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राज की जीत में मुंबई की हार है

महाराष्ट्र चुनाव के नतीजे देखकर राज ठाकरे बहुत खुश होंगे। एक तो यूं कि चचा को बता दिया कि उनका असली राजनीतिक उत्तराधिकारी उनका बेटा ऊद्धव नहीं बल्कि वो खुद हैं। दूसरा ये कि एमएनएस के गुंडों ने उत्तर भारतीय के खिलाफ मुंबई में जो हिंसा की थी उसको राज ठाकरे अब नतीजों के आइने में निहारेंगे और अपनी पीठ ठोंक कर मराठी में कुछ यूं कहेंगे – मिनी जे काय केलाय, बरोबर केलाय..(जो मैने किया सही किया)।

मुंबई इस बार वाकई बंटी नजर आयी। राज ठाकरे की एमएनएस मुंबई की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी। लेकिन राज ठाकरे की बदौलत इस बार उत्तर भारतीय वोटरों ने भी वोट पोलराइज कर दिया। मुंबई की दस सीटों पर उत्तर भारतीय उम्मीदवार ही जीते, यानी एमएनएस के डर से मराठी और गैर मराठी वोटरों ने अपने-अपने तबके के लोगों को ही जिताया। कम से कम भूमिपुत्र और ‘मुंबई मराठियों की’ का नारा देकर जो चचा ने चार दशक पहले बीज बोये उसी फसल की दोबारा रोपाई आज राज ठाकरे कर रहे हैं। ये बात अलग है कि आज चचा उनके साथ नहीं। क्योंकि भतीजे ने उन्हें भी आइना दिखा दिया है।

ठाकरे परिवार में हर कोई किसी न किसी को नापसंद जरूर करता है। बालासाहेब ने शिव सेना की नींव ही गैर मराठीवाद पर रखी। बाद में उन्हें अल्पसंख्यक समुदाय के मुंबईकर भी नहीं पसंद आये। भतीजे को भी यही घुट्टी पिलायी। जब वो बड़ा हुया तो उसने एमएनएस बनायी और गैर-मराठीवाद का परचम लहराया। उत्तर भारतीयों को चुन-चुन कर रोड, स्टेशन, गली मुहल्लों में निशाना बनाया। वो अंग्रेजी से भी नफ़रत करते हैं इसलिये दुकानों और शोरूमों के आगे टीन-टब्बर पर जो कुछ अंग्रेजी में लिखा पाया गिरा दिया। शायद कुछ दिनों में अपने चचा का पूरा डीएनए मैपिंग करवायें और अल्पसंख्यकों से भी नफ़रत करने लगे।

बालासाहेब को अपने बेटे और अपने हाथों से बनायी पार्टी कि ये गत देखकर ( शिवसेना इन चुनावों में चौथे नम्बर की पार्टी बनी ) ठेस जरूर पहुंची होगी लेकिन राज की बदहवासी जीत देखकर उनका मन दीवार के अमिताभ बच्चन के उस डॉयलॉग को बार बार दोहरा रहा होगा – आज -खुश तो बहुत होगे तुम। जो आज तक तुम्हारे बताये रास्ते पे चला, जिसने आज तक तुम्हारे आगे हमेशा सर झुकाया, जिसने तुमसे अलग होने के बाद आज तक तुम्हारे सामने हाथ नहीं जोड़े – वो! वो आज तुम्हारी लगायी फसल काट रहा है। आज – खुश तो बहुत होगे तुम …हाँ, आज खुश तो बहुत होगे तुम, कि मैं हार गया..

लेकिन मुंबई का एक बहुत बड़ा तबका, यूपी के शहरों से मुंबई आये दूध और डेरी वाले, गाजीपुर, प्रतापगढ, सुल्तानपुर के हजारों टैक्सी, ऑटो वाले, मुंबई की फिल्म इंडस्ट्री में भोजपुरी फिल्मों में अपनी किस्मत आज़माने बिहार और यूपी से आये युवा, मल्टीनेशनल कंपनियों में काम करने वाले हजारों गैर-मराठी लोग, छोटे उद्योगों को मुंबई में बसाने और मुंबई की खुशियों में इजाफा करने वाले हजारों गैर-मराठी लोग, फेरी वाले, वकील, डाक्टर हर कोई वो शख्स जिसकी मातृ-भाषा मराठी न हो – अमिताभ बच्चन से लेकर कमाल खान तक – उसे राज ठाकरे की जीत में अपनी हार दिखेगी। क्योंकि राज ठाकरे की तरह उनके लिये भी मुंबई जीने का सहारा बन चुकी है। उनकी कर्मभूमि बन चुकी है। और अब वो इस दोहरे खौफ में जियेंगे कि जिसकी राजनीति ने उन्हें इतनी चोट पहुंचायी वो जन समर्थन के बाद शायद वैसा ही न हो जाये जैसे इस बात का डर हमेशा बना रहता है कि कहीं तालिबानियों के हाथ पाकिस्तान का न्यूक्लियर बटन न आ जाये।

तीन साल में ही राज ठाकरे और उनकी एमएनएस नें राजनीति का चोगा पहन कर गुंडई की एक ऐसी मिसाल पेश की है कि अंडरवर्लड के भी पसीने छूट जायें। मुंबई-ठाणे-नाशिक की बेल्ट में एमएनएस के उत्पात का खौफ ऐसा था कि ट्रेन की ट्रेन भर भर कर लोग वापस यूपी-बिहार अपने गांव, शहर लौटने लगे थे। अब जब मुंबई की इतनी सीटें राज की झोली में हैं तो बस उनके अंगुली उठाने भर की देर है। कहीं भी कुछ भी करा सकते हैं। अंगुली हिलाना तो वो अपने चचा से ही सीखे हैं। एक जमाना था जब चचा ही सरकार थे। मुंबई का पत्ता भी उनके कहे बगैर नहीं हिलता था। बड़ी बड़ी मल्टीनेश्नल कंपनियों का भी बोरिया बिस्तर उठा दिया था उन्होने। राज भी उसी राह पर हैं। ‘सरकार’ के असली उत्तराधिकारी वो ही हैं ये बाद अब वो ताल ठोंक कर कहेंगे।

यानि आमची मुंबई अब राजची मुंबई बन जायेगी जहां पर ‘सरकार राज’ चलेगा ये कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी। क्योंकि उनके पास तो अब नंबर भी हैं। उनके गुंडा राज पर अब “जनता” ने मुहर लगा दी है। तो कांग्रेस खुश होती रहे कि उसके गठबंधन नें महाराष्ट्र में तीसरी बार जीत दर्ज कर रिकॉर्ड कायम किया है मगर ये पहला चुनाव होगा जिसमें जनता वोट डाल कर भी हार गयी।

(लेखक IBN7 में एडिटर – स्पेशल असाइनमेंट हैं )

((प्रभात शुंगलू का यह लेख नई दुनिया में छपा है।))

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3 Responses to राज की जीत में मुंबई की हार है

  1. शशि सिंह Reply

    October 26, 2009 at 5:36 pm

    ये तो बड़ी नाइंसाफी है। मुसीबत की असली जड़ कांग्रेस को तो कुछ कह ही नहीं रहा है। वामपंथियों को निपटाने के लिए एक कार्टूनिस्ट को बाल ठाकरे बना दिया और अब अपने पापों पर पर्दा डालने के लिए दूसरे कार्टूनिस्ट राज ठाकरे के हाथों पहले का कैरीकेचर बनवाने में लगी है। सारी मुसीबत की जड़ कांग्रेस ही है। वरना किसी गुंडे में कहा इतना दम कि मुंबई को बंधक बना ले और शासन कुछ न कर पाये?

  2. अरविंद शेष Reply

    October 26, 2009 at 7:21 pm

    शशि सिंह बिल्कुल सही कह रहे हैं।

  3. aam admi Reply

    October 27, 2009 at 4:18 pm

    “….मगर ये पहला चुनाव होगा जिसमें जनता वोट डाल कर भी हार गयी.” aisi baat nahin hai prabhat ji. 1952 se lekar aaj tak har chunav me vote dekar janta hi haarti rahi hai.azab dekhiye ki is desh me 77% log garibi rekha ke niche hain aur karoron log 20 rupay se bhi kam me gujar-basar kar rahe hain (Arjun Sengupta Committee), phir bhi in badhaliyon aur gurbaton ke liye jimmedaar evam punjipation aur corporate ghararon ki pairokari karnewali rajniti maje me jit jati rahi hai. aur yeh kisi se chupa hua nahin ki is kism ki rajniti ki sabse badi alambardar Congress hai. iske bavjood sara desh Congress ke “yuvraj” ka gungan kar raha hai aur unse ek bade badlao ki ummid lagaye baitha hai. sabse badi dukhti rag to yeh hai ki jis budhijeevi tabke(?) ko is kism ki rajniti ka vikalp pesh karne ki jimmedari uthani thi, wah “yuvraj” aur mamata banerjee type netaon ki “rajniti” par mugdh hua jaa raha hai aur samaj me confusion ki isthiti paida kar raha hai. mujhe malum hai ki mere aisa kahne par bhai log paschim bangal ke vampanthiyon ki kargujariyon ko ginane lag jayenge. par kya vampanthiyon ki harkaton ko ginane se is desh ki barbadiyon ki jimmedar Congress type partiyon ki kartuton ko nazarandaz kar diya jaye?

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