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	<title>Comments on: सवाल पत्रकारिता का और निजी हमले होने लगे</title>
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	<description>बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे</description>
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		<title>By: alok nandan</title>
		<link>http://jantantra.com/2009/10/17/prasoon-reply-on-personal-attacks/comment-page-1/#comment-459</link>
		<dc:creator>alok nandan</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 20 Oct 2009 09:50:55 +0000</pubDate>
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		<description>माडरेटर जनतंत्र, जिस तरह से आपने इंट्रो में हिंदी समाज की मानसिकता का जिक्र किया है, वह एक बार फिर अप्रत्यक्षरूप से यही सवाल उठा रहा है निजी हित और सार्वजनिक हित के बीच की लकीर क्या है। पत्रकार का ठप्पा लगाकर आप किसी के निजी जीवन में कितना घुस सकते हैं ?? भारतीय संविधान में अलग से पत्र या पत्रकारों को कोई छूट नहीं दिया गया है, लेकिन अपनी प्रखरता से इसने लोकतंत्र के चौथे खंभे का दर्जा पाया है। इस चौथे खंभे को तंदरुस्त रखने के लिए यह जरूरी है कि इसकी मजबूती और टिकाऊपन का मूल्यांकन होता रहे। वैसे आप इंट्रो अच्छा लिख लेते हैं, कभी कोशिश कीजिएगा कि तराजू का बैलेंस बरकार रख के इंट्रो लिखने की।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>माडरेटर जनतंत्र, जिस तरह से आपने इंट्रो में हिंदी समाज की मानसिकता का जिक्र किया है, वह एक बार फिर अप्रत्यक्षरूप से यही सवाल उठा रहा है निजी हित और सार्वजनिक हित के बीच की लकीर क्या है। पत्रकार का ठप्पा लगाकर आप किसी के निजी जीवन में कितना घुस सकते हैं ?? भारतीय संविधान में अलग से पत्र या पत्रकारों को कोई छूट नहीं दिया गया है, लेकिन अपनी प्रखरता से इसने लोकतंत्र के चौथे खंभे का दर्जा पाया है। इस चौथे खंभे को तंदरुस्त रखने के लिए यह जरूरी है कि इसकी मजबूती और टिकाऊपन का मूल्यांकन होता रहे। वैसे आप इंट्रो अच्छा लिख लेते हैं, कभी कोशिश कीजिएगा कि तराजू का बैलेंस बरकार रख के इंट्रो लिखने की।</p>
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		<title>By: alok nandan</title>
		<link>http://jantantra.com/2009/10/17/prasoon-reply-on-personal-attacks/comment-page-1/#comment-458</link>
		<dc:creator>alok nandan</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 20 Oct 2009 09:21:35 +0000</pubDate>
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		<description>आदरणीय वाजपेयी जी, पत्रकार और पत्रकारिता को सही तरीके से परभाषित किये बिना एक पत्रकार होने के अर्थ को नहीं समझा जा सकता है। और पिछले कुछ वर्षों में पत्रकार और पत्रकारिता के जो रूप प्रकट हुये हैं उन्हें देखकर तो पत्रकार और पत्रकारिता को लेकर कोई सटीक परिभाषा निकाल पाना शायद एक कठिन और जोखिम भरा कार्य है। आप खबरों को पकड़ पाने की कुलबुलाहट की बात कर रहे हैं, शायद यह एक पत्रकार का अंदरूनी मनोवेग है। यदि इस मनोवेग को ही आधार मानकर पत्रकार और पत्रकारिता की परिभाषा खड़ी करने की कोशिश करते हैं तो निसंदेह यह और भी घातक है। खबरो को पकड़ने की कुलबुलाहट किसी भी पत्रकार को किसी के निजी जिंदगी में घुसने की इजाजत नहीं देता है। यदि आप सार्वजनिक हित के लिए किसी के निजी जीवन में घुस रहे हैं तो यह सिद्ध् करना ही होगा कि वाकई में आप जिसे सार्वजनिक हित समझ रहे हैं वो है भी या नहीं।
यदि ममता बनर्जी आधी रात को किसी पत्रकार से मिलने से इनकार करती हैं तो वह किस सत्ता को चुनौती दे रही हैं ? ममता बनर्जी को नहीं बल्कि इस देश के किसी भी व्यक्ति को पूरा हक  है कि वह अपना निजी समय अपने तरीके से बेरोक टोक कहीं भी बिताये। और चूंकि वह एक सार्जनिक व्यक्तित्व हैं, ऐसे में उनके सुरक्षा का विशेष ध्यान रखा जाना मशीनरी का एक हिस्सा है। मना करने के बावजूद यदि तथा उम्दा पत्रकारिता के नाम पर कोई व्यक्ति उस सुरक्षा तंत्र को भेदने की कोशिश करता है तो निसंदेह उसके खिलाफ सहज मामला बनता है। पत्रकारिता के नाम पर बहुत मनमानी हो चुका है, और वीआईपी लोगों की हत्याएं भी हुई हैं। रेप के संबंध में महिला पत्रकार जो कह रही हैं वह पूरी तरह से एक तरफा भी तो हो सकता है, यह सहज ज्ञान की बात है कि सिस्टम चलाने वाला कोई भी व्यक्ति किसी महिला पत्रकार को रेप कराने की धमकी नहीं दे सकता है। खबरों की कलुबुलहाट के कारण खुद खबर मे आने के लिए और अपने पक्ष को और मजबूती प्रदान करने के लिए बड़ी सहजता से कोई भी महिला पत्रकार यह बात कह सकती है। और थोड़ा सा इमोशन के साथ कहेगी तो उसका प्रभाव ज्यादा पड़ेगा, और उसमें थोड़ा इमोशन मिला के सधे हुये हाथों से लिखे दिया जाये तो उसकी विश्वसनीयता और बढ़ जाती है। आप शंका को मानसिक दिवालियापन करार दे रहे हैं, लेकिन मुझे लगता है कि असल पत्रकारिता शंका से शुरु होती है। आंख बंद करके किसी पर यकीन करने से पत्रकारिता अंधी हो जाएगी,चाहे वह महिला पत्रकार क्यों न हो। आपने सही कहा कहा है कि पत्रकारिता को लिंग के दायरे में बांधना उचित नहीं है, लेकिन क्या किसी पुरुष पत्रकार को यह धमकी दिया जा सकता है कि उसके साथ रेप करा दिया जाएगा? या फिर कोई पुरुष पत्रकार यह कहानी गढ़ सकता है कि उसे खबरो को कवर करने के दौरान रेप करने की धमकी दी गई है ? खबरों को पकड़ने की कुलबुलाहट अच्छी चीज है, लेकिन खबर पकड़ में न आने पर बिना बात के उसे खबर बनाकर खेलना, और उस नजरिये को स्थापित करना पत्रकार और मीडिया हाउसों के हित में तो सकता है, लेकिन पत्रकारिता के हित में नहीं। संवाद के सिलसिला को आपने आगे बढ़ाया, इससे पत्रकारिता के अच्छे भविष्य के प्रति उम्मीद जरूर जगी है।
आलोक नंदन</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आदरणीय वाजपेयी जी, पत्रकार और पत्रकारिता को सही तरीके से परभाषित किये बिना एक पत्रकार होने के अर्थ को नहीं समझा जा सकता है। और पिछले कुछ वर्षों में पत्रकार और पत्रकारिता के जो रूप प्रकट हुये हैं उन्हें देखकर तो पत्रकार और पत्रकारिता को लेकर कोई सटीक परिभाषा निकाल पाना शायद एक कठिन और जोखिम भरा कार्य है। आप खबरों को पकड़ पाने की कुलबुलाहट की बात कर रहे हैं, शायद यह एक पत्रकार का अंदरूनी मनोवेग है। यदि इस मनोवेग को ही आधार मानकर पत्रकार और पत्रकारिता की परिभाषा खड़ी करने की कोशिश करते हैं तो निसंदेह यह और भी घातक है। खबरो को पकड़ने की कुलबुलाहट किसी भी पत्रकार को किसी के निजी जिंदगी में घुसने की इजाजत नहीं देता है। यदि आप सार्वजनिक हित के लिए किसी के निजी जीवन में घुस रहे हैं तो यह सिद्ध् करना ही होगा कि वाकई में आप जिसे सार्वजनिक हित समझ रहे हैं वो है भी या नहीं।<br />
यदि ममता बनर्जी आधी रात को किसी पत्रकार से मिलने से इनकार करती हैं तो वह किस सत्ता को चुनौती दे रही हैं ? ममता बनर्जी को नहीं बल्कि इस देश के किसी भी व्यक्ति को पूरा हक  है कि वह अपना निजी समय अपने तरीके से बेरोक टोक कहीं भी बिताये। और चूंकि वह एक सार्जनिक व्यक्तित्व हैं, ऐसे में उनके सुरक्षा का विशेष ध्यान रखा जाना मशीनरी का एक हिस्सा है। मना करने के बावजूद यदि तथा उम्दा पत्रकारिता के नाम पर कोई व्यक्ति उस सुरक्षा तंत्र को भेदने की कोशिश करता है तो निसंदेह उसके खिलाफ सहज मामला बनता है। पत्रकारिता के नाम पर बहुत मनमानी हो चुका है, और वीआईपी लोगों की हत्याएं भी हुई हैं। रेप के संबंध में महिला पत्रकार जो कह रही हैं वह पूरी तरह से एक तरफा भी तो हो सकता है, यह सहज ज्ञान की बात है कि सिस्टम चलाने वाला कोई भी व्यक्ति किसी महिला पत्रकार को रेप कराने की धमकी नहीं दे सकता है। खबरों की कलुबुलहाट के कारण खुद खबर मे आने के लिए और अपने पक्ष को और मजबूती प्रदान करने के लिए बड़ी सहजता से कोई भी महिला पत्रकार यह बात कह सकती है। और थोड़ा सा इमोशन के साथ कहेगी तो उसका प्रभाव ज्यादा पड़ेगा, और उसमें थोड़ा इमोशन मिला के सधे हुये हाथों से लिखे दिया जाये तो उसकी विश्वसनीयता और बढ़ जाती है। आप शंका को मानसिक दिवालियापन करार दे रहे हैं, लेकिन मुझे लगता है कि असल पत्रकारिता शंका से शुरु होती है। आंख बंद करके किसी पर यकीन करने से पत्रकारिता अंधी हो जाएगी,चाहे वह महिला पत्रकार क्यों न हो। आपने सही कहा कहा है कि पत्रकारिता को लिंग के दायरे में बांधना उचित नहीं है, लेकिन क्या किसी पुरुष पत्रकार को यह धमकी दिया जा सकता है कि उसके साथ रेप करा दिया जाएगा? या फिर कोई पुरुष पत्रकार यह कहानी गढ़ सकता है कि उसे खबरो को कवर करने के दौरान रेप करने की धमकी दी गई है ? खबरों को पकड़ने की कुलबुलाहट अच्छी चीज है, लेकिन खबर पकड़ में न आने पर बिना बात के उसे खबर बनाकर खेलना, और उस नजरिये को स्थापित करना पत्रकार और मीडिया हाउसों के हित में तो सकता है, लेकिन पत्रकारिता के हित में नहीं। संवाद के सिलसिला को आपने आगे बढ़ाया, इससे पत्रकारिता के अच्छे भविष्य के प्रति उम्मीद जरूर जगी है।<br />
आलोक नंदन</p>
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		<title>By: अमर सहनी</title>
		<link>http://jantantra.com/2009/10/17/prasoon-reply-on-personal-attacks/comment-page-1/#comment-457</link>
		<dc:creator>अमर सहनी</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 20 Oct 2009 00:12:50 +0000</pubDate>
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		<description>निहोरा जी, (अगर आपको ठीक पहचान पा रहा हूं तो)  आपको यहां देख कर बहुत खुशी हो रही है। आप मुझे नहीं जानते होंगे। लेकिन बिहार के करोडो लोगों की तरह मै आपसे परिचित हूं। आपके इस कमेंट के बारे में मेरे एक साथी ने फोन कर बताया ।

आप जैसे  बिहार के  एक प्रमुख राजनेता इतनी साफ तौर पर अपनी बात कह रहे  हैं  तो उम्‍मीद की जानी चाहिए कि स्थिति जल्‍दी ही बदलेगी। आपकी स्‍पष्‍टवादिता को सलाम ।

लेकिन साथ ही यह भी कहूंगा कि आपकी पार्टी जदयू ने जिस तरह से बिहार में भूमिहार राज ला दिया है, उसका खामियाजा इस चुनाव में तो आप लोग भुगत ही चुके हैं, अगले विधान सभा चुनाव में भी भुगतेंगे।

मैं यह बात आपको नाराज करने के लिए नहीं कह रहा हूं। बल्कि आप ही की बात को आगे बढा रहा हूं। आपने बहुत सही कहा है पत्रकार जब अपनी मूल ड्यूटी से हटेंगे, पत्रकारिता में फारवर्ड कास्‍ट के लोग भरे रहेंगे तो उनको इसका  खामियाजा भुगतना ही पडेगा। जनतंत्र भी खतरे में रहेगा।

यही बात  बिहार  की राजनीति में पहले लालू प्रसाद पर लागू हुई और अब आपकी पार्टी और नीतीश कुमार की राजनीति पर भी लागू होगी।

जब आप राजद में थे तो आपके आंकडों पर आधारित बयान बिहार की राजनीति में भूचाल ला दिया करते थे। उम्‍मीद करता हूं अब आपके हस्‍तक्षेप इंटरनेट के पाठकों को भी बहुत फायदा  होगा।

-अमर सहनी, पटना</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>निहोरा जी, (अगर आपको ठीक पहचान पा रहा हूं तो)  आपको यहां देख कर बहुत खुशी हो रही है। आप मुझे नहीं जानते होंगे। लेकिन बिहार के करोडो लोगों की तरह मै आपसे परिचित हूं। आपके इस कमेंट के बारे में मेरे एक साथी ने फोन कर बताया ।</p>
<p>आप जैसे  बिहार के  एक प्रमुख राजनेता इतनी साफ तौर पर अपनी बात कह रहे  हैं  तो उम्‍मीद की जानी चाहिए कि स्थिति जल्‍दी ही बदलेगी। आपकी स्‍पष्‍टवादिता को सलाम ।</p>
<p>लेकिन साथ ही यह भी कहूंगा कि आपकी पार्टी जदयू ने जिस तरह से बिहार में भूमिहार राज ला दिया है, उसका खामियाजा इस चुनाव में तो आप लोग भुगत ही चुके हैं, अगले विधान सभा चुनाव में भी भुगतेंगे।</p>
<p>मैं यह बात आपको नाराज करने के लिए नहीं कह रहा हूं। बल्कि आप ही की बात को आगे बढा रहा हूं। आपने बहुत सही कहा है पत्रकार जब अपनी मूल ड्यूटी से हटेंगे, पत्रकारिता में फारवर्ड कास्‍ट के लोग भरे रहेंगे तो उनको इसका  खामियाजा भुगतना ही पडेगा। जनतंत्र भी खतरे में रहेगा।</p>
<p>यही बात  बिहार  की राजनीति में पहले लालू प्रसाद पर लागू हुई और अब आपकी पार्टी और नीतीश कुमार की राजनीति पर भी लागू होगी।</p>
<p>जब आप राजद में थे तो आपके आंकडों पर आधारित बयान बिहार की राजनीति में भूचाल ला दिया करते थे। उम्‍मीद करता हूं अब आपके हस्‍तक्षेप इंटरनेट के पाठकों को भी बहुत फायदा  होगा।</p>
<p>-अमर सहनी, पटना</p>
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		<title>By: dr.nihora yadav</title>
		<link>http://jantantra.com/2009/10/17/prasoon-reply-on-personal-attacks/comment-page-1/#comment-456</link>
		<dc:creator>dr.nihora yadav</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 18 Oct 2009 03:21:36 +0000</pubDate>
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		<description>patrakar ke kalam par jab caste rhega tab samachar nispakch nahi hoga ajj adhiktar patrakaro ke yahi estithi hai samachar patro ya electronic media mai adhiktar forwad cast ke usme brammins  sabse adhik  inke dwara garibo ki bat ko tarji nahi di jati sirf apne hito ki rakch karta hai  jab patrakar apni mul duty se hatega tab unko to khamiaja vugatnaparegahi des ke jantantra bhi khatra mai parega</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>patrakar ke kalam par jab caste rhega tab samachar nispakch nahi hoga ajj adhiktar patrakaro ke yahi estithi hai samachar patro ya electronic media mai adhiktar forwad cast ke usme brammins  sabse adhik  inke dwara garibo ki bat ko tarji nahi di jati sirf apne hito ki rakch karta hai  jab patrakar apni mul duty se hatega tab unko to khamiaja vugatnaparegahi des ke jantantra bhi khatra mai parega</p>
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