क्या कभी हमारे देश का राजनीतिक माहौल ऐसी शर्मनाक स्थिति में रहा है, जैसा की अभी है? अख़बारों के पहले पन्ने पर जिस तरह की ख़बरें रोज़ आ रही हैं, उससे आपको उबकाई आती होगी।
बात कुछ दिन पहले से शुरू करते हैं, जब आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री वाइ राजशेखर रेड्डी का निधन एक हेलीकॉप्टर दुर्घटना में हुआ। रातों-रात वाइएसआर देवतुल्य हो गये। यह सुन कर कि उनके प्रिय नेता वाइएसआर नहीं रहे, लोगों के बीच से आत्महत्या की ख़बरें आने लगीं। लेकिन इस बीच एक और बात हुई, जिस पर कम ग़ौर किया गया। वाइएसआर के बेटे जगन मोहन रेड्डी देखते ही देखते राष्ट्रीय स्तर पर चमकते सितारे की तरह छा गये? तीस वर्ष से भी कम उम्र में ही उनके द्वारा हजारों करोड़ से अधिक की जायदाद बटोरने ने उन्हें चरचा में ला दिया? पता नहीं यह सच है कि झूठ, लेकिन उसी दिन एक और ख़बर आयी कि जिसने वाइएसआर के वियोग में आत्महत्या की, उसके परिवार को आर्थिक मुआवजा यह कहते हुए दिया गया कि वाइएसआर के बिना परिवार का जीवनयापन-भरणपोषण मुश्किल है। अगर यह सच है, तो यह कह सकते हैं कि हमारे नेता मानवीय मूल्यों को खोने की आख़िरी राह पर चल रहे हैं।
झारखंड की बात करें। संसदीय लोकतंत्र इस राज्य को कभी प्रगति पथ पर ले जानेवाला साबित नहीं हुआ। अनैतिक राजनीति के लिए रांची सबसे बेहतरीन जगह है, जहां बड़े-बड़े नेता हत्या के दोषी पाये गये, सत्ता के लिए हॉर्स ट्रेडिंग में लगे रहे, पक्षपाती राज्यपाल केंद्र द्वारा कहे जाने पर भी इस्तीफा देने से इनकार करते रहे। रांची का नाम इसलिए ले रहा हूं, क्योंकि झारखंड की सरकार इसी राजधानी में संचालित होती है। बाकी जगहों पर तो माओवादी नियंत्रित करते हैं। अब मधु कोड़ा की बात करते हैं, जो दो दशक में एक मज़दूर से अरबपति बन गये। स्वाभाविक रूप से और भ्रष्टाचारियों की बनायी परंपरा का निर्वाह करते हुए मधु कोड़ा भी सीने में दर्द के कारण अस्पताल में भर्ती हो गये, जब उन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे।
एक और दूसरे राज्य की बात करते हैं, जो देश के समृद्ध राज्यों में से है। वह है महाराष्ट्र, जहां ऐसी आश्चर्यजनक घटना घटी, जैसा कि भारतीय राजनीति में पहले कभी नहीं देखा गया। वह मुख्यमंत्री, जो 60 घंटे तक चले 26/11 की घटना के बाद एक फिल्मवाले को अतिथि बना कर ताज होटल दिखाने ले गया था, उसे बाद में केंद्र में कैबिनेट मंत्री बना दिया जाता है। महाराष्ट्र में चुनाव परिणाम आने के बाद दो सप्ताह तक चखचख चली, कैबिनेट गठित करने के लिए और कैबिनेट का गठन कैसा हुआ? वह आरआर पाटील, जो 26/11 के समय महाराष्ट्र के गृह राज्य मंत्री थे और जिन्होंने घटना के बारे में यह कहा था कि मुंबई जैसे बड़े शहर में ऐसी छोटी घटनाएं होती रहती हैं, उन्हें फिर से राज्य का गृहमंत्री बना दिया गया। शिवराज पाटील (जिन्हें कलंकित कर केंद्रीय गृहमंत्री पद छोड़ने को बाध्य किया गया था) ने आरआर पाटील को फिर से गृहमंत्री बनाये जाने को उत्साहजनक क़दम बताया। छगन भुजबल, जो मुंबई पुलिस को तहस-नहस करने में सबसे अहम भूमिका निभा चुके हैं, उन्हें फिर से उप मुख्यमंत्री बना दिया गया। विधानसभा में पहले ही दिन महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना का एक दबंग विधायक, जो अब एमएलए भी है, ने सदन को इसलिए नहीं चलने दिया, क्योंकि वहां किसी ने हिंदी में शपथ ले ली थी।
क्या हमारे नेताओं के पास कोई शर्म नहीं है! खैर! यह आडंबरयुक्त सवाल है।
कर्नाटक में क्या हुआ? वहां कुछ दबंगों ने, जिन्हें हम रेड्डी ब्रदर्स के नाम से जानते हैं, ने राज्य सरकार को बंधक-सा बना लिया। भाजपा नेतृत्व असहाय-लाचार होकर यह सब देखता रहा। इतना ही नहीं, सभी मूल्यों को ताक पर रख कर बीजेपी को रेड्डी बंधुओं की मांग को पूरी करते हुए मुख्यमंत्री के करीबी को इस्तीफा देने को बाध्य करना पड़ा। उसके बाद मुख्यमंत्री टीवी चैनलों के सामने आंसू बहाते नज़र आये। दिल्ली में जेसिका लाल हत्याकांड में अभियुक्त मनु शर्मा को पेरोल पर इसलिए छोडा गया, क्योंकि उसकी बुज़ुर्ग मां बीमार थी! बाद में पता चला कि मनु की मां 50 साल की हैं, स्वस्थ हैं और हरियाणा चुनाव में उन्होंने अपने पति के लिए धुआंधार कैंपेन भी किया था। जिस दिन मनु को पेरोल पर रिहा किया गया, उस दिन उनकी मां चंडीगढ़ में एक एनजीओ के फंड रेजिंग कार्यक्रम में भाषण दे रही थीं। मनु को रात में बीमार मां की सेवा और देखभाल की जगह दिल्ली के नाइट क्लब में देखा गया। दिल्ली की मुख्यमंत्री ने पेरोल पर रिहा करने की सहमति देते हुए यह तर्क गिनाये कि इसके लिए पर्याप्त वजह है। शुक्रिया ईश्वर का, कि मनु फिर से जेल में है।
लगभग दो माह बाद हम गणतंत्र दिवस की 60वीं सालगिरह मनाएंगे। जब भी अगले गणतंत्र दिवस के बारे में सोचता हूं, मेरे ज़ेहन में क्यों केला शब्द आ रहा है?
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व ओपन मैग़ज़ीन के संपादक हैं और यह आलेख 20 नवंबर के अंक में छपा है। इसका अनुवाद प्रभात ख़बर के पत्रकार निराला ने किया है।)
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Dr. Vishnu Rajgadia
December 5, 2009 at 7:35 pm
मौजूदा राजनीति पर अच्छा लेख है. लेकिन आज तो नेताओं से ज्यादा बेशर्मी मीडिया दिखा रहा है. एक ताजा उदाहरण देना चाहूंगा जिससे नेता और मीडिया, दोनों की बेशर्मी उजागर होती है.
बिहार के मुख्यमंत्री को मीडिया ने चाटुकारिता की हदें पार करके सुशासन बाबू का दरजा दे रखा है. उसी सुशासन बाबू ने सूचना का अधिकार कानून की हत्या कर दी है. यह संसद का बनाया कानून है. इसमें छेड़छाड़ की इजाजत किसी को नहीं. इस कानून ने सिर्फ फीस संबंधी नियम बनाने का अधिकार केंद्र एवं राज्य सरकारों को दिया है. ऐसे नियम भी सूचना कानून की मूल भावना एवं प्रावधानों के अनुकूल होने चाहिए.
लेकिन 19 अक्तूबर 2009 को नीतीश सरकार ने सूचना कानून के मूल प्रावधानों में ही गंभीर छेड़छाड़ करके शर्मनाक अपराध किया है.
संसद के बनाये कानून में यह अनधिकृत घुसपैठ है. बिहार सरकार ने एक घुसपैठिये की भूमिका निभायी है.
पूरे देश के लोग जिस सूचना के अधिकार का लाभ उठा रहे हैं, उसका लाभ अब बिहार के नागरिकों को नहीं मिलेगा. बिहार के लोगों को पूरे देश से अलगाव में डाल दिया गया है. इस नाते बिहार सरकार ने अलगाववादी भूमिका निभायी है.
बिहार सरकार ने पूरी ढिठाई अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर निकलकर नागरिकों के अधिकारों का अतिक्रमण किया. लेकिन मीडिया के लिए यह मुद्दा नहीं.
नीतीश के सुशासन की ढोल बजाने वाले सारे चाटुकार बुद्धिजीवी बेशर्मी से खामोश हैं. उनकी खामोशी का सबब पूरा बिहार समझ रहा है. समय सबको औकात बतायेगा.
डाॅ. विष्णु राजगढ़िया