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वाजपेयी "देवतुल्य" हैं, अंगुली उठाओगे तो पाप लगेगा!

लिब्रहान आयोग की रपट को लेकर हंगामा मचा हुआ है। सारे राजनीतिक दल अपनी सुविधा के मुताबिक उसका खंडन-मंडन कर रहे हैं। लेकिन लिब्रहान आयोग में एक अदद नाम ने भी पूरे राजनीतिक वातावरण में कम लुत्ती नहीं लगायी है। आयोग ने जिन लोगों को बाबरी मस्जिद के विध्वंस के लिए जिम्मेदार ठहराया है, उनमें एक नाम अटल बिहारी वाजपेयी का भी है। वाजपेयी का नाम आया तो पूरी भाजपा ही नहीं, संघ परिवार को भी मिर्ची लग गयी। और तो और, वाजपेयी को कल तक पानी पी पीकर कोसने वाले कल्याण सिंह ने भी सप्तम स्वर में कोसना शुरू किया कि कांग्रेस वालों की बेशर्मी तो देखो, बेचारे अटल बिहारी वाजपेयी जैसे संतपुरुष का नाम अयोध्या विवाद से जोड़ दिया। मोम से भी कमतर बीजेपी के लौहपुरुष लालकृष्ण आडवाणी ने भी अपनी फटी आवाज में चीखना शुरु किया कि मेरा नाम लिया तो लिया, वाजपेयी का नाम कैसे जिम्मेदारों की सूची में ठहरा दिया। वैसे आडवाणी मानते हैं कि 6 दिसंबर 1992 उनकी जिंदगी का सबसे दुखद दिन है। यानी अयोध्या प्रकरण में सारे धत्कर्म करके भी आडवाणी खुद को पाक-साफ मानते हैं। वाणी और बुद्धि की बलिहारी है!

लेकिन क्या लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट में वाजपेयी का नाम आने पर संघ परिवारियों का ये अनर्गल प्रलाप सही है?

क्या वाजपेयी का इस देश की धर्मनिरपेक्ष मानसिकता में आस्था रही है? क्या अयोध्या प्रकरण में वाजपेयी नहीं जानते थे कि कार सेवा के नाम पर जो कुछ चल रहा है, वह इतिहास को लांछित करने वाले किसी क्षण का कारण बन सकता है? अगर ऐसा नहीं था तो जब 1990 में आडवाणी सोमनाथ से रथयात्रा लेकर निकले तो वाजपेयी ने उन्हें क्यों नहीं रोकने की कोशिश की? क्यों नहीं कहा भाजपा, संघ परिवार और अपने सदा सहायक आडवाणी से कि जो कुछ तुम करने जा रहे हो, वह मर्यादा के पुरुषोत्तम के व्यक्तित्व को तो व्यथित करने वाला है ही, इस देश की सहनशील वृति और सामूहिक मानसिकता से भी बलात्कार करने वाला है? लेकिन तब वाजपेयी भी तो कमंडल राग ही गा रहे थे। बस स्वर और सुर का फर्क था। आडवाणी, जोशी, कल्याण सिंह और दूसरे संघ परिवारियों की तुलना में वाजपेयी की भाषा थोड़ी प्रांजल थी। नहीं तो जुबान पर मुसलमानों के खिलाफ जहर रखकर चलने में कौन भाजपायी पीछे रहता है? बीजेपी कांग्रेस को इस बात के लिए कोसती है कि उसने चरण सिंह, चंद्रशेखर से लेकर देवेगौड़ा और गुजराल तक की सरकार को चलने नहीं दिया। लेकिन वीपी सिंह की जिस सरकार को भाजपा चला रही थी, उसे अयोध्या मसले पर भाजपा ने ही गिराया था। आडवाणी की गिरफ्तारी के बाद 23 अक्टूबर 1990 को राष्ट्रपति आर वेंकटरामन के पास वीपी सरकार से समर्थन वापसी की चिठ्ठी लेकर उदार नेता अटल बिहारी वाजपेयी ही गये थे। जब एक अदना व्यक्ति भी समझ रहा था कि आडवाणी की रथयात्रा अयोध्या में विस्फोटक स्थिति पैदा कर सकती है, तो क्या वाजपेयी को यह पता नहीं था?

6 दिसंबर हुआ। पूरा देश स्तब्ध रह गया। अगर वाजपेयी अयोध्या में बाबरी मस्जिद के गिराये जाने से इतने ही व्यथित थे तो क्यों नहीं उन्होंने भाजपा को छोड़ दिया? क्या कोई राजनीतिक दल देश की आहत मर्यादा, सभ्यता और संस्कार से भी बड़ा होता है? अयोध्या में 6 दिसंबर को जो कुछ हुआ, वह भगवान राम के प्रति वैसा ही था, जैसा रावण ने राम के साथ किया था। आडवाणी और उनके गिरोह वालों ने जो कुछ किया, उससे वाजपेयी का सिर वाकई शर्म से झुका हुआ था और इस तरह झुका हुआ था कि उनकी गर्दन उसे संभाल नहीं पा रही थी तो वह भाजपा छोड़कर उस ‘पाप’ से मुक्ति पा सकते थे। विभीषण ने राम के लिए रावण को छोड़ा था या नही?

लेकिन यह सब सवाल क्यों उठाया जाए। बाबरी मस्जिद ध्वंस से एक दिन पहले लखनऊ में भाजपायी-हिंदुत्ववादी-संघी गिरोहबाजों को संबोधित करते हुए वाजपेयी ने जो कुछ कहा, वह मर्यादित व्यक्तित्व के लक्षण नहीं थे। वाजपेयी ने कहा कि अयोध्या में कारसेवा करने का अधिकार तो सुप्रीम कोर्ट ने दिया है। उन्होंने कहा कि अयोध्या में कल क्या होगा, वह नहीं जानते लेकिन वहां जमीन को समतल करना पड़ेगा। 24 घंटों में जमीन समतल कर दी गयी। क्या अपने इस गुनाह से वाजपेयी बच सकते हैं?

दरअसल वाजपेयी के नाम पर हायतौबा मचाने वाले और शायद खुद वाजपेयी भी यह नहीं जानते कि 6 दिसंबर 1992 को इस देश ने क्या खोया था। हिंदू-मुस्लिम झगड़े तो होते रहे हैं, जैसे दो भाइयों में होते हैं। आपस में दोनो लड़ते भिड़ते भी रहे लेकिन एक दूसरे के साथ जीने और एक दूसरे के साथ निबाहने का भरोसा हमेशा कायम रहा। 6 दिसंबर ने उस भरोसे को तोड़ दिया। बाबरी मस्जिद की टूट से उठी गर्द में आज भी इस देश के धर्मनिरपेक्ष संस्कार का दम घुटता है। लेकिन यह बात वही समझ सकते हैं, जिन्होंने भगवान राम के व्यक्तित्व से मर्यादा और संवेदना का पाठ पढ़ा हो। वे नहीं, जो कालनेमी की तरह राम का नाम जपते हुए रावणी साजिश का हिस्सा हों।

((विचित्र मणि टेलिविजन में वरिष्ठ पत्रकार हैं।))

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6 Responses to वाजपेयी "देवतुल्य" हैं, अंगुली उठाओगे तो पाप लगेगा!

  1. diwakar Reply

    November 28, 2009 at 6:16 pm

    bichitramni bhai ki lekh ek pakshiya hai. mai pehle hi ye spastha kar dun ki mai koi vajpayee prasansak nahi hun, magar report me sirf ek pakshiye bat likhi huyee hai.

  2. Anand Prasad Reply

    November 28, 2009 at 9:03 pm

    muslim tushtikaran karne walon ki sur mey sur mila kar vichitramani jee kya saabit karna chhahte hain….????? kisi bhi vyakti ke personality ki kisi ek angle se nahi samjhi jaa sakti…….. vajpayeejee ke samagra vyaktitwa ki sampoorna aakalan karne ke paschat hi kisi tarah ki tippani karni chhahiye…!!!

    • विवेक Reply

      November 29, 2009 at 12:43 am

      क्यों भई, अब ज़रा यह भी बता दीजिए कि किसी के व्यक्तित्व का संपूर्णता में विश्लेषण कैसे किया जाता है? एक शख़्स जो पूरे राष्ट्र को कलंकित करने वाली साज़िश में शामिल रहा। लोगों को भड़काऊ बयान देकर अपने नापाक मंसूबों को पूरा करने के लिए उकसाता रहा… उस शख़्स के उस गुनाह को कैसे खारिज किया जाए … जरा यह भी बता दो। अगर आपके पैमाने को आधार बना लिया जाए तो दुनिया में सिर्फ चंद लोग ही आलोचना के काबिल होंगे। एक क़ातिल और वहशी दरींदे में भी कुछ गुण तो मिल ही जाएंगे? क्यों नहीं मिलेंगे क्या?

      वैसे भी यहां बात एक खास प्रकरण की हो रही है। बाबरी मस्जिद के ढहाए जाने की हो रही है और उस घिनौने काम से देश में सामाजिक बंटवारे की हो रही है। उस हिसाब से देखा जाए तो वाजपेयी बहुत बड़े गुनहगार हैं। अब जिसे चरण वंदना करनी हो वो करता रहे।

      • Anand Prasad Reply

        November 29, 2009 at 6:46 pm

        nobody here in this world is “perfect”……. you have to choose between “bad” and “worse”…….. to criticize someone is easy but you can judge one not only by taking few negative things and ignoring thousands positive things (… as far as Vajpayeejee’s personality is concerned)…… Aap logon pey yeh ukti bilkul theek baithti hai……. ” Bura jo dekhan mai chala, bura na milya ki, jo dil khoja apnu, mujhse bura na koi…!!!!!!”

        • विवेक Reply

          November 29, 2009 at 7:28 pm

          अरे भई आप तो संत निकले। बाबा रामदेव के कोई चेले हैं या फिर रजनीश के नए अवतार। आप यह भी बता दीजिए। यहां तो बात सियासत की हो रही है और आप संत वाणी बोल रहे हैं। जय बाबा रामदेव की … जय रजनीश की … जय हो जय हो

          • Anand Prasad Reply

            December 5, 2009 at 12:54 pm

            aap baat siyasat ki kar rahe ho aur neetant acchhey evam 100% imanedaar logon ki apeksha karte ho bhai….ye bhala kaise mumkeen hai…???? apko pata hona chahiye kee — politics is nothing but a dirty game…….!!!! ab isey aap kabir/ramdev/rajenessh ki baat samjhte ho to phir yeh apki marjee…!!!!!!

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