कांग्रेस पार्टी और उसके नेताओं को रंगों से खासा लगाव है। जब किसी मेनस्ट्रीम से भटके गुट या आंदोलन को कुचलना होता है तो उसके खिलाफ सैन्य या अन्य कार्रवाई छेड़ देते हैं और उस ऑपरेशन को अमूमन किसी रंग से जोड़ कर नाम दे देते हैं। 1984 में इंदिरा गांधी ने सिख आतंकवाद के खिलाफ पंजाब में सैन्य कार्रवाई की तो उसे ऑपरेशन ब्लू स्टार नाम दिया। उसके बाद राजीव गांधी ने ऑपरेशन ब्लैक थंडर छेड़ा। और अब गृहमंत्री पी चिदंबरम ने नक्सली आंदोलन को कुचलने के लिये राज्य सरकारों के साथ मिलकर ‘रेड कॉरीडेर’ में ऑपरेशन ग्रीन हंट छेड़ दिया है। इंदिरा गांधी की 25वीं पुण्यतिथि के साल में कांग्रेसी नेता अपनी स्वर्गीय नेता को इससे सुंदर पुष्पांजलि और कैसे दे सकते थे?
इंदिरा गांधी यदि ज़िंदा होतीं और प्रधानमंत्री बनी रहतीं तो पता नहीं वो कैसे टैकेल करती नकसली समस्या को? क्या वो इस समस्या का वैसे ही संकीर्ण राजनीति का चश्मा पहन कर हल निकालने की कोशिश करती जैसा उन्होंने पंजाब के आतंकवाद से जूझने में किया। या फिर इमरजेंसी लगा कर विपक्षी नेताओं की धर पकड़ कर और उन्हें जेल में ठूंस कर किया ताकि उनकी सरकार पर आवाम के जायज गुस्से को कुचला जा सके। क्या इंदिरा गांधी नक्सली समस्या को उस समझदारी और कुशलता से हल करने की कोशिश करतीं, जैसा उन्होंने मुक्ति बाहिनी को समर्थन देकर और बांग्लादेश बनवा कर किया था? आज इंदिरा गांधी तो नहीं रहीं। मगर उनकी भरी-पूरी विरासत जरूर है। आज सोनिया गांधी हैं, राहुल गांधी हैं और गांधी परिवार के आशीर्वाद पर चलती मनमोहन सरकार और उसके गृहमंत्री चिदंबरम हैं। इसलिये रंगों कि विरासत को ध्यान में रखते हुये चिदंबरम साहब ने ऑपरेशन ग्रीन हंट छेड़ा हुया है।
लेकिन ऑपरेशन ग्रीन हंट से शिकार किसका करना है? शिकार तो जंगली जानवरों का किया जाता है। वहशी दरिंदों का किया जाता है। जो इंसानी आबादी के लिये खतरा हैं। क्या सरकार आदिवासियों को जानवर से बदतर समझती है? जो गलती से हिंदुस्तान की धरती में घुस आये हैं और जंगलो में अपना डेरा डाल लिया है। और इसलिये उन्हे वहां से उखाड़ फेंकना है या यूं कहें उन्हे मार गिराना ही सरकार का धर्म बनता है? चूंकि आदिवासी कभी वोट बैंक नहीं बने इसलिये उन्हें डेमोक्रेटिक और भौगोलिक दायरे के बाहर रखकर देखने की मानसिकता उतनी ही विकृत है जितनी की नक्सलियों के हाथों पुलिसकर्मी फ्रांसिस इन्दूवार की हत्या।
आदिवासियों के लिये उनके जंगल ही घर है। जैसा कि चिदंबरम साहब का घर राजधानी के सबसे सुरक्षित इलाके नई दिल्ली में है। सच तो ये है कि जंगल के कंदमूल-फल, पेड़-पौधे, पत्ती-पत्ता, लकड़ी, इलाके की खनिज संपदा आदि सब आदिवासियों की ही पुश्तैनी जायदाद है जिस पर अब केन्द्र सरकार के स्पेशल इकॉनोमिक जोन यानी सेज (एसईजेड) और बड़े बड़े उद्योगपतियों की नज़रें गड़ी हैं। आज आदिवासियों को उन्हीं के घर से बेदखल करने की साजिश रची जा रही है। उन्हें उनकी जमीन से होने वाली कमाई में हिस्सेदारी नहीं दी जा रही। सच तो ये है कि साठ साल की आजादी के बाद भी आदिवासी इलाके जिसे आज ‘रेड कॉरीडोर’ कहा जाता है वो वैसे ही स्टोन एज में जीने के लिये अभिशप्त हैं। विकास की हवा जंगलों से कभी नहीं बही। इलाके में बिजली आ जाये तो शायद वैसी ही भीड़ लगे जैसा कोई डेढ़ सौ साल पहले ट्रेन देखकर आंखे फटी की फटी रह गयीं थी। सच तो ये है कि दंतेवाड़ा हो या गढ़चिरौली हो, तेलंगाना का इलाका हो या झारखंड के जंगल… यहां के रहने वाले आदिवासी दो जून की रोटी को आज भी तरसते हैं। उन्हें पीने का साफ पानी नसीब नहीं। वहां लोग कैंसर या एड्स जैसी बड़ी बीमारियों से नहीं मरते बल्कि दवाई और अस्पताल के अभाव में मलेरिया से मर जाते हैं।
ऐसे में कुछ आदिवासी अपने हक़ के लिये सरकार और सरकारी तंत्र के खिलाफ बंदूक तान लेते हैं। फिर वो नक्सली कहलाये जाते हैं। ये जरूर है कि सरकार के खिलाफ उनकी इस मुहिम में कुछ बेगुनाह भी मारे जाते हैं। फ्रांसिस इन्दूवार जैसे निष्ठावान पुलिस कर्मी भी मौत के घाट उतार दिये जाते हैं। बंदूक उठा लेना तो समस्या का हल नहीं। हिंसा करने वाला सजा का भी हकदार है। मगर हिंसा के जवाब में हिंसा ये रास्ता भी क्या अनोखा नहीं है? ये सवाल नक्सलियों पर उतना ही लागू होता है जितना कि सरकार पर। क्योंकि ऑपरेशन ग्रीन हंट लॉंच करके सरकार ने अपने इरादे बिल्कुल साफ कर दिये हैं। आंख के बदले आंख। पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद और घर के दबे कुचले लोगों का गरीबी के खिलाफ विद्रोह सरकार एक ही तराजू में तोले ये क्या जायज है?
हाल ही में पंजाब के पूर्व डीजीपी के पी एस गिल ने तहलका मैगजीन में एक इंटरव्यू दिया। नक्सली समस्या को लेकर उन्होंने कहा – ऑपरेशन ग्रीन हंट से कुछ नहीं निकलेगा। पंजाब के आतंकवाद से निपटना और नक्सलवाद से निपटने में अंतर है। नक्सली हिंसा को और आदिवासियों की समस्या के हल के 101 तरीके हैं। गिल ने सरकार को चेताया और कहा – कहीं ऐसा न हो कि सरकार के लिये ये ऑपरेशन वैसा ही साबित हो जैसा कि अफगानिसतान में अमेरिका की दखलअंदाजी।

प्रभात शुंगलू
(प्रभात शुंगलू IBN7 में एडिटर – स्पेशल असाइनमेंट हैं)
Sushant jha
November 2, 2009 at 12:33 pm
Fantastic…in fact Congress is not willing to accept that this is socio-econimic problem. Perhaps it is afraid of the fact that if socio-economic theory gets momentum, its long rule in the country will be questioned. It should understand that until and unless industrial loot in that region is not tackled or sloved logically with the ensured participation of locals, one can not stop these violence. But no…Chidambaram will never pay heed to that. In fact, his party is more interested in installing Madhu Koda type of person as CM who always find himself in the role of liasioning for MNCs who are eyeing for the precious resources of Jharkhand and other state. Then, it is not a surprise that Chidambaram is speaking in the language of Security guard to the Corporates in that region. Amen.
alok nandan
November 2, 2009 at 1:16 pm
इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाओ का नारा दिया था…अब कांग्रेस गरीबों को हटा रही है….सैनिक बलों को घर के अंदर रेड कारिडोर के खिलाफ इस्तेमाल कर रही है…वाकई में चिदंबरम रेड कोरिडोर मे सरकार को फंसा रहे हैं…चाहे कुछ भी हो सेना का इस्तेमाल नहीं होना चाहिये….एक बार सैनिक कार्रवाई शुरु हो जाएगी तो फिर यह लंबा चलेगी…क्रिया और प्रतिक्रिया का दौर शुरु हो जाएगा….जो वैसे भी चल रहा है…केपीएस गिल की बातों पर ध्यान देने की जरूरत है….लड़ाई होगी तो खून के छिंटे दूर दूर तक फैलेंगे..जंगल के बाद नगरों और महानगरों को भी प्रभावित करेंगे….
संदीप
November 2, 2009 at 5:57 pm
वैसे कल चिदंबरम ने भी खून की आखिरी बूंद तक लड़ने की बात कही है। ऐसा लग रहा है कि वह खुद ही लड़ने जा रहे हैं।
चिदंबरम साहेब, केपीएस गिल जैसा आदमी भी कह रहा है कि आपरेशन ग्रीन हंट से कुछ नहीं होगा, तो उनकी ही सुन लीजिए (आदिवासियों की आवाजे़ तो आपके कान में पहुंचती नहीं हैं)