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थोड़ी जानकारी, थोड़ी हिदायत के साथ ब्लॉग मंथन ख़त्म

ब्लॉग-विमर्श के लिहाज से पहले दिन के मुक़ाबले दूसरे दिन के दोनों सत्र ज़्यादा कारगार लगे। इसकी एक वजह तो समय से सत्र का शुरू होना रहा। अधिक वक्ताओं के विचार आए लेकिन इसके साथ ही तकनीकी सत्र में जिस बारीकी से रविरतलामी, मसिजीवी, ज्ञानदत्त पांडेय और संजय तिवारी ने सूचना, तकनीक औऱ अभिव्यक्ति के बीच के अंतरसंबंधों को बताया वो नॉन-ब्लॉगरों के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण रहे। लेकिन पहले दिन वक्ताओं को बोलने देने में जितनी दरियादिली दिखायी गयी अगले दिन उसकी गाज भाषा, साहित्य और संप्रेषणियता के सवाल पर बोलने आए वक्ताओं पर गिरी। जाहिर तौर पर उसका शिकार मैं भी हुआ। विश्वविद्यालय की ओर से जो न्योता हमें भेजा गया था उसमें ये साफ तौर पर लिखा था कि आप जो भी बातचीत करेंगे उसे प्रकाशित किया जाएगा इसलिए हमनें अपने स्तर से बीस मिनट बोलने के लिहाज से तैयारी की थी जबकि हमें पांच मिनट, सात मिनट के भीतर, गहरे दबाबों के बीच अपनी बात खत्म करनी पड़ी। मैंने तो फिर भी पांच मिनट के निर्धारित समय होने पर भी हील-हुज्जत करके ढाई मिनट आगे तक जार रहा लेकिन बाद के वक्ताओं से कहा गया कि आप एक-एक मिनट में अपनी बात रखें।

दिल्ली से चलते हुए सोचकर कितना अच्छा लग रहा था कि हम देश में पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित होनेवाली चिट्ठाकारी संगोष्ठी में विमर्श करने जा रहे हैं जिसे कि पाठ के रुप में तैयार किया जाएगा। लेकिन आप समझ सकते हैं कि बोलते वक्त हमने ऐसा महसूस किया कि खून, पेशाब, थूक और खखार की तरह यहां अपने विचारों की सैम्पलिंग भर देने आए हैं। वहां मौजूद कुछ लोगों ने ये तर्क दिया कि जब आप पांच मिनट में पढ़नेवाली पोस्ट लिख सकते हैं तो फिर अपनी बात क्यों नहीं रख सकते। पांच मिनट ही क्यों भई, टेलीविजन के हिसाब से सोचें तो 25-30 सेकेंड काफी हैं। इससे ज्यादा की बाइट तो चलती भी नहीं। लेकिन क्या चिट्ठाकारी को जब हम विमर्श और अकादमिक दुनिया में शामिल कर रहे हैं तो उसे निपटाने के अंदाज में ही बात करनी होगी।

अब बिडंबना देखिए कि रियाजउल हक जैसा गंभीर ब्लॉगर वक्ता जब ये कह रहा है कि आप हिन्दी ब्लॉग्स पर नजर डालें तो कहीं से इस बात का अंदाजा नहीं लगेगा कि ये उसी देश की अभिव्यक्ति है जहां हजारों किसानों ने कर्ज के बोझ से आत्महत्या कर ली, दलित समाज का एक तबका आज भी पचास साल पहले के भारत में जीने के लिए अभिशप्त है। हिन्दी ब्लॉगिंग करते हुए जो खतरे हमें उठाने चाहिए, अभी तक हम नहीं उठा रहे हैं और उसके बाद वो पूरी बातचीत को सामाजिक सरोकार और प्रतिबद्ध लेखन की ओर मोड़ना चाह रहे थे, महज दो मिनट के भीतर उन्हे दबाब में आकर बात खत्म करनी पड़ गयी लेकिन वही दूसरे सत्र में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिन्दी प्रोफेसर इस बात की घोषणा करते हुए भी कि उन्हें ब्लॉग के बारे में कुछ भी नहीं पता है, करीब पच्चीस मिनट तक बोल गए। इस पच्चीस मिनट में ऐसा कुछ भी नहीं था जो कि ब्लॉग को लेकर चलनेवाली बहस को आगे ले जाता हो, विमर्श के दायरे का विस्तार करता हो,वही सब जिम्मेदारी का एहसास,लेखन में विवेक का प्रयोग और दुनियाभर के नैतिक आग्रह जिसकी चर्चा पहले दिन ही विस्तार से की गयी। ब्लॉगरों की भाषा में इसे नामवर सिंह की पायरेसी करार दिया गया।

औपचारिकता, हिन्दी साहित्य-समाज से आक्रांत दोनों दिनों की इस संगोष्ठी ने ब्लॉग विमर्श के स्पेस को बहुत ही संकुचित कर दिया। हमें बार-बार इस बात का एहसास कराया गया कि हम हिन्दी साहित्य-समाज के लोगों के बीच रहकर अपनी बात कर रहे हैं तभी तो कुलपति, विभागाध्यक्ष से लेकर एमए तक के स्टूडेंट ने हमें आगाह किया कि आप अनुशासित बनिए। संतोष नाम के एक स्टूडेंट ने जब मुझे मंच से अनुशासित होने और धैर्य से दस मिनट नहीं बैठने लायक करार दिया तो हमें इस बात का यकीन हो गया कि आनेवाले समय में हिन्दी साहित्य से जुड़ी संस्थाएं और विभाग अगर चिट्ठाकारी पर किसी भी तरह का आयोजन करती है तो इसका बंटाधार कर देगी। मैंने उन्हें बस इतना ही कहा कि हम यहां योग और साधना शिविर में नहीं आए हैं कि हिलना-डुलना बंद कर दें। हम विचलन की स्थिति में जी रहे हैं और उन्हीं सबके बीच अपनी बात रखनी है। हिन्दी समाज में चिट्ठाकारी को साहित्यिक मापदंड़ों के खांचे में फिट करने की छटपटाहट बहुत अधिक है। तभी उन्होंने ब्लॉग की तकनीकी, सुविधाओं, शर्तों और शैलियों को तो अपना लिया, लेकिन ब्लॉग शब्द को अपनाने से इनकार कर दिया। ब्लॉग की जगह वो चिट्ठाकारी शब्द का प्रयोग कर थै-थै नाच रहे हैं। नामवर सिंह इस शब्द के प्रयोग का श्रेय म.गां.अं.विश्वविद्यालय को देते हैं। हमें तो चिट्ठाकारी टाइप करने में असुविधा हो रही है। आते समय डेस्क पर पड़ी एक रिपोर्ट पर नजर गयी, शीर्षक था- चिट्ठाकारी से साहित्य को कोई खतरा नहीं। अब बताइए चिट्ठाकारी को साहित्य के बरक्स खड़ी करने की क्यों जरुरत पड़ गयी? इस पर गंभीरता से चर्चा की जानी चाहिए।

बहरहाल, दूसरे दिन के पहले सत्र चिट्ठाकारीः भाषा और साहित्य के सवाल पर प्रथम वक्ता के तौर पर मसिजीवी नाम से मशहूर ब्लॉगर विजेन्द्र सिंह चौहान ने अपनी बात रखी। उन्होंने स्पष्ट किया कि कई बार हमें लगता है कि चिट्ठाकारी की बिल्कुल कोई नयी और अलग भाषा है। लेकिन क्या सचमुच ऐसा है? ये उसी रुप में नया है जिस रूप में ये हंस में नहीं आता, कथादेश में नहीं आता, साहित्य की किताबों में नहीं आता। लेकिन गंभीरता से विचार करें तो ब्लॉग की कोई नयी भाषा नहीं है। ये बोली जानेवाली भाषा, कई अलग-अलग जगहों पर बोली जानेवाली भाषा का ही रुप है। शुरुआती दौर से ही चिट्ठाकारी को जिन लोगों ने आगे बढ़ाया वो हिन्दी के लोग नहीं थे, उनका साहित्य से कोई लेना-देना नहीं था लेकिन ये भी है कि वो इसी जुनून के तहत उसका विकास करते गए। इसलिए भाषा के सवाल पर हमें इस लिहाज से भी सोचना होगा। उन्होंने कहा कि हम चिट्ठाकारी में टाइप करते हुए छोटी-मोटी गलतियां करते हैं लेकिन ये कोई बड़ी बात नहीं है। हां, दिक्कत तब है जब हम इस पर गर्व करने लग जाते हैं।

हिमांशु को चिट्ठाकारी में कविता और उसकी भाषा के संदर्भ में बातचीत करने के लिए आमंत्रित किया गया। उन्होंने चिट्ठाकारी पर मौजूद कविताओं का पाठ भी किया लेकिन मनीषा पांडेय के ये कहे जाने पर कि आप अपनी बात कीजिए, सिर्फ कविता क्यों सुना रहे हैं तो उन्होंने कहा कि मैं अभी इसे समझ ही रहा हूं इसलिए सीधे-सीधे इस पर बात नहीं कर सकता। मनीषा को उनका ये नॉनसीरियस रवैया पसंद नहीं आया। ये अलग बात है कि अंत तक हिमांशु का कविता सुनाना जारी रहा।

वक्ता के तौर पर चिट्ठाकारीः भाषा और संप्रेषणीयता के सवाल पर मुझे बोलने के लिए बुलाया गया। भाषा पर बातचीत करने के पहले मैंने स्पष्ट करने की कोशिश की कि- मैं हिन्दी चिट्ठाकारी को बनाम की जुमलेबाजी से अलग करके देखना चाहता हूं। मैं न तो इसे साहित्य बनाम ब्लॉग,न तो मीडिया बनाम ब्लॉग और न ही समाज सेवा बनाम ब्लॉग के तौर पर देख रहा हूं। मैं इसे इसी रुप में देख रहा हूं जिस रुप में देख रहा हूं। हिमांशु का इस संबंध में मानना रहा कि मैं अलग से ब्लॉग को नहीं लेता। अगर वो कहीं छप गयी तो कविता है, कहानी है, नहीं छपी है, नेट पर है तो वही पोस्ट है। दूसरी बात जो कि मुझे लगी वो ये कि हमें हिन्दी चिट्ठाकारी पर बात करते हुए संदर्भों की तलाश करनी चाहिए। सिर्फ सतहीपन, अनर्गल और कुंठासुर जैसे सरलीकृत नजरिए को पेश करके हम इस पर बात नहीं कर सकते।

दूसरे दिन में अब तक की बहस पर स्त्री के सवालों पर लिखी जानेवाली पोस्टों पर किसी ने कुछ नहीं कहा। रियाजउल, अशोक पांडेय, गिरीन्द्र, राकेश कुमार सिंह जैसे लोग समाज औऱ सरोकार पर जो कुछ भी लिख रहे हैं, उसकी कहीं कोई चर्चा नहीं की गयी। ऐसा न किया जाना भी एक राजनीति का हिस्सा हो सकता है। संभव है इस तरह के आयोजन हमारे भीतर एक लोभ पैदा करते हों कि आप अगर चीजों को एक खास संदर्भ में देखते हैं तो आपके पक्ष में कई संभावनाएं हैं। आज ब्लॉगिंग ने मीडिया औऱ टेलीविजन आलोचना के लिए जितना बड़ा स्पेस तैयार किया है उतना शायद ही अखबारों औऱ किताबों के जरिए हुआ होगा। बड़े स्तर पर नास्टॉलजिक राइटिंग की जा रही है, स्ट्रैटजी के साथ लेखन किया जा रहा है, रविरतलामी जैसे लोग भाषा-प्रौद्योगिकी का पाठ तैयार कर रहे हैं, उस पर आप बात ही नहीं कर रहे। हमें भाषा को इसी सिरे से पकड़ने की जरुरत है कि इन संदर्भों के बीच ब्लॉग की भाषा किस रुप में निर्मित हो रही है?

मैं फुरसतिया के प्रचार शब्द से असहमति जताते हुए कहूंगा कि अरविंद जी ने ये बात विस्तार से बताने की कोशिश की कि विज्ञान की दुनिया में जो कुछ भी नया चल रहा है हिन्दी में वो साइंस ब्लॉग में मौजूद है। ये बात काफी हद तक सही भी है कि हिन्दी में साइंस पर बहुत कम लिखा जाता है। हां, इस लेखन की चर्चा करते हुए अरविंद मिश्रा ने बाकी ब्लॉगरों के नाम लेने के वाबजूद लगभग सारे उदाहरण अपने साइंस ब्लॉग से दिए। गिरिजेश राव बोल रहे थे कि मैं अपने खोए हुए रिकार्डर की ताकीद करने के सिलसिले में ऑफिस के लोगों से बीतचीत में उलझ गया और वापस आने पर संतोष की ओर से मेरे लिए की गयी व्यक्तिगत टिप्पणी को लेकर उत्तेजित औऱ परेशान हो गया। गिरिजेश राव और विपिन की बात को मैं सुन नहीं पाया इसके लिए माफ करेंगे। इस पूरे सत्र की अध्यक्षता प्रियंकर पालीवाल ने की और पूरे सत्र तक जमे रहे जबकि इरफान ने मंच संचालन करते हुए, अपनी खूबसूरत आवाज से हमारे भीतर चल रहे उठापटक को लगातार संतुलित करने का काम किया।

भोजन अवकाश के बाद गांव को लेकर एक किस्म की जो फैंटेसी शहर के लोगों के बीच होती है और शहरी मानसिकता पनपनी शुरु होती है, इस गंभीर सच की थीम पर बनी फिल्म सरपत की स्क्रीनिंग की गयी। अभय तिवारी ने इस फिल्म के जरिए गांव को एक परिभाषा में बदल दिए जाने की कवायद को शिद्दत के साथ देखने की कोशिश की है। 18 मिनट की इस फिल्म के दिखाए जाने के बाद चिट्ठाकारीः तकनीकी पक्ष का सत्र शुरु होता है।

दोनों दिनों के कुल सत्रों को अगर हम मिलाकर तुलना करें तो ये सबसे ज्यादा गंभीर सत्र रहा। ये अलग बात है कि इस सत्र में थोड़ी दूर के लिए मैं स्वयं एजी ऑफिस के पास जूस पीने चला गया। यशवंत सिविल लाइन्स के लिए रिक्शा खोजने निकले। मनीषा चायवाले बाबा के साथ कटबहसी कर रही थी। मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया, सेमिनार की थकान, धुएं में उड़ाता गया के अंदाज में इरफान बाहर दिखे। मेरी ओर से मनीषा को दी गयी किताब भूपेन को इतनी जरुरी लगी कि बाहर फोटोकॉपी की मशीन ढूंढने में व्यस्त नजर आए। अविनाश अलोप हो गए। समरेन्द्र मामू लोग से मिलने निकल पड़े। ब्लॉगरों के लिए ये सत्र ट्यूटोरियल क्लास की तरह ही लगा। लेकिन जूस पीने के बाद जब मैं अंदर आकर बैठा तो महसूस किया कि चिट्ठाकारी के नाम पर जो हम बौद्धिक बहसें कर रहे हैं, अपनी बौद्धिकता झाड़ रहे हैं, उन सबसे हटकर हम ब्लॉगरों को एक साल तक लगातार देश के अलग-अलग हिस्सों में जाकर ब्लॉग शिविर लगाने चाहिए। क्योंकि ब्लॉगरों के नदारद होने के वाबजूद भी इस सत्र में कुर्सी लगभग भरी हुई थी। लोग चीजों को गौर से सुन रहे थे और नहीं समझ में आने पर सवाल भी कर रहे थे।

खैर, इस सत्र में रविरतलामी ने यूनीकोड को लेकर विस्तार से बताया। फांट को लेकर सुझाव दिए और हमें हिन्दी की वर्तनी को किस तरह से चेक करें। दिल्ली में उस सॉफ्टवेयर को कहां से खरीदें। ये सबकुछ बताया। ज्ञानदत्त पांडेय ने ब्लॉगिंग में समय प्रबंधन के महत्व और उसके तरीके को सटीक तौर पर बताया। मसिजीवी के लिखने और पढ़ने के बीच के समय-अनुपात को समझाया। मसिजीवी ने स्टेप वाइज स्टेप ब्लॉग बनाने, नियंत्रित किए जाने और उसे जिंदा रखने के तरीकों पर चर्चा की और डेमो के जरिए इसे प्रयोग करके बताया। इस सत्र में संजय तिवारी की ओर से इंटरनेट के चालीस साल होने और उसके विविध पड़ावों से गुजरने की घटना को गंभीरता से देखने-समझने को अनिवार्य बताया। संजय तिवारी ने यह कहते हुए कि हम बुरे दौर से गुजर रहे हैं जिसे कि इन्होंने पहले सत्र में भी कहा था इसके विकल्पों की तलाश करने की प्रक्रिया पर भी अपनी बात रखी। एक ब्लॉग के बना लेने के बाद हम तीसमार खां नहीं हो जाते। हमें इंटरनेट की दुनिया को बारीकी से समझने की जरुरत है, संजय तिवारी की बात से ये पक्ष बार-बार उभरकर सामने आया।

ब्लॉग-तकनीक से जुड़े करीब 8 सवालों (मेरी मौजूदगी में) के पूछे जाने और वक्ताओं की ओर से विस्तार से चर्चा किए जाने के बाद सत्र समाप्ति की औपचारिक घोषणा की जाती है। उसके बाद हिन्दी के प्रोफेसर राजेन्द्र कुमार फिर से उन सारे हिदायतों दोहराते हैं जिसे कि नामवर सिंह ने उदघाटन सत्र के दौरान हमें दी थीं। यहां मुझे नब्बे साल से पंडितजी नाम से मशहूर उस गोलगप्पा और चाट खिलानेवाले बाबा की याद आ जाती है, जब मैंने पांच गोलगप्पे खाने के बाद पूछा कि हो गया बाबा? बाबा ने जबाब दिया था कि जहां से शुरू किए हैं वहीं से खत्म करेंगे न बेटा। उन्होंने खट्टे पानी से खिलाना शुरु किया था, बीच में मीठा पानी, फिर घुघनी भरके, फिर दही डालकर.. मैंने तभी सवाल किया था और उन्होंने वापस खट्टे पानी पर लौटने की बात की थी।

दूसरे सत्र की समाप्ति के बाद हम ब्लॉगरों को स्मृति चिन्ह और प्रशस्ति पत्र लेने के लिए बारी-बारी से मंच पर बुलाया गया। इस कार्यक्रम के सह-संयोजक सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी ने एक बार फिर से हम ब्लॉगरों के बारे में परिचय दिया। ये परिचय ब्लॉग और लिंक के परिचय से अलग था। इन दोनों के भीतर जो भी अपनी पहचान बनी थी,उससे लोगों को अवगत कराया। हमने अपनी-अपनी कमाई बटोरी और कार्यक्रम खत्म होने की घोषणा के साथ ही बाहर आए।

बाहर आकर एक अजीब किस्म की भावुकता से मैं भर गया। लग रहा था कि पता नहीं अब कब किससे मिलना हो। रवि रतलामी के साथ तस्वीर खींचावाने की इच्छा थी। उनकी गाड़ी स्टार्ट हो चुकी थी,मुझे देखकर उन्हें मेरी बात याद आ गयी और एक-एक करके सब उचर गए। बांह में भरकर उन्होंने तस्वीर खिंचायी…और फिर सबों ने साथ-साथ। फिर विदा हुए।

इधर ब्लॉगरों की एक गैंग सीनेट हॉल में होनेवाले मुशायरे में घुसपैठ के लिए बेताब नजर आया। हम भी उनके साथ हो लिए। साढ़े नौ बजे प्रयागराज से लौटना था..लेकिन अभी छ ही बजे थे। रास्ते में मसिजीवी इस बात पर अफसोस कर रहे थे कि एक दिन और क्यों रुकना पड़ गया और मैं अफसोस कर रहा था कि मैं क्यो नहीं रुक गया? कल को कोई पूछे कि इलाहाबाद में क्या देखा तो कुछ भी नहीं बता पाउंगा।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय देखकर आंखें चौंधिया गयी। मसिजीवी ने मेरी तस्वीरें लीं। फिर अंदर दाखिल हुए। मुशायरा शुरु हो चला था। नजर के सामने नाचता रिकार्डर,लोगों से अलग होने पर एक बाजिब किस्म की भावुकता और लंबी थकान के बीच मुशायरे ने मुझ पर कोई असर नहीं किया। मन उचट गया। उधर से अविनाश और यश मालवीय भी बाहर जाते दिखे। उन्होंने भी कहा कि मजा नहीं आया चट गए। मैंने कहा- चट गए हैं तो क्यों न फिर चाट खाने चलें। अजय ब्रह्मात्मज ने कहा था कि इलाहाबाद में चाट जरुर खाना। बिना हैलमेट के यश भाई की बाइक पर हम दोनों लग गए। नब्बे साल की पुरानी पंडितजी की चाट दूकान पहुंचने तक यश भाई की कविताओं और हाथ लहरा-लहराकर गीत गाने का सिलसिला जारी रहा-
पिंजरा में देखो बोले,राम नाम टुइयां
शहरों से भलो हमरो गांव मोरी गुइयां..

चाट खाने के बाद हम मस्त हो गए फिर विश्राम होटल तक यश भाई और उनके गीतों के साथ। होटल पहुंचने पर एक घंटे के लिए क्या शुरु किया जाए..सुनने-सुनाने का दौर? लेकिन ऐसे ही सूखा-सूखी। यश भाई ने कहा कि आपलोग यात्रा पर जा रहे हैं, आचमन करना ठीक नहीं होगा। लेकिन बीयर तो चल ही सकती है इस संकल्प के साथ..हेस्टी-टेस्टी पर धावा। आधा से ज्यादा चखना मैं ही खा गया, अदने से एक सेवेन अप को पचाने के लिए। बाहर आकर यश भाई को भाभी का हवाला देकर हम उन्हें विदा होने की बात करते हैं, वो हमें स्टेशन तक छोड़ने की जिद करते हैं। फिर कई कविताओं के टुकड़े एक के बाद एक। वो कहते हैं- दुनिया पैसे कमाती है, हम कहते हैं आदमी कमाते हैं। … उनसे विदा होते वक्त मेरी आंखों के कोर भींग जाते हैं।

वापस आकर दस मिनट के भीतर समान समेटते हैं। समरेन्द्र भाई के दोस्त की गाड़ी पर लदते हैं और फिर इलाहाबाद स्टेशन। तीन थाली पैक कराकर फिर प्रयागराज के भीतर। बातचीत का दौर, आसपास की लड़कियों से थोड़ा भी सट जाने पर टोका-टोकी का दौर शुरु। हम बातें करना चाहते हैं लोग सोना चाहते हैं। हम ठहाके लगाना चाहते हैं, वो खर्राटे लगाने लग जाते हैं। हम तीनों ट्वॉयलेट के पास खड़े होकर देर रात तक बातें करते हैं। रेलवे के कर्मचारी के साथ गप्पें मारते हैं और फिर वापस आकर अपने-अपने बिस्तर में दुबक जाते हैं।

अपने हॉस्टल के कमरे के सामने पांच अखबार पड़े हैं। ओह..आज तो संडे है, तभी तो पांच अखबार। इन चार दिनों में दिल्ली में क्या हुआ, नहीं मालूम, हॉस्टल में क्या हुआ नहीं पता.. तब से लेकर अब तक तो इस पोस्ट को लेकर ही भिड़ा रहा। ..पुरानी दुनिया में वापस।

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6 Responses to थोड़ी जानकारी, थोड़ी हिदायत के साथ ब्लॉग मंथन ख़त्म

  1. गिरीन्द्र Reply

    October 25, 2009 at 3:36 pm

    शुक्रिया, अच्छा लगा संस्मरण रूप स्टाइल में रपट पढ़कर। मुझे रवि रतलामी की बातों में अधिक रूचि है। गुजारिश है कि आप इस पर और भी जानकारी दें क्योंकि जो जानकारी ब्लॉग मंथन से निकली होगी उसका अधिकांश हिस्सा रतलामी साहेब ही परोसे होंगे। ऐसा मेरा मानना है।

  2. विनीत कुमार Reply

    October 25, 2009 at 3:51 pm

    समरेन्द्र,आपने पोस्ट में तस्वीर लगायी है,उसे बदल सकें तो बदल दें। रवि रतलामी के साथ की ये तस्वीर बहुत ही अंतरंग है,मैंने किसी भी तरह के आत्म-प्रचार की भावना से नहीं ली है। कार्यक्रम की और भी कई तस्वीरें हैं।. लेकिन अपनी ही लिखी पोस्ट के साथ अपनी तस्वीर देखकर थोड़ा असहज महसूस कर रहा हूं।

  3. समरेंद्र Reply

    October 25, 2009 at 7:33 pm

    विनीत जी,
    तस्वीर बदल दी गई है।

  4. virendra jain Reply

    October 27, 2009 at 9:21 pm

    अफसोस कि मुझे किसी ने नहिन बुलाया अरे भाई में भी तो ब्लोग लिखता हुं

  5. arun pandey Reply

    October 28, 2009 at 1:51 am

    विनीत बाबू, ब्लाग मंथन तो हो गया। आप ठीक ही लिखते हैं पर मामला थोड़ा बोझिल और उबाऊ कर देते हैं। मेरा मानना है कि ब्लाग लिखने का सबसे सही मंत्र यही है कि आप जान ले कि किसके लिए लिखा जा रहा है। इंटरनेट में पढ़ने वाले के लिए इतने लंबे और थकाऊ ब्लाग आपकी अपनी मेहनत में पानी फेर देते हैं। ब्लाग मंथन में मैं तो नहीं गया,शायद कभी इसके लिए eligible भी न हो पाऊं पर ये तो मालूम है कि कब कहां और कितना और किसके लिए लिखना चाहिए जिससे कि सामने वाला उसे पढ़ने का वक्त भी निकाल सके।

  6. विनीत कुमार Reply

    October 28, 2009 at 7:38 pm

    अरुणजी
    आपने बिल्कुल सही कहा। लेकिन ऐसा करते हुए मैं डॉक्यूमेंटेशन करता हूं। ये मेरे रिसर्च का हिस्सा है। मैं कभी भी इस नीयत से नहीं लिखता कि लोग चलताउ तरीके से पढ़े औऱ वाह-वाह करके ताली पिटने लग जाएं। ये टाइमपास पोस्ट नही है,विमर्श का एक हिस्सा है और इसके लिए तो पशेंस रखने ही होंगे।

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