Subscribe by Email

कृपया उन्नी दंपति पर आंसू न बहाएं

वह एक उदास करने वाली शाम थी। टेलीविजन 26/11 के हमले की पहली वर्षगांठ ‘मना’ रहा था। तर्कवीर सुबह से कुछ निंदा, कुछ आलोचना, कुछ समालोचना, कुछ प्रशंसा, तो कुछ निजी एजेंडे के तीर चला रहे थे। जितने मुंह उतनी बातें। तर्को के इस घमासान में यह सच दम तोड़ चुका था कि हम अभी भी एक राष्ट्र के तौर पर असुरक्षित हैं। 26/11 के उस जानलेवा हादसे के बाद एक साल में हमने जो किया है, उससे कहीं ज्यादा किया जाना चाहिए था। न केवल सरकार, बल्कि देश के जागरूक नागरिक भी इस मामले में असफल रहे हैं। लेकिन टीवी की इस तमाशाखोरी के बीच एक ऐसा कार्यक्रम भी देखने को मिला, जिसने रोंगटे खड़े कर दिए।

वे के. उन्नीकृष्णन और उनकी पत्नी धनलक्ष्मी थे। कौन हैं ये उन्नीकृष्णन दम्पति? भूल गए? ये वही हैं, जिन्होंने अपने इकलौते बेटे मेजर संदीप उन्नीकृष्णन को इस हमले के दौरान हमेशा के लिए खो दिया था। ताज होटल को आतंकियों से मुक्त कराने के अभियान में इस जवान मेजर के एक साथी को प्राणघाती चोटें लग गईं थीं। उस मौके पर उन्होंने अपने साथियों को कहा कि तुम लोग रुको, मैं देखता हूं। वे आगे बढ़े तो इतना आगे बढ़ गए कि जिंदगी पीछे छूट गई।

आज बेटे की मौत के एक साल बाद उन्नीकृष्णन दंपति अकेले हैं और बेमकसद जिंदगी जीने की यंत्रणा हर क्षण भोग रहे हैं। तफसील में जाने से पहले यह सुनिए कि उन्होंने इंटरव्यू में क्या कहा? एंकर ने उनसे पूछा कि क्या आपको अपने बेटे की बहादुरी पर गर्व है? अब तक हम सुनते आए हैं कि भीगी आंखों और भर्राए गले से लोग कहते हैं कि हां, हमें गर्व है कि हमने अपना बेटा देश के लिए कुर्बान कर दिया। अक्सर वे अपने प्रिय की कुर्बानी का हवाला देकर सत्ताधीशों के आसपास मंडराते नजर आते हैं। पर उनका प्रति प्रश्न था – नहीं, मुझे क्यों गर्व हो? उसने अपनी ड्यूटी निभाते समय जान गंवाई। मैंने उसको एक ही चीज सिखाई थी, वह थी काम के प्रति निष्ठा। उसने निष्ठा से अपने कर्तव्य को अंजाम दिया और मारा गया।

मेरे मन में सवाल उठता है। वह क्यों मारा गया? किसके लिए मारा गया? कर्तव्यहीन नेताओं के लिए? कल को कोई आतंकवादी किसी भ्रष्ट नेता का अपहरण कर ले, तो फिर एनएसजी के जवान इसी तरह लड़ते और जान गंवाते नजर आएंगे। क्यों? किसके लिए?

मैंने देखा कि एंकर की आंखें भीग चली थीं। टीवी की तमाशागोई करने वाले अक्सर बेहिस हो जाते हैं। पर मैं ऋचा अनिरुद्ध की तारीफ करना चाहूंगा। उन्होंने यह इंटरव्यू दिमाग से नहीं दिल से किया। इसीलिए उन्नीकृष्णन दम्पति जो बोले, वह जीती-जागती त्रासदी का सुलगता हुआ बयान था।

एक और सवाल था कि आप लोगों ने अक्सर अपनी जिंदगी को खत्म करने की सोची। क्या यह सच है? जवाब फिर से बेलाग था – हां। अपनी पत्नी की ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा कि ये अक्सर कहती हैं, हमें अपना जीवन खत्म कर देना चाहिए। फिर ये ही मना कर देती हैं। जिस दिन ये चाहेंगी कि ऐसा करना है, उस दिन मैं इनका साथ दूंगा। वे आगे बोलते हैं कि हम जी कर क्या करेंगे? लोगों के सामने मकसद होता है। किसी को बच्चे पालने होते हैं, किसी पर परिवार की जिम्मेदारी होती है पर हमारे आगे कुछ भी नहीं है। संदीप एक जिंदादिल इंसान था, वह जीना चाहता था, पर जी न सका।

इसी बीच धनलक्ष्मी बोलती हैं कि मुझे अपने शरीर पर अपने बेटे के स्पर्श का अहसास अभी भी होता है। उफ़! पितृत्व और मातृत्व की मेरे लिए यह एक नई व्याख्या थी। सिर्फ़ एक मां ही अपने जने के स्पर्शसुख को समझ सकती है। उसे सदा के लिए खो बैठने का अफसोस कितनी पीड़ा देता होगा? पल, पल, हर पल।

मैंने पहली बार ऐसा पिता देखा जो अपने बेटे की मृत्यु को नाहक गरिमा नहीं प्रदान कर रहा था। उन्हें बदले में कुछ नहीं चाहिए था। उनकी शिकायत इस व्यवस्था से है, जो लोगों की जान लेती है। विचारों का यह अन्तरिक्ष क्या ‘उन्नी’ को इसरो की नौकरी के दौरान मिला। या इस भयंकर आपबीती ने उन्हें वैचारिक अश्वस्थामा बना दिया? बेचैन और अपने हरदम रिसते घाव का अभ्यस्त।

यही वजह है कि जब केरल के मुख्यमंत्री अच्युतानंदन सियासी मातमपुरसी के लिए उनके पास पहुंचे तो उन्होंने मिलने से भी इंकार कर दिया था। उनका कहना था कि मैं कुत्तों से भेंट नहीं करना चाहता। तमतमाये मुख्यमंत्री ने बाद में पत्रकारों से कहा था कि अगर ये मेजर संदीप उन्नीकृष्णन के पिता नहीं होते तो कोई कुत्ता भी उनसे मिलने नहीं जाता। जाहिर है।

देश का हर संवेदनशील व्यक्ति इस प्रतिक्रिया से अपमानित महसूस कर उठा था पर अच्युतानंदन अड़े रहे। बाद में उनकी ओर से पार्टी के महासचिव प्रकाश करात ने माफी मांगी। एक और उदाहरण। नई दिल्ली की वसुंधरा में एक पेट्रोल पंप है। वहां वाहनों की भीड़ लगी रहती है। मशहूर है। इस पंप पर शुद्ध और माप में पूरा रसायन मिलता है। गजब कहानी है इसकी भी।

यह कारगिल के अमर शहीद कैप्टन अनुज नायर की याद में चल रहा पेट्रोल पंप है। अनुज के पिता एस. के. नायर इसे चलाते हैं। कहते हैं- सरकार ने इन्हें पेट्रोल पंप तो अलाट कर दिया था, परंतु इसकी जमीन के आवंटन से लेकर अन्य प्रक्रियाओं को पूरा करने में उन्हें काफी जूझना पड़ा। ‘इंस्पेक्टर राज’ रिश्वत की अपनी परंपरा को कायम रखने पर अड़ा था। उधर, एस. के. नायर की जिद थी कि मैं कोई चढ़ावा नहीं चढ़ाऊंगा। आखिर यह मेरे बेटे की शहादत की निशानी है।

मुझे लगता है। अनुज से भी कठिन लड़ाई उनके पिता ने लड़ी। आप जब व्यवस्था से लड़ते हैं तो निस्संग हो जाते हैं। पर एस. के. नायर लड़ते रहे और पंप कायम करके ही दम लिया। मुझे यकीन है। उन्होंने यह सब पैसा कमाने के लिए नहीं किया था। शत-प्रतिशत ईमानदारी का परिचय देकर वे अपने पंप से बिकने वाले डीजल- पेट्रोल की हर बूंद के साथ बेटे के आदर्शो को प्रज्ज्वलित रखते हैं।

देखने में उन्नीकृष्णन और नायर परिवारों की प्रतिक्रियाएं अलग लगती हैं। पर दोनों का संदेश एक है। हमारे हुक्मरान नौजवानों के लहू से कब तक आंख चुराते रहेंगे? कोई भी देश नौजवानों को कंधा देकर महान नहीं बनता। बल्कि उनके मजबूत कंधों पर चढ़कर आगे बढ़ता है। ‘दिनकर’ और उनका ‘कुरुक्षेत्र’ याद आ रहा है।

वह कौन रोता है वहां,

इतिहास के अध्याय पर,

जिसमें लिखा

नौजवानों के लहू का मोल है।

प्रत्यय किसी बूढ़े,

कुटिल नीतिज्ञ के व्यवहार का,

 जिसका हृदय इतना मलिन

 जितना कि शीर्ष वलक्ष है।

जो आप तो लड़ता नहीं

कटवा किशोरों को

मगर आश्वस्त होकर सोचता

शोणित बहा लेकिन बच गई

लाज सारे देश की।

(हिंदुस्तान से साभार)

खांटी पत्रकार। लगभग तीस साल से संपादक। पहले आज, फिर अमर उजाला और अब हिंदुस्तान के प्रधान संपादक। कुछ समय के लिए देश के नंबर न्यूज़ चैनल आज तक में एक्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर। आप उनसे sashi.shekhar@hindustantimes.com पर संपर्क कर सकते हैं।

Share This Post

One Response to कृपया उन्नी दंपति पर आंसू न बहाएं

  1. abbbu Reply

    November 29, 2009 at 11:45 pm

    this is the magiK of this man . Sashi ji has done it again, earlir also he has written many passonate write ups

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

You may use these HTML tags and attributes: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <strike> <strong>