नई दुनिया में अक्टूबर में एक सीरीज छापी गई। आमतौर पर मीडिया संस्थान किसी भी बड़ी कंपनी को चुनौती देने से बचते हैं। ऐसे वाकये एक-दो ही होंगे जब किसी मीडिया संस्थान ने देश की किसी ताक़तवर कंपनी के काले कारनामों का खुलासा करने के लिए सीधी मुहिम चलाई हो। नई दुनिया ने यह कारनामा किया है। अनिल अंबानी की कंपनी के ख़िलाफ़ उसके संवाददाता विनोद अग्निहोत्री की रिपोर्ट कई किस्त में छापी गई। इस कवरेज के लिए नई दुनिया के मैनेजमेंट को साधुवाद दिया जाना चाहिए। लेकिन अब जो ख़बरें छन-छन कर सामने आ रही है, वह इस पूरे मसले पर नई रोशनी डालती हैं।
जिन दिनों नई दुनिया में अनिल अंबानी की पोल खोली जा रही थी, उन्हीं दिनों न्यूज़ चैनल न्यूज़ एक्स पर केजी बेसिन गैर विवाद से जुड़ी ख़बरें एक खास अंदाज में प्रसारित की जा रही थीं। देश की एक सम्मानित मीडिया वेबसाइट ने बताया कि जहां दूसरे न्यूज़ चैनल विवाद से जुड़ी ख़बरों को संतुलित तरीके से दिखा रहे हैं न्यूज़ एक्स का झुकाव मुकेश अंबानी की तरफ़ था।
बीते महीने भी न्यूज़ एक्स ने ऐसा ही किया था। गैस विवाद पर अनिल अंबानी की कंपनी ने देश भर के अख़बारों में विज्ञापन जारी किए। उसके कुछ दिन बाद न्यूज़ एक्स पर मुकेश अंबानी के समर्थन में सीरीज़ चलाई गई। अब नई दुनिया में भी अनिल अंबानी की कंपनी के फर्जीवाड़े की पोल खोली गई। आखिर ऐसा क्यों हुआ और न्यूज़ एक्स और नई दुनिया की ख़बरों का आपस में क्या लेना देना है? आखिर क्यों इस पूरे विवाद में… एक न्यूज़ चैनल बड़े भाई के समर्थन में ख़बरें दिखाता है और एक अख़बार छोटे भाई की पोल खोलता है? ये सवाल काफी अहम हैं और इनके जवाब एक ब्लॉग पर दिए गए हैं। ये जवाब पूरी तरह सही हैं या नहीं- यह कहना तो मुश्किल है… लेकिन ब्लॉग में छपी बातें पर मीडिया हल्के में जोरदार चर्चा है। उस ब्लॉग का नाम है - अंबानी ब्रदर्स फाइट डॉट ब्लॉगस्पॉट डॉट कॉम .
ब्लॉग में बताया गया है कि न्यूज़ एक्स और नई दुनिया के मालिक विनय छजलानी की कंपनी “सूवी इंफो मैनेजमेंट प्राइवेट लिमिटेड” में मुकेश अंबानी समूह ने अपनी कंपनी “आर्थिक कमर्शियल्स प्राइवेट लिमिटेड” के जरिए 38 करोड़ रुपये लगाए हैं। इस लिहाज से देखा जाए तो मुकेश अंबानी समूह के न्यूज़ एक्स और नई दुनिया से सीधे रिश्ते जुड़ते हैं। कुछ दिन पहले मीडिया वेबसाइट द हूट पर भी इस ओर इशारा किया गया था। न्यूज़ एक्स और नई दुनिया की रिपोर्टिंग पर गौर करने से ब्लॉग और वेबसाइट पर किए गए दावों में दम नज़र आता है।
अनिल अंबानी का मीडिया प्रेम भी जग जाहिर है। कई मीडिया कंपनियों में उनके निवेश है और कई चैनल लॉन्च करने की योजना है। लेकिन साल-डेढ़ साल से बड़े भाई ने छोटे भाई की चालों का जवाब देने के लिए मीडिया कंपनियों में दखल बढ़ाने की रणनीति पर आक्रामक तरीके से काम किया। उसी ब्लॉग पर बताया गया है कि मुकेश अंबानी ने सब्सिडरी कंपनियों के जरिए न केवल न्यूज़ एक्स और नई दुनिया बल्कि न्यूज़ 24, इंडिया टीवी और ईटीवी नेटवर्क में भी भारी पैसा लगाया है। रिलायंस इंडस्ट्रीज से जुड़ी कंपनियों का इन सभी मीडिया संस्थानों में मोटा निवेश है।
इस लिहाज से देखा जाए तो अब मीडिया के एक बड़े तबके में मुकेश अंबानी के हितों के ख़िलाफ़ जाती हुई कोई ख़बर न तो प्रसारित हो सकती है और न ही प्रकाशित। लेकिन मीडिया जगत के जानकार नई दुनिया के कदम को ज़्यादा ख़तरनाक बता रहे हैं। उनके मुताबिक तमाम निवेश के बावजूद कुछ अख़बारों ने ख़बरों पर आंख मूंद कर समझौता करते हुए मुकेश का गुणगान करने से मना कर दिया। लेकिन नई दुनिया एक औजार के तौर पर इस्तेमाल हो रहा है। उनके मुताबिक विनोद अग्निहोत्री की रिपोर्ट में दम हो सकता है लेकिन टाइमिंग से अख़बार की नीयत पर सवाल उठ खड़े हुए हैं। कुछ पत्रकारों का यह भी कहना है कि विनोद अग्निहोत्री की पहली ही रिपोर्ट में कई बातें ऐसी थी जिन पर सवाल उठाए जा सकते हैं।
ग्यारह अक्टूबर को विनोद अग्निहोत्री की रिपोर्ट का शीर्षक था “अनिल अंबानी के साम्राज्य पर आती नहीं आंच”. उस रिपोर्ट की शुरुआत जिस अंदाज में हुई है उस पर आप गौर करें -
“रिलायंस कम्युनिकेशंस का मशहूर नारा था- “कर लो दुनिया मुट्ठी में।” इस कंपनी के चेयरमैन अनिल अंबानी ने दुनिया तो नहीं, देश की सरकार जरूर अपनी मुट्ठी में कर ली है। सत्ता के गलियारों में, उद्योग जगत की गगनचुंबी इमारतों में और अफसरों के केबिनों में सब कहते हैं कि केंद्र और राज्यों में किसी की भी सरकार हो, लेकिन तूती अनिलभाई की ही बोल रही है। राज्यसभा सांसद के रूप में सत्ता के गलियारों के भीतर तक जा चुके अनिलभाई का दबदबा ऐसा है कि हर सप्ताह, आमतौर पर हर बुधवार कैबिनेट सचिव, प्रधानमंत्री के प्रमुख सचिव और दूसरे कई महत्वपूर्ण सचिव व उच्च अधिकारी छोटे अंबानी की अगवानी अपने दफ्तरों में करते हैं। इसके लिए अनिल हर हफ्ते मुंबई से दिल्ली आते हैं। “नईदुनिया” से प्रधानमंत्री कार्यालय के सूत्रों ने इसकी पुष्टि की है”।
इस इंट्रो का सीधा मतलब यही है कि अनिल अंबानी ने सरकार को खरीद लिया है। सरकार को नहीं भी खरीदा हो तो कई आला अधिकारियों को तो खरीद ही लिया है। विनोद अग्निहोत्री के मुताबिक उनकी इस ख़बर की पुष्टि प्रधानमंत्री कार्यालय के सूत्र करते हैं। इसका मतलब प्रधानमंत्री कार्यालय को भी यह भनक है कि कई आला अधिकारी अनिलभाई के पे-रोल पर हैं। इस जानकारी के बाद भी अगर उन अधिकारियों पर कार्रवाई नहीं हो रही है तो इसका मतलब यही लगाया जाना चाहिए कि यह सब प्रधानमंत्री कार्यालय की रजामंदी से चल रहा है। मतलब प्रधानमंत्री तक अनिल अंबानी की सीधी पहुंच हैं।
अगर ऐसा है तो फिर अनिल अंबानी चीख-चीख कर यह क्यों कह रहे हैं कि सरकार मुकेश अंबानी के आगे बिछी हुई है? तब फिर क्यों रिलायंस से अवैध रिश्ते रखने के आरोप में डायरेक्टर जनरल ऑफ हाइड्रोकार्बन के ओहदे से वी के सिब्बल की विदाई हो गई? यह तो सब जानते हैं कि पेट्रोलियम मंत्री मुरली देवड़ा ने वी के सिब्बल को दो साल का एक्सटेंशन दे दिया था। और उन पर रिलायंस इंडस्ट्रीज से कई तरह के फेवर लेने के आरोप लगे हैं। उनकी बेटियां कई-कई महीने तक रिलायंस के गेस्टहाउस में रुकी हैं। उनकी एक बेटी तो रिलायंस के खरीदे मकान में रह रही थी। राज खुलने के बाद अब जांच हो रही है और उसी मजबूरी में सरकार को वी के सिब्बल का एक्सटेंशन रद्द करना पड़ा है।
कुल मिला कर नई दुनिया में छपी ख़बर की टाइमिंग और तेवर से यह संदेश तो उठता है कि अनिल अंबानी के ख़िलाफ़ ख़बरें मुकेश अंबानी को फायदा पहुंचाने के इरादे से छापी गई हैं। अगर इन ख़बरों में दम है कि मुकेश अंबानी की सब्सिडरी कंपनियों ने नई दुनिया और न्यूज़ एक्स में पैसा लगाया है तो फिर क्लैश ऑफ इंटरेस्ट का मामला बनता है। नई दुनिया और न्यूज़ एक्स मैनेजमेंट को इन आरोपों पर अपना रुख साफ़ करना चाहिए। उन्हें बताना चाहिए कि सच क्या है?
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