आलोक मेहता। कुछ समय पहले तक आउटलुक हिंदी के संपादक। अब नई दुनिया के प्रधान संपादक। बतौर साहित्यकार पद्म सम्मान हासिल करने वाले पत्रकार। सत्ताधारी यूपीए के बेहद करीबी कलमबाज। राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के भक्त। अरुंधती रॉय के घोर विरोधी। नक्सलियों के ख़िलाफ़ चल रहे ऑपरेशन ग्रीन हंट के हिमायती। उन्होंने संडे नई दुनिया में आज संपादकीय लिखा है। “अंग्रेजी दा मुखौटों के आंसू”। निशाना अरुंधती रॉय पर है। और उन तमाम लोगों पर जिन्हें अरुंधती का लिखा पसंद है। लेकिन नाम लिए बगैर। जाहिर है अरुंधती रॉय और उनके प्रशंसकों से वो बेहद दुखी हैं। आलोक मेहता दुखी इसलिए भी हैं कि रिलायंस गैस विवाद में नई दुनिया के स्कूप का सच सामने आ गया है। हम चाहते हैं कि अपने “एजेंडे” में पूरी तरह से “ईमानदार” पत्रकार आलोक मेहता का ये छायावादी लेख जनतंत्र के पाठक भी पढ़ें और अपनी प्रतिक्रिया दें। - मॉडरेटर
——————————-
अंग्रेजी दा मुखौटों के आंसू
अंग्रेजी भाषा पर उनका अच्छा अधिकार है। अच्छी शिक्षा-दीक्षा मिली है। बैंक में लाखों ही नहीं, कुछ करोड़ रुपये जमा हो जाते हैं। मेग्सायसाय, बुकर, नोबेल पुरस्कार की सिफारिश करने वाले प्रशंसकों से घिरी रहती हैं। कहानी, उपन्यास के अलावा अंग्रेजी की समाचार पत्रिकाओं में 25 से 30 पृष्ठों के बड़े-बड़े लेख छप जाते हैं। इतने बड़े लेख उस पत्रिका या देश के किसी अन्य संपादक के नहीं छप सकते। जिन पत्र-पत्रिकाओं में लिखने-छपने पर उन्हें हजारों रुपये मिलते हैं, उन प्रकाशनों के प्रबंधक वही पूंजीपति हैं, जो जंगल काट कर उद्योग लगाते हैं, झुग्गियां तोड़ कर बहुमंज़िली इमारतें बनाते हैं। अंग्रेजी में लिखी जिन पुस्तकों की रॉयल्टी से उन्हें लाखों रुपये मिलते हैं, वे पुस्तकें वही वर्ग खरीदता है, जिसे झोंपड़ियों के प्रति दर्द का अहसास नहीं होता। हां, अंग्रेजी में भारत के आदिवासियों की दुर्दशा, खूनी हिंसा की मानसिकता वाले नक्सली अतिवादियों के बारे में पढ़-सुनकर भारत विरोधी षड्यंत्र करने वाले परदेसी बहुत अधिक प्रसन्न होते हैं। वह भारत में झोला लटका कर चलती हैं और हवाई यात्रा महंगे बिजनेस क्लास में करती हैं। पांच सितारा होटलों की पार्टियों में आनंद लेती हैं लेकिन प्रशंसकों के रूप में दूर खड़े फटेहाल लोगों को देखना चाहती हैं। आखिर जयकार वही कर सकते हैं।
उन्हें छत्तीसगढ़ या झारखंड, उड़ीसा या आंध्र में जंगल और पहाड़ काटने पर बहुत तकलीफ होती है। ज्ञानी लेखिका होने के कारण उन्हें पता है कि आदिवासियों को पहाड़ में “ईश्वर” के दर्शन होते हैं और वे पेड़ों की पूजा करते हैं इसलिए उनके पेड़ों और पहाड़ों से छेड़छाड़ कर उद्योग-धंधा लगाने वाले दुष्ट और पापी हैं। वह चाहती हैं कि आदिवासियों को अंडमान के आदिवासियों की तरह प्राचीन पाषाण युग जैसा ही रहने दिया जाए। वह उनकी संस्कृति की रक्षा करना चाहती हैं। उन्हें डर लगता है कि यदि सुदूर आदिवासी क्षेत्रों में भी शिक्षा की व्यवस्था हो गयी तो थोड़ा पढ़-लिख कर आदिवासी शहरी युवकों की तरह बेरोजगारी के शिकार होंगे। यह बात अलग है कि अभी रोजगार नहीं होने के कारण ही वे हिंसक अपराधियों के कथित “वैचारिक गिरोहों” के चंगुल में रह कर बंदूक उठाये भटक रहे हैं और कभी जानवरों से, कभी गिरोहों से और कभी पुलिस के हाथों मारे जा रहे हैं। वह चाहती हैं कि उनके पास वही डॉक्टर जाए, जिसे हिंसक गुटों का प्रमाण-पत्र मिला हो। जो दवाई का नहीं हथियारों का इंतज़ाम कर सकता हो। उन इलाकों में वही इंजीनियर जाए, जो मकान-दुकान बनाने के बजाय बारूदी सुरंग लगा सकता हो। उन्हें दिल्ली के पास हरियाणा या यूपी में पुलिस अथवा अपराधी गिरोह के अत्याचारों पर परेशानी नहीं होती लेकिन हिंसक नक्सलियों पर कठोर कार्रवाई और गोलियों से दर्द होता है।
ऐसी लेखिका, लेखक या उनके परम प्रिय चाहने वालों से कोई यह सवाल नहीं करता कि पिछले 20-25 वर्षों में राजधानी दिल्ली के चारों ओर अरावली की पहाड़ियों को तोड़े जाते समय उस इलाके में रहने वाले गरीब लोगों की भावना और भगवान की सुध उन्होंने क्यों नहीं ली? खदानों से रेत की चोरी से लेकर झोंपड़ियों की जगह इमारतों और उद्योगों का विरोध क्यों नहीं किया? दिल्ली में यमुना किनारे झुग्गी-झोंपड़ी बनाकर रहने वालों में हजारों लोग उसी छत्तीसगढ़, झारखंड, बिहार और उड़ीसा से आये हुए हैं। उनकी झोंपड़ियां उजड़ने पर उन्हें कोई कष्ट क्यों नहीं हुआ? हिंसक नक्सली गुटों के प्रति उन्हें सहानुभूति है लेकिन छत्तीसगढ़, झारखंड, उड़ीसा, बिहार में कम शिक्षा और बेरोजगारी के कारण पुलिस में भर्ती हुए 19 से 25 साल तक के युवकों को बारूदी सुरंग से उड़ाये जाने और फिर उनके परिवारों की दयनीय हालत तथा भुखमरी पर लेखिका की कलम कभी नहीं चलती। यह अंग्रेजीदां पाखंड नहीं तो और क्या है?
संभव है उनके प्रशंसक अन्य विचारों के पाखंडियों को देखकर संतोष कर लेते हों। निश्चित रूप से कथित “प्रगतिशील” पाखंडियों की तरह दक्षिणपंथी पाखंडी भी सत्ता के गलियारों में महत्वपूर्ण माने जाते हैं। वे हिंदू धर्म और संस्कृति की रक्षा की बात करते हैं। बचपन से छात्र-जीवन तक कट्टर हिंदूवादी संगठनों में दंडवत करते रहे हैं। संगठन और स्वयंसेवकों के बल पर शीर्ष स्थानों पर पहुंचे हैं लेकिन उन्हें अब पांच सितारा होटलों में शराब के प्याले के बिना “संस्कृति” की बात करना अच्छा नहीं लगता। वे राजनीतिक स्वार्थों के लिए किसी के साथ भी हाथ मिलाने और काम करने के लिए तैयार हो जाते हैं। उन्हें इस बात से तकलीफ होती है कि ईमानदार पत्रकार कॉरपोरेट कंपनियों के झगड़ों और गड़बड़ियों को क्यों उजागर करते हैं लेकिन स्वयं बड़ी कॉरपोरेट कंपनियों की पैरवी करने और उनसे लाखों रुपये लेने में कभी संकोच नहीं होता। वे मंदिर के नाम पर करोड़ों रुपये इकट्ठा करते हैं लेकिन राजधानी दिल्ली में बने मंदिरों और अन्य प्रार्थना स्थलों के आसपास कूड़े-गंदगी के ढेर हटवाने और वहां भिखारी या अपराधी गिरोहों से रक्षा के लिए कभी कोशिश नहीं करते। वे स्वयं मंदिरों की मूर्तियों पर 10 लाख से 10 करोड़ रुपये तक के स्वर्णमुकट चढ़ाते हैं लेकिन उन मूर्तियों को सजाने-संवारने और शुद्ध संस्कृत में प्रार्थना करने वाले पुजारियों को मात्र 1500 रुपए मिलने और मंदिरों के प्रबंधकों द्वारा किये जा रहे शोषण के विरुद्ध एक शब्द नहीं बोलते। उन्हें तो धन और सत्ता सुख के लिए धर्म और संस्कृति की एक दुकान और मुखौटे की ज़रूरत होती है।
पाखंड सोशलिस्ट भी कम नहीं करते। एक बड़े सोशलिस्ट नेता ने हाल के राज्यसभा चुनाव में अपनी संपत्ति 54 करोड़ रुपये घोषित की। लोग उन्हें जीवन भर मज़दूरों और किसानों का नेता मानते रहे। दिखाने को वे हमेशा कुर्ता पायजामा पहनते रहे। सोशलिस्ट विचारधारा फैलाने के लिए देश में ही नहीं, विदेशों से चंदा लेते रहे। मज़दूर नेता बनने के लिए कभी रेल हड़ताल करवायी और रेलमंत्री बनने के बाद उन्हीं मज़दूरों के बजाय बड़े अफसरों, चाहनेवालों-चाहनेवालियों और शोषक पूंजीपतियों के स्वार्थों की पूर्ति करते रहे। पाखंड का आलम यह कि सत्ता कट्टरपंथियों के कंधों पर बैठकर चाहिए लेकिन लबादा ‘धर्मनिरपेक्षता का पहने रखा। सत्ता की भूख ऐसी कि शारीरिक-मानसिक हालत खस्ता होते हुए भी सरकारी बंगले, गाड़ी और हवाई जहाज की सुविधाएं अवश्य चाहिए। फिर वे अकेले सोशलिस्ट नहीं हैं। अब तो हजार-पांच सौ करोड़ रुपये की जमा-पूंजी वाले ही असली सोशलिस्ट नेता कहलाना चाहते हैं। ‘सोशलिस्ट’ तमगा लगाने का लाभ यह है कि वे कभी भी किसी दल या संगठन के साथ जुड़ कर सत्ता सुख पा सकते हैं। कट्टरपंथी हिंदुओं, मुस्लिमों या सिखों की पार्टियां हों या कांग्रेस या कम्युनिस्ट पार्टियां अथवा भ्रष्टाचार के आरोपों से आकंठ डूबे नेताओं की जेबी पार्टियां, सोशलिस्ट किसी से भी तालमेल कर सकते हैं। उनके लिए सोशलिज्म का एक मुखौटा पर्याप्त है।
यहां तक पढ़ने वाले मुखौटाधारियों के कुछ प्रशंसक थोड़ा नाराज़ हो गये होंगे
। उन्हें महसूस हो रहा होगा कि हमें यूपीए के सत्ताधारी मुखौटे क्यों नहीं दिखते? क्षमा कीजिएगा – वह भी अच्छी तरह दिखते हैं। कांग्रेस नेतृत्व वाले गठबंधन में बैठे सत्ताधारी या उनके सहयोगी और एजेंटों ने भी गरीबों के नाम पर मुखौटे लगा रखे हैं। उनकी दुकानें ईमानदार, कर्मठ नेताओं और कार्यकर्ताओं के बल पर चल रही हैं। कुछ सत्ताधारी नेता सचमुच काबिल हैं, पढ़े-लिखे हैं और अच्छी छवि के बल पर राज कर रहे हैं लेकिन उनके दफ्तर में बैठे सलाहकार, सहयोगी, चमचे या एजेंट जमकर दुकान चलाते हैं। सोनिया गांधी या राहुल गांधी भले ही हरिजन, आदिवासी बस्तियों में जाकर दुख-दर्द सुन-समझ कर चिट्ठी लिखते रहें, सत्ता के गलियारों में गरीबों की गुहार सुनने को कोई तैयार नहीं है। वोट ‘गरीबों के साथ’ के नाम पर लिया जाता है लेकिन केंद्र में बैठे नेता जवाहरलाल नेहरू या इंदिरा गांधी की तरह गरीबों या सामान्य लोगों से मिलने के लिए साल में एक घंटा तक नहीं निकाल पाते। वे तो कांग्रेस संगठन से जुड़े जिलों या प्रादेशिक नेताओं को मिलने का वक्त तक नहीं दे सकते। वे सिर्फ बहुराष्ट्रीय अथवा बड़ी देसी कॉरपोरेट कंपनियों के प्रबंधकों से मिलते हैं। गरीबों के लिए योजनाएं बनती हैं लेकिन क्रियान्वयन भष्ट अफसरों की कृपा पर छोड़ दिया जाता है। बड़े सौदों पर विचार होता है। सुदूर गांव में पापड़-बड़ी और खादी बनाने वालों की कोई चिंता नहीं होती। असल में मूर्तियां लगाने, हटवाने या तुड़वाने के बजाय मुखौटे हटवाने-तुड़वाने के अभियान की ज़रूरत है। ((नई दुनिया से साभार))
प्रतिवादी
November 8, 2009 at 1:22 pm
हिंदी पत्रकारिता को शर्मसार करने वाला लेख…
anand bharti
November 8, 2009 at 1:56 pm
Likhna jab duty ban jaaye toh har din ek naya mudda khojna zaroori ho jaata hai. Pathak logon ko bhi ussi andaz me padh lena chahiye. Apna khoon jalane se achha hai ki padh kar bhoolne ki aadat bana lo. Alok ji ne toh arundhati roy aur angrezi akhbar ka PR hi kar diya ,ab aap roy ka likha hua dhundhate rahiye.Bhai… Bade log chhoti baaton ko bada karna jaante hain aur badi baaton ko chhota karne me shaan samajhte hain.Issme agar aap pareshaan hain toh isska koi ILAAZ nahin hai.
विवेक
November 8, 2009 at 6:00 pm
आलोक मेहता ये क्यों कर रहे हैं समझ में नहीं आता। उनके लेख पढ़ कर लगता ही नहीं कि किसी पत्रकार ने यह सब लिखा है।
virendra jain
November 8, 2009 at 6:27 pm
आलोकजी को यह सब अभी क्यों याद् आया जब अरुन्धति ने चिदमबरम को सींखचों में खड़ा करने का प्रयास किया। अरुन्धति ने क्या क्या नहीं किया उसकी सूची इस समय गिनवाना किसी अपराध बोध जैसा लगता है। दूसरा सवाल उठता है कि क्या आलोकजी ने ये सारे सवाल एक पत्रकार के रूप में उठाये थे? वैसे यह भी सच है कि हम इस लोकतंत्र के नाम पर एक छद्म जी रहे हैं। कुछ दिन तो कौड़ाओं की सम्पत्तियां चर्चाओं में रहती हैं पर बाद में सब वही चलने लगता है. मध्यप्रदेश में जिसके ड्राइवर के लाकर से करोड़् निकलते हैं उसी को कुछ दिन बाद फिर से मंत्री बना दिया जाता है
vikram
November 8, 2009 at 7:05 pm
Galat kya likha hai… sab jaante hain… yahi sach hai
Anand Prasad
November 8, 2009 at 7:41 pm
alok jee……. yadi hindi ki patrakarita karni hai to deevangat Prabhash Joshi jee se thodi si diksha le leni thi…..!!!!!
alok nandan
November 9, 2009 at 1:26 pm
अब संपादक जी को कौन समझाये की भाषा मायने नहीं रखता है…आप किसी भी भाषा में लिखे कोई फर्क नहीं पड़ता है, असल चीज है आप लिख क्या रहे हैं… थेथरलाजी करने के बजाय सीधे जवाब क्यों नहीं दे रहे हैं कि वेदांता के लिए चिंदबंरम साहब क्या क्या गुल खिला रहे हैं…मल्टी नेशनल कंपनी को लाभ पहुंचान के लिए सरकारी सेना का इस्तेमाल कर रहे हैं या नहीं ??? पत्रकार लोग सरकारी एजेंट के रूप में काम रहे हैं, और इसके एवज में हर तरह के लाभ उठा रहे हैं…और किसी का 20-25 पेज का लेख कहीं छप रहा है तो इतनी तिलमिलाहट क्यों….वैसे भी सच्चाई में डूबे हुये लेखों को कतरने की साजिश संपादकों द्वारा बहुत पहले से की जा रही है…ऐसे संपादकों को यकीन दिलाते हैं कि चाहे वे अपने अखबारों में जो इच्छा हो छापे, लेकिन भोंपू की आवाज का कोई असर नहीं होगा…पाठकों को लिखाई को तौलना आ गया है…वैसे आपरेशन ग्रीन हंट के समर्थन में सरकारी खाते से कितने के एड जारी किये गये हैं???
विनीत कुमार
November 10, 2009 at 2:24 am
हद है…मुझे तो पहले का कुछ खास पता नहीं लेकिन आपमें से कोई बताएं कि क्या ये शुरु से ही ऐसा ही लेखन करके तथाकथित बड़े पत्रकार बने हैं।
रजनीश के झा
November 10, 2009 at 11:42 am
आलोक मेहता वस्तुतः आज के पत्रकारिता के सबसे बड़े नमूने हैं, इन्होने अपना आकर अपनी लेखनी से नहीं अपितु चरण वंदन से ही करा है यह इस लेख से साफ़ परिलक्षित हो जाता है, हम क्यूँ आज के पत्रकारिता को दोष दें जब इसके शीर्ष पुरुष ही कलम विहीन है
sanjay mishra
November 11, 2009 at 4:20 pm
alok ne general see baten kahi hain….elite society ke log garibi aur aadivasi ke liye daya bhav dikhate rahe hain….bharat ke english lekhak bharat ki garibi bech kar international awards jitate rahe hain.
jahan tak aadivasion ka sawal hai visthapan naya nahi hai. public sector ki factory banate samay bhi log visthapit huye thay. mamla niji company ko leese dene ka bataya ja raha hai. ye nitigat sawal hai. kya chunav ke samay congress se aise nitigat sawal kisi ne puche. sab jai ho jai ho karte rahe. arundhati ko aspast karna hoga ki we adivasion ke haq ki ladai lad rahi hain ya naxaliyon ke liye uth khari hui hain…ghaal mel se mudde se bhatakne ka khatra rahta hai. sena ke upyog par unki chinta jayaj ho sakti hai…
aalok safal sampadak rahe hain par prabhas joshi jaison ki category me nahin aate hain…unse jyada ummid kyon karte hain log
sanjay mishra
सुधीर शर्मा
November 11, 2009 at 11:57 pm
संजय मिश्रा,
इसलिए कहते हैं कि पढ़ना लिखना चाहिए। कोई भी सवाल यूं ही नहीं उठा देना चाहिए। अरुंधती क्या कहती हैं और क्या करती हैं इसके बारे में जानने की कोशिश होनी चाहिए। उन्होंने साफ कहा है कि ओपन पत्रिका में नक्सली नेता गणपति के इंटरव्यू से भी कोई उम्मीद नहीं जगती है। उनका मत साफ है और वो वक़्त आने पर अपना मत बार-बार साफ भी करती हैं।
आउटलुक में छपे उनके लेख में कहीं से भी यह नहीं है कि वो नक्सलियों की हिंसा का समर्थन कर रही हैं। लेकिन वो जरूर कहती हैं कि सत्ता की प्रायोजित हिंसा के ख़िलाफ़ उठी अहिंसक आवाज़ों को जब दबा दिया जाएगा तो हिंसा होगी ही। यह एक विश्लेषण है और इसका मतलब हिंसा का समर्थन कतई नहीं है। लेकिन आप लोगों को पढ़ने-लिखने से मतलब ही नहीं। बस सवाल उठाना है तो और किसी की भी मंशा को कठघरे में खड़ा कर देना है।
आलोक मेहता जैसे लोग सत्ता की दलाली कर रहे हैं और राज्य की हिंसा के लिए तार्किक आधार का निर्माण कर रहे हैं। यह ग़लत है और इसका विरोध होना चाहिए। आलोक मेहता पत्रकार नहीं हैं। और अगर आपको लगता है कि वो पत्रकार हैं तो यह आपका भ्रम है या फिर उनसे आपका कोई स्वार्थ जुड़ा है।
sanjay mishra
November 13, 2009 at 11:02 am
outlook padhkar vidwan bane sudhirji apna parichay dete to achha hota…vidwata ka aapko guman to hai lekin ochhi bhasa ka aap istemal kyon karte hain…lagta hai blogging ki dunia ko jin girohon ne pakar kar rakha hai aap bhi uuhi girohon ke sadasya lagte hain….blogging ko gali-galauj ka madhyam na banain….aap bahut bade vidwan ho sakte hain lekin mujhe apne bees saal ke patrakariye anubhav par hi bharosa hai. aapka sisya banne ki abhilasa nahin…chela mudne ke liye apne hi giroh ke kisi sammanit sadasya ko chun len. pacchis saal pahle hi marx, mao aur charu ke vicharon ko atmasat kar liya tha…in chijon par padhne ke liye bloggeron ke sahyog ki koi jaroorat nahin hai mujhe….arundhati ko main pandrah saal se achhi tarah janta hoon…unhe janne ke liye outlook ki jaroorat nahin…aap bere vidwan hain aur mujhe padhne ki nasihat de rahe hain…kripakar apne pathakon ke liye padhne sabd ke panch samanarthak sabd hindi aur english me khoj kar bata den to unka bhala ho….jahan tak jal, jungle aur jamin ka masla hai to iske liye abaj uthane wale sirf naxali hi nahi hain..jharkhand andolan ke 70 years ka safar isi buniyad par tika hai….is masle par aap arundhati ka anukaran karen ye aap ki marji….ye blog..blog ka khel chodkar khud kyon nahi jugle me utar jate hain…arundhati ko poojibaad me samasya ki jar dikhti hai lekin usi poojivadi america ke vidwan chomski se madad ki guhaar laga rahi hain..aap logon ki chali to jungalon me sanghars kar rahe hmare sathiyon ko aap log osama laden ka samarthan bhi dila denge….jal,jugle aur jamin ke masle par vichar karne ke kai aayam hain iski gambhirta ka aapko koi anumaan nahin
sanjay mishra
सुधीर शर्मा
November 13, 2009 at 11:22 pm
अरे भई आप तो हत्थे से उखड़ गए। आपसे किसने कहा कि आउटलुक पढ़ कर मैंने अपनी प्रतिक्रिया दी है? मैंने ऐसा लिखा था क्या? जहां तक भाषा का सवाल है संजय मिश्रा, आप सोचिएगा कि सुनी सुनाई बातों को किसी से जोड़ देने के कितने खतरे होते हैं। कालांतर में चल कर वही सुनी सुनाई बातें सच्ची लगने लगती हैं। और इससे अश्लील कुछ हो ही नहीं सकता। अरुंधति ने जो बातें नहीं कहीं वो आप सबने उनके सिर मढ़ दीं। वो घूम-घूम कर सफाई देती रहती हैं लेकिन आप सब उनकी सफाई भी खारिज कर देते हैं। इसे क्या कहा जाए?
आप कहते हैं कि आपने 25 साल पहले मार्क्स, माओ और चारू के विचारों को आत्मसात कर लिया था। मुझे नहीं लगता कि आपने आत्मसात किया है। आत्मसात का मतलब समझते हैं आप? अगर आत्मसात कर लिया होता तो इस तरह की बचकानी बातें तो नहीं करते।
आपने कहा कि 70 साल के झारखंड आंदोलन पर नजर डालें। आंदोलन के बाद झारखंड बना और उसके बनने के बाद आदिवासियों का क्या हश्र हो रहा है यह हम सभी जानते हैं। अब अगर कोई जानबूझ कर उस पर पर्दा डालने की कोशिश करे तो उसका क्या उपाय है?
आपने यह भी कहा कि आप 15 साल से अरुंधति को पढ़ रहे हैं। ताज्जुब है कि आप 15 साल से पढ़ रहे हैं और फिर भी उनके बारे में अफवाह फैलाते हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि आप उन कंपनियों के एजेंट के तौर पर काम करते हैं जिनके हित झारखंड से जुड़े हैं? कहीं ऐसा तो नहीं मधु कोड़ा और उसकी कथित दलालियों से आपका कोई रिश्ता है?
चलिए मान लेते हैं कि जल, जंगल और जमीन से जुड़े आयामों की गंभीरता का मुझे कोई अनुमान नहीं… क्या आप मुझे समझाएंगे? अगर समझाएंगे तो बड़ी कृपा होगी। कुछ नया सीखने को मिलेगा।
सादर
सुधीर शर्मा
sanjay mishra
November 14, 2009 at 1:26 pm
aadivashi netaon ke raah se bhatak jane par aapki chinta mahsoos kar sakta hoon.