ये दो घटनाएं एक ही दिन की हैं और इन दोनों घटनाओं से मीडिया का चरित्र सामने आ जाता है। ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन जैसे संगठनों की असलियत भी जाहिर हो जाती है। पहली घटना आईबीएन 7 और लोकमत पर शिव सैनिकों के हमले से जुड़ी है। मुंबई और पुणे में हुआ हमला लोकतंत्र पर हमले के बराबर था। ख़बर बड़ी थी और सभी चैनलों ने, अख़बारों ने उस ख़बर को जोरशोर से प्रसारित किया और प्रकाशित किया।
जनतंत्र की टीम भी उस हमले के लिए शिव सैनिकों की निंदा करती है और यह उम्मीद भी कि महाराष्ट्र की कांग्रेस-एनसीपी सरकार शिवसैनिकों से सख्ती से निपटेगी। हालांकि यह उम्मीद पहले भी कई बार की गई लेकिन भोकुस दलाल किस्म की सरकारें गरीबों पर गोली चलाने का फैसला तो ले लेती हैं लेकिन शिव सैनिकों और एमएनएस के गुर्गों पर हाथ डालने से डरती हैं।
अब दूसरी बड़ी घटना। आईबीएन 7 और लोकमत न्यूज़ चैनल… मीडिया कंपनी आईबीएन – 18 का हिस्सा हैं। और आईबीएन 18… मीडिया कंपनी नेटवर्क 18 का एक हिस्सा है। नेटवर्क 18 से जुड़ी एक और ख़बर बहुत बड़ी थी। टेलीविजन 18 के दो न्यूज़ चैनल सीएनबीसी टीवी 18 और सीएनबीसी आवाज़ में बड़े पैमाने पर छंटनी की गई। करीब 125 कर्मचारियों को एक झटके में निकाल दिया गया। लेकिन यह ख़बर किसी अख़बार और किसी न्यूज़ चैनल पर नहीं आई। यहां तक कि टिकर में भी इस ख़बर को जगह नहीं दी गई।
यही नहीं ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन (BEA) ने भी इस मुद्दे पर एक पंक्ति तक लिखना मंजूर नहीं किया। उसकी तरफ़ से इस मुद्दे पर कोई प्रेस विज्ञप्ति नहीं जारी की गई। सारे संपादक पत्रकारों की रोजी-रोटी पर पड़ी मार पर मौन हैं। हम जानते हैं कि संपादकों के हाथ आज बंधे हैं। वो संपादक कम मैनेजर ज़्यादा हैं। बहुत कुछ उन्हें अपनी इच्छाओं और संस्कारों के विरुद्ध करना पड़ता है। यही वजह है कि वो पत्रकारों की छंटनी की ख़बर अपने अख़बार और न्यूज़ चैनल पर नहीं दे सकते। लेकिन बीईए तो उनका अपना एसोसिएशन है। उनसे और उनके इस संगठन से इतनी उम्मीद तो की जा सकती है कि साथियों की छंटनी पर संवेदना के दो शब्द ही कह दें।
प्रकाश
November 21, 2009 at 10:45 pm
ये जिस BEA नाम की संस्था का आपने जिक्र आपने किया है वो कुछ नपुंसक किस्म के लोगों की दुकान है। इनसे कोई उम्मीद करना बेवकूफी है। पत्रकारों को इस संस्था का बहिष्कार करना चाहिए।
media ka madhav
November 22, 2009 at 10:54 am
vo press par hamla tha jiske rahnuma sahoo-jain bidla type log hain chhatnee to individual ka mamla hai bhala unkee chinta kaun kare.patrakar to bailgadi ke neeche chalne vala jeev hai.par uske nam par malik gulchharre udata hai sahanubhooti batorata hai.journos ke papi pet -aisa kyon kahte hain- par laat mar muskata hai.
denesh
November 23, 2009 at 11:37 am
मुझे लगता है कि कि बाल ठाकरे के शिष्यों ने सीएनएन-आईबीएन के साथ जो किया वो सही है। शिवसेना का इस तोड़फोड़ के पीछे तर्क है कि उनके नेता बाल ठाकरे का कोई अपमान नहीं कर सकता है और न ही उनके खिलाफ कोई लिख सकता है। सही मायनों में शिवसेना का ये तर्क सही भी लगता है। सीएनएन-आईबीएन, एनडीटीवी और अन्य चैनलों पर उस दिन इसी बात का सभी लोगों ने रोना रोया कि शिवसेना ने लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर हमला किया है। लेकिन मेरा सवाल ये है कि ये चौथा स्तंभ है कहां ? असल में लोकतंत्र का ये चौथा स्तंभ रह ही नहीं गया है। हम मन ही मन खुश होते हैं कि मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है लेकिन सही मायनों में ये चौथा स्तंभ अब लंगड़ा हो गया है। आज उसके सामने सिर्फ सरकार और राजनीतिक दल ही रह गए हैं जिनके विरोध में वो खबरें चलाकर अपने आपको बड़ा साबित करने की कोशिश करता है। लेकिन असल में इसके पीछे भी उसका नजरिया पैसा कमाना है। आज हर मीडिया हाउस की एक नीति है और उसी के तहत वो खबरें लिखता या दिखाता है। असल पत्रकारिता को तो मरे हुए जमाना हो गया है। एक छोटा सा उदाहरण देता हूं, गुड़गांव में एक फैक्ट्री में मजदूरों को निकाला जाता है तो उसके पीछे पूरा मीडिया लग जाता है। यहां पर मीडिया मजदूरों के हितों की कम और अपनी टीआरपी को ध्यान में रखते हुए संबंधित सरकार पर ज्यादा हमले बोलता है। दो दिन बाद उन मजदूरों को हक मिला या नहीं इस पर किसी चैनल या अखबार की नजर नहीं जाती है। इसी तरह से सीएनएन-आईबीएन से 250 पत्रकारों की छुट्टी हो जाती है लेकिन किसी मीडिया हाउस या अखबार ने ये खबर लिखने और दिखाने की कोशिश नहीं की। और तो और किसी संपादक ने भी इस पर कुछ संपादकीय नहीं लिखा क्योंकि उन्हें बाल ठाकरे पर संपादकीय लिखने से फुर्सत नहीं मिली। असल में मीडिया निष्पक्ष नहीं रह गया है। और यही बात बाल ठाकरे और उनकी शिवसेना का भी आरोप है और जब लाठी से ही खबरें दब सकती है तो शिवसेना ने तोड़फोड़ करके क्या गलत किया। फिर क्यों कुछ चैनलों के धुरंधरों ने दिन भर एक चैनल पर चौथे स्तंभ का रोना रोया। पहले निष्पक्ष बनों और आम आदमी की आवाज बनों और पहले अपने घर की आवाज बनों तब आपको हक है दूसरे पर ऊंगली उठाने का। चलो शिवसेना ने मराठी मानुष के नाम पर तो अपनी कौम के लिए लड़ाई लड़ी लेकिन आप लोग तो अपने लोगों की ही गर्दन काटने से नहीं चूके।