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	<title>Comments on: बड़ी ग़लतियों पर भी माफ़ी नहीं मांगते हिंदी अख़बार</title>
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	<description>बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे</description>
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		<title>By: संजय कुमार सिंह</title>
		<link>http://jantantra.com/2009/10/07/hindi-newspaper-spreadingconfusion/comment-page-1/#comment-1665</link>
		<dc:creator>संजय कुमार सिंह</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 07 Oct 2009 13:40:46 +0000</pubDate>
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		<description>हिन्दी के अखबारों में गलत खबरें छपने के कई कारण हैं। इनमें सबसे बड़ा और प्रमुख कारण है अक्षम और अयोग्य लोगों के कंधों पर रिपोर्टिंग की भारी जिम्मेदारी लाद देना और फिर उन्हें साधन-सुविधाएं तो दूर, सामान्य वेतन (न्यूनतम मजदूरी) भी न दिया जाना। अब चूंकि पैसे मिलते ही नहीं हैं या न के बराबर मिलते हैं इसलिए नौकरी जाने का कोई खतरा नहीं रहता है। दूसरी ओर, कार्रवाई करने वाला भी सारी स्थितियों को जानता-समझता है सो क्या करे।

ऐसे में गलती करने वाले की हिम्मत बढ़ती जाती है और वह बेशर्म भी हो जाता है। अंग्रेजी अखबारों के मुकाबले हिन्दी के अखबारों में जोखिम भी खूब लिए जाते हैं। दूसरी ओर एक्सपर्टीज का ख्याल रखने का रिवाज नहीं के बराबर है। हिन्दी अखबारों में रिपोर्टिंग असाइनमेंट कई बार हंस चुगेगा दाना-तिनका कौवा मोती खाएगा जैसा होता है। ऐसे में जिस रिपोर्टिंग में जिसे भेजा जाना चाहिए उसे नहीं भेजा जाएगा तो भी गलतियां होंगी। इसका एक कारण यह भी है कि हिन्दी के संपादकों के पास देने के लिए कुछ होता है नहीं सो वे चमचों को खुश करने के लिए विरोधियों को पीड़ित, दुखी और कुंठित करके भी काम चलाते हैं।

इसके अलावा गलतियों का एक और कारण है अनुवाद। ज्यादातर हिन्दी अखबारों के रिपोर्टर अनुवाद से भागते हैं, घबड़ाते हैं या उनका हाथ अनुवाद या यूं कहिए अंग्रेजी में ही तंग होता है। बिना पैसे के काम करने वाले कई रिपोर्टर अंग्रेजी की कॉपी को वैसे ही समझते हैं जैसे अंधा हाथी को। ऐसे में मूल रूप में अंग्रेजी में आई खबर का एजेंसी का अनुवाद बहुत मददगार होता है। पर अगर एजेंसी में किसी साथी ने गलत अनुवाद कर दिया है तो सभी अखबारों में गलत ही छपेगा। और ऐसा अक्सर होता है। अब चूंकि गलती सभी ने की है तो माफी कोई एक क्यों मांगे।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>हिन्दी के अखबारों में गलत खबरें छपने के कई कारण हैं। इनमें सबसे बड़ा और प्रमुख कारण है अक्षम और अयोग्य लोगों के कंधों पर रिपोर्टिंग की भारी जिम्मेदारी लाद देना और फिर उन्हें साधन-सुविधाएं तो दूर, सामान्य वेतन (न्यूनतम मजदूरी) भी न दिया जाना। अब चूंकि पैसे मिलते ही नहीं हैं या न के बराबर मिलते हैं इसलिए नौकरी जाने का कोई खतरा नहीं रहता है। दूसरी ओर, कार्रवाई करने वाला भी सारी स्थितियों को जानता-समझता है सो क्या करे।</p>
<p>ऐसे में गलती करने वाले की हिम्मत बढ़ती जाती है और वह बेशर्म भी हो जाता है। अंग्रेजी अखबारों के मुकाबले हिन्दी के अखबारों में जोखिम भी खूब लिए जाते हैं। दूसरी ओर एक्सपर्टीज का ख्याल रखने का रिवाज नहीं के बराबर है। हिन्दी अखबारों में रिपोर्टिंग असाइनमेंट कई बार हंस चुगेगा दाना-तिनका कौवा मोती खाएगा जैसा होता है। ऐसे में जिस रिपोर्टिंग में जिसे भेजा जाना चाहिए उसे नहीं भेजा जाएगा तो भी गलतियां होंगी। इसका एक कारण यह भी है कि हिन्दी के संपादकों के पास देने के लिए कुछ होता है नहीं सो वे चमचों को खुश करने के लिए विरोधियों को पीड़ित, दुखी और कुंठित करके भी काम चलाते हैं।</p>
<p>इसके अलावा गलतियों का एक और कारण है अनुवाद। ज्यादातर हिन्दी अखबारों के रिपोर्टर अनुवाद से भागते हैं, घबड़ाते हैं या उनका हाथ अनुवाद या यूं कहिए अंग्रेजी में ही तंग होता है। बिना पैसे के काम करने वाले कई रिपोर्टर अंग्रेजी की कॉपी को वैसे ही समझते हैं जैसे अंधा हाथी को। ऐसे में मूल रूप में अंग्रेजी में आई खबर का एजेंसी का अनुवाद बहुत मददगार होता है। पर अगर एजेंसी में किसी साथी ने गलत अनुवाद कर दिया है तो सभी अखबारों में गलत ही छपेगा। और ऐसा अक्सर होता है। अब चूंकि गलती सभी ने की है तो माफी कोई एक क्यों मांगे।</p>
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		<title>By: ramashankar sharma</title>
		<link>http://jantantra.com/2009/10/07/hindi-newspaper-spreadingconfusion/comment-page-1/#comment-1664</link>
		<dc:creator>ramashankar sharma</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 07 Oct 2009 02:28:46 +0000</pubDate>
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		<description>आज की पत्रकारिता की हकीकत यह है कि कोई काम नहीं करना चाहता है. ज्यादातर रिपोर्टर अपने निर्धारित अड्डों से बाहर निकलना नहीं चाहते सभी एक जगह बैठ कर सेटिंग में व्यस्त रहते हैं. रही बात फील्ड की तो जो न्युकमर होते हैं उन्हें दौड़ा दिया जाता है. वो बेचारे जो देखते समझते हैं उसे बता देते है. जिन्हें ये तथाकथित सीनियर रिपोर्टर सजा देते है. यह खबर सभी रिपोर्टरों को एक साथ मिलती है क्योंकि अखबार का दबाव होता है और मिसिंग पर सुनना पड़ता है इसलिये रिपोर्टरों में गैरलिखित समझौता डेवलप हो गया है कि कोई मिसिंग नहीं होगी इससे खबर गलत या सही सभी अखबारों (हिन्दी के)दिख जाती है. ज्यादातर यह मामले क्राइम बीट पर ही मिलेगे.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आज की पत्रकारिता की हकीकत यह है कि कोई काम नहीं करना चाहता है. ज्यादातर रिपोर्टर अपने निर्धारित अड्डों से बाहर निकलना नहीं चाहते सभी एक जगह बैठ कर सेटिंग में व्यस्त रहते हैं. रही बात फील्ड की तो जो न्युकमर होते हैं उन्हें दौड़ा दिया जाता है. वो बेचारे जो देखते समझते हैं उसे बता देते है. जिन्हें ये तथाकथित सीनियर रिपोर्टर सजा देते है. यह खबर सभी रिपोर्टरों को एक साथ मिलती है क्योंकि अखबार का दबाव होता है और मिसिंग पर सुनना पड़ता है इसलिये रिपोर्टरों में गैरलिखित समझौता डेवलप हो गया है कि कोई मिसिंग नहीं होगी इससे खबर गलत या सही सभी अखबारों (हिन्दी के)दिख जाती है. ज्यादातर यह मामले क्राइम बीट पर ही मिलेगे.</p>
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