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इस संसद का क्या करें?

“आजतक एक भी चीज को पार्लियामेंट ने ठिकाने लगाया हो, ऐसी कोई मिसाल देखने में नहीं आती। बड़े सवालों की चर्चा जब पार्लियामेंट में चलती है, तब उसके मेंबर पैर फैलाकर लेटते हैं या बैठे बैठे झपकियां लेते हैं। उस पार्लियामेंट में मेम्बर इतने जोरों से चिल्लाते हैं कि सुनने वाले हैरान-परेशान हो जाते हैं। उसके एक महान लेखक ने उसे दुनिया के बातूनी जैसा नाम दिया है। मेंबर जिस पक्ष के हों, उस पक्ष के लिए अपना मत बगैर सोचे-समझे दे देते हैं, देने को बंधे हुए हैं। अगर कोई मेंबर इसमें अपवादस्वरूप निकल आए, तो उसकी कमबख्ती ही समझिए। जितना समय और पैसा पार्लियामेंट खर्च करती है, उतना समय और पैसा अगर अच्छे लोगों को मिले, तो प्रजा का उद्धार हो जाए।”

ठीक 100 साल पहले गांधी जी ने यह विचार ब्रिटिश संसद के लिए व्यक्त किये थे। अपनी किताब हिंद स्वराज्य में। तब भारत अंग्रेजों का गुलाम था और यहां संसद की जगह ब्रिटिश असंबली थी। लेकिन 100 साल में भारतीय संसद उस बदतर स्थिति से भी बदतर हो गयी है, जिसका जिक्र गांधी जी ने ब्रिटिश संसद के लिए किया है।

कभी अति शोरगुल तो कभी अति अनुपस्थिति भारतीय संसद की नियति बन गयी है। आलम यह है कि बात-बात पर संसद को सिर पर उठा लेने वाले सांसद प्रश्नकाल के दौरान सदन में नहीं रहते। अगर ऐसा होता तो सोमवार को प्रश्नकाल के दौरान लोकसभा में 20 में से सिर्फ 3 सवाल ही नहीं पूछे जाते और प्रश्न पूछने के लिए नामित 34 माननीय लोकसभा सदस्य सदन से नदारद नहीं रहते। और इस मसले पर दुखी स्पीकर मीरा कुमार को अपनी नाराजगी यह कहकर नहीं जतलानी पड़ती कि वे सभी राजनीतिक दलों के नेताओं को इस पर चिठ्ठी लिखने जा रही हैं। वैसे तो हर राजनीतिक दल यह साबित करने में लगा रहता है कि मेरी कमीज तुमसे उजली है लेकिन इस मामले में सारी पार्टियां एक जैसी हैं और एक साथ हैं। चाहे सत्तारूढ़ कांग्रेस के मधु गौड़ याक्षी हों या फिर मुख्य विपक्षी दल भाजपा के वरुण गांधी, समाजवादी पार्टी की जयाप्रदा हों या फिर जद-यू के राजीव रंजन सिंह ललन। सोनिया गांधी ने अपने सांसदों पर त्यौरी चढ़ाई तो सारे दलों के सांसदों ने रेल, जहाज और कोहरे पर अपनी गैर-मौजूदगी का ठीकरा फोड़ दिया। कमाल के हैं सांसद। सदन में रहेंगे तो हल्ले-हंगामे में स्कूली बच्चों को पीछे छोड़ देंगे और नहीं रहेंगे तो सवाल उठाने के लिए भी नहीं। उन्हें इस बात का भी ध्यान नहीं रहता कि जिस जनता के नाम पर संसद से सड़क तक उनकी जुबान चलती है, उन आम लोगों के पैसे से ही सिर्फ लोकसभा में एक घंटे पर 14 लाख रुपये खर्च किये जाते हैं। मोटा हिसाब लगाएं तो एक सवाल पर एक लाख रुपये खर्च होते हैं। लेकिन राष्ट्रभक्त सांसदों को इसकी परवाह नहीं।

कमोबेश हर अखबारों ने लिखा कि 18 साल में पहली बार यह हुआ कि सदस्यों की गैरमौजूदगी की वजह से सदन की कार्यवाही को बीच में स्थगित करना पड़ा। लेकिन इसकी शुरुआत तो राजीव गांधी के राज में ही हो गयी थी। राजीव गांधी के बारे में ही यह कहा जाता है कि प्रधानमंत्री रहते हुए वह सदन से अक्सर गायब रहते थे और कई बार सदन में उनकी मौजूदगी होकर भी नहीं होती थी क्योंकि सवालों का जवाब देने से वह बचते थे। धीरे धीरे सदन से गायब रहने को सांसदों और मंत्रियो ने अपना राष्ट्रीय धर्म बना लिया।

लेकिन जो सांसद और मंत्री सदन में रहते हैं, वही कौन सा अच्छा काम कर रहे हैं, जिससे सदन की गरिमा बढ़ रही हो। सोमवार को अगर लोकसभा में प्रश्नकाल के दौरान सवाल करने वाले सांसद ही गायब थे तो मंगलवार को राज्यसभा में वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी जिस तरह विपक्ष और सीपीएम सांसद वृंदा करात पर भड़के, वह लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुकूल नहीं था। विपक्ष तो महंगाई जैसे गंभीर मसले पर सरकार से सफाई मांग रहा था लेकिन खुद को सबसे काबिल मानने वाले वित्त मंत्री को विपक्ष का सवाल करना नागवार गुजरने लगा। कायदे से तो गुस्सा विपक्ष को करना चाहिए लेकिन यहां उलटा हुआ। मुखर्जी ने वृंदा करात पर चीखते हुए कहा कि अपना रोष वो कहीं और जाकर दिखाएं। लगे हाथ मुखर्जी जी को यह भी बता देना चाहिए था कि अपना रोष जताने वृंदा कहां जातीं। इसे ही कहते हैं कि चोरी भी, सीनाजोरी भी। जनता महंगाई की सूली पर लटकी हुई है और सरकार के सबसे सीनियर मंत्री को इस पर विपक्ष का सवाल उठाना भी गवारा नहीं। कैसी संवेदनाहीन सरकार है!

ब्रिटिश संसद को गांधी ने हिंद स्वराज्य में ही बांझ और वेश्या कहा था, जिसे एक महिला की आपत्ति पर हटा लिया था। नहीं पता, सांसदों की गैरमौजूदगी, हंगामा और मारपीट (अमर सिंह-अहलुवालिया प्रकरण) वाली मौजूदा संसद के बारे में उनकी राय किन शब्दों में बाहर आती।

((विचित्र मणि टेलीविजन में वरिष्ठ पत्रकार हैं))

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