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श्रद्धांजलि और सम्मान पर उनका भी हक है

आचार्य नरेंद्र देव

आचार्य नरेंद्र देव

चाहे अखबार हों या न्यूज चैनल, हर जगह इंदिरा गांधी छायी रहीं। इसमें कोई बुराई भी नहीं है। वह 17 साल तक देश की प्रधानमंत्री रहीं और विवादों के साये में ही सही, जब उनकी हत्या हुई, तब वह प्रधानमंत्री थीं। हत्या के साथ खुद अपने अंगरक्षकों का ही भक्षक हो जाना मामले को और गरमाने वाला बन गया। उस पर से अंगरक्षक सिख थे, जो इंदिरा गांधी के ऑपरेशन ब्लू स्टार से खफा थे। समुदाय की गुस्सायी मानसिकता को अपने जेहन में उन्होंने इस कदर बिठा लिया था कि उनके लिए धर्म की आहत भावना अपने कर्तव्य पर भारी पड़ गयी। अखबारों और न्यूज चैनलों में इंदिरा गांधी का बखान भरा रहा। उनका साहस, उनकी दूरदर्शिता, उनकी राष्ट्रभक्ति, उनकी दृढ़ता, विकास को लेकर उनकी सोच से लेकर उनके व्यक्तिगत पहलुओं पर बहुत कुछ लिखा गया। उनमें तारीफ के तमाम लक्षण थे भी। उस गूंगी गुड़िया की मुखर आवाज जमाने को सुनायी पड़ी। बड़े-बड़े आर्थिक दार्शनिकों के प्रवचनों को दरकिनार कर बैंको का राष्ट्रीयकरण किया। बांग्लादेश बनाकर पाकिस्तान को उसकी हैसियत बता दी। समाजवादी नहीं थीं लेकिन राजे-रजवाड़ों के सरकारी पेंशन बंद कर उन्हें भी साफ इशारा कर दिया कि अब यह देश तुम्हारे बाप की जागीर नहीं है। पोखरण में परमाणु विस्फोट करके सुपर पावर देशों को बता दिया कि विनाश के पटाखे फोड़ना सिर्फ उन्हें ही नहीं आता। इस लिहाज से उनकी हत्या के 25 साल बाद उन्हें याद किया जाना चाहिए।

देश दुखी है। दुखी तो हम भी हैं। लेकिन यह दुख तब और बढ़ जाता है कि श्रद्धांजलि और संवेदना के मामले में भी हमारी तंगदिली हम पर भारी पड़ जाती है। जिस दिन इंदिरा गांधी का कत्ल हुआ, उसके ठीक 109 साल पहले उसी दिन सरदार बल्लभ भाई पटेल का जन्म हुआ था। पटेल का आजादी के आंदोलन में इतना बड़ा कद था कि आजादी मिलने पर अगर वह जिद पर अड़ जाते तो देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू नहीं, बल्कि सरदार पटेल होते। लेकिन उन्हें लगता था कि कोई भी पद देश के कद से बड़ा नहीं हो सकता। देशी रियासतों को एकजुट करना टेढ़ी खीर था लेकिन पटेल की सूझबूझ से यह संभव हो पाया। क्या उस महापुरुष को उनके जन्मदिन पर याद नहीं किया जाना चाहिए? क्या लोकतंत्र का चौथा पाया उन्हें याद करके खुद को धन्य नहीं कर पाता? क्या आने वाली पीढ़ियों को यह नहीं बताता कि मनमोहन सिंह भले ही रंगीन भविष्य के सपनों में खोए हों लेकिन इस वर्तमान की बुनियाद पटेल जैसे मनीषियों की तपस्या पर टिकी है?

पटेल के बारे में तो फिर भी किसी अखबार के कोने-अंतरे में एकाध कॉलम देखने को मिल गया लेकिन आचार्य नरेंद्र देव? जब पटेल ही लोगों को याद नहीं तो कोई ये ना पूछ बैठे कि नरेंद्र देव कौन हैं? ठीक इंदिरा गांधी की हत्या से 95 साल पहले 31 अक्टूबर को ही भारत में समाजवाद के जनक आचार्य नरेंद्र देव का जन्म हुआ था।

विचित्र मणि

विचित्र मणि

कांग्रेस के भीतर समाजवाद की स्थापना और आजादी के बाद उसे उपेक्षितों-वंचितों से जोड़ने का सबसे पहले सिलसिलेवार ड्राफ्ट आचार्य ने ही तैयार किया था। संविधान में समाजवाद शब्द तो जुड़ गया लेकिन समाजवाद को अपने कंधे पर ढोने वाले बिसरा दिये गये। अगर थोड़ा उन्हें भी याद कर लिया जाए तो शायद इतिहास अपने पन्नों में यह जोड़ दे कि भारत अपने पुरखों का समादर करना जानता है।

((विचित्र मणि टेलिविजन में वरिष्ठ पत्रकार हैं))

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3 Responses to श्रद्धांजलि और सम्मान पर उनका भी हक है

  1. saurav Reply

    November 1, 2009 at 4:06 pm

    aap sahi kah rahe hain. par shaayad aapne jharkhand, bihar aur kolkata se prakashit prabhat khabar nahin dekha hai. aapki nirasha shyad thori kam ho sakti hai.

  2. शेष नारायण सिंह Reply

    November 1, 2009 at 8:32 pm

    सरदार पटेल और आचार्य नरेंद्र देव सही मायनों में शिक्षित और प्रतिबद्ध लोग थे. जिसे सही समझा वही किया. लेकिन आधुनिक टी वी न्यूज़ रूम में उनका ज़िक्र करके मुझे कई दिन तक दुखी होने का मसाला मिल गया था. जब मैंने सरदार पटेल पर एक विशेष कार्यक्रम की पेशकश की तो एक भाई ने मुझे समझा दिया कि , शेष जी यहाँ ज़्यादातर लोग मंडल विरोधी हैं . झंझट में मत पडो. .वे मुझे समझाना चाहते थे कि सरदार केवल पिछडी जातियों के नेता थे. ज़ाहिर है कि मैं चुप हो गया. और एक दिलचस्प बात . जिस दिन, हिन्दी के कालजयी उपन्यास, ” अलग अलग वैतरणी” के लेखक, शिव प्रसाद सिंह जी का स्वर्गवास हुआ., मैंने खबर लिख दी. खबर रन डाउन में थी . न्यूज़ रीडर बेचारी नहीं जानती थी कि , शिव प्रसाद सिंह कौन थे . वहां तो हिन्दी भी देव नागरी में नहीं लिखी जाती थी. एक सर्वज्ञ टाइप पत्रकार से उसने पूछा कि who is this shiv prasad guy? हिन्दी पत्रकार साहेब ने फरमाया कि शेष जी के कोई रिश्तेदार होंगें.और उन्होंने खबर ड्राप करवा दी . मैंने अपनी नाराज़गी रिकॉर्ड करवा दी . शायद इसी लिए जब कुछ दिन बाद बाबा नागार्जुन की मृत्यु हुई तो हर बुलेटिन में खबर गयी और शाम को देश के सबसे सम्मानित एंकर ने उस खबर को मुख्य बुलेटिन में हेड लाइन का रुतबा दिया नाम किसी का नहीं लूँगा क्योंकि इस कथा के सभी चरित्र ऐसे लोग हैं जिन पर आज की टी वी पत्रकारिता को गर्व है.

  3. hemant Reply

    November 5, 2009 at 2:25 am

    Dear Vichitramani
    achha likha hai… acharya narendra dev par ak programme aap apne VISHESH (09:30 PM aaj tak) par kyo telecast nahi karte… alian aur udan tashtario se aap bhi bore ho gaye honge…

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