प्रिय संमरेंद्र जी,
आपका शुक्रिया निष्पक्ष बने रहने के लिए।एक स्वस्थ लेख काफी प्रभाव छोड़ता है जनमानस पर और जाहिर है उसकी भाषा भी ठोक बजा कर लिखी गई हो तो फिर कहना ही क्या?पिछली बार मैं भी कह नहीं पाया था पर विचारों पर टिप्पणी देने से लेख या साईट में निखार देखने के लिए मिलता ही है...भविष्य के लिए आपको शुभकामनाएं।

रामकांत</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>प्रिय संमरेंद्र जी,<br />
आपका शुक्रिया निष्पक्ष बने रहने के लिए।एक स्वस्थ लेख काफी प्रभाव छोड़ता है जनमानस पर और जाहिर है उसकी भाषा भी ठोक बजा कर लिखी गई हो तो फिर कहना ही क्या?पिछली बार मैं भी कह नहीं पाया था पर विचारों पर टिप्पणी देने से लेख या साईट में निखार देखने के लिए मिलता ही है&#8230;भविष्य के लिए आपको शुभकामनाएं।</p>
<p>रामकांत</p>
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		<title>By: समरेंद्र</title>
		<link>http://jantantra.com/2009/10/05/dainik-bhaskar-objectionable-repor/comment-page-1/#comment-435</link>
		<dc:creator>समरेंद्र</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 07 Oct 2009 12:06:52 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://janatantra.com/?p=2990#comment-435</guid>
		<description>रमाकांत जी,

आपकी चिंता वाजिब है। लेकिन ऐसा नहीं है कि जनतंत्र पर नवभारत टाइम्स की पोर्न पत्रकारिता के बारे में नहीं लिखा गया है। उस पर खूब लिखा गया है और बहस भी चलाई गई है। हो सकता है कि उन लेखों पर आपकी नज़र नहीं पड़ी हो। आपकी सहूलियत के लिए हम उनके लिंक्स नीचे पोस्ट कर रहे हैं। हो सके तो एक बार उन पर नज़र डालिएगा। अगर आप उस बहस को आगे बढ़ाना चाहते हैं तो जनतंत्र पर आपका स्वागत है।

http://janatantra.com/2009/07/20/dengerous-web-media/
http://janatantra.com/2009/07/21/why-not-ban-these-site/
http://janatantra.com/2009/07/24/why-ban-on-websites/
http://janatantra.com/2009/07/25/nbt-savita-bhabhi-discourse/</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>रमाकांत जी,</p>
<p>आपकी चिंता वाजिब है। लेकिन ऐसा नहीं है कि जनतंत्र पर नवभारत टाइम्स की पोर्न पत्रकारिता के बारे में नहीं लिखा गया है। उस पर खूब लिखा गया है और बहस भी चलाई गई है। हो सकता है कि उन लेखों पर आपकी नज़र नहीं पड़ी हो। आपकी सहूलियत के लिए हम उनके लिंक्स नीचे पोस्ट कर रहे हैं। हो सके तो एक बार उन पर नज़र डालिएगा। अगर आप उस बहस को आगे बढ़ाना चाहते हैं तो जनतंत्र पर आपका स्वागत है।</p>
<p><a href="http://janatantra.com/2009/07/20/dengerous-web-media/" rel="nofollow">http://janatantra.com/2009/07/20/dengerous-web-media/</a><br />
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		<title>By: &#8220;दैनिक भास्कर पर दया कीजिए&#8221; : Janatantra.com</title>
		<link>http://jantantra.com/2009/10/05/dainik-bhaskar-objectionable-repor/comment-page-1/#comment-434</link>
		<dc:creator>&#8220;दैनिक भास्कर पर दया कीजिए&#8221; : Janatantra.com</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 06 Oct 2009 14:03:49 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://janatantra.com/?p=2990#comment-434</guid>
		<description>[...] दैनिक भास्कर की ग़लती पर पाठकों ने बहुत तीखी प्रतिक्रिया दी है। बीते 24 घंटों में 500 से अधिक पाठक इसे पढ़ चुके हैं। पढ़ने वालों की संख्या की तुलना में प्रतिक्रियाएं कम आयी हैं लेकिन जो भी आयी हैं उन्हें गंभीरता से लिया जाना चाहिए। यह सही है कि पोर्न पढ़ने वालों की संख्या बहुत ज़्यादा होती है। यह भी सही है कि अश्लील साहित्य के पाठक भी बहुत हैं। लेकिन समाचार पत्रों को ही अश्लील बना दिया जाए और आधी आबादी को उपभोग की वस्तु यह कहीं से भी सही नहीं है। इसका पुरजोर विरोध होना चाहिए। बहुत से पाठकों ने हमें फोन करके यह भी कहा कि अगर कोई गाली तो क्या आप भी उसे गाली दीजिएगा। उन्हें एतराज हमारे शीर्षक पर था। “लौंडागीरी” शब्द के इस्तेमाल पर था। उनकी बात सही है। कोई बड़ा अख़बार, कोई बड़ा मीडिया संस्थान लाख नंगई करे हमें शालीन बने रहना चाहिए। आगे से हम कोशिश करेंगे कि बहुत गुस्सा आने पर भी अपनी भाषा संतुलित रखें। बहरहाल, दैनिक भास्कर की ग़लती पर आई टिप्पणियों में से चंद पर आप भी नज़र डालें। - मॉडरेटर  सुशांत झा [...]</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>[...] दैनिक भास्कर की ग़लती पर पाठकों ने बहुत तीखी प्रतिक्रिया दी है। बीते 24 घंटों में 500 से अधिक पाठक इसे पढ़ चुके हैं। पढ़ने वालों की संख्या की तुलना में प्रतिक्रियाएं कम आयी हैं लेकिन जो भी आयी हैं उन्हें गंभीरता से लिया जाना चाहिए। यह सही है कि पोर्न पढ़ने वालों की संख्या बहुत ज़्यादा होती है। यह भी सही है कि अश्लील साहित्य के पाठक भी बहुत हैं। लेकिन समाचार पत्रों को ही अश्लील बना दिया जाए और आधी आबादी को उपभोग की वस्तु यह कहीं से भी सही नहीं है। इसका पुरजोर विरोध होना चाहिए। बहुत से पाठकों ने हमें फोन करके यह भी कहा कि अगर कोई गाली तो क्या आप भी उसे गाली दीजिएगा। उन्हें एतराज हमारे शीर्षक पर था। “लौंडागीरी” शब्द के इस्तेमाल पर था। उनकी बात सही है। कोई बड़ा अख़बार, कोई बड़ा मीडिया संस्थान लाख नंगई करे हमें शालीन बने रहना चाहिए। आगे से हम कोशिश करेंगे कि बहुत गुस्सा आने पर भी अपनी भाषा संतुलित रखें। बहरहाल, दैनिक भास्कर की ग़लती पर आई टिप्पणियों में से चंद पर आप भी नज़र डालें। &#8211; मॉडरेटर  सुशांत झा [...]</p>
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	<item>
		<title>By: आयशा</title>
		<link>http://jantantra.com/2009/10/05/dainik-bhaskar-objectionable-repor/comment-page-1/#comment-433</link>
		<dc:creator>आयशा</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 06 Oct 2009 10:49:37 +0000</pubDate>
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		<description>यह कितना अजीब है कि एक अख़बार के पत्रकार इस खोज में लगे हैं कि किसी दूसरे देश की नागरिक पुलिस में भर्ती महिलाएं निजी ज़िंदगी में क्या कुछ करती हैं। किस महिला ने बिकिनी में फोटो खिंचवाए और किसने नहीं। दैनिक भास्कर ने इस रिपोर्ट के जरिए खोजी पत्रकारिता को एक नया आयाम दिया है। उसके लिए इसके संपादकों को सार्वजनिक तौर पर जूतों की माला पहना कर &quot;सम्मानित&quot; किया जाना चाहिए।

दरअसल, यह पूरा मामला एक घृणित सोच से जुड़ा है। ऐसे लोग महिलाओं को उपभोग की वस्तु से ऊपर कुछ भी समझने को तैयार नहीं हैं। हम सबको इसका विरोध करना चाहिए। हम महिलाओं का अपमान करने के लिए दैनिक भास्कर को माफी मांगनी चाहिए। साथ ही यह वादा करना चाहिए कि ऐसी बेहूदा हरक़त आगे नहीं होगी।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>यह कितना अजीब है कि एक अख़बार के पत्रकार इस खोज में लगे हैं कि किसी दूसरे देश की नागरिक पुलिस में भर्ती महिलाएं निजी ज़िंदगी में क्या कुछ करती हैं। किस महिला ने बिकिनी में फोटो खिंचवाए और किसने नहीं। दैनिक भास्कर ने इस रिपोर्ट के जरिए खोजी पत्रकारिता को एक नया आयाम दिया है। उसके लिए इसके संपादकों को सार्वजनिक तौर पर जूतों की माला पहना कर &#8220;सम्मानित&#8221; किया जाना चाहिए।</p>
<p>दरअसल, यह पूरा मामला एक घृणित सोच से जुड़ा है। ऐसे लोग महिलाओं को उपभोग की वस्तु से ऊपर कुछ भी समझने को तैयार नहीं हैं। हम सबको इसका विरोध करना चाहिए। हम महिलाओं का अपमान करने के लिए दैनिक भास्कर को माफी मांगनी चाहिए। साथ ही यह वादा करना चाहिए कि ऐसी बेहूदा हरक़त आगे नहीं होगी।</p>
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		<title>By: sanjay</title>
		<link>http://jantantra.com/2009/10/05/dainik-bhaskar-objectionable-repor/comment-page-1/#comment-432</link>
		<dc:creator>sanjay</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 06 Oct 2009 10:26:26 +0000</pubDate>
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		<description>dainik bhaskar me women bhaskar publish hota hain par eshpar kam karnw wale jayadatar male editor hain.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>dainik bhaskar me women bhaskar publish hota hain par eshpar kam karnw wale jayadatar male editor hain.</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: रंगनाथ सिंह</title>
		<link>http://jantantra.com/2009/10/05/dainik-bhaskar-objectionable-repor/comment-page-1/#comment-431</link>
		<dc:creator>रंगनाथ सिंह</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 05 Oct 2009 19:15:35 +0000</pubDate>
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		<description>ज्नतंत्र ने जो कहा है वही काफी है। भाष्कर के कर्णधार जरा कान दें....</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>ज्नतंत्र ने जो कहा है वही काफी है। भाष्कर के कर्णधार जरा कान दें&#8230;.</p>
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	<item>
		<title>By: अरविंद शेष</title>
		<link>http://jantantra.com/2009/10/05/dainik-bhaskar-objectionable-repor/comment-page-1/#comment-430</link>
		<dc:creator>अरविंद शेष</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 05 Oct 2009 15:15:01 +0000</pubDate>
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		<description>जिस अखबार के लिए &quot;सुख की खोज&quot; एकमात्र सूत्रवाक्य हो, उसके &quot;सुख&quot; को खोजते हुए चीन की सेना की इन महिलाओं की वेशभूषा तक पहुंच जाना स्वाभाविक लगता है। लेकिन इसे केवल इस रूप में देखना शायद भास्कर की इस दुर्दशा का सरलीकरण होगा। हाल में जिस तरह मीडिया के एक वर्ग की ओर से चीन से युद्ध की आशंका को उन्माद में बदलने की कोशिश हुई, यह उस कोशिश का सबसे अश्लील नतीजा है।

लेकिन जो अखबार महज पूंजी हितों के लिए कुछ भी करने को आमादा हो, उससे आप उम्मीद भी क्या कर सकते हैं। किसी भी एक दिन का अखबार देख कर बताइए कि जनता के पक्ष के लिहाज से इस अखबार के क्या मायने हैं। सिर्फ सेलिब्रेटियों से पृष्ठों को सजाना इस अखबार और इसकी संपादकीय नीति की नियति बन चुकी है। बड़े नाम इसके लिए शोभा की वस्तु है और ज्यादा प्रसार इसका गुण...।

ऐसे में अगर मोर्चा संभालती महिलाओं की हिम्मत के बजाय अगर इसे उसकी &quot;मारक क्षमता&quot; के रूप में उघड़ी टांगें या मिनी स्कर्ट दिखाई देता है, तो इस पर गुस्साइए नहीं, दया कीजिए...।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>जिस अखबार के लिए &#8220;सुख की खोज&#8221; एकमात्र सूत्रवाक्य हो, उसके &#8220;सुख&#8221; को खोजते हुए चीन की सेना की इन महिलाओं की वेशभूषा तक पहुंच जाना स्वाभाविक लगता है। लेकिन इसे केवल इस रूप में देखना शायद भास्कर की इस दुर्दशा का सरलीकरण होगा। हाल में जिस तरह मीडिया के एक वर्ग की ओर से चीन से युद्ध की आशंका को उन्माद में बदलने की कोशिश हुई, यह उस कोशिश का सबसे अश्लील नतीजा है।</p>
<p>लेकिन जो अखबार महज पूंजी हितों के लिए कुछ भी करने को आमादा हो, उससे आप उम्मीद भी क्या कर सकते हैं। किसी भी एक दिन का अखबार देख कर बताइए कि जनता के पक्ष के लिहाज से इस अखबार के क्या मायने हैं। सिर्फ सेलिब्रेटियों से पृष्ठों को सजाना इस अखबार और इसकी संपादकीय नीति की नियति बन चुकी है। बड़े नाम इसके लिए शोभा की वस्तु है और ज्यादा प्रसार इसका गुण&#8230;।</p>
<p>ऐसे में अगर मोर्चा संभालती महिलाओं की हिम्मत के बजाय अगर इसे उसकी &#8220;मारक क्षमता&#8221; के रूप में उघड़ी टांगें या मिनी स्कर्ट दिखाई देता है, तो इस पर गुस्साइए नहीं, दया कीजिए&#8230;।</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: सुशांत झा</title>
		<link>http://jantantra.com/2009/10/05/dainik-bhaskar-objectionable-repor/comment-page-1/#comment-429</link>
		<dc:creator>सुशांत झा</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 05 Oct 2009 13:45:20 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://janatantra.com/?p=2990#comment-429</guid>
		<description>मुझे ये खबर पाकिस्तानी अखबार डेली मेल की हूबहू कापी लगती है जिसमें उसने लिखा था कि भारत ने जो बीएसएफ में महिलाओं की नियुक्तियां की है वो दरअसल पेशेवर वेश्याएं हैं जिन्हे सरहद पर तैनात किया गया है। अब लगता है कि पाकिस्तान के अखबार भी सर्कुलेशन कैंसर से ही ग्रसित होंगे-मंशा उनकी भी शायद इतनी कुत्सित न हो। याद कीजिए हमारे यहां उस खबर पर कैसी प्रतिक्रिया आई थी! लेकिन कामुक भाषा का प्रयोग से सर्कुलेशन बढ़ाने की मंशा भी दरअसल कुत्सित मानसिकता ही है जो दोनों देशों के लोगों की सेक्स पीड़ित मानसिकता को दर्शाती है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण नवभारत टाईम्स और खासकर इसका नेट एडीशन है जो इस तरह के कंटेन्ट बेचकर लाजवाब हिट्स बटोर रहा है। क्या हुआ अगर सविता भाभी गायब हो गई, हमारे पत्रकार तो शब्द को ही सविता भाभी बनाने पर तुले हुए हैं। ये सब पैसे की माया है। लेकिन यहां सवाल संपादक की नैतिकता का जरुर है। ये वही लोग है जिन्होने स्कूलों में यौन शिक्षा देने के नाम पर नाक भौ सिकोंड़ी है और कभी भी इस बारे में बहस नहीं चला पाए। लेकिन मनेजमेंट के दबाव में धड़ल्ले से यौन कंटेंन्ट बेच रहे हैं। ये हमारे देश की अजीब हिप्पोक्रेसी है।

इसका इलाज तबतक नहीं होगा जबतक हमारे देश में लड़के और लड़कियों को एक खास सांचे में रखकर सोचा जाएगा। जबतक दोनों के बीच दूरी रहेगी, ऐसे कंटेन्ट अपना रुप बदल कर जगह-2 अपना करतब दिखाएंगे। कभी-2 तो मुझे लगता है कि देश में अगर लड़के-लड़कियों के बीच इतनी कृतृम दूरी न होती तो तमाम विज्ञापन, समाचार और कंन्टेन्ट को काफी मशक्कत करनी पड़ती। अभी तो वे बल्तकार, छेड़खानी, करबाचौथ, बारिस में भींगना और यहां तक सेना के परेड को भी सेक्स कंटेन्ट बना देते हैं!</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>मुझे ये खबर पाकिस्तानी अखबार डेली मेल की हूबहू कापी लगती है जिसमें उसने लिखा था कि भारत ने जो बीएसएफ में महिलाओं की नियुक्तियां की है वो दरअसल पेशेवर वेश्याएं हैं जिन्हे सरहद पर तैनात किया गया है। अब लगता है कि पाकिस्तान के अखबार भी सर्कुलेशन कैंसर से ही ग्रसित होंगे-मंशा उनकी भी शायद इतनी कुत्सित न हो। याद कीजिए हमारे यहां उस खबर पर कैसी प्रतिक्रिया आई थी! लेकिन कामुक भाषा का प्रयोग से सर्कुलेशन बढ़ाने की मंशा भी दरअसल कुत्सित मानसिकता ही है जो दोनों देशों के लोगों की सेक्स पीड़ित मानसिकता को दर्शाती है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण नवभारत टाईम्स और खासकर इसका नेट एडीशन है जो इस तरह के कंटेन्ट बेचकर लाजवाब हिट्स बटोर रहा है। क्या हुआ अगर सविता भाभी गायब हो गई, हमारे पत्रकार तो शब्द को ही सविता भाभी बनाने पर तुले हुए हैं। ये सब पैसे की माया है। लेकिन यहां सवाल संपादक की नैतिकता का जरुर है। ये वही लोग है जिन्होने स्कूलों में यौन शिक्षा देने के नाम पर नाक भौ सिकोंड़ी है और कभी भी इस बारे में बहस नहीं चला पाए। लेकिन मनेजमेंट के दबाव में धड़ल्ले से यौन कंटेंन्ट बेच रहे हैं। ये हमारे देश की अजीब हिप्पोक्रेसी है।</p>
<p>इसका इलाज तबतक नहीं होगा जबतक हमारे देश में लड़के और लड़कियों को एक खास सांचे में रखकर सोचा जाएगा। जबतक दोनों के बीच दूरी रहेगी, ऐसे कंटेन्ट अपना रुप बदल कर जगह-2 अपना करतब दिखाएंगे। कभी-2 तो मुझे लगता है कि देश में अगर लड़के-लड़कियों के बीच इतनी कृतृम दूरी न होती तो तमाम विज्ञापन, समाचार और कंन्टेन्ट को काफी मशक्कत करनी पड़ती। अभी तो वे बल्तकार, छेड़खानी, करबाचौथ, बारिस में भींगना और यहां तक सेना के परेड को भी सेक्स कंटेन्ट बना देते हैं!</p>
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