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"दैनिक भास्कर पर दया कीजिए"

दैनिक भास्कर की ग़लती पर पाठकों ने बहुत तीखी प्रतिक्रिया दी है। बीते 24 घंटों में 500 से अधिक  लोग इसे पढ़ चुके हैं। पढ़ने वालों की संख्या की तुलना में प्रतिक्रियाएं कम आयी हैं लेकिन जो भी आयी हैं उन्हें गंभीरता से लिया जाना चाहिए। यह सही है कि पोर्न पढ़ने वालों की संख्या बहुत ज़्यादा होती है। यह भी सही है कि अश्लील साहित्य के पाठक भी बहुत हैं। लेकिन समाचार पत्रों को ही अश्लील बना दिया जाए और आधी आबादी को उपभोग की वस्तु यह कहीं से भी सही नहीं है। इसका पुरजोर विरोध होना चाहिए। बहुत से पाठकों ने हमें फोन करके यह भी कहा कि अगर कोई गाली तो क्या आप भी उसे गाली दीजिएगा। उन्हें एतराज हमारे शीर्षक पर था। “लौंडागीरी” शब्द के इस्तेमाल पर था। उनकी बात सही है। कोई बड़ा अख़बार, कोई बड़ा मीडिया संस्थान लाख नंगई करे हमें शालीन बने रहना चाहिए। आगे से हम कोशिश करेंगे कि बहुत गुस्सा आने पर भी अपनी भाषा संतुलित रखें। बहरहाल, दैनिक भास्कर की ग़लती पर आई टिप्पणियों में से चंद पर आप भी नज़र डालें। - मॉडरेटर 

सुशांत झा

मुझे ये खबर पाकिस्तानी अखबार डेली मेल की हू-ब-हू कापी लगती है, जिसमें उसने लिखा था कि भारत ने जो बीएसएफ में महिलाओं की नियुक्तियां की है वो दरअसल पेशेवर वेश्याएं हैं जिन्हे सरहद पर तैनात किया गया है। अब लगता है कि पाकिस्तान के अखबार भी सर्कुलेशन कैंसर से ही ग्रसित होंगे-मंशा उनकी भी शायद इतनी कुत्सित न हो। याद कीजिए हमारे यहां उस खबर पर कैसी प्रतिक्रिया आई थी! लेकिन कामुक भाषा का प्रयोग से सर्कुलेशन बढ़ाने की मंशा भी दरअसल कुत्सित मानसिकता ही है जो दोनों देशों के लोगों की सेक्स पीड़ित मानसिकता को दर्शाती है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण नवभारत टाईम्स और खासकर इसका नेट एडीशन है। जो इस तरह के कंटेन्ट बेचकर लाजवाब हिट्स बटोर रहा है। क्या हुआ अगर सविता भाभी गायब हो गई, हमारे पत्रकार तो शब्द को ही सविता भाभी बनाने पर तुले हुए हैं।

ये सब पैसे की माया है। लेकिन यहां सवाल संपादक की नैतिकता का जरुर है। ये वही लोग है जिन्होंने स्कूलों में यौन शिक्षा देने के नाम पर नाक भौ सिकोंड़ी है। और कभी भी इस बारे में बहस नहीं चला पाए। लेकिन मैनेजमेंट के दबाव में धड़ल्ले से यौन कंटेंन्ट बेच रहे हैं। ये हमारे देश की अजीब हिप्पोक्रेसी है।

इसका इलाज तब तक नहीं होगा जब तक हमारे देश में लड़के और लड़कियों को एक खास सांचे में रखकर सोचा जाएगा। जब तक दोनों के बीच दूरी रहेगी, ऐसे कंटेन्ट अपना रुप बदल कर जगह-2 अपना करतब दिखाएंगे। कभी-2 तो मुझे लगता है कि देश में अगर लड़के-लड़कियों के बीच इतनी कृतृम दूरी न होती तो तमाम विज्ञापन, समाचार और कंन्टेन्ट को काफी मशक्कत करनी पड़ती। अभी तो वे बलात्कार, छेड़खानी, करवा चौथ, बारिश में भींगना और यहां तक सेना के परेड को भी सेक्स कंटेन्ट बना देते हैं।

अरविंद शेष

जिस अखबार के लिए “सुख की खोज” एकमात्र सूत्रवाक्य हो, उसके “सुख” को खोजते हुए चीन की सेना की इन महिलाओं की वेशभूषा तक पहुंच जाना स्वाभाविक लगता है। लेकिन इसे केवल इस रूप में देखना शायद भास्कर की इस दुर्दशा का सरलीकरण होगा। हाल में जिस तरह मीडिया के एक वर्ग की ओर से चीन से युद्ध की आशंका को उन्माद में बदलने की कोशिश हुई, यह उस कोशिश का सबसे अश्लील नतीजा है।

लेकिन जो अखबार महज पूंजी हितों के लिए कुछ भी करने को आमादा हो, उससे आप उम्मीद भी क्या कर सकते हैं। किसी भी एक दिन का अखबार देख कर बताइए कि जनता के पक्ष के लिहाज से इस अखबार के क्या मायने हैं। सिर्फ सेलिब्रेटियों से पृष्ठों को सजाना इस अखबार और इसकी संपादकीय नीति की नियति बन चुकी है। बड़े नाम इसके लिए शोभा की वस्तु है और ज्यादा प्रसार इसका गुण…।

ऐसे में अगर मोर्चा संभालती महिलाओं की हिम्मत के बजाय अगर इसे उसकी “मारक क्षमता” के रूप में उघड़ी टांगें या मिनी स्कर्ट दिखाई देता है, तो इस पर गुस्साइए नहीं, दया कीजिए…

आयशा

यह कितना अजीब है कि एक अख़बार के पत्रकार इस खोज में लगे हैं कि किसी दूसरे देश की नागरिक पुलिस में भर्ती महिलाएं निजी ज़िंदगी में क्या कुछ करती हैं। किस महिला ने बिकिनी में फोटो खिंचवाए और किसने नहीं। दैनिक भास्कर ने इस रिपोर्ट के जरिए खोजी पत्रकारिता को एक नया आयाम दिया है। उसके लिए इसके संपादकों को सार्वजनिक तौर पर जूतों की माला पहना कर “सम्मानित” किया जाना चाहिए।

दरअसल, यह पूरा मामला एक घृणित सोच से जुड़ा है। ऐसे लोग महिलाओं को उपभोग की वस्तु से ऊपर कुछ भी समझने को तैयार नहीं हैं। हम सबको इसका विरोध करना चाहिए। हम महिलाओं का अपमान करने के लिए दैनिक भास्कर को माफी मांगनी चाहिए। साथ ही यह वादा करना चाहिए कि ऐसी बेहूदा हरक़त आगे नहीं होगी

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One Response to "दैनिक भास्कर पर दया कीजिए"

  1. सुधीर शर्मा Reply

    October 6, 2009 at 11:22 pm

    दया के पात्र ये अख़बार नहीं हैं। दया के पात्र हम जैसे पाठक हैं। जिनके पास कोई सार्थक विकल्प ही नहीं। हमारा समाज कितने बुरे दौर से गुजर रहा है कि हम एक भी संवेदनशील और सकारात्मक काम में लगे अख़बार का न तो सृजन कर सके, न ज़िंदा रख सके और न ही बर्दाश्त कर सके। कितनी दयनीय स्थिति है हम पाठकों की।

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