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संघर्ष कहां, आदर्श कहां… चारण और सूबेदारों का राज है

पहले चरण में वोट फ़ीसदी घटा है. झारखंड विधानसभा चुनावों में. एक स्रोत का मानना है, बीस वर्षों में सबसे कम मत पड़े. खासतौर से शहरों में. इससे क्या संकेत मिलते हैं? यह क्या राजनीति के प्रति नफ़रत का प्रतिफल है? इस घटते वोट फ़ीसदी के संकेत गहरे हैं. समाजशास्त्रियों के लिए भी. राजनीतिज्ञों के लिए भी. लोकतंत्र के प्रेमियों के लिए भी.

एक विश्लेषण यह भी है कि यह ग्लोबल विलेज की नयी दुनिया में उभरे आत्मकेंद्रित समाज का रुझान है. इक्कीसवीं सदी की यह दुनिया, गांव मानी जा रही है. एक सूत्र में बंधी. यह दुनिया, बाजार के विचारों से संचालित है. अब दुनिया पलटने और बदलनेवाले राजनीतिक विचार प्रभावी नहीं हैं. राजनीति, विचारविहीन है. पहले ‘वाद’ थे. पूंजीवाद, समाजवाद, साम्यवाद, अराजकतावाद. अब है… बाजारवाद. इस बाजारवाद के विचारस्रोत है, ‘मैनेजमेंट थाट’ या ‘मैनेजमेंट गुरु’ या ‘मैनेजमेंट आइडियालाग’ (प्रबंधन के भाष्यकार). अभी दुनिया ने मैनेजमेंट गुरु पीटर ड्रकर की शताब्दी मनायी. उनके मरे चार वर्ष हुए. वह जीते तो सौ वर्ष के हुए होते. वह अर्थशास्त्री जेएम किंस और जोसेफ़ शुंपीटर स्तर के थे. इन दोनों से वह प्रबंधन के अपने विचार लेकर मंथन भी करते रहे. प्रबंधन में आज वही पीटर ड्रकर आइडियालाग माने जाते हैं. प्रबंधन शास्त्र की शुरुआत का श्रेय उन्हें है. कहते हैं, इस वर्ष ‘मैनेजमेंट कंसलटिंग इंडस्ट्री’ को 300 बिलियन डॉलर (13.88 लाख करोड़ रुपये) की आय होगी. इसका श्रेय उन्हें दिया गया है. जब राजनीतिकवाद थे, अर्थशास्त्र के सिद्धांत समाज को गढ़ते थे, तब प्रबंधन का शास्त्र नहीं था. आज एक प्रबंधन गुरु अपने एक व्याख्यान के लिए 60000 डॉलर (28 लाख रुपये) कमा सकता है. प्रबंधन कला को इस स्तर तक पहुंचाने का श्रेय पीटर ड्रकर को दिया जाता है. वह बाजार, प्रबंधन और उद्योग के मौलिक विचारक माने गये. वह ‘द फ़ादर ऑफ़ माडर्न मैनेजमेंट’ (आधुनिक प्रबंधन के पिता) और ‘वर्ल्ड्स ग्रेटेस्ट मैनेजमेंट थिंकर’ (विश्व के सबसे बड़े प्रबंधन विचारक) माने जाते हैं. उन्होंने ही भविष्यवाणी की थी कि भविष्य में नालेज वर्कर (ज्ञानसंपन्न मजदूर) होंगे.

यह विश्व गांव, ज्ञान संपन्न मजदूरों की दुनिया है. मार्क्सवाद के गहरे अध्येता बता सकते हैं कि मार्क्स ने कैसे व किस समाज में ‘एलीनेशन’ (अलगाव) की चर्चा की थी. बाजार की इस दुनिया का प्रेरक तत्व है, उपभोग की भूख. टीवी विज्ञापनों पर देखे गये अत्याधुनिक और महंगी चीजों का आकर्षण. उसे पाना, उसमें जीना। उसमें रमना, उसी में डूबना-उतराना. भदेस भाषा में कहें, तो यही भोग का संसार है. इससे आत्मकेंद्रित समाज पनपता है. यह समाज अपने लिए जीता है. घर में बच्चों के लिए समय नहीं. पति-पत्नी अपनी दुनिया में. दरकते-टूटते मानवीय संबंध. शहरों में यह ज्यादा है. गांवों में कम. इसलिए शहर का समाज गांव की तुलना में अधिक आत्मकेंद्रित हो रहा है. दिनोंदिन. लोकतंत्र समूह की जीवन पद्धति है. समूह की व्यवस्था है. इसलिए आत्मकेंद्रित होते लोग समूह से कट रहे हैं, जिनकी दुनिया खुद तक सीमित हो गयी है, वे पहल कर समाज के लिए क्यों वोट दें? सरकार, समाज की चीज है. इस तरह आत्मकेंद्रित लोगों को समाज की चीज से क्या ताल्लुक? गांव का व्यक्ति अभी भी, समूह व समाज के लिए जीता है. इसलिए वहां वोट फ़ीसदी अधिक है. पिछले लोकसभा चुनावों में जमशेदपुर व बोकारो में सबसे कम वोट पड़े? शायद यहां भी नालेज वर्कर अधिक हो गये हैं. खुद से सरोकार अधिक. यह व्याख्या पढ़े-लिखे लोग देते हैं. यह कारण है या नहीं, यह अध्ययन से ही पुष्ट होगा.

फिर घटते वोट क्या बताते हैं? हमारी मान्यता रही है, कोउ नृप होउ हमहि का हानी. कोई भी राजा हो, उससे क्या फ़र्क पड़नेवाला? डॉ लोहिया ने भी निराशा के कर्तव्य में भारतीय मन की उदासी-तटस्थता का उल्लेख किया है. उनकी व्याख्या मानती है कि हजारों वर्ष की गुलामी ने हमें सत्वहीन कर दिया है. बाबरनामा में बाबर के सटीक अनुभव हैं. कैसे लाखोंलाख लोग सेना के मामूली टुकड़ी को मूकदर्शक बन कर स्वागत करते हैं. पराधीनता मान लेते हैं. इस तरह मतदाताओं के घटते रुझान की अनेक व्याख्या होती रही है. होती रहेगी. पर लोकतंत्र को हमारी मौजूदा राजनीति, अविश्वसनीय बना चुकी है. यह सच है. राजनीति का चेहरा कितना अविश्वसनीय हो गया है, इस पर एक सटीक टिप्पणी लिखी है, ओपेन पत्रिका के संपादक संदीपन देब ने. इसे हम साभार छाप रहे हैं. सच यह है कि राजनीतिज्ञों के कामकाज से यह नफ़रत पैदा हई है. प्रभात खबर ने पहले चरण में वोट दे चुके लोगों से बात की. राज्य भर में. मुद्दों को लेकर. सबसे अधिक लोग त्रस्त हैं, भ्रष्टाचार से. फिर महंगाई से. झारखंड के मतदाता स्थायी सरकार भी चाहते हैं. जिन थोड़े से, वोट दे चुके लोगों से बात हुई, उनकी नजर में यही मुद्दे हैं. बातचीत अलग-अलग पृष्ठभूमि के लोगों से हुई. समाज के हर वर्ग से हुई. युवा से बुजुर्ग तक. अब इन मुद्दों की कसौटी पर राजनीतिक दलों को परखें. जिस महंगाई से सबसे अधिक लोग त्रस्त हैं, उसके लिए कहीं गंभीर आवाज उठी? चुनावी घोषणा पत्रों को छोड़ कर. आज से बीस वर्ष पहले प्याज के भाव पर सरकारें बदलतीं थीं. राजनीतिक दल लंबे समय तक आंदोलन चलाते थे. जेल जाते थे. शासकों की फिजूलखर्ची गिनाते घूमते थे. गांव-कस्बों तक जाते थे. वैकल्पिक आर्थिक नीति की बात करते थे. अब किस दल के पास वैकल्पिक अर्थनीति है? 1991 के पहले तक चुनाव में अर्थनीति को लेकर मुद्दे उठते थे. गरीबों की पक्षधर कौन सी नीति है? अमीरों की पक्षधर अर्थनीति क्या है? इस पर राजनीतिक दल सार्वजनिक बहस करते थे. 1991 के उदारीकरण के बाद अब अर्थनीति एक ही है. इस तरह सिर्फ़ चेहरे अलग-अलग हैं, विचार और सिद्धांत अलग-अलग नहीं रहे.

एक बार मधु लिमये ने मुंबई में एक व्याख्यान दिया था. वर्तमान राजनीति का संकट. उन्होंने दो विचारकों का एक उद्धरण दिया. फ़िर अपनी बात शुरू की. कहा कि आज राजनीति, राजनेता और दल ये सब शब्द लोगों में तिरस्कार की भावना पैदा करते हैं और उसमें संकीर्ण स्वार्थवादिता की बू आती है. नेता सिर्फ़ वादा करते हैं. बड़ी बातें करते हैं. कुछ करते नहीं. इसलिए उन्होंने पूरी राजनीति को अविश्वसनीय बना दिया है. फिर उन्होंने आगे कहा, आज भारतीय राजनीति में हो क्या रहा है? लोकतंत्र की पांच संस्थाएं हैं. एक संस्था हो गयी हमारी पार्लियामेंट. दूसरी, हमारा प्रेस. तीसरी, हमारी न्यायपालिका. चौथी, हमारे राजनीतिक दल. पांचवीं, नौकरशाही तथा पुलिस प्रशासन. फिर उन्होंने कहा, ये पांच संस्थाएं ठीक नहीं रहेंगी, तो लोकतंत्र नहीं चल पायेगा. मधु लिमये ने कहा – आज राजनीतिक दलों में क्या हो रहा है? और बताया, देश में जो दलों की सबसे बड़ी कमजोरी है… वह है, कि राजनीतिक दलों में सूबेदारों का राज चल रहा है, जिसको वार लारडिज्म कहा जाता है इनका कोई राष्ट्रीय दृष्टिकोण नहीं होता. ये सिद्धांतों के प्रति वफ़ादार नहीं होते. ये अपने राज्य के अंदर अपने दायरे में, अपनी जागीर में, अपने सूबे में, लोकतंत्र को नहीं पनपने देते. कार्यकर्ता को आगे नहीं बढ़ने देते. इस तरह दलों में अंदरूनी लोकतंत्र है ही नहीं. इसी तरह नौकरशाही, प्रेस, पुलिस प्रशासन सबकी स्थिति है. आज कहां संघर्ष है? कहां आदर्श है? कहां बदलाव के प्रति समर्पित लोग हैं? बुद्धिजीवी तो और पस्त, निराश और चारण की भूमिका में हैं. इस देश में कहां सामाजिक परिवर्तन की राजनीति हो रही है? नया समाज गढ़ने का विचार कहां है?

इसलिए वोटर कम निकल रहे हैं, तो आश्चर्य नहीं. पर निरपेक्ष व उदासीन बने वोटर नहीं जान रहे हैं कि उनकी तटस्थता या उदासी से क्या होगा? लोकतंत्र से बढ़िया व्यवस्था आज भी नहीं है. सही है, इसमें कमियां हैं, यह तर्क भी अपनी जगह है कि 51 नासमझ, 49 नासमझों पर राज करते हैं. पर इससे बेहतर है क्या? कैसे राजाओंका वंश का आतंक रहा है? यह इतिहास से पूछिए. एक-एक व्यक्ति को गरिमा और वाणी लोकतंत्र ने ही दी है. हां, उसमें कमियां हैं, तो लोक-सजगता से ही दूर होगी. लोकतंत्र का विकल्प नहीं है. इस देश ने आपातकाल में तानाशाही की भी एक झलक भोगी है. अब भी समय है कि राजनीतिज्ञ सोचें कि लोकतंत्र को कैसे विश्वसनीय बनाया जाये और मतदाता कैसे घरों से निकलें? इसके लिए चरित्र विकसित करना होगा. विश्वसनीय बनना होगा. इसके लिए राजनेता तैयार हैं. (प्रभात ख़बर से साभार)

((वरिष्ठ पत्रकार हरिवंश झारखंड के नंबर वन अख़बार प्रभात ख़बर के प्रधान संपादक हैं))

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