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क्या जनसत्ता ने वामपंथ को निपटाने की सुपारी ली है?

आज जनसत्ता के पहले पन्ने पर कुल दस ख़बरें हैं जिनमें से चार वामपंथ की अलग-अलग धाराओं से जुड़ी हैं। अख़बार की पहली लीड है – “माओवादियों पर नकेल के लिए गृह मंत्रालय को हरी झंडी।” इस में बताया गया है कि सरकार ने गृह मंत्रालय को नक्सलियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई के लिए हरी झंडी दे दी है। जैसे अब तक नक्सली हमले पर हमले कर रहे थे और सरकार हाथ पर हाथ रख कर बैठी थी। उस ख़बर में यह भी कहा गया है कि वायुसेना को आत्मरक्षा में गोलीबारी की अनुमति मिलेगी। ख़बर बस इतनी सी ही है।

जनसत्ता में वामपंथ से जुड़ी दूसरी ख़बर है – “माओवादियों को मिल रही है विदेशी मदद: डीजीपी।” कोलकाता से फाइल की गई इस रिपोर्ट में बताया गया है कि छत्रधर महतो और उनके साथियों को विदेशी पूंजी मिली है। ख़बर के मुताबिक “राज्य के पुलिस महानिदेशक भूपिंदर सिंह ने शनिवार को बताया कि आदिवासियों के विकास के नाम पर लालगढ़ में बड़े पैमाने पर (कितने बड़े पैमाने पर – इसका जिक्र नहीं है) विदेशों से रकम भेजी जा रही है। ये रुपये विभिन्न सूत्रों से आते हैं। इसका बड़ा हिस्सा माओवादियों के हाथ भी पहुंचाया गया है। उन्होंने कहा कि इस रकम का काफी बड़ा हिस्सा पुलिस संत्रास विरोधी जनसाधारण कमेटी के नेता छत्रधर महतो को मिला है। माओवादियों ने इस रकम का इस्तेमाल हथियार खरीदने के लिए किया है।”

इस ख़बर में चार बार “बड़े पैमाने” का जिक्र किया गया है। वो बड़ा पैमाना पांच करोड़ है… दस करोड़ है… पांच हज़ार करोड़ है… आखिर कितना बड़ा है यह बताया नहीं गया। दूसरी बात आज कल विदेशी पैसा किस जिले में नहीं जाता है। हज़ारों की संख्या में स्वयं सेवी संस्थाएं काम कर रही हैं। विकास के नाम पर हर आदिवासी जिले में करोड़ों रुपये भेजे जाते हैं। विदेशी फंडिंग एजेंसियां ये रकम भेजती हैं। नक्सल प्रभावित इलाकों में जहां सरकारी एजेंसियां काम नहीं कर पाती, वहां पर भी बड़ी संख्या में एनजीओ सक्रिय रहते हैं और उन्हें सरकारी के साथ गैर सरकारी संस्थाएं पैसा देती हैं। और यह गौर करने की बात है कि उस पूंजी का मकसद नक्सलियों को मदद पहुंचाना नहीं बल्कि विकास की धीमी ही सही लौ जला कर उनके आंदोलन की धार को कुंद करना होता है। लेकिन आप इस ख़बर से इनकार नहीं कर सकते। अगर किसी राज्य का डीजीपी ऐसे बयान दे रहा है तो उसे छापना ही चाहिए। लेकिन डीजीपी से यह तो पूछा ही जा सकता है कि वह बड़ा पैमाना कितना है… उसके सबूत क्या-क्या हैं? यह पूछना चाहिए कि किस फंडिंग एजेंसी के कितने पैसे से हथियार खरीदे गए हैं? पैसा चीन से आया है… या फिर किसी और नेटवर्क के जरिए पैसा आया है?

उसी रिपोर्ट में यह भी लिखा है कि दंडाधिकारी ने छत्रधर महतो को 15 दिन की पुलिस हिरासत में भेजने की पुलिसिया अपील खारिज कर दी। कहा कि 14 दिन हिरासत में रखने के बाद भी पुलिस महतो के ख़िलाफ़ कोई ठोस सबूत नहीं जुटा सकी है। जो पुलिस अदालत में सबूत नहीं दे पा रही हो उसके डीजीपी के बयान को हेडलाइन बना कर अंतिम सत्य के तौर पर प्रस्तुत करने का क्या तुक?

तीसरी ख़बर है – “हज के लिए जाना चाहते हैं माकपा नेता मोल्ला।” इस रिपोर्ट का इंट्रो है – “धर्म को समाज के लिए अफीम बताने वाले मर्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के नेता और राज्य के भूमि और राजस्व मंत्री अब्दुर रज्जाक मोल्ला हज पर जाना चाहते हैं। पिछले कुछ समय से माकपा के ख़िलाफ़ खुल कर बयानबाजी करने वाले मोल्ला का कहना है कि धर्म के प्रति उनकी आस्था है।”

क्या जनसत्ता के संपादक और इस ख़बर के रिपोर्टर यह बताएंगे कि किस कम्युनिस्ट प्रदेश और राष्ट्र में चर्च ख़त्म कर दिए गए हैं? चीन में यह प्रतिबंध लगाया गया था लेकिन 1980 के दशक में वहां भी लोगों को धर्म में यकीन रखने की आज़ादी दे दी गई। वहां भी लोग बौद्ध, इस्लाम और ईसाई समेत कई धर्मों में यकीन रखते हैं और अपने-अपने तरीके से अपने देवता को पूजते हैं।

जनसत्ता के रिपोर्टर से यह भी पूछा जाना चाहिए क्या पश्चिम बंगाल और केरल में दुर्गा पूजा पर प्रतिबंध है? क्या वहां चर्च पर ताले लगा दिये गए हैं? क्या वहां मुसलमानों को मस्जिद नहीं जाने दिया जाता है? अगर कम्युनिस्ट विचारधारा के बारे में जानकारी नहीं है तो वह जनसत्ता में काम करने वालों की दिक्कत है। लेकिन वो कम से कम इतनी कोशिश तो कर ही सकते हैं कि अपनी अज्ञानता को सार्वजनिक करने की जगह उसे दूर करने के प्रयास करें।

जनसत्ता की चौथी ख़बर है कि – “मार्क्सवाद का सिद्धांत भी नहीं रोक पाया परिवारवाद।” उस ख़बर का इंट्रो है – “क्रांति की शुरुआत अपने घर से होनी चाहिए। इसी जुमले की तर्ज पर केरल की माकपा नेता और स्वास्थ्य मंत्री पी के श्रीमथी ने अपने विभाग में खानसामे के पद पर अपनी पुत्रवधू धन्या वी नायर की नियुक्ति की। इसके एक साल बाद धन्या की पदोन्नति अपने अतिरिक्त निजी सहायक के रूप में की। मजेदार बात यह है कि यह पद भी श्रीमथी के भतीजे और माकपा नेता इपी जयराजन के पुत्र ने खाली किया था। श्रीमथी और उनके देवर जयराजन माकपा के केंद्रीय समिति के सदस्य भी हैं।” उस ख़बर में यह भी लिखा गया है कि आपत्ति और विवाद के बाद श्रीमथी को निजी सहायक के पद से अपनी पुत्रवधू को 2008 में हटाना पड़ा।

इस ख़बर का सिर्फ़ और सिर्फ़ एक मकसद है। यह बताना कि मार्क्सवादी विचारधारा के लोग भी भ्रष्ट हो सकते हैं। वरना जिस समाज में वंशवाद कि जड़ें इतनी गहरी हों कि एक प्रधानमंत्री की हत्या के बाद उसके पुत्र को प्रधानमंत्री की कुर्सी सौंप दी जाती हो वहां किसी को खानसामा या निजी सहायक बनाने जैसा वंशवाद किसी जिक्र लायक नहीं है। फिर भी इस ख़बर पर कोई एतराज नहीं जताया जा सकता। लेकिन पहले पन्ने पर मौजूद वामपंथ से जुड़ी तमाम ख़बरों से जोड़ कर देखने के बाद यही लगता है कि जनसत्ता ने किसी से वामपंथ की छवि ख़राब करने की सुपारी ली हो।

यहां एक बात और गौर करने लायक है कि “मार्क्सवाद का सिद्धांत भी नहीं रोक पाया परिवारवाद” “लाल रंग” में लिखा है और हज जाने वाली ख़बर के शेष भाग की हेडिंग हरे रंग में। रंगों का यह समीकरण भी बेतुका है और इससे जनसत्ता के डेस्क की सोच जाहिर होती है।

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One Response to क्या जनसत्ता ने वामपंथ को निपटाने की सुपारी ली है?

  1. विश्‍वस्‍त सूत्र... Reply

    October 11, 2009 at 11:42 pm

    जनसत्‍ता ने नहीं, अलबत्‍ता थानवी जी ने जरूर ली है… किससे, समय आने पर…

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