इलाहाबाद से जब से लौटा हूं… एक आशंका गहरा रही है। लगता है कि अब ब्लॉग के रेग्युलेशन की मांग जोर पकड़ेगी। आए दिन ब्लॉगरों पर मुक़दमे होंगे। बेनामियों की धर-पकड़ तेज होगी। तभी तो नामवर सिंह ने कहा कि “कहने से जीभ नहीं कटती मगर लिखने से हाथ कट जाते हैं”। तभी तो विभूति नारायण राय ने कहा कि आप सबको मालूम होने चाहिए कि जब स्टेट इस तरह के मामले में दखल करती है तो उसका रवैया किस तरह का होता है? ऐसे मसले में ब्यूरोक्रेसी जब नियंत्रण की कोशिश करेगी तो आपको मुश्किलों से दो-चार होना पड़ सकता है?
सम्मेलन के पहले सत्र में यह बार-बार लगा कि हमें डराने-समझाने के लिए बुलाया गया है। वहां मौजूद लोगों का ज़ोर अभिव्यक्ति की आज़ादी पर नहीं था। बल्कि वहां जुटे ब्लॉगरों के जेहन में ज़िम्मेदारी के नाम पर एक ख़ौफ भर देना था। हम नामवर सिंह और विभूति नारायण राय – दोनों से ज़िम्मेदारी का मतलब पूछना चाहते थे। यह समझना चाहते थे कि आखिर किस तरह की जिम्मेदारी की बात कर रहे हैं वो? लेकिन उन्होंने इसका मौका ही नहीं दिया। अपने-अपने भाषण के बाद अपने ही संस्थान से सम्मान ग्रहण किया और फिर पहले से तय दूसरे कार्यक्रमों में हिस्सा लेने के लिए चले गए। जिम्मेदारी पर विचार करने के लिए पीछे छूट गए हम जैसे ब्लॉगर। जिन्हें भाड़ा और भोजन देकर अपने-अपने शहरों से इलाहाबाद बुलाया गया था।
वैसे इन दिनों हर कोई ब्लॉगरों को जिम्मेदार बना रहा है। बड़े-बुजुर्ग और अहम ओहदों पर बैठे लोग आंखें तरेर रहे हैं और कह रहे हैं कि सुधर जाओ वरना अंजाम बुरा होगा। आखिर क्यों? क्यों बार-बार चेतावनी दी जा रही है कि अनुशासन में लिखो? कोई लाख हेरा-फेरी करे, लेकिन उसे दलाल मत कहो। कोई भूमिहारवाद, ब्राह्मणवाद, ठाकुरवाद फैलाए, लेकिन उसे जातिवादी मत कहो। कोई धर्म के नाम पर लहू बहाए, मगर उसे कट्टरपंथी मत कहो। ठीक है। हम यह बात मान लेते हैं। लेकिन यहां हमारे एक सवाल का जवाब दीजिए। ऐसे तमाम लोगों को आखिर कहा क्या जाए?
दरअसल, नामवर सिंह और विभूति नारायण राय जैसे लोग बेहद डरे हुए हैं। कुछ समय पहले तक उनके बारे-बारे में हर जगह अच्छा-अच्छा छपता था। वो अपने-अपने मठों के मालिक हैं। और उनके जैसे तमाम मठाधीश दूसरे संस्थानों के शीर्ष पर बैठे हुए हैं। ये सभी व्यक्तिगत जीवन में जो कर्म करें, लेकिन सामूहिक जीवन में एक सिद्धांत का पालन करते हैं। वो सिद्धांत है कि जिनके खुद के घर शीशे के हों वो दूसरों के घरों पर पत्थर नहीं फेंका करते। इसलिए वो सभी कभी किसी के घर पर पत्थर नहीं उछालते और एक-दूसरे के मुखौटे हटाने की कोशिश नहीं करते।
इस अघोषित समझौते का असर यह हुआ कि हर कोई अपनी जाति और जरूरत के हिसाब से लोगों को संरक्षण देता चला गया और पवित्र भी बना रहा। नामवर सिंह हिंदी के भीष्म पितामह बन गए। विभूति नारायण राय पुलिस महकमे में होते हुए भी प्रगतिशील किस्म के विचारक बने रहे। लेकिन ब्लॉग के आने के बाद से सूरत कुछ बदली है। इन मठाधीशों के चेहरे पर लगे मुखौटे हटे हैं। इनकी पवित्रता पर अंगुलियां उठने लगी हैं। कभी किसी मोहल्ले पर उनके जातिवादी चेहरा बेनकाब हो जाता तो कहीं और कोई उनकी पोल खोल देता। ये तमाम नामवर और विभूति घूम-घूम कर कहते तो जरूर हैं कि वो ब्लॉग नहीं पढ़ते… इंटरनेट पर नहीं जाते, लेकिन हमें ख़बर है कि वो अपने चेले-चटियों से प्रिंट मंगा कर पढ़ते हैं और गुस्से में लाल भी होते हैं।
हम अपने को भुलावे में नहीं रखना चाहते। हमें यह मालूम है कि ब्लॉग के जरिए कोई क्रांति नहीं होने वाली। यह एक माध्यम है और इसका हर कोई अपने-अपने हिसाब से इस्तेमाल करेगा। लेकिन हमें यह भी मालूम है कि जो सवाल अब मुख्यधारा की मीडिया में नहीं उठ सकते वो ब्लॉगों में उठाए जा रहे हैं। बीते लोकसभा चुनाव में अख़बारों की कालाबाजारी पर ब्लॉग और वेबसाइटों पर जो चर्चा हुई वो इससे पहले मुमकिन नहीं थी। अख़बारों के जातिवादी चरित्र पर जो बहस ब्लॉग और वेबसाइटों पर हुई वो अख़बारों में मुमकिन नहीं थी। कई संस्थानों और संस्थान का रूप अख्तियार कर चुकी कई महान हस्तियों के ग़लत क़दमों पर जैसी बहसें वेबसाइटों पर हुईं हैं वैसी बहसें अख़बारों में शायद ही कभी हुई होंगी।
ब्लॉग ने रोजी-रोटी की चिंता, भविष्य की अनिश्चितता और बीसियों तरह के समझौतों के बीच हमें अपनी आज़ाद अभिव्यक्ति के लिए एक स्पेस दिया है। इसी स्पेस के बल पर बहुत से लोग खुल कर तो कुछ नाम छुपा कर पुराने और सड़ चुके मठों को तोड़ने का साहस कर रहे हैं। हमें मालूम है कि अगर “तथागत” के बारे में लोगों को पता चला तो वो प्रभात ख़बर में नौकरी नहीं कर सकेंगे। अगर “कबीर” की पहचान सार्वजनिक हुई तो शायद उन पर हमले बढ़ जाएंगे। “चार्वाक सत्य” के बारे में खुलासा हुआ तो बहुत से साथियों से उनके रिश्ते बिगड़ जाएंगे। “प्रेमरंजन” को भी शायद संस्थान से बाहर कर दिया जाए।
इसलिए विभूति नारायण राय और नामवर सिंह जैसे तमाम लोगों से बस इतना ही कहना है कि वो हमें डराना बंद करें। ब्यूरोक्रेसी और रेग्युलेशन की धौंस देना भी बंद करें। साथ ही हो सके तो अपने अतीत में झांक कर देखें कि जाति, धर्म और क्षेत्र के नाम पर कितने लोगों के भविष्य के साथ खिलवाड़ किया है। क्योंकि भ्रष्टाचार का मतलब सिर्फ़ पैसे का लेन-देन ही नहीं है। धर्म, जाति और क्षेत्र के नाम पर किया गया भेदभाव भी भ्रष्टाचार का ही एक रूप है। और इस भ्रष्टाचार को उजागर करने के लिए पहचान गोपनीय रखना कोई गुनाह नहीं।
Mazkoor Alam
October 27, 2009 at 6:28 pm
क बहुत खूब समरेंद्र भाई, ब्लॉग के आने से सबसे ज्यादा असहज वे ही लोग हैं, जो लोग स्थापित हैं. इसका कारण भी सर्वज्ञात है कि सत्ता की चाबी कैसे अपने पास रखी जाए ये इन्हें मालूम है. कहने का आशय यह है कि जो ÓसमरथÓ हैं, अभी तक कलम भी उन्हीं के हाथ थी. अखबार या पत्रिका जैसे पूंजी का खेल भी उन्हीं के द्वारा संचालित होता था. इस वजह से आम आदमी लिखता तो जरूर था, इन मीडिया में, लेकिन कुछ ज्यादा बराबर लोग उस खबर को अपने बराबर कर देते थे. उन्हें Óछोटा मुंह, छोटी बातÓ पसंद नहीं आती थी. खबरों से कैसे खेला जाता है, इस नाम पर वो पहले उसका संपादन करते, फिर उसका डंक निकाल देते. उसके बाद बड़े खूबसूरत अंदाज में खरामा-खरामा खरोंच मारी जा रही है, कह कर उसे लोगों के सामने उन शब्दों में परोसते, जिन शब्दों से आम आदमी का सारोकार ही नहीं होता. वह बेचारा समझ ही नहीं पाता कि कहा क्या गया है. जबकि दूसरी तरफ इंटरनेट क्रांति और ब्लॉग ने इतना तो कर ही दिया है कि कोई भी पागल, जिसके पॉकेट में 20 रुपये हों, किसी कैफे में बैठकर अपनी खबर पोस्ट कर सकता है. और यही कुछ ज्यादा बराबर लोगों के लिए खतरे की घंटी है कि लाखों-करोड़ों लगाने वाले और पाने वाले की बात न सुन कर ये छुटभय्यै टाइप लेखक और उसी टाइप पाठक उनके खिलाफ लिख और पढ़ रहे हैं. इसलिए इन्हें नाथना बहुत जरूरी है.
हां, ब्लॉगर भइया, एक बात और सरकार को चंदा वो देते हैं और सरकार से चंदा वो लेते हैं, इसलिए आपको उनसे डरना ही चाहिए. नहीं तो वो पाठक भी बदल सकते हैं, लेखक भी बदल सकते हैं और कानून भी.
arun pandey
October 28, 2009 at 1:43 am
बात में दम है। दरअसल ऐसे लोगों को लगता है कि उनकी दुनिया ही उजड़ जाने वाली है। लेकिन इन लोगों को जान लेना चाहिए कि हर प्रोडक्ट का लाइफ साइकल होता है। जब तक वो एक्सपोज नहीं होता तब तक लोग खूब खऱीदते हैं। लेकिन जब पोल खुल जाती है तो मिथ्या हो जाता है। कुछ यही हाल हिंदी के इन तथाकथित विद्वानों का है। मैंने इनके नाम सुने हैं। देखा नहीं क्योंकि कभी इच्छा ही नहीं हुई। कुलमिलाकर कंटेंट तो अच्छा था ही लिखा भी बड़े चुटीले लेकिन साफगोई वाले अंदाज में गया है। well done बधाई
संजय ग्रोवर
October 28, 2009 at 2:01 pm
DekheN :-
कुंठा तू न गयी किसी मन से…….
http://samwaadghar.blogspot.com/2009/10/blog-post_708.html
शेष नारायण सिंह
October 28, 2009 at 6:56 pm
zमीडिया के जनवादीकरण के इस दौर में मीडिया की कृपा से मठाधीश बने लोगों की गद्दी खिसकने लगी है.सूचना के प्रसार में बड़ी पूंजी की औकात घटने के बाद उन लोगों के सामने मुश्किल पेश आ रही है जो मीडिया को कण्ट्रोल करने की रणनीति को किसी भी योजना का हिस्सा मानते थे. यह तजुर्बा हमें भी हुआ था जब २४ घंटे के न्यूज़ चैनलों की शुरुआत हुई थी. आम तौर पर अखबारों के मालिकों या सम्पादकों से मिल मिला कर संभाल लेने वाले नेता और मठाधीश परेशान हो गए थे क्योकि किसी भी मौक़ा-ए-वारदात पर मौजूद टी वी रिपोर्टर खबर को ज्यों का त्यों भेज देता था . करीब १० साल बाद अब टी वी न्यूज़ को भी मैनेज करने की विधा विकसित हुई तब तक यह ब्लॉग वाले टूट पड़े और अब मीडिया मैनेज कर के मठाधीश बनने वाले बड़े साहब लोग चिंतित हैं . हो सकता है इसे भी मैनेज करने की कोई तरकीब आ जाये लेकिन अगली पीढी ब्लॉग से भी ज़्यादा क्रांतिकारी जनवादी करण के हथियार ला सकती है . अब लगता है कि आज के दिन के लिए ही दिनकर ने लिखा था कि सिंहासन खाली करो कि जनता आती है.