देश में नक्सली गतिविधियों के विस्तार को तीन तरह के आंकड़ों के साथ पेश किया जा सकता है। अगर नक्सली गतिविधियों के बारे में आंकड़े इस तरह पेश किए जाएं कि कितने राज्यों में नक्सलवाद का प्रभाव है तो वह देश के पचहत्तर प्रतिशत हिस्से में दिखाई देगा। अगर नक्सली गतिविधियों को जिलों की संख्या के आधार पर देखें तो वह आंकड़ा पहले के मुकाबले आधा दिखाई देने लगेगा। लेकिन अगर गांवों की संख्या के आधार पर देखें तो देश के कुल महज दो या तीन प्रतिशत हिस्से में नक्सलवाद का प्रभाव दिखाई देता है। क्या सचमुच देश के दो-तीन प्रतिशत हिस्से में अपना प्रभाव रखने वाली कोई राजनीतिक विचारधारा आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा हो सकती है? इस सवाल को दूसरे तरीके से भी उठाया जा सकता है कि देश के लगभग सभी हिस्सों में सरकार और राजनीतिक पार्टियों पर लोगों का विश्वास लगातार कम होता जा रहा है। आंतरिक सुरक्षा के लिए राजनीतिक चिंता का सबसे प्रमुख पहलू यह होना चाहिए या फिर कोई अन्य? क्या ऐसा संभव है कि सरकार और राजनीतिक पार्टियों के प्रति लोगों का भरोसा मजबूत हो और फिर भी उनकी विरोधी कोई राजनीतिक विचारधारा अपने पांव जमा ले?
गृहमंत्री पी चिदंबरम का कहना है कि सरकार नक्सलियों के खिलाफ जो अभियान चलाने जा रही है वह नक्सलियों के नहीं, बल्कि नक्सलवाद के खिलाफ है। नक्सलवाद अगर केवल कुछेक हथियारबंद कार्रवाई का नाम नहीं है तो क्या किसी विचारधारा के खिलाफ कोई सैन्य अभियान हो सकता है? विचारधारा के प्रभाव को क्या सैन्य अभियानों के जरिए खत्म किया जा सकता है? यह आरोप लगाया जा सकता है कि नक्सली बंदूक के बूते अपने प्रभाव वाले इलाके में लोगों को नियंत्रण में रखते हैं। लेकिन क्या इसे इस तरह से नहीं देखा जा सकता कि देश के कुछ पढ़े-लिखे लोग भी नक्सलवादी विचारधारा से प्रभावित रहते हैं, जबकि उन तक किसी किस्म की बंदूक का साया भी नहीं पहुंचता।
खुद चिदंबरम और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कई बार कह चुके हैं कि देश में एक पढ़ी-लिखी जमात नक्सलवादियों की समर्थक है। देश में संसदीय वामपंथी पार्टियों से गहरी नाराजगी के बाद वामपंथ की जो धारा विकसित हुई यानी नक्सलवाद को देश के कई बुद्धिजीवियों ने समर्थन दिया। खुद मनमोहन सिंह उस समय चंडीगढ़ में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर थे और उन्हें पुलिस वाले नक्सलवादियों के करीब मानते थे। पंजाब के नक्सलवादी नेता हाकाम सिंह समाऊ ने इस बात का उल्लेख किया है। कोई तस्वीर कहां खड़े होकर ली जाती है यह तस्वीर लेने के मकसद पर निर्भर करता है। पी चिदंबरम ने दिल्ली में ननी पालकीवाला स्मृति व्याख्यान में कहा कि इस साल नक्सलवादियों ने आर्थिक केंद्रों पर एक सौ तिरासी हमले किए। उनके अनुसार पंचायत भवन, स्कूल, रेलवे स्टेशन आदि आर्थिक केंद्र हैं। पर यहां यह तथ्य गौरतलब है कि नक्सलवाद विरोधी अभियानों के दौरान पंचायत भवन और स्कूल सैन्यकर्मियों के ठिकानों में तब्दील हो जाते हैं।
पी चिदंबरम नक्सलवादियों को विकास विरोधी कहते हैं। लेकिन विकास का क्या अर्थ है? विकास किसी एक चीज का नाम नहीं है। विकास के क्या मायने होते हैं? क्या केवल सड़क, बिजली, पानी विकास है? कल-कारखाने, बड़े बांध, बड़े पैमाने पर खदानों से निकासी विकास है? जंगलों का सफाया करना विकास है? जमशेदपुर विकास का एक मॉडल है। पर यह विकास आदिवासियों के लगभग दो सौ गांवों की कब्रगाह पर हुआ है। जमशेदपुर में आज आदिवासी चेहरा मुश्किल से दिखाई देता है।
नक्सलवादियों को विकास-विरोधी कहा जा रहा है, लेकिन जिन इलाकों में उनका प्रभाव नहीं है वहां कौन विकास का विरोध करता रहा है? दरअसल, विकास के विरोध में नक्सलवाद को खड़ा करने के पीछे लगभग वही उद्देश्य है जो अमेरिका का आतंकवाद के नाम पर प्रतिरोध विरोधी ढांचा और संस्कृति विकसित करने का रहा है। नक्सलवादियों को जिन इलाकों में सबसे सक्रिय बताया जा रहा है वे आदिवासीइलाके हैं। क्या वहां विरोध और प्रतिरोध की संस्कृति नहीं रही है? नक्सलवाद के जन्म से पहले भी उन इलाकों में सत्ता द्वारा अपनी नीतियों और कार्यक्रमों को थोपे जाने का सशस्त्र विरोध किया जाता रहा है।
इस समय सरकार की क्या चिंता है इसे एक आंकड़े से समझा जा सकता है। सरकार का कहना है कि देश में इस्पात की बाईस ऐसी बड़ी-बड़ी परियोजनाएं हैं जिन्हें शुरू करने में दिक्कत आ रही है। यह दिक्कत असल में जमीन के अधिग्रहण को लेकर लोगों का जबर्दस्त विरोध है। सरकार कहती है कि ये परियोजनाएं बयासी अरब डॉलर की हैं। दुनिया भर की बड़ी-बड़ी कंपनियां इन इलाकों में अपनी परियोजनाओं को लाना चाहती हैं। उद्योगपतियों के संगठन एसोचैम के अनुसार, सरकार के एक अध्ययन में बताया गया है कि एक सौ नब्बे ढांचागत परियोजनाओं का सत्तर प्रतिशत काम इसलिए रुका पड़ा है, क्योंकि जमीन की समस्या है। अठारह परियोजनाएं ऐसी हैं जिनमें दो लाख चौवालीस हजार आठ सौ पंद्रह करोड़ रुपए का विनियोग तीन-चार वर्षों से कागजों में ही पड़ा है। जिन लोगों ने अपनी जमीनें दी हैं उनका अस्तित्व मिट गया। विकास के लिए जमीन दी गई, लेकिन वह विकास उनके किस काम का होता है?
अर्जुन सेनगुप्त समिति की रिपोर्ट कहती है कि सतहत्तर प्रतिशत आबादी रोजाना बीस रुपए से कम पर गुजर-बसर करती है। यहां देश के विकास का क्या अर्थ निकाला जा सकता है? दरअसल, विकास के नारे को एक राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाता रहा है। जवाहरलाल नेहरू ने पीसी मोहलनवीस की अध्यक्षता में जीवन के स्तर और आमदनी के वितरण के अध्ययन के लिए एक समिति बनाई थी। उस समिति ने अपनी रिपोर्ट पच्चीस फरवरी 1964 को पेश की और बताया कि आम लोगों के जीवन-स्तर में सुधार और आमदनी के वितरण की स्थिति बेहद खराब है;देश में आमदनी पर कुछ लोगों का नियंत्रण होता जा रहा है; लोगों की आमदनी के बीच खाई लगातार चौड़ी हुई है। तब नक्सलवाद नहीं था। अर्जुन सेनगुप्त के अनुसार अगर देश के अठासी प्रतिशत दलित और चौरासी प्रतिशत मुसलमान भीषण गरीबी में जी रहे हैं तो यह उस विकास का संकट है जो सरकारें देश पर थोपती रही हैं। विकास के साथ ही अगर वितरण के सवाल को भी रखा जाए तो विकास के नारे के राजनीतिक आयाम को समझा जा सकता है।
नक्सलवाद को सबसे बड़ा खतरा मानने की वजह हिंसा की घटनाएं भर नहीं हैं। देश में सरकार चलाने वाले लोग बड़े इत्मीनान से इतनी संख्या में होने वाली हिंसक घटनाओं को यह कह कर टालते रहे हैं कि इतने बड़े देश में ऐसी वारदातें तो होती रहती हैं। अगर इसके भाव को यहां ग्रहण किया जाए तो देश के दो-तीन प्रतिशत गांवों को प्रभावित करने वाली विचारधारा और उसकी गतिविधियों को देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा मानने और उस पर इस तरह से चिंता जाहिर करने की वजह समझ में नहीं आती। क्योंकि मुकाबले चुनाव परिणामों के आधार पर देश में विभिन्न राजनीतिक पार्टियों का जो सांगठनिक प्रभाव दिखता है वह इसके मुकाबले में कई गुना ज्यादा है।
दरअसल, नक्सली गतिविधियों को सबसे बड़ा खतरा मानने और नक्सलियों के प्रति समर्थन या सहानुभूति का भाव रखने वालेबुद्धिजीवियों को कोसने का एक कारण अर्जुन सेनगुप्त के इन वाक्यों से समझा जा सकता है। अर्जुन सेनगुप्त ने लिखा है कि सालों के आर्थिक सुधार ने हमारे देश की विकास दर ऊंची की है, लेकिन इसने जनसंख्या के बड़े भाग को गरीबी और भुखमरी के साए में डाल दिया है। लोग वैसे तो शांत दिखते हैं, लेकिन जैसे ही मौका आता है वे हिंसक विरोध में शामिल हो जाते हैं। दरअसल, सत्ता का खुद का लोगों पर भरोसा खत्म हो रहा है। ऐसी स्थिति में अगर कोई भी ऐसा आंदोलन होता है जिसके पास लोगों को प्रभावित करने के राजनीतिक औजार हों तो उसे बेहद खतरनाक माना जाता है। नक्सली गतिविधियों में होने वाली हिंसक घटनाओं को देखें तो रोजाना देश में होने वाली आपराधिक घटनाओं की तुलना में कितनी होती हैं? शायद सौ में एक प्रतिशत का चौथाई हिस्सा भी नहीं होता। संसदीय पार्टियों ने अपना भरोसा बुरी तरह से खोया है और दूसरी तरफ कोई भी राजनीतिक विचारधारा या संगठन नहीं है जो लोगों की दुख-तकलीफों के लिए लड़ रहा हो।
सरकार नक्सलवादियों के खिलाफ अपने अभियान के उद्देश्य को लेकर बहुत साफ है। वह कहती है कि पहले नक्सलवाद से निपटेगी और फिर विकास के कार्य करेगी। अमेरिका ने भी इराक पर हमला करने के बाद उसके पुनर्निर्माण का कार्यक्रम पेश किया था। सरकार ने एक जमाने में यह नीति बनाई थी कि जिन इलाकों में नक्सलवादी गतिविधियां बढ़ रही हैं वहां वह ऐसे अधिकारियों को तैनात करेगी जिनके पास लोगों का विश्वास जीतने का माद्दा हो। तब भूमि सुधार के कार्यक्रम लागू करने के बारे में भी विचार किया जाता था। लेकिन आज तो खुद प्रधानमंत्री कहते हैं कि वे भूमि के मालिकाने की अधिकतम सीमा बढ़ाने के पक्षधर हैं। लोगों का विश्वास जीतना केवल प्रबंधन की पढ़ाई में ज्यादा से ज्यादा नंबर पा लेने से नहीं सीखा जा सकता। इसके लिए सरोकार जरूरी हैं।
इस समय सरकार पहले सफाया और फिर विकास का जो नारा दे रही है वह लगभग उसी तरह का परिणाम लाने वाला साबित होगा जिसमें देखा गया है कि विकास के हिस्सेदार में आम लोग नहीं होते हैं। सफाए के बाद विकास का मतलब साफ है, प्रतिरोध की संस्कृति का सफाया। सरकार नक्सल प्रभावित इलाकों में जिस विकास का आश्वासन दे रही है उस विकास का वर्ग-चरित्र कोई भिन्न नहीं होगा।
नक्सलवाद को प्रतिरोध की संस्कृति के पर्याय के रूप में पेश किया जा रहा है। इसीलिए यह देखा गया है कि जहां कहीं भी विरोध की आवाज उठी है उसे माओवाद और विरोधियों को माओवादी करार दिया गया है। विरोध को कुचलने का यही आसान रास्ता है। लेकिन विरोध की विचारधाराओं से निपटने के लिए भूमि सुधार जैसे कार्यक्रमों पर जोर देना होगा; विकास के साथ उसका न्यायसंगत वितरण भी सुनिश्चित करना होगा।
((अनिल चमड़िया महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में प्रोफेसर हैं। जनतंत्र पर उनका यह लेख जनसत्ता से साभार छापा गया है।))
saurabh
November 5, 2009 at 11:55 am
चमड़िया जी, संसाधनों को अगर दोहा नहीं जाएगा तो वो अंडे तो देंगे नहीं. संसाधनों का इस्तेमाल करना किसी भी देश की चुनी हुई सरकार के लिए एक कर्तव्य जैसा होता है, जिसका फल जनता को मिलता है. रही बात विकास कार्यों की तो जो लोग बीस रुपये भी नहीं कमा पा रहे वो सौ रुपये से ऊपर की गोलियां कैसे धुएं में उड़ा रहे हैं. ग़रीब जनता के प्रति हम सब की सहानुभूति है, हम कोई अंबानी या बिड़ला के घर पैदा नहीं हुए हैं. ऐसी ही धूल मिट्टी से निकले हैं लेकिन किसी की हत्या करना गलत है. पुलिस वाले भी आम आदमी होते हैं साहब, बीबी बच्चे उनके भी होते हैं. हिंसा करने वालों से सहानुभूति कैसे रखी जाएं. गरीब की गरीबी दूर की जा सकती है, गरीबी का नाटक करने वाले की नहीं.
कुमार राकेश
November 5, 2009 at 12:41 pm
सौरभ,
कुछ संसाधन भविष्य के लिए भी छोड़ दीजिए। आने वाली संतानों के लिए। सबसे अंडे आप ही निकाल लीजिएगा तो हमारी पीढ़ियां क्या खाएंगी। दूसरी बात, चुनी हुई सरकार का क्या कर्तव्य होता है, यह आप मनमोहन और चिदंबरम को जा कर समझाइए। उसके लिए यहां वक़्त क्यों बर्बाद कर रहे हैं। अगर मनमोहन और चिदंबरम जैसे लोग अपने कर्तव्य का पालन सही तरीके से करते तो आज यह नौबत नहीं आती।
एक बात और। खुदा न करे, लेकिन जिस दिन आपके घरों पर बुल्डोजर चलेंगे और अगर आप कोई बहुत बड़े जमींदार नहीं तो किसी दिन किसी कंपनी के लिए आपकी जमीन कब्जे में ली जाएगी तब आपसे पूछेंगे कि संघर्ष के लिए आपने हौसला और पैसा कहां से जुटाया है?
आखिर में बस इतना ही किसी भी तर्क का कुतर्क से जवाब दिया जा सकता है। लेकिन बेहतर होता कि आपने इस लेख को सही तरीके से पढ़ा होता। इसमें हिंसा को कहीं से जायज नहीं ठहराया जा रहा है। यहां सवाल है कि जब आपकी ही चुनी हुई सरकारें आपके ही हक़ों को मारने लगें और जुल्म ढाने लगें और अहिंसक विरोध को लगातार अनसुना किया जाए तब फिर आपके पास क्या विकल्प बचता है?
यहां बात उस साज़िश की है जिसके जरिए आपकी ही चुनी हुई सरकार आपके ही क़त्ल के लिए वैचारिक आधार तलाशती है और फिर संहार करती है। जब लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार इतनी हिंसक हो जाए तब भी आम आदमियों के पास संघर्ष करने के अलावा क्या रास्ता बचता है?
यह सोचने की बात है कि इरोम दस साल से अनशन पर बैठी हैं और मणिपुर में हजारों-लाखों की संख्या में लोग लगातार तानाशाही रवैये और क्रूर कानून के ख़िलाफ़ प्रदर्शन करते हैं और सरकार उन प्रदर्शनों को अनसुना कर देती है। उसके बाद अगर मणिपुर के लोग हिंसक हो जाएं तो उनकी क्या ग़लती?
यह सोचने की बात है कि जंतर मंतर पर आए-दिन धरने प्रदर्शन होते हैं लेकिन सरकार किसी भी मांग पर जब जायज तरीके से विचार नहीं करे तब फिर लोग सड़कें जाम करने लग जाएं तो उनकी क्या ग़लती है?
इसलिए सौरभ, तमाशा देखना बहुत ख़तरनाक है, किसी के संघर्षों का मजाक उड़ाना भी बहुत ख़तरनाक है क्योंकि ऐसा करके न केवल हम सत्ता के शोषक तत्वों का साथ देते हैं बल्कि अपने भीतर के इंसान को भी मारते चले जाते हैं। हो सके तो सोचना… कि हमारे मकान, हमारी गाड़ी और हमारे शहरों के लिए वो आदिवासी अपनी रोटी, अपनी इज्जत और अपनी ज़मीन का सौदा क्यों करें?