लिब्रहान कमीशन पर सरकार की एटीआर में एक प्रस्ताव ये भी है कि राजनीतिक दल अगर धर्म का इस्तेमाल करेंगे तो उन पर पाबंदी लगनी चाहिए। इशारा ज़रूर बीजेपी और संघ परिवार की ओर था। लेकिन फिर इतिहास में कांग्रेस पर भी धर्म का राजनीतिक फायदे के लिये इस्तेमाल करने का आरोप लगेगा। क्योंकि बाबरी विध्वंस की नींव तो उसी दिन पड़ गयी थी जब 1986 में एक दिन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने विवादस्पद ढांचे पर लगा चालीस साल पुराना ताला खुलवाया था और राम लला की पूजा करवायी थी। तब तक वहां साल में एक बार ही राम लला की पूजा होती थी। लेकिन ताला खुलवाते समय राजीव गांधी अचानक हिंदू नेता हो गये। क्योंकि शाह बानो मामले में वो कट्टरपंथी मुसलमानों के चक्कर में पड़ चुके थे। शाह बानो मामले पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश की काट में नया कानून ला चुके थे। हिंदू वोटर नाराज़ था। चुनांचे उसे भी खुश करना था। राजनीति चमकाने के लिये धर्म का ये चोगा उन्होंने अपने कार्यकाल के आखिरी दिनों तक ओढ़े रखा और 1989 में उन्होंने उस विवादास्पद भूमि पर शिलान्यास करा कर आडवाणी से पहले ही हिंदू हृदय सम्राट की उपाधि अर्जित कर ली। लेकिन इस फेर में उन्होंने हिंदू कट्टरपंथियों को वो करने का मौका दिया जो उन्होंने 6 दिसंबर 1992 को किया।
अब सवाल ये है कि अगर तो वो ‘राम लला’ का जन्मस्थान था तो हिंदुओं ने उसे तोड़ा क्यों? इतिहास को बचा कर क्यूं नहीं रखा। और गर ये मान लिया जाए कि वहां मंदिर कभी था नहीं बल्कि बाबर ने मस्जिद बनवायी थी तो सवाल ये उठता है कि ऐसी ऐतिहासक धरोहर को नरसिंह राव की कांग्रेस सरकार क्यों नहीं बचा पायी? पहले आरोप का जवाब संघ परिवार यानी महानुभाव वाजपेयी, आडवाणी, विनय कटियार, कल्याण सिंह, अशोक सिंघल, साध्वी रितंबरा आदि को देना होगा। इनमें से कई लोगों पर अलग अलग मुक़दमा भी चल रहा। लेकिन दूसरी बात का जवाब लिब्रहान कमीशन की रिपोर्ट में होगा ये उम्मीद ज़रूर की जा रही थी। लेकिन इस बाबत रिपोर्ट ने निराश किया। जस्टिस लिब्रहान ये कहने से चूक गये कि विध्वंस को लेकर नरसिंह राव और उनकी सरकार का रोल भी संदेह के घेरे में था। यानी सब मिले-जुले थे। प्रधानमंत्री राव के साथ साथ उनकी पूरी कैबिनेट सोती रही जब बजरंगी मस्जिद की छाती पर कुदाल चला रहे थे और उमा भारती अपने गुरू पंडित मुरली मनोहर जोशी के गले में बांह डाले वहां मौजूद पत्रकार-कैमरामेन को पोज दे रहीं थीं। और तब शायद सारे कांग्रेसी भी यही चाहते थे कि विवाद की जड़ हमेशा के लिये ख़त्म हो जाये तो अच्छा – न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी।
लेकिन जस्टिस लिब्रहान तबकी राव सरकार को साफ बचा ले गये। आखिर क्यों? सन 1992 में कांग्रेस को केन्द्र में शासन करने का 40 साल का तजुर्बा था। राज्यों की छोटी मोटी गतिविधियों को वो दूर दिल्ली में बैठी भांप लेती थी। पंजाब से लेकर केरल तक, जम्मू-कश्मीर से लेकर आंध्र प्रदेश तक दर्जनों बार केन्द्र की कांग्रेस सरकार ने राज्य सरकारों को बर्ख़ास्त किया है। लॉ एंड ऑर्डर के नाम पर धारा 356 लगा कर चुनी हुई सरकारें बेदखल की हैं। इस मामले में इतने पुराने तजुर्बे के बाद ये मान लेना कि कांग्रेस की नरसिंह राव सरकार को इंटेलिजेंस इनपुट नहीं मिला। या नरसिंह राव और उनकी पूरी कैबिनेट कल्याण सिंह की चिकनी-चुपड़ी बातों में आ गई। या सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाई का इंतजार करते रहे – बड़ा हास्यास्पद लगता है। एक पाक-साफ इमेज वाले पूर्व जस्टिस ने अपनी रिपोर्ट मे ऐसा माना इसलिए आश्चर्य भी होता है। क्योंकि पूर्व केन्द्रीय मंत्री और गांधी परिवार के करीबी माने जाने वाले माखनलाल फोतेदार ने 6 दिसंबर के रोज अयोध्या से आ रही खबरों को लेकर प्रधानमंत्री आवास पर कई फोन मिलाये। बकौल फोतेदार उन्हें हमेशा यही जवाब मिला की साहब सो रहे हैं। दो साल पहले कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी कह चुके हैं कि गांधी परिवार को कोई सदस्य सरकार में होता तो मस्जिद कभी न गिरती। लेकिन जस्टिस लिब्रहान अपनी एक हजार पेज की रिपोर्ट में नीरो के साथ खड़े दिखे।
देश के स्वतंत्रता आंदोलन में भी धर्म का माकूल इस्तेमाल किया गया। फर्क ये था कि तब दुश्मन गैर-मुल्की था। आक्रमणकर्ता था। आज दुश्मन की शक्ल हम एक दूसरे में ही टटोल रहे। और क्या फिर धर्म को राजनीति से अलग रखने पर पार्टियां एकमत हो पाएंगी। ये मुखौटा तो अब सब पार्टियों पर फिट आने लगा है। हर रंग में उपलब्ध है ये मुखौटा – लाल, हरा, केसरिया। और इन रंगो के कई शेड्स में। राज्य सभा में लिब्रहान कमीशन की रिपोर्ट पेश होते ही ये मुखौटा फिर सामने आया। बीजेपी और समाजवादी सांसदों नें जय श्री राम और या अली के नारे लगाये। दोनों पार्टियां अपने अपने वोट बैंक से मुखातिब दिखीं।
जब तक राजनीतिक दल समाज को हिंदू , मुसलमान, सिख, ईसाई के खांचे में रखेंगी और उन्हें वोट बैंक से ज्यादा कुछ नहीं समझेंगी तब तक ये मुखौटा ही उनके काम आयेगा। क्योंकि ऐसा न होता तो पिछले 17 सालों में अदालत में मामला लंबित न होता। दोषी सज़ा भुगत रहे होते। मुखौटे बेनकाब हो गये होते। फिर न कोई छद्मधारी मॉडरेट होता न छद्म धर्मनिरपेश। बस विवादित स्थान पर भव्य मंदिर और मस्जिद होती। और हिंदू -मुस्लिम सब मिलकर अपनी साधना, आराधना और बंदगी में जुटे होते।
((वरिष्ठ पत्रकार प्रभात शुंगलू IBN-7 में एडिटर (स्पेशल असाइनमेंट) हैं))
saand
December 2, 2009 at 3:03 pm
इन मुखोटों पर और कटनी चर्चाएँ करेंगे!!! किताबे भरी पड़ी है !! गिगित भी ऐसे रंग नहीं बदलता नेता पल में मुस्लिम पल में हिन्दू बनता है !!