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"तुम्हारा रेप करा देंगे, किसी को पता भी नहीं चलेगा"

पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के समर्थकों की सनक और पत्रकारों की त्रासदी के बारे में वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी का यह लेख सबको पढ़ना चाहिए। इसमें बताया गया है कि कैसे रिपोर्टिंग करने पहुंचे एक युवा पत्रकार के ख़िलाफ़ ममता बनर्जी के समर्थकों ने हत्या की साज़िश का मुक़दमा दर्ज करा दिया। तो एक अन्य वाकये में तृणमूल कार्यकर्ताओं ने एक मान्यता प्राप्त पत्रकार को यह कहते हुए प्रेस कॉन्फ्रेंस कवर करने से मना कर दिया कि वो जिस चैनल में काम कर करती हैं उसका झुकाव सीपीएम की तरफ़ है। यह लेख हमें सोचने पर मजबूर करता है कि आज पत्रकार किन चुनौतियों के बीच अपना काम कर रहे हैं।

यह सही है कि आज मीडिया की साख बहुत गिरी है। पत्रकारों का सम्मान भी घटा है। लेकिन यह भी सही है कि तमाम बुराइयों के बावजूद आज भी जनहित से जुड़े मुद्दों पर मीडिया व्यवस्था के तमाम अंगों को चुनौती देने से नहीं कतराता। कुछ समय पहले जब कांग्रेस ने सादगी का नारा बुलंद किया तो मीडिया ने उसकी जमकर तारीफ की। लेकिन एक हफ़्ते के भीतर ही सादगी के पाखंड की पोल भी खोल दी। यह भी कुछ ही दिन पुरानी बात है जब कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने दलितों की बस्ती में जाना शुरू किया। तब मीडिया ने राहुल गांधी की खुले दिल से तारीफ़ की। लेकिन जब कांग्रेस के दूसरे नेताओं ने अपनी नौटंकियों से दलितों का मजाक उड़ाना शुरू कर दिया तो इसी मीडिया ने उन्हें आड़े हाथों लिया। कहने का मतलब सिर्फ़ इतना ही कि अगर लोकसभा में अच्छे प्रदर्शन से ममता बनर्जी और उनके समर्थक होश खो बैठे हैं तो उनका पतन भी बहुत जल्द होगा। कहीं ऐसा न हो कि यह पतन उत्थान से पहले ही हो जाए। – मॉडरेटर

शोमा दास की उम्र सिर्फ 25 साल की है। पत्रकारिता का पहला पाठ ही कुछ ऐसा पढ़ने को मिला कि हत्या करने का आरोप उसके खिलाफ दर्ज हो गया। हत्या करने का आरोप जिस शख्स ने लगाया संयोग से उसी के तेवरों को देखकर और उसी के आंदोलन को कवर करने वाले पत्रकारों को देखकर ही शोमा ने पत्रकारिता में आने की सोची। या कहें न्यूज चैनल में बतौर रिपोर्टर बनकर कुछ नायाब पत्रकारिता की सोच शोमा ने पाल रखी थी।

बंगाल के आंदोलनो को बेहद करीब से देखने-भोगने वाले परिवार की शोमा को जब बंगला न्यूज चैनल में नौकरी मिली तो समूचे घर में खुशी थी कि शोमा जो सोचती है वह अब करेगी। बंगला न्यूज चैनल ’24 घंटा’ की सबसे जूनियर रिपोर्टर शोमा को नौकरी करते वक्त रिपोर्टिग का कोई मौका भी मिलता तो वह रात में कहीं कोई सड़क दुर्घटना या फिर किसी आपराधिक खबर को कवर करने भर का। जूनियर होने की वजह से रात की ड्यूटी लगती और रात को खबर कवर करने से ज्यादा खबर के इंतजार में ही वक्त बीतता। 13 अक्तूबर की रात भी खबर कवर करने के इंतजार में ही शोमा आफिस में बैठी थी। लेकिन अचानक शिफ्ट इंचार्ज ने कहा ममता बनर्जी को देख आओ। बुद्धिजीवियों की एक बैठक में ममता पहुची हैं। शोमा कैमरा टीम के साथ निकल गयी। कवर करने पहुची तो उसे गेट पर ही रोक दिया गया। ममता बनर्जी की हर सभा में गीत गाने वाली डोला सेन ने शोमा दास से कहा ’24 घंटा’ बुद्धदेव के बाप का चैनल है इसलिये ममता से वह मिल नहीं सकती। लोकिन शोमा को लगा, कोई बाईट मिल जाये तो उसकी पत्रकारिता की भी शुरुआत हो जाये। खासकर बुद्धिजीवियों की बैठक में अल्ट्रा लेफ्ट विचारधारा के लोगों की मौजूदगी से शोमा का उत्साह और बढ़ा, क्योंकि घर में अपनी मां-पिताजी से अक्सर उसने नक्सलबाड़ी के दौर के किस्से सुने थे।

शोमा को ममता में आंदोलन नजर आता। इसलिये उसे लगा कि एक बार ममता दीदी सामने आ जायें तो वह इस मुद्दे पर बाइट तो जरूर ले लेगी। लेकिन गेट पर ममता का इंतजार कर रही शोमा दास का खड़ा रहना भी तृणमूल के कार्यकर्ताओं को इतना बुरा लगा कि पहले धकेला फिर डोला सेन ने ही कहा – ‘तुम्हारा रेप करा देंगे, किसी को पता भी नहीं चलेगा। भागो यहां से।’ लेकिन शोमा को लगा, शायदा ममता बनर्जी को यह सब पता नहीं है, इसलिये वह ममता की बाईट के इंतजार में खड़ी रही और ममता जब निकलीं तो उत्साह में शोमा ने भी अपनी ऑफिस की गाड़ी को ममता के कैनवाय के पीछे चलने को कहा। लेकिन कुछ फर्लांग बाद ही तृणमूल के कार्यकर्ताओं ने गाड़ी रोकी और शोमा पर ममता की हत्या का आरोप दर्ज कराते हुये उसे पुलिस के हवाले कर दिया। यह सब ममता बनर्जी की जानकारी और केन्द्र में तृणमूल के राज्य-मंत्री मुकुल राय की मौजूदगी में हुआ। शोमा को जब पुलिस ने थाने में बैठा कर पूछताछ में बताया कि ममता बनर्जी का कहना है कि तुम उनकी हत्या करना चाहती थीं तो शोमा के पांव तले जमीन खिसक गयी। उसने तत्काल अपने ऑफिस को इसकी जानकारी थी। लेकिन ममता बनर्जी ऐसा कैसे सोच भी सकती हैं, यह उसे अभी भी समझ नहीं आ रहा है।

लेकिन इसका दूसरा अध्याय 14 अक्टूबर को तृणमूल भवन में हुआ। जहां ‘आकाश’ चैनल की कोमलिका ममता बनर्जी की प्रेस कान्फ्रेन्स कवर करने पहुंची। कोमलिका मान्यता प्राप्त पत्रकार हैं। लेकिन इस सभा में तृणमूल के निशाने पर कोमलिका आ गयीं। कोमलिका को तृणमूल भवन के बाहरी बरामदे में ही रोक दिया गया। कहा गया ‘आकाश’ न्यूज चैनल सीपीएम से जुड़ा है, इसलिये प्रेस कान्फ्रेन्स कवर करने की इजाजत नहीं है। कोमलिका को भी झटका लगा, क्योंकि कोमलिका वही पत्रकार है जिसने नंदीग्राम के दौर में ‘समय’ न्यूज चैनल में रहते हुये हर उस खबर से दुनिया को वाकिफ कराया था, जब सीपीएम का कैडर नंदीग्राम में नंगा नाच कर रहा था। जब सीपीएम के कैडर ने नंदीग्राम को चारों तरफ से बंद कर दिया था जिससे कोई पत्रकार अंदर ना घुस सके, तब भी कोमलिका और उसकी उस दौर की वरिष्ठ सहयोगी सादिया ने नंदीग्राम में घुस कर बलात्कार पीड़ितों से लेकर हर उस परिवार की कहानी को कैमरे में कैद किया जिसके सामने आने के बाद बंगाल के राज्यपाल ने सीपीएम को कटघरे में खड़ा कर दिया था। उसी दौर में ममता बनर्जी किसी नायक की भूमिका में थीं।

कोमलिका-सादिया की रिपोर्टिग का ही असर था कि सार्वजनिक मंचों से एक तरफ सीपीएम कहने लगी कि ‘समय’ न्यूज चैनल जानबूझ कर सीपीएम के खिलाफ काम कर रहा है, तो दूसरी तरफ ममता दिल्ली आयीं तो इंटरव्यू के लिये वक्त मांगने पर बिना हिचक आधे घंटे तक लाइव शो में ममता मेरे ही साथ यह कह कर बैठीं कि आपकी रिपोर्टर बंगाल में अच्छा काम कर रही है। कोमलिका को लेकर ममता बनर्जी की ममता इतनी ज्यादा थी कि ममता ने कोमलिका को सलवार कमीज तक भेंट की और साल भर पहले जब कोमलिका ने शादी की तो ममता इस बात पर कोमलिका से रुठीं कि उसने शादी में उसे क्यों नहीं आमंत्रित किया।

लेकिन 14 अक्टूबर को इसी कोमलिका को समझ नहीं आया कि वह एक पत्रकार के बतौर अपना काम करने के लिये प्रेस कान्फ्रेन्स कवर करने पहुंची है, तो उसे कोई यह कह कर कैसे रोक सकता है कि वह जिस चैनल में काम करती है, वह सीपीएम से प्रभावित है। नंदीग्राम और सिंगूर के आंदोलन के दौर में कोमलिका ने जो भी रिपोर्टिंग की, कभी सीपीएम ने किसी न्यूज चैनल को यह कह नहीं रोका कि आप हमारे खिलाफ हैं, आपको कवर करने नहीं दिया जायेगा। कोमलिका के पिता रितविक घटक के साथ फिल्म बनाने में काम कर चुके हैं और नक्सलबाड़ी के उस दौर को ना सिर्फ बारीकी से महसूस किया है, बल्कि झेला भी जिसके बाद कांग्रेस का पतन बंगाल में हुआ और सीपीएम सत्ता पर काबिज हुई। नंदीग्राम से लालगढ़ तक के दौरान सीपीएम की कार्यशैली को लेकर शोमा दास और कोमलिका के माता-पिता की पीढ़ी में यह बहस गहरायी कि क्या वाकई ममता सीपीएम का विकल्प बनेगी और अक्सर कोमलिका ने कहा – लोगों को सीपीएम से गुस्सा है, इसका लाभ ममता को मिल रहा है।

लेकिन नया सवाल है कि अब ममता से भी गुस्सा है तो किस तानाशाही को शोमा या कोमलिका पंसद करें। यह संकट बंगाल के सामने भी है और पत्रकारों के सामने भी। क्योंकि अगर दोनों नापंसद हैं, तो वैकल्पिक धारा की लीक तलवार की नोंक पर चलने के समान है। तो सवाल है, पत्रकारिता कैसे की जाये?

((यह लेख पुण्य प्रसून वाजपेयी के ब्लॉग से साभार लिया गया है। इन दिनों वो देश के पहले न्यूज़ चैनल ज़ी न्यूज़ को बतौर प्राइम टाइम एंकर और एडिटर अपनी सेवाएं दे रहे हैं।))

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8 Responses to "तुम्हारा रेप करा देंगे, किसी को पता भी नहीं चलेगा"

  1. अरविंद शेष Reply

    October 16, 2009 at 3:14 pm

    -”तुम्हारा रेप करा देंगे, किसी को पता भी नहीं चलेगा।”

    यह बस अपने कानों से सुनना भर बाकी था किसी के लिए। वरना इस प्रकृति से इतर कोई चरित्र नहीं रहा है ममता बनर्जी एंड कंपनी का। मुश्किल यह है कि दुश्मन के दुश्मन को दोस्त मानने में हमारी वह बुद्धिजीविता भी आड़े नहीं आती, जिसका खम ठोंकते हुए हम अक्सर एक आम आदमी से पांच फुट ऊपर का देवता मानने का दम भरते हैं। सिंगूर और नंदीग्राम की नायिका का खिताब देने वाले लोग कितने बेईमान थे, जिनके सामने से गुजरात- 2002 गुजरा था। उस वक्त नरेंद्र मोदी के साथ खड़ा होने वाली ममता बनर्जी तुरंत ही उनके लिए देवी जैसी नायिका बन गईं। (ध्यान रखिएगा कि मायावती को अब तक इसी काम के लिए माफ नहीं किया गया है। किया भी नहीं जाना चाहिए। लेकिन केवल मायावती को क्यों…?)

    एक अंधी सोच, विकल्पहीन दिशा, उत्पात और प्रोपेगेंडा को अपनी सत्ता-राजनीति का आधार बनाने वाली ममता बनर्जी व्यवहार में हमेशा ऐसी ही रही हैं। शोभा दास को रेप करा देने की अपनी किसी सेनापति की ऐसी धमकी अगर उन्हें स्वीकार्य है, तो इस पर किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। वे खुद इससे भी आगे जाके शोभा दास पर हत्या की साजिश और कोशिश का मुकदमा दर्ज करती हैं, यह बताने के लिए कि वे क्या सकती हैं…।

    क्या शोभा दास (शोभा दास को इस घटनाक्रम में एक प्रतिनिधि पात्र माना जाए) को डरना चाहिए…!

    यह सोचने का वक्त उन लोगों के लिए है जिन्हें भाजपा के साथ गलबंहियां करके राजनीतिक जमीन हासिल करने वाली ममता बनर्जी की सादगी, सादी साड़ी और पैरों में केवल हवाई चप्पल दिखाई देती है। तापसी मलिक (मैं पहले भी कह चुका हूं कि तापसी की त्रासदी से हर किसी को विचलित होना चाहिए, अगर वह कहीं से भी जिंदा और ईमानदार है) के दुख के सामने उन्हें सुनीता मंडल का दुख देखना जरूरी नहीं लगता। जबकि सुनीता मंडल के साथ वही सब कुछ हुआ था, जो तापसी के साथ हुआ।

    अब अगर शोभा दास को यह धमकी मिली है कि तुम्हारा रेप करा देंगे, पता नहीं भी चलेगा, तो बहुत सारे लोगों की तरह हम भी इंतजार करेंगे कि ममता बनर्जी की आरती गाती महाश्वेता देवी के साथ खड़े तथाकथित बुद्धिजीवी इसे किस तरह “जस्टीफाई” करने की कोशिश करते हैं।

    लेकिन अभी भी धीरज धरने की बात है। शोभा दास और उनके तीन साथियों पर हत्या की साजिश या कोशिश का आरोप लगा चुका है, और “हजार चौरासीवें की मां” महाश्वेता देवी का यह बयान कुछ ही दिन पहले अखबारों में आ चुका है कि मेरा नक्सलियों से कोई नाता नहीं रहा है और कुछ समय पहले वे जब मेरे घर आए और मुझे पता चला तो मैने उन्हें भगा दिया…।

  2. कुमार राजेश Reply

    October 16, 2009 at 3:43 pm

    शर्मनाक। ममता बनर्जी को इस हरकत के लिए माफी मांगनी चाहिए। हम तो उन्हें जमीनी नेता समझते रहे, लेकिन लगता है कि वो आसमान में उड़ रही हैं।

  3. aam admi Reply

    October 16, 2009 at 5:19 pm

    kahan hain we tamam buddhijeevi jinki ‘didi’ kuch is andaz me apni ‘mamta’ bikher rahi hain. we aayen aur batayen ki dohari rajniti ki pathshala se nikali is ‘ jabaz’ mahila ki sadgi ka mukhauta kuch is andaz me hi kyon aur kaise utar gaya? in budhijeeviyon ko yah bhi batana chahiye ki Bengal me Wampanthiyon ka vikalp isi mansiktawali rajniti hogi kya?

  4. अरविंद शेष Reply

    October 16, 2009 at 7:54 pm

    उम्मीद है, इसे पढ़ कर मामले को पूरी तरह समझने में मदद मिलेगी…

    साइट का पता ये है-
    http://www.thehoot.org/web/home/story.php?sectionId=6&mod=1&pg=1&valid=true&storyid=4149

    लेख ये है-

    Politicians polarize media in West Bengal

    The media was viewing an assault on itself in the light of political allegiance rather than protection of its rights. And that is the real tragedy. AJITHA MENON reports on a Trinamul assault on a 24 Ghanta reporter and cameraman, and rues the partisan media responses it evoked.

    Posted Friday, Oct 16 14:58:36, 2009

    Cutting across party lines, politicians humiliate, insult and even assault journalists with aplomb in West Bengal. The latest has been the assault and threat on a women journalist and her cameraman by a central minister and Trinamul Congress workers on October 13th, outside the house of painter Shuvaprasanna, where Trinamul Congress leader Mamata Banerjee was holding a meeting. Shoma Das of 24 Ghanta news channel, had her bag and phone snatched, and her mouth gagged by party workers.

    Central minister Mukul Roy was caught on record saying “I will not allow a CPI(M) channel to work here. Is it Buddhadeb Bhattacharya’s father’s channel?”. Aside from the indecent language, the statement made it clear that journalists would be allowed to work only if they worked for media organizations with political leanings that the Trinamul approves of !

    However, even more shocking was the role played by intellectuals and other journalists present. Shuvaprasanna, an internationally known artist, made obscene comments about the woman journalist’s parentage for allowing her to “roam free at night”, once again exposing how hollow all the talk about respecting women and women’s rights in Bengal truly is. Trinamul workers also assaulted the cameraman accompanying the woman journalist, and smashed his camera. One of the women workers of the party also threatened the journalist saying “I will have you raped by our party boys if you don’t behave”.

    But the worst was yet to come. Trinamul Congress leader and Railway Minister Mamata Banerjee called the police and filed a General Diary against the journalist, alleging attempt to murder. The journalist and her cameraman were taken to the police station and kept there for five hours “for questioning”, without even being allowed to visit the washroom. The journalist did file a counter General Diary alleging assault by Trinamul workers. The next day her home was raided by the police.

    However, the really horrifying revelation was in the behaviour of the other journalists present on the spot. Most of them knew the woman journalist and her cameraman in question and both of them were carrying valid House Cards. However, in a stunning display of how the media is polarized on organizational as well as personal levels today, some reporters put out news stories on the alleged murder attempt on Mamata Banerjee without making any mention of the targeted assault on the journalist and her team. None of them bothered to adhere to media ethics where investigation and verification are considered cornerstones of credible reporting.

    Be it Finance Minister Pranab Mukherjee twisting the ear of a photo-journalist or Chief Minister Buddhadeb Bhattacharya insulting a senior journalist by calling him a rat or even the most recent and demeaning action by Trinamul Congress leader Mamata Banerjee, what is emerging clearly is that a polarized media is conducive to the political agenda of different political parties, when it suits them, to deny the journalists the Right to Information and Freedom of Expression – in effect gag the free press. The simple fact is that when one media house or journalist is targeted, others either enjoy the show, or remain silent and even gleefully report the incident in a manner that carries no credibility.

    The office-bearers of the Press Club, Kolkata and several senior editors were seen giving phone-ins and TV interviews condemning the action by the Trinamul Congress, however, all the ire was directed against the politicians without any sign of introspection. Wouldn’t it have been more effective to send a clear message to journalist employees not to tolerate or support the violation of their and other journalists’ rights to work, information and expression?

    Furthermore, only those media organizations which opposed the Trinamul Congress’s policies were seen carrying the condemnations. Others, who support the party were of course sticking to the murder attempt story! The media was viewing an assault on itself in the light of political allegiance rather than protection of its rights. And that is the real tragedy.

    Ironically, after all the condemnation that took place through the day on Oct 14th, following the incident, in the evening two more women journalists were thrown out of the Trinamul Congress Bhavan where a party meeting was being held. Pragya Saha and Komolika Sengupta of Akash Channel, belonging to the same media group as 24 Ghanta, were humiliated for belonging to a particular channel, while about 50-odd reporters and photo- journalists looked on mutely. The matter even didn’t get coverage in the so-called free press!

    Don’t stage a boycott or even a rally or a procession – it will only bring forth political allegiances of media organizations to the forefront and in the end media is all about covering news, not boycotting it. But the organizations can at least empower the journalists with the right to support colleagues on ground zero, even if it is through verbally asserting the person’s right to work, right to information and freedom of speech and expression. Reporters, cutting across media organizations and their political affiliations, admit to wanting to support colleagues in such situations but say they refrain for fear of losing their jobs!

    Most of the field reporters say they expect to be assaulted, insulted or humiliated by parties fearing exposure or from those with vested interests. However, as the three women journalists recently insulted by the Trinamul Congress said, it’s the betrayal by one’s own fraternity which is truly unacceptable and heart-rendering.

    Its amazing that when such incidents occur, we, the media, look to politicians to protect our rights – making it a no-show from the very beginning considering the fact that politicians survive on the divide and rule policy.

    Can we not at least unite on this one ground of right to work with freedom of expression, cutting across our organizations’ political policy, and implement it ourselves by offering a media support network for this?

  5. brij khandelwal Reply

    October 17, 2009 at 6:21 am

    bengali bhadra log yeh sab deserve karte hain. jaisa boya vaisa paayaa.
    na mamta bhali, na marxist achche. ek khote sikke ke do sides. ab thodi intehaa ho jaye tabhi jan manas chetega
    nag nath aur saanp nathon ki jung hai bhai. abhi aag aur bhadak ne do, tab aayega mazaa

    • कुमार राजेश Reply

      October 17, 2009 at 8:20 am

      बृज जी,

      कहीं पत्रकार पर झूठे मुकदमे दर्ज कराए जाएं… उन्हें डराया-धमकाया जाए तो इसमें मज़ा लेने वाली क्या बात है? आप तो ऐसे ताली बजा रहे हैं जैसे कोई तमाशा हो रहा है। ऐसे मामलों में मज़ा नहीं लेना चाहिए। जो मज़ा लेते हैं और कभी लपेटे में आते हैं तो उनके पास बचने की कोई जगह नहीं होती।

      और ये बंगाली भद्रलोग से आपका क्या मतलब है? ये कह कर तो आपने घोर क्षेत्रवादी मानसिकता का परिचय दिया है। फिर आपको क्या हक़ कि आप किसी की ओलाचना करें?

  6. रजनी Reply

    October 21, 2009 at 12:29 pm

    ममता दीदी से बचकर रहना अभी तो पत्रकार हैं निशाने पर…रेल मिली है चलाने को कल को बेटिकट रेल यात्रियों का भी रेप करवाने लगेंगी, तो हैरान मत होना…शायद इस देश का इससे बड़ा दुर्भाग्य नहीं हो सकता कि ऐसे लोगों के हाथ में देश का भविष्य है, देश चलाने की जिम्मेदारी है….
    लोकतंत्र के नाम पर तानाशाह राज कर रहे हैं। इनसे और क्या उम्मीद की जा सकती है।

  7. Ravindra Kumar Khare Reply

    November 6, 2009 at 9:45 pm

    ममता बनर्जी के सहयोगी अब इतने निर्भीक हो गये कि किसी भी औरत की आबरू से खेल सकते हैं! वाह! ये हमारे नेता हैं जिनकी छत्रछाया में इस तरह के कीड़े पनप रहे हैं जो अपने आप को बाहुबली समझ रहे हैं और हम उन्हीं को अपने सिर पर बैठा रहे हैं। और कुछ लोग तालियाँ बजा-बजा कर तमाशे का आनन्द ले रहे हैं। यह घटना किसी के साथ भी घट सकती हैं यह अहसास अब किसी भी महिला पत्रकार को व्यथित भी कर सकता है या एक आन्दोलन का रूप भी धारण कर सकता है। निश्चित हो कि एक आन्दोलन का रूप ही धारण करे क्योंकि देखें तो ये डोला सेन कैसे किसी महिला का रेप कर देंगी और किसी को पता भी नहीं चलेगा। एक महिला एक महिला के विषय में ऐसा कैसे कह सकती है? कहाँ हैं महिला आयोग वाले। एक महिला के साथ इस तरह के वाक्यों का प्रयोग भी एक जघन्य अपराध है। अपराधी को सज़ा मिलनी ही चाहिए।

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