अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया है। यह फैसला चौंकाने वाला है और इसके साथ ही अमेरिकी मीडिया में घमासान छिड़ गया। ओबामा समर्थकों ने इस पर खुशी जाहिर की तो विरोधियों ने पूछा है कि आखिर बारह दिन में ओबामा ने ऐसा क्या कमाल किया जिसकी वजह से उन्हें शांति पुरस्कार देने की धोषणा कर दी गई।
दरअसल, ओबामा ने 20 जनवरी को राष्ट्रपति पद की शपथ ली जबकि एक फरवरी को नोबेल शांति पुरस्कार के नामांकन की आखिरी तारीख थी। फॉक्स न्यूज़ की वेबसाइट पर उन बारह दिनों का ब्योरा दिया गया है। जिसके मुताबिक उन बारह दिनों में ओबामा ने पार्टी में मौज की, अधिकारियों के साथ बैठकें कीं और चर्च नहीं गए। पूरा ब्योरा देने के बाद पूछा गया है कि ओबामा के उन तमाम कामों में से आखिर वो कौन सा काम था जिसकी वजह से नोबेल कमेटी ने उन्हें शांति पुरस्कार देने का फ़ैसला लिया।
न्यूयॉर्क टाइम्स पर अपने ब्लॉग में निकोलस डी क्रिस्टॉफ ने कहा है कि वो ओबामा के प्रशंसक हैं और पश्चिमी एशिया में शांति स्थापित करने की दिशा में उठाए गए कदमों की सराहना करते हैं। लेकिन वो आगे यह भी कहते हैं कि बावजूद इसके ओबामा को शांति पुरस्कार दे कर जल्दबाजी की गई है। यहां सवाल उठता है कि आखिर ओबामा ने अभी तक ऐसा क्या किया है जिसकी वजह से उन्हें यह पुरस्कार दिया जा रहा है?
वैसे इस फ़ैसले से खुद अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा भी भौचक हैं। उन्होंने कहा है कि उनकी सुबह ऐसी होगी ये उन्हें उम्मीद नहीं थी। बराक ओबामा ने कहा कि वो उन तमाम ऐतिहासिक लोगों की सूची में शामिल होने के हक़दार नहीं हैं जिन्हें यह सम्मान जा चुका है। ओबामा ने यह भी कहा कि नोबेल शांति पुरस्कार को उन सभी लोगों के साथ साझा करना चाहते हैं जो सम्मान और न्याय के पक्षधर हैं। उन्होंने इसे एक आह्वान के तौर पर स्वीकार किया है ताकि सभी देश मिल कर गरीबी, ग्लोबल वार्मिंग और परमाणु अप्रसार जैसी 21वीं सदी की चुनौतियों से संघर्ष करें।
aam admi
October 10, 2009 at 1:28 pm
nobel committee ke is kadam se yeh sabit ho gaya hai ki purashkaron, chahe we jis bhi field me diye jaate hon aur duniya bhar me jahan kahin bhi diye jaate hon, ka asli maksad kisi ache kaam to recognise karne ke bajaye kuch aur hi hota hai. aaj ki tarikh me puraskar ek madhyam ban gaya hai kisi taqatwar ko khus karne ya maska lagane ka, kisi chele ko upkrit karne ka ya phir kisi ko apne ‘grip’ me lene ka. hindustan me to yah marz aur bhi bhayankar hai. Sahitya se lekar samajseva ya phir filmon ko le lijiye, adhikansh purashkar girohbazi aur dhandhebazi ka shikaar hain. ye girohbaz aur dhandhebaz apna ‘khel’ karte samay apne dharmik aur jatiye sanskaron ko puri nirlajjta ke nibhate hain.
KS
October 10, 2009 at 6:01 pm
Mujhe lagta hai, Alok Megta sahab ko unki ameriki rastpatiji kee randniti ka gahraai se adhyayan karna chahiye. Agar aisa hua to hume poora visvaas hai ki wah 6 din ke bheetar rajhysabha ke bhi beetar najar aayenge. Waise yah faisla kab tak hone waala hai ki koun sa patrkaar ab falaan tareekh se rajysabha men bhaita karega. In atkalo ko viraam lag jaye to alokji ko bhi rahat mile, aur bakee bhaiyon ko bhi.
रीतेश
October 10, 2009 at 7:38 pm
12 दिन के लिए नोबेल. ये नोबेल का अपमान है या पतन, ये कहे बिना मैं इतना कहना चाहूंगा कि अगर ईरान के खिलाफ आग न उगलने या चीन के डर से नोबेल शांति पुरस्कार के ही दूसरे विजेता दलाई लामा तक से मिलने से मुंह चुराने वाले को इस लायक समझा गया है तो यह रॉयल फाउंडेशन की गंभीरता पर चोट है.
अगर विश्व शांति के लिए इस साल किसी को नोबेल देना ही था तो अपने मनमोहन सिंह से बेहतर भला और कौन है. और कुछ नहीं तो कम से कम मुंबई हमले के बाद कुछ राजनीतिक दलों और कई समाचार संगठनों के संगठित हल्ला-बोल के बावजूद पाकिस्तान पर हमला न करना क्या विश्व शांति में कोई छोटा योगदान है.
पाकिस्तान पर भारत हमला करता तो कुछ और पड़ोसी मित्र का चोला उतारकर मैदान में देर-सबेर नहीं आ जाते, इसकी कोई गारंटी तो थी नहीं. मनमोहन सिंह ने इतनी दूरदर्शिता का परिचय दिया और पड़ोस में पड़े एक महाशक्ति को भारत पर हमला करने का कोई मौका नहीं दिया, ये क्या वैश्विक शांति में छोटा योगदान है.
आज भास्कर में गिरीश निकम जी ने लिखा है कि उनके पास भी विश्व शांति के लिए गजब का विजन है. उन्हें क्यों नहीं दिया जा रहा है नोबेल. ओबामा को भी तो विश्व को परमाणु हथियारों से मुक्ति दिलाने के विजन के लिए ही पुरस्कार दिया जा रहा है. और तो और, ओबामा ने क्या कहा, वो इस दिशा में लगातार काम करेंगे लेकिन उन्हें नहीं लगता कि उनके राष्ट्रपति रहते, यहां तक कि उनके जिंदा रहते, ऐसा हो पाएगा.
अब ऐसे नोबेल पुरस्कार पाने वाले को चूमने और बधाई देने के अलावा और क्या किया जा सकता है.
jc
October 10, 2009 at 8:36 pm
Amerika ka rashtrapati kuchh nahi kare to usko NOBALE PURASKAR banata hai
re baba.
nahi banta kya ????
sanjay
October 11, 2009 at 1:02 am
sab jugad hai bhai