हिंदुस्तान ने अक्टूबर में एक बेहतरीन काम किया है। हिंदुस्तान “समागम” नाम से पटना और लखनऊ दो शहरों में आयोजन किए। पटना का आयोजन शानदार रहा। थोड़े अंतराल पर ही सही दोनों ने एक ही कार्यक्रम में नीतीश कुमार और लालू यादव – दोनों ने हिस्सा लिया। बिहार की बेहतरी पर लोगों के सामने अपनी राय रखी। वर्तमान में ये दोनों ही बिहार की सियासत की धूरी हैं। नीतीश सत्ता पक्ष का प्रतिनिधित्व करते हैं और एक बड़े तबके की यह धारणा है कि उनका यकीन ओछी सियासत से ज़्यादा विकास की राजनीति में है। दूसरी तरफ करीब डेढ़ दशक तक बिहार में एकछत्र राज करने वाले लालू यादव इस वक़्त विपक्ष में हैं। उनके बारे में धारणा यह है कि वो विकास की राजनीति में यकीन नहीं रखते।
हिंदुस्तान समागम में दोनों ही नेताओं ने बिहार की बेहतरी पर चर्चा की। आपसी रंजिश भुला कर केंद्र की नीतियों पर सवाल उठाए। दोनों ने कहा कि सियासत का लक्ष्य राज्य का विकास होना चाहिए। ऐसा बहुत कम होता है जब दो धुर्र विरोधी आगे-पीछे ही सही एक कार्यक्रम में हिस्सा लें और आपसी रंजिश का जिक्र नहीं हो। इनके अलावा उस कार्यक्रम में कई ऐसी हस्तियां शामिल हुईं जिनका बिहार में काफी दखल रहा है। दीपांकर भट्टाचार्य, शकील अहमद, शत्रुघ्न सिन्हा, शिवानंद तिवारी, एनके सिंह समेत यह फेहरिस्त काफी लंबी है।
आमतौर पर ऐसे कार्यक्रमों का कोई नतीजा नहीं निकलता। कोई यह पूछे कि वहां हुई बहस का क्या नतीजा निकला, तो जवाब देना मुश्किल होगा। लेकिन ऐसी बहसों के कई फायदे होते हैं। पहला फायदा तो यही है कि लोगों के जेहन पर जमी गर्द छंटती है। किसी भी बात को समझने के लिए व्यापक दृष्टिकोण मिलता है। साथ ही कुछ अहम सवाल भी उठते हैं। सवाल कि जब विकास के मुद्दे पर सभी एक सुर में बोल रहे हैं तो फिर चूक किससे और कहां हुई? फिर बिहार विकास की दौड़ में इतना क्यों पिछड़ गया? वो गुनहगार कौन हैं, जिन्होंने लोगों के विश्वास का ख़ून किया है? जब सवाल उठेंगे तो लोग उनका जवाब भी तलाशेंगे। इससे तुरंत कोई फर्क पड़े न पड़े, लेकिन एक सकारात्मक सोच का माहौल बनने लगता है।
बिहार को देखें तो बीते दो दशक में वहां रोल मॉडल बदले हैं। सूरजभान और शहाबुद्दीन जैसे आपराधिक छवि वाले नेता युवाओं के रोड मॉडल बने। अच्छे और बुरे का भेद मिटने और विकल्पों के नहीं होने के कारण आसान रास्तों पर चलने की आदत सी हो गई। अपहरण उद्योग की शक्ल लेने लगा। प्रतिभाओं का पलायन बहुत ज़्यादा होने लगा। अंधेरा होते ही लोग अपने घरों में कैद हो जाते। डर और निराशा के वातावरण में मानसिक सोच कुंठित होती गई। ऐसे में यह बहुत जरूरी है कि पिछड़ेपन के तमाम बुनियादी कारणों पर खुल कर बहस हो। बहस से नए-नए विचार उठते हैं। उनका असर देर से भले ही हो लेकिन होता जरूर है।
दूसरी बात, समागम जैसे कार्यक्रमों से अख़बार की छवि बेहतर होती है। यह भी शुद्ध रूप से एक मार्केटिंग स्ट्रेटेजी है। लेकिन यह रणनीति तौलिया और बिछौना बेचने से बेहतर है। अभी नई दुनिया का उदाहरण लीजिए, सूत्रों के मुताबिक एक हफ़्ते तक करीब पचास हज़ार प्रतियां हर रोज मुफ्त में बांटी गईं। अगर एक प्रति की कीमत सात रुपये भी जोड़ी जाए तो हर रोज़ साढ़े तीन लाख रुपये मुफ़्त में बांटे गए। एक हफ़्ते में यह रकम 24.5 लाख रुपये होती है। इतने में कई सकारात्मक काम किए जा सकते थे, जिनसे अख़बार की ब्रैंडिंग बेहतर होती। विश्वविद्यालयों और कॉलेजों के छात्रों को जोड़ा जा सकता था। युवाओं के लिए प्रतियोगिताओं का आयोजन हो सकता था। उन्हें सामाजिक और कारोबारी क्षेत्र की उन नामचीन हस्तियों से मिलवाया जा सकता था, जो अपने-अपने क्षेत्र में बेहतरीन काम कर रहे हैं। इससे अख़बार की छवि बेहतर होती और सकारात्मक काम करने से सर्कुलेशन पर भी असर पड़ता। हिंदुस्तान वही काम कर रहा है और यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि भविष्य में उसे इसका फल भी मिलेगा।
पटना की तुलना में लखनऊ में हुआ समागम उतना हाई प्रोफाइल नहीं था। मुख़्तार अब्बास नकवी, अखिलेश यादव, जतिन प्रसाद, जयंत चौधरी, संदीप पांडे समेत कई चर्चित चेहरों ने हिस्सा लिया। सत्ताधारी बीएसपी का कोई प्रतिनिधि नहीं शामिल हुआ। बाकी दलों से भी वरिष्ठ नेताओं की जगह युवा चेहरे ही नज़र आए। हो सकता है कि युवा लोगों को बुलाने का फैसला अख़बार का रहा हो। लेकिन सत्ताधारी दल से किसी के नहीं होने से बात अधूरी रह गई। फिर भी समागम की तारीफ़ करनी चाहिए। यह एक सकारात्मक पहल है।
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pankaj jha
October 31, 2009 at 5:51 pm
लखनऊ में हुए समागम में समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव भी नहीं शामिल हुए थे……