दिल्ली और एनसीआर में नई दुनिया की स्थिति में कोई सुधार नहीं हो रहा है। अख़बार का सर्कुलेशन बढ़ाने की तमाम कोशिशें नाकाम साबित हो रही हैं। कुछ दिन पहले अख़बार ने बेडशीट स्कीम लॉन्च की। इस उम्मीद में कि बेडशीट कंटेंट के बूते न सही बेडशीट के भरोसे ही सही पाठक अख़बार खरीदने लगें। लेकिन पाठकों ने वो स्कीम पूरी तरह ठुकरा दी। अख़बार के साथ बेडशीट भी पसंद नहीं आई।
उसके बाद इसी महीने नई दुनिया के मैनेजमेंट ने एक नई योजना शुरू की। हिंदुस्तान टाइम्स प्रिटिंग प्रेस के सूत्रों के मुताबिक 11 अक्टूबर से 17 अक्टूबर तक नई दुनिया की पचास हज़ार प्रतियां अधिक छपवाई गईं। हॉकरों से कहा गया कि वो इन प्रतियों को मुफ़्त में बांटे। लेकिन हॉकरों ने नई दुनिया के बंडलों को उठाने से मना कर दिया। आखिरकार वो बंडल रद्दी की दुकानों पर नज़र आए। उनकी कुछ तस्वीरें आप नीचे देख सकते हैं। ये तस्वीरें एक रद्दी की दुकान से खीचीं गई हैं।
नई दुनिया मैनेजमेंट काठ की हांडी चढ़ाना चाह रहा है। सतही कंटेंट को स्कीमों के जरिये बेचने की कोशिश हो रही है। लेकिन मीडिया में ऐसे दांव नहीं चलते। आप हर किसी से समझौता कर सकते हैं, लेकिन ख़बरों से नहीं। बहुत ज़्यादा सरकारी राग गाने से पाठक बिदकते हैं। वैसे भी पहले से कई अख़बार सरकार के गुणगान में व्यस्त हैं, फिर दिल्ली और एनसीआर के पाठक वैसा ही एक और अख़बार क्यों झेलेंगे। हर रोज राष्ट्रपति की तस्वीर छापने और मनमोहन सिंह से लेकर पी चिदंबरम की तारीफ़ पर तारीफ़ करने से काम नहीं चलता है।
हाल के दिनों में वंशवाद का मसला हो या फिर कोई और नई दुनिया जिस तरह से सरकार का भोंपू बना है वो गौर करने लायक है। खुद प्रधान संपादक आलोक मेहता ने व्यवस्था के लिहाज से तमाम ग़लत बातों को अपने तर्कों से सही साबित करने की कोशिश की हैं। यह रवैया पाठकों में भरोसा जगाता नहीं बल्कि उनके भरोसे को तोड़ता है।
अगर नई दुनिया मैनेजमेंट की मंशा वाकई में सर्कुलेशन बढ़ाने की है तो उसे कंटेंट पर गंभीरता से काम करना होगा। अपनी छवि सुधारनी होगी। ख़बरों पर विशेष ध्यान देना होगा। जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को चुनौती देनी होगी। जब तक ऐसा नहीं होगा तब तक उसके पांव एनसीआर में नहीं जमने वाले। उसकी जगह रद्दी की दुकान ही है।
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