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नरेंद्र मोदी और राज ठाकरे से कम नहीं हैं शीला दीक्षित

राज ठाकरे और उनके गुर्गों के बर्ताव और पागलपन से बहुत सारे लोगों को दुख हो रहा होगा। लेकिन क्या कभी इस ओर भी ध्यान गया है कि लोकतंत्र की चादर ओढ़े कांग्रेसी सरकार दिल्ली को क्या बनाने की योजना पर काम कर रही है?  राज ठाकरे की उछल-कूद महज तात्कालिक ज्वार है, जिससे अगर ‘स्टेट’ नहीं निपट सका तो ‘जनता’ निपट लेगी। लेकिन दिल्ली की शीला दीक्षित सरकार जिस रणनीति पर काम कर रही है, वह राज ठाकरे टाइप राजनीति नहीं है, जो सामने से दिख जाए। असर के स्तर पर वही होगा, जो राज ठाकरे टाइप राजनीति का मकसद है। बल्कि और भी स्थायी नतीजों के साथ होगा। और बुरा भी नहीं लगेगा। बुरा या अच्छा लगना सिर्फ उनका मायने रखता है, जो ‘सभ्य’ और ‘संभ्रांत’ हैं।

दरअसल, बहुत सारे ‘सभ्य’ और ‘संभ्रांत’ लोगों की तरह दिल्ली की मुख्यमंत्री जी भी तहेदिल से यह चाहती हैं कि भारत देश की यह राजधानी ‘सभ्य’ और ‘संभ्रांत’ बाशिंदों का आईना बन जाए। इसके लिए क्या करना चाहिए? ‘बिहारियों को बाहर निकालो’ जैसी कोई बात कहके तो बड़ी मुश्किल खड़ी हो जाती है! सो, कोई बात करने की जरूरत क्या है? काम किया जाए! काम जब ‘असर’ करने लगेगा तो अपना मकसद खुद-ब-खुद पूरा हो जाएगा।

बिहारियों को भगाओ, दिल्ली बचाओ

दिल्ली में बसों का किराया बढ़ना क्या इतना बड़ा सवाल होना चाहिए कि जिस पर शोर मचाया जाए? बेशक नहीं होना चाहिए, क्योंकि इससे दिल्ली के ‘सभ्य’ और ‘संभ्रांत’ समाज पर कोई असर नहीं पड़ेगा। (मेट्रो का किराया बढ़ने पर भी नहीं)। और जिन पर असर पड़ेगा, उनसे दिल्ली की खूबसूरती में खलल पड़ता है। इसलिए बसों के किराए बढ़ने पर इतनी हाय-तौबा मचाने की तुक क्या है!

मान लीजिए कि बिहारीलाल नोएडा की एक फैक्ट्री में नौकरी करता है। किराया बढ़ने से पहले वह बदरपुर से नोएडा सेक्टर- 37 सात रुपये में पहुंच जाता था। नए किराए के हिसाब से यही दूरी तय करने के लिए उसे पंद्रह रुपये चुकाने पड़ेंगे। इसी तरह मुंगेरीलाल पहले चार किलोमीटर की दूरी तीन रुपये में तय करके तीन हजार रुपये की नौकरी करने जाता था। अब उसे इतनी ही दूरी तय करने के लिए दस रुपये चुकाने पड़ते हैं। (यों, दिल्ली सरकार ने मुंगेरीलाल पर मेहरबानी कर दी है। फिर भी, हम उसी स्लैब की बात करेंगे, क्योंकि हमारे लिए बिहारीलाल किसी मुंगेरीलाल से बेहतर हालत में नहीं है।)

दिल्ली सरकार ने जो नया ढांचा तैयार किया है, उसके मुताबिक एक से तीन किलोमीटर के लिए पांच रुपये , तीन से दस किलोमीटर के लिए दस रुपये और दस किलोमीटर से ज्यादा के लिए पंद्रह रुपये तय किए गए हैं। और बिहारीलाल की दिक्कत यह है कि पुराने ढांचे के हिसाब से वह जहां बारह किलोमीटर तक की दूरी सात रुपये में तय करता था, अब उसके लिए उससे पंद्रह रुपये लूटे जा रहे हैं। इसी तरह मुंगेरीलाल को चार किलोमीटर की दूरी तीन रुपये के बजाय अब दस रुपये देने पड़ते हैं। नहीं देने पर उसे कंडक्टर के मुंह से सुनना पड़ता है कि – ‘देने हैं तो दे, नहीं तो उतर नीचे। स्साले बिहारी कहीं के…। चले आते हैं कुत्ते की तरह मुंह उठाए…!’

यानी सरकार के इस नृत्यगान के बावजूद कि किराए में ‘महज’ पचास-साठ फीसद की बढ़ोतरी की गई है, बिहारीलाल को सौ फीसद से भी ज्यादा और मुंगेरीलाल को साढ़े तीन सौ फीसद से ज्यादा बढ़ोतरी वाला किराया चुकाना पड़ रहा है। मुंगेरीलाल के रोजाना छह रुपये की जगह अब बीस रुपये और बिहारीलाल के अपने घर से नौकरी पर जाने-आने का खर्च रोजाना जहां चौदह रुपये था, वह बढ़ कर अब तीस-बत्तीस रुपये हो गया है। यानी बिहारीलाल के चार सौ रुपये महीने का किराया खर्च बढ़ कर अब लगभग हजार रुपये महीना। चार हजार रुपये (बहुतों को दो हजार भी काफी है) महीने की आमदनी, एक हजार रुपये महीना बस किराया और एक हजार रुपये खोली-से दिखने वाले एक कमरे के घर का किराया। बीवी के अलावा दो बच्चे। हिसाब लगा सकते हैं आप बिहारीलाल की आमदनी और खर्च का?

जरूरत नहीं। क्योंकि बिहारीलाल या मुंगेरीलाल इस दिल्ली में अब ऐसे कीड़े-मकोड़ों की जमात के नुमाइंदे हैं, जो विदेशी मेहमानों की नजर में आते ही मुंह कसैला कर दे सकता है। एक तरफ अरबों रुपये बहा कर दिल्ली की सज-धज इसलिए हो रही है, क्योंकि राष्ट्रमंडल खेलों में आने वाले विदेशी मेहमान इसे देख कर निहाल हो जाएं कि भारत सचमुच जन्नत है, और दूसरी तरफ बिहारीलाल, जो छह-सात सौ रुपये , वह भी महीने के बोझ बढ़ाने पर चीख-चिल्ला रहा है।

जी हां। बिहारी लाल की त्रासदी उसका चीखना-चिल्लाना इसलिए लगेगा क्योंकि उसके होने से दरअसल दिल्ली सरकार का दिल दुखता है। दिल्ली सरकार की मुखिया ने एक बार राज ठाकरे की जुबान से उधार लेकर एक जुमला उछाला था। लेकिन उससे राज ठाकरे की तरह मूर्ख होने, अमानवीय होने और गैरलोकतांत्रिक होने का ठप्पा लगने का खतरा था। इसलिए उससे पलटना जरूरी था। लेकिन फिर बिहारीलाल का होना जो खल रहा है, उसका क्या किया जाए?

राज के हथकंडों से ज़्यादा क्रूर हथकंडे

जाहिर है, उसके लिए ऐसे रास्ते तलाश करने की जरूरत है, जिससे ‘सभ्य’ और ‘संभ्रांत’ लोगों की नुमाइंदा सरकार होने का मुलम्मा भी बना रहे, और बिहारीलाल से छुटकारा भी मिल जाए।

हमारे कुछ महान मित्र अक्सर कहा करते हैं कि महंगाई बढ़ना दरअसल आर्थिक तौर पर एक उन्नत समाज की निशानी है। उनके अर्थशास्त्र का गणित तो मैं नहीं समझता। लेकिन इतना समझता हूं कि चार हजार रुपये  महीने कमाने वाले बिहारीलाल की नौकरी हाल में इसलिए बच सकी थी क्योंकि मंदी के तर्क पर जितने लोगों को निकाला गया था, उसके अलावा दो और लोगों ने बहुत कम वेतन के कारण खुद से नौकरी छोड़ दी थी और कम से कम उन दो लोगों की जगह पर एक की जरूरत थी। और बिहारीलाल बदरपुर में लगने वाली सब्जी मंडी से अपने मैनेजर के लिए कुछ सस्ती मिल जाने वाली ताजी-हरी सब्जियां अक्सर ले जाया करता था, जिसके लिए उसके मैनेजर ने कभी भी दस रुपये बख्शीश के तौर पर भी नहीं दिए थे। लेकिन मैनेजर ने उस वक्त बिहारीलाल की नौकरी बचा कर अब तक लाई गई सारी सब्जियों की कीमत अदा कर दी थी।

(अब बिहारीलाल को डर लगने लगा है कि अगले दौर में क्या होगा। क्योंकि उसके इलाके में भी सस्ती मिल जाने वाली सब्जियों की हालत यह है कि आलू पच्चीस रुपये और गोभी पचास रुपये किलो मिलने लगा है। अब उसके घर में दाल बहुत कम बनती है, क्योंकि जीने के लिए थोड़ा-सा ही सही, भात या रोटी खाना जरूरी है। ऊपर से उसके बस के किराए का खर्चा अब दोगुने से भी ज्यादा बढ़ गया है।)

कहीं कोई ऐसा अभियान दिखने-सुनने में आ रहा है, जिससे कम से कम यह भ्रम भी पैदा हो सके कि लोगों की तकलीफें बढ़ गई हैं, और इसके खिलाफ आवाज उठाने वाली ताकतें लोकतंत्र के स्तंभों के रूप में जिंदा हैं!

प्रभुवर्ग की बांदी है मीडिया

याद है, बीआरटी के मसले पर हमारे प्यारे लोकतंत्र के धारदार चौथे खंभे का रुख! बीआरटी से होने वाली तकलीफों के बयान से लगता था कि अखबार के पन्ने आंसुओं से नहा गए हैं और ‘जनता’ की चीत्कारों से हिल उठे हैं। ‘जनता’ की तकलीफों के पक्ष में ऐसे माहौल की ‘रचना’ करना अभूतपूर्व था। और हम सबने देखा कि बीआरटी की क्या हालत हुई। सरकार घुटनों के बल रेंग रही है बीआरटी के खिलाफ आग उगलने वाली लॉबी के सामने…।

बीआरटी- यानी बस रैपिड ट्रांजिट, यानी सड़कों पर बनाई जाने वाली ऐसी लेन जिनमें केवल बसें ही चलतीं। अंबेडकर नगर से मूलचंद की मजबूरी अब तक ढोयी जा रही है। मथुरा रोड की कहानी सबकी निगाह में आ चुकी होगी, कि पहले सड़कों पर बीच में बीआरटी की योजना रद्द करके किनारे, फिर उसे भी लगभग बेमानी बना देने की योजना पर अमल शुरू हो चुका है।

मोटरगाड़ियों को दिक्कत नहीं होनी चाहिए। कुल सड़कों का अस्सी फीसद जगह घेरने और बीस फीसद से भी कम लोगों की सवारी बनी मोटरगाड़ियों को कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए।

विकास के नाम पर लूट

सरकार के किसी मंत्री ने शायद कहा कि नई लो-फ्लोर बसें चूंकि बहुत महंगी आ रही हैं, इसलिए घाटा पूरा करने के लिए किराया बढ़ाना जरूरी था। सरकार की ओर से भिन्न-भिन्न तर्क अब भी बांचे जा रहे हैं। लेकिन सर जी, बताएंगे जरा कि बसों में सफर करने वाले किन लोगों ने आपको महज आखों को सुहाने वाली और छाती फुलाने के लिए बैठ कर सफर करने वाली वातानुकूलित और हरी-हरी लो-फ्लोर बसें ही खरीदिए?

घाटा पूरा करना है। बहुत अच्छा! बिहारीलाल की गर्दन हमेशा हाजिर है। काट लीजिए, घाटा पूरा जाएगा। लेकिन ये ब्लू लाइन या निजी बसों वाले किस ग्रह से उतर कर इस दिल्ली की जमीन पर आए हैं कि बराबर का किराया वसूल कर तुरंत नई बसें खड़ी कर लेते हैं। कभी अपनी काहिली, बेईमानी, भ्रष्टाचार और उससे नीचे उतर कर अपनी पचास साल से ज्यादा से सेवा-रत डीटीसी के कर्मचारियों के भ्रष्ट आचरण पर निगाह गई है आपकी? नहीं। जाने लगेगी, तो अपनी जेब और अपने पेट का आकार कैसे फूलेगा! फिर क्या कभी इस बात का खुलासा होगा कि इन हरी-हरी और लाल-लाल सुहावनी बसों को ही दिल्ली की सड़कों पर दौड़ने लायक मान लेने की ‘असली’ वजह क्या है?

बसों में सफर करने वालों के लिए पुरानी डीटीसी बसें ही काफी आरामदायक और सुरक्षित हैं। इनके लिए एक या दो रुपये की बचत ज्यादा महत्त्वपूर्ण थी। लेकिन दिल्ली की लुटेरी सरकार के लिए इन बातों को समझना ‘सभ्य’ और ‘संभ्रांत’ लोगों की सरकारत्व को अपमानित करना होगा। यों भी, इन ‘सभ्यों’ और ‘संभ्रांतों’ के दूर के सगे-संबंधी भी तो नहीं होंगे कोई कि जिन्हें बढ़े किराए से परेशानी हो। तो क्यों न ऐसा उपाय किया जाए कि ‘विकास’ कराया जाए लगातार। सब कुछ चलता रहेगा। ‘लूट’ की ‘लूट’ और ‘विकास’ का ‘विकास…’।
 
देश की तमाम सरकारें, यह सुनने में शर्म नहीं आ रही हो, तो सुनो कि तुम्हारी आठ फीसदी विकास दर और दुनिया की बड़ी आर्थिक ताकत होने के दावे बेहद बेहया हैं। यहां सिर्फ इतना कि आज भी ऐसे लोग हर कदम पर खड़े तुम्हें आईना दिखा रहे हैं कि बस में सफर करने वालों के लिए एक या दो रुपये  का बहुत महत्त्व होता है। एक या दो रुपये  की टिकट कम लेने पर सरकारी बसों में कॉलर पकड़ कर उससे सौ रुपये  जुर्माना लिया जा सकता है और प्राइवेट या ब्लू लाइन बसों मां-बहन की वीभत्सतम गालियों के साथ अधिकतम जलील किया जा सकता है और कॉलर पकड़ कर चलती बस से फेंक भी दिया जा सकता है।

ताकि सनद रहे…

मनमोहनी उदारीकरण के दौर में जिस शख्स की आमदनी इतनी नहीं है कि वह बाजार को एक ‘संतोषजनक उपभोक्ता’ होने का भरोसा दिला सके, वह सब बिहारी है।

और…

‘विकास’ के इस दिल्ली ब्रांड से लेकर दिल्ली के ही बटला हाउस इनकाउंटर तक की प्रकृति का विश्लेषण कर लीजिए- दिख जाएगा कि दिल्ली की यह शीला दीक्षित सरकार गुजरात की नरेंद्र मोदी सरकार से कहां अलग है। फर्क सिर्फ इतना है कि नरेंद्र मोदी छाती ठोंक कर सब कर रहे हैं और शीला दीक्षित बहुत ही सॉफिस्टिकेटेड तरीके से…।

यों भी, नीतिगत चाल-चलन को व्यवहार में उतारने के मामले में कांग्रेस के सामने भाजपा की औकात क्या है!

सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे! कहावत सुना है आपने…!

(नोट: इस देश का सामाजिक प्रभु वर्ग “सत्ता” के किसी भी सूत्र की लगाम अपने हाथ में थाम लेने में सबसे “लचीला” रहा है, इसीलिए आगे रहा है।)

((वरिष्ठ पत्रकार अरविंद शेष इन दिनों जनसत्ता से जुड़े हैं।))

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6 Responses to नरेंद्र मोदी और राज ठाकरे से कम नहीं हैं शीला दीक्षित

  1. Mazkoor Alam Reply

    November 19, 2009 at 6:05 pm

    prabhu varg ke pass aam aadmi ko bas mein karne ka hamesha se do hathiyar raha hai. ek to nafrat phailana.. doosra logon dainik suvidhayon se door kar dena ki log usi mein phans kar mukti ka asli marg bhool jaye agle janam tak ke liye…

  2. aam admi Reply

    November 19, 2009 at 6:28 pm

    Congress aur BJP ko alag- alag manne walon ke pas Arvind Shesh dwara uthaye gaye muddon ka koi jawab hai? Rang-virange tambu lagane bhar se asaliyat ab chupne wali nahin. Janvirodhi in dalon ka asli chehra baar-baar samne laana hi hoga. Arvind Shesh aur Jantantra ko Badhai aise lekh ke liye.

  3. सुधीर शर्मा Reply

    November 19, 2009 at 11:04 pm

    कभी कभी तो लगता है कि इस देश की जनता के हिस्से भूख, गरीबी और तिरस्कार के सिवाए कुछ नहीं। भूख से बचने के लिए और परिवार का पेट पालने के लिए लोग नौकरी करते हैं। नौकरी में समझौते करते हैं और फिर तिरस्कार झेलना पड़ता है। इस व्यवस्था में सड़ांध इतनी अधिक है कि इससे सिर्फ दलाल पैदा हो सकते हैं और जो दलाल बनने को तैयार नहीं होगा उसे हाशिए पर तड़पने और भूखों मरने के लिए छोड़ दिया जाएगा। उसकी जेब से एक-एक पैसा निकाल लिया जाएगा और जिस्म के लहू का एक-एक कतरा होम कर दिया जाएगा। यह २१वीं सदी का भारत है और शीला दीक्षित जैसे लोग २१वीं सदी के हुक्मरान। हमारे हिस्से बेबसी, कुंठा, हताशा और निराशा के सिवाए कुछ नहीं।

  4. कपिल Reply

    November 19, 2009 at 11:22 pm

    कांग्रेस की so-called धर्मनिरपेक्षता की असलियत आपने खोल कर सामने रख दी है। असल में धर्मनिरपेक्षता का मुखौटा कांग्रेस ने ओढ़ा ही इसलिए है कि इसकी आढ़ में घोर जनविरोधी नीतियों को लागू किया जाए। कांग्रेस वह पार्टी है जो आज बाजारवादी नीतियों को बेहद खूबसूरती से आम जनता पर लाद रही है और इस पर कोई शोर भी नहीं हो रहा। कांग्रेस आज भी टाटा-बिरला वर्ग की सबसे पसंदीदा पार्टी है इसकी यही वजह है। इस बढि़या लेख के लिए अरविंद भाई बधाई स्‍वीकार करें।

  5. रंगनाथ सिंह Reply

    November 21, 2009 at 12:21 am

    शीला सकार की नीति का आपने प्रभावी विश्लेषण किया है।

  6. anand bharti Reply

    November 21, 2009 at 12:37 pm

    Sawal sirf sheilaji ka nahin hai virodhi parties ne kuchh kiya kya? jab poori rajniti janvirodhi ho jaaye toh kise kya kaha jaaye. Abhi bhi time hai ki sarkar ko BUS KIRAYA KAM KARNE KE LIYE MAZBOOR KARE. ganna KISANON KA UDAHARAN SAAMNE HAI, KENRA KO APNA FAISLA WAPAS LENA PADA.

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