राजेंद्र धोड़पकर को हम सभी जानते हैं। वो हिंदुस्तान के एसोसिएट एडिटर हैं। लाजवाब कार्टूनिस्ट हैं। एक उम्दा पत्रकार हैं और जानने वाले बताते हैं कि एक बेतरीन व्यक्ति हैं। उन्होंने आज हिंदुस्तान में एक लेख लिखा है – नक्सली हिंसा में “पुलिसवाले ही क्यों बनते हैं शिकार”। इस लेख में उन्होंने एक मानवीय नज़रिया पेश किया है। आप उनके नज़रिये से सहमत हो सकते हैं और असहमत भी। लेकिन हम चाहते हैं कि आप इसे पढ़ें। इसलिए भी क्योंकि हाल के दिनों में मीडिया ने सरकार के सुर में सुर मिलाकर नक्सलियों को आतंकी बताते हुए उनके सामूहिक नरसंहार का जो नारा बुलंद किया है, उसे किसी भी तरह का नैतिक समर्थन नहीं दिया जा सकता है। किसी भी “गुमराह” राज्य को अपने ही “गुमराह” नागरिकों के नरसंहार की सुपारी नहीं दी जा सकती है। राजेंद्र धोड़पकर का यह लेख इस मुद्दे पर सकारात्मक बहस की मांग करता है। – मॉडरेटर
यह एक सीपीआई (एमएल) के पूर्व कार्यकर्ता के साथ घटी सच्ची घटना है। वह जब छात्र था, तब उसके छोटे भाई ने आत्महत्या कर ली। पुलिस ने पहला काम यह किया कि परिवारवालों को धमकाया कि वे पैसे लेकर आएं वरना उन पर हत्या का आरोप लगाकर उन्हें जेल में बंद कर दिया जाएगा। शोक में डूबे परिवारजनों के सामने यह एक काम आ पड़ा कि पहले वे रिश्वत की रकम जुटाएं फिर अपने बच्चे का अंतिम संस्कार करें। बड़ा भाई जब एमएल का पूर्णकालिक कार्यकर्ता हो गया तब उसका कहना था कि जब भी पुलिसवालों से कहीं आमना-सामना होता तो वह पुलिसवालों की बुरी तरह पिटाई करता। भारत के लगभग हर व्यक्ति के पास पुलिस की संवेदनहीनता और क्रूरता की एकाध आपबीती सुनाने को जरूरी होगी। आदमी जितना गरीब और साधनहीन होगा, उसकी ऐसी कहानियां संख्या में ज़्यादा और ज़्यादा भयानक होंगी।
अभी यह सब याद करने का प्रसंग यह है कि पिछले कुछ वर्षों में भारत में नक्सली हिंसा से सात सौ से ज़्यादा पुलिसकर्मी मारे जा चुके हैं। ये हमारे आप जैसे ही सामान्य परिवारों के लोग थे। जो हमारी आपकी तरह ही अपना घर-परिवार चलाने की नौकरी कर रहे थे। सिर्फ़ उनकी नौकरी पुलिस विभाग में थी। यह भी ध्यान देने की बात है कि इनमें से ज़्यादातर नक्सलियों के ख़िलाफ़ किसी कार्रवाई के दौरान नहीं मारे गए थे। उन्हें नक्सलियों ने अपने जाल में फंसा कर मारा था या उन पर घात लगाकर हमला किया था। यानी उन्होंने नक्सलियों पर हमला नहीं किया, हमलावर नक्सली थे। आखिरकार पुलिसवाले क्यों नक्सलियों के हमलों का शिकार होते हैं।
एक वजह तो यह है कि इससे प्रचार मिलता है। एकाध पूर्व नक्सली नेता का मानना है कि चूंकि मौजूदा नक्सलियों का जनाधार ज़्यादा बड़ा नहीं है, इसलिए ऐसी हिंसा से वे जितने मजबूत हैं, उससे ज़्यादा मजबूत नज़र आते हैं। लेकिन ज़्यादा बड़ी वजह यह है कि भारतीय समाज में पुलिसवालों को हिंसा का शिकार बना कर वे ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में अपनी लोकप्रियता बढ़ाना चाहते हैं। यह सही है कि पुलिस समाज में कानून व्यवस्था बनाए रखने का सबसे जरूरी औजार है। लेकिन यह भी सही है कि भारतीय समाज में, खासकर कमजोर तबकों में पुलिस को दमनकारी ही माना जाता है। नक्सलवादी घात लगाकर पुलिसवालों को मारकर अपने को दमन और शोषण के ख़िलाफ़ दिखाते हैं और ग्रामीणों, आदिवासियों के सामने यह भी सिद्ध करने की कोशिश करते हैं कि वे पुलिस से ज़्यादा ताक़तवर हैं। वे पुलिसवालों को मार सकते हैं।
नक्सलवादियों का जनाधार कितना मजबूत है, उनका संगठन कितना व्यापक और गहरा है, ये सवाल छोड़ दिए जाएं तो भी यह सवाल किसी से पूछा जाना चाहिए कि मान लें अगर वह देश के अत्यंत पिछड़े इलाकों में रह रहा दलित या आदिवासी है और उसे पुलिस और नक्सलियों में से किसी एक को चुनना है तो वह किसे चुनेगा? खाकी वर्दी पहनकर डंडा फटकारते आने वाले दरोगा और उसी की तरह के कपड़े पहने, उसी की बोली बोलने वाले नक्सली में से कौन उसे कम भयप्रद लगता है? यह सच है कि जहां-जहां नक्सल प्राव है वहां-वहां विकास कार्य नहीं हो पा रहे हैं, लेकिन जब वहां नक्सलवाद नहीं पनप रहा था, तब कौन से विकास कार्य हो रहे थे, जिनके न होने पर वह विलाप करें। छत्तीसगढ़ या उड़ीसा या झारखंड के गरीब आदिवासी की आर्थिक स्थिति तब भी वैसी थी और अब भी वैसी ही है। फर्क सिर्फ़ यह है नक्सलियों के डर से पुलिस या नायब तहसीलदार उसके गांव में नहीं आते।
मुद्दा यह नहीं है कि एक लगभग अप्रांसगिक हो चुकी विचारधारा को मान रहे नक्सलियों से लड़ा जाए या नहीं। बात यह है कि हम नक्सलियों को ख़त्म करके नक्सल प्रभावित जनता को क्या देना चाहते हैं? पुलिस और प्रशासन के तौर – तरीकों में व्यापक सुधार के बिना नक्सलियों से लड़ना मुश्किल है और अगर सुरक्षाबलों के सहारे उन्हें ख़त्म कर भी दिया गया तो प्रतिरोध के दूसरे हिंसक रास्ते पैदा हो जाएंगे। जब तक पुलिस का हिंसक दमनकारी रूप और प्रशासन की जनविरोधी रवैया नहीं बदलता, नक्सलवाद से लड़ने का कोई नैतिक आधार नहीं बचता।
विरोधाभास यह है कि नक्सलवादी दमन के प्रतीक पुलिसवालों को मारते हैं तो वे दरअसल अपने ही वर्ग के लोगों को मार रहे होते हैं। जो शोषक ठेकेदार या सरकारी अफ़सर होते हैं, उनसे वे चौथ वसूलकर उन्हें सुरक्षित कर देते हैं। पुलिस में सुधार इसलिए भी जरूरी है ताकि ये निचले स्तर के सरकारी कर्मचारी एक ऐसे आंदोलन की भेंट नहीं चढ़े, जिसके विचार या व्यवहार को वे जानते भी नहीं। सामान्य भारतीय मन में पुलिस के प्रति जो घृणा है वह आदिवासी इलाकों में नक्सलवादियों के हाथ पुलिस के क़त्लेआम के रूप में दिखाई देती है और शहरों में कानून के उल्लंघन के रूप में। अक्सर आम भारतीय छोटे-मोटे कानूनों का उल्लंघन इसलिए भी करता है, क्योंकि उन्हें वह सिर्फ़ पुलिस से जोड़कर देखता है।
पुलिस और प्रशासनिक सुधारों की जरूरत इसलिए भी है कि पुलिस या सरकारी कर्मचारी की छवि जनविरोधी हो गई है। अपराधी छवि वाले राजनेताओं की लोकप्रियता का बड़ा कारण यह है कि भले ही वे अपराध करते हों, लेकिन वे अपने इलाके में पुलिस और प्रशासन से समानांतर एक तंत्र बना देते हैं जो थाने-कचहरी में उनकी मदद करता है। अगर नक्सल कॉरिडोर में नक्सलियों का राज है तो देश के कई दूसरे इलाकों में दबंग राजनेताओं और अपराधियों की चलती है।

राजेंद्र धोड़पकर, एसोसिएट एडिटर, हिंदुस्तान
अरविंद शेष
October 21, 2009 at 8:32 pm
बहुत संतुलित और वस्तुनिष्ठ विश्लेषण। राजेंद्र जी धन्यवाद।
shambhu
October 22, 2009 at 12:11 am
शायद ये बात देश के हुक्मरान और अपनी अपनी रोटी सेंक रहें व्हाइट कॉलर चोरों को भी समझ में आती… तो फिर कोई नक्सली नहीं बनता… और किसी रईस को देखकर लालच पुलिस वाले के मन में भी नहीं पनपता
रंगनाथ सिंह
October 22, 2009 at 10:04 pm
भारतीय पुलिस के चरित्र पर सवाल उठा कर राजेन्द्र जी ने व्यवस्था के सबसे निरंकुश तंत्र पर सवाल उठाया है। पुलिस व्यवस्था में सुधार के प्रति सरकार की अनदेखी भी गंभीर चिंता की बात है।